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Full text of "Nandi Sutra (1991)ac 50 Mlj"

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९ 
श 
जप 


जिनागम-प्रन्धथमाला : प्रस्थाजु १२ 


[परमश्रद्धेय गुरुदेव पूज्य श्री जोरावरमलजी महाराज की पुण्यस्मृति मे श्रायोजित ] 


श्रीदिववाचकविरचित 
ननन्‍्दीसृञ्ञ 


[मूलपाठ, हिन्दी श्रनुवाद, विवेचन, परिशिष्ट युक्त ] 





श्ल| 

प्रेरणा 

(स्व.) उपप्रव्तक शासनसेवी स्वासो श्री ग्रजलालजी भहाराज 
| 


सयोजक तथा प्रधान सम्पादक 
श्री स्‍था जन श्रमणसघ के युवाचारय्य 
(स्व०) युवाचार्य श्री सिश्रीमलजी महाराज 'सधुकर' 


[] 

ग्रनुवादन --विवेचन 

जन साध्वी उसरावकु वर 'अ्खंना' 
| 

सम्पादन 

कमला जेन 'जोजी', एम ए 

() 


प्रकाशक 
श्री आागमप्रकाशन समिति; ब्यावर (राजस्थान) 


जिनागस-म्रन्थसाला : प्रन्याजू १२ ४ १२ 


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पते 


ध। 


निर्देशन 
साध्वी श्री उमरावबकु वर “अर्चना' 


सम्पादकमण्डल 
अनुयोगप्रवर्तक घुनि श्री कन्हैयालालजी 'कमल 
उपाचायं श्री वेवेन्द्रमुनि शास्त्री 

श्री रतनमुनि 


7 


सम्प्रेरक 
सुनि कली वितयकुलार 'सोस' 
श्री सहेन्द्रमुनि दिनकर" 


द्वितोय सस्करण प्रकाशनतिथि 
बीर निर्वाण सं० २५१७ 

विक्रम सं० २०४८ 

अगस्त १९९१ ई० 


प्रकाशक 
श्री आगमभप्रकाशन समिति 

श्री ब्रज-मधुकर स्मृति भवन, 
पीपलिया बाजार, ब्यावर (राजस्थान) 
पिन--३०५९० १ 


मुद्रक 
सतीशचनत शुक्ल 

वैदिक यंत्रालय, 

क्रेसरगंज, अजमेर--३०५०० १ 


7) मूल्य ऑफ | १0/.. 


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समर्पण 


जिनकी साहित्य-सेवा श्रमर रहेगी, 

जिनके प्रकाण्ड पाण्डित्य के समक्ष 
जेन-जैनेतर विद्वान्‌ नतमस्तक होते थे, 

जो सरलता, शान्ति एबं सयम की प्रतिमूर्ति थे, 
भारत की राजधानी में जो अपने भव्य एवं. 
दिव्य व्यक्तित्व के कारण भारतभूषण' के 
गौरवमय विरुद से विभूषित किए गए, 
जिनके अश्रगाध आगमज्ञान का लाभ मुभे भी 
प्राप्त करने का सद्भाग्य प्राप्त हुआ, 

उन बविद्वद्वरिष्ठ शतावधानी 

मुनिश्री रत्नचन्द्रजो महाराज के 
कर-कमलो मे । 

मधुकर मुनि 

[ प्रथम संस्करण से] 


ग्राकाशकोाय 


श्री नन्‍दीसूत्र का यह द्वितीय सस्करण पाठको के हाथो में है। इस सूत्र का श्ननुवाद और विवेचन श्रमण- 
सघीय प्रख्यात विदुषी महासती श्री उमरावकुंवरजी म० “'ग्रचनंना” ने किया है। महासती “अ्रचंना” जी से 
स्थानकवासी समाज भलीभाति परिचित है। प्रापके प्रशस्त साहित्य को नर-नारी बडे ही चाव से पढते-पढाते हैं । 
प्रवचन भी प्रापके श्रन्तरतर से विनिर्गंत होने के कारण श्रतिशय प्रभावोत्पादक, माधुयं से ओत-प्रोत एवं बोधप्रद 
है । प्रस्तुत आगम का अनुवाद सरल झौर सुबोध भाषा में होने से स्वाध्यायप्रेमी पाठकों के लिये यह सस्करण 
अत्यन्त उपयोगी होगा, ऐसी आशा है । 

प्रस्तुत सूत्र परम मागलिक' माना जाता है । हजारो वर्षों से ऐसी परम्परा चली श्रा रही है ! श्रतएवं साधु- 
साध्वीगण इसका सज्काय करते है, भ्रनेक श्रावक भी । उन सबके लिए न अ्रधिक विस्तृत, न श्रधरिक सक्षिप्त, 
मध्यम शैली में तेयार किया गया यह सस्करण विशेषतया बोधप्रद होगा । 


समिति अपने लक्ष्य की ओर यथाशक्‍्य सावधानी के साथ किन्तु तीत्र गति से श्रागे बढ रही है। आगम 
बत्तीसी क॑ प्रकाशन का कार्य पूर्ण होने जा रहा है तथा भ्रप्राप्य शास्त्रो के द्वितीय सस्करण मुद्रित हो रहे हैं । 


5५५ 


यह सब श्रमणसघ के स्व० युवाचार्य पण्डितप्रवर मुनिश्री मिश्रीमलजी म० सा० “मधुकर'' के कठिन श्रम 
ओर श्रागमज्ञान के प्रधिक से भ्रधिक प्रचार-प्रसार के प्रति तीत्र लगन तथा गम्भीर पाण्डित्य के कारण सम्भव हो 
सवा है । 


ग्रन्त मे जिन-जिन महानुभावों का समिति को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप मे सहयोग प्राप्त हुआ या हो रहा है, उन' 
सभी के प्रति हम हादिक शझ्राभार व्यक्त करना श्रपना कत्तंव्य समभते हैं । 


रतनचन्द मोदी सायरमल चोरडिया अमभरचन्द सोदी 
कार्य वाहक ग्ध्यक्ष महामत्री मत्री 
क्री आगमप्रकाशन समिति, ब्यावर 


श्री आगम प्रदआाशन समिलि, व्यायर 


अश्रध्यक्ष 
कार्यवाहक अध्यक्ष 
उपाध्यक्ष 


महामत्री 
मत्री 


सहमत्री 
कोषाध्यक्ष 


सदस्य 


परामशंदाता 


(कार्यकारिणी समिति ) 


श्री किशनलालजी बंताला 

श्री रतनचन्दजी मोदी 

श्री धनराजजी विनायकिया 

श्री पारसमलजी चोरडिया 

श्री हुक्मीचन्दजो पारख 

श्री एस किशनचन्दजी चो रडिया 
श्री जसराजजी पारख 

श्री जी० सायरमलजी चोरडिया 
श्री अमरचन्दजी मोदी 

श्री ज्ञानराजजी मूथा 

श्री ज्ञानचन्दजी विनायकिया 
श्री जवरीलालजी शिशोदिया 
श्रो अमरचन्दजी बोथरा 


श्री एस बादलचन्दजी चोरडिया 
श्री मूलचन्दजी सुराणा 

श्री दुलीचन्दजी चोरडिया 
श्री प्रकाशचन्दजी चौपडा 
श्री मोहनसिहजी लोढा 

श्री सागरमलजी बेताला 
श्री जतनराजजी मेहता 

श्री भवरलालजी श्रीश्रीमाल 
श्री चन्दममलजी चोरडिया 
श्री सुमेरमलजी मेडतिया 
श्री आसूलालजी बोहरा 


श्री जालमसहजी मेडतवाल 
श्री प्रकाशचन्दजी जैन 


मद्रास 
ब्यावर 
ब्यावर 
मद्रास 
जोधपुर 
मद्रास 
दुर्ग 
मद्रास 
ब्यावर 
पाली 
ब्यावर 
ब्यावर 
मद्रास 
मद्रास 
नागौर 
मद्रास 
ब्यावर 
ब्यावर 
इन्दौर 
मेडतासिटी 
दुगं 
मद्रास 
जोधपुर 
जोधपुर 
ब्यावर 
नागोर 


नन्दीसृत्र-प्रथम संस्करण प्रकाशन के विशिष्ट अर्ंसहयोगी 
श्रीमान्‌ सेठ एस. रलनचन्दजी चोरड़िया, मद्रास 


(जीवन परिचय ] 


आपका जन्म मारवाड के नागौर जिले के नोखा (चादावतों का) ग्राम में दिनाक २० दिसम्बर १९२० 
ई को स्व श्रीमान्‌ सिमरथमलजी चोरडिया की ध्मंपत्नी स्वर्गीया श्रीमती गट्टूबाई की कुक्षि से हुआ । प्लापका 
बचपन गाँव में ही बीता । प्रारम्भिक शिक्षा आगरा में सम्पन्न हुई। यही पर चौदह वर्ष की ग्रल्पायु में ही आपने 
अ्रपना स्वतन्त्र व्यवसाय प्रारम्भ किया | निरन्तर भ्रथक परिश्रम करते हुए पन्द्रह वर्ष तक श्राढत के व्यवसाय में 
सफलता प्राप्त की । 


सन १९५० के मध्य झापने दक्षिण भारत के प्रमुख व्यवसाय के केन्द्र मद्रास में फाइनेन्स का कार्य शुरू 
किया जो श्राज सफलता की ऊँचाइयो को छ रहा है, जिसमे प्रमुख योगदान श्रापके होनहार सुपुत्र श्री प्रसपश्नचन्दजी, 
श्री पदमचन्दजी, श्री प्रेमचन्दजी, श्री धर्मंचन्दजी का भी रहा है । वे कुशल व्यवसायी है तथा झापके प्राशाकारी है । 


आपने व्यवसाय में सफलता प्राप्त कर अपना ध्यान समाज-हित में व धामिक कार्यों की ओर भी 
लगाया है। उपाजित धन का सदुपयोग भी शुभ कार्यो में हमेशा करते रहते है। उसमे श्रापके सम्पूर्ण परिवार 
का सहयोग रहता है। मद्रास के जैनसमाज के ही नहीं श्रन्य॒ समाजों के कार्यों में भी आपका सहयोग सर्देव 
रहता है । 
आप मद्रास की जैन समाज की प्रत्येक प्रमुख सस्था से किसी न किसी रूप में सम्बन्धित हैं । उनमें से 
कुछेक ये है 
भू पू कोषाध्यक्ष श्री एस एस जन एज्युकेशनल सोसायटी 
(इस पद पर सात वर्ष तक रह हैं) 
अध्यक्ष--(उत्तराज्चल) -श्री राजस्थानी एसोसिएशन, 
कोषाध्यक्ष--श्री राजस्थानी श्वे स्था जेन सेवा सघ, मद्रास 
(इस सस्था द्वारा असहाय व श्रसमर्थ जनो को सहायता दी जाती है। होनहार युवकों व 
युवतियों को व विद्वानो को सहयोग दिया जाता है ।) 
महास्तम्भ--श्री व्धंभान सेवा समिति, नोखा 
सरक्षक--श्री भगवान्‌ महावीर श्रहिसा प्रचार सघ 
टस्टी--स्वामीजी श्री हजारीमलजी म॒ जैन ट्रस्ट, नोखा 
कायेकारिणी के सदस्य-“आाननन्‍्द फाउन्डेशन 
भू पू महामत्री--श्री बैकटेश झायु्वेदिक झोषधालय-मद्रास, 
(यहाँ सेकडो रोगी प्रतिदिन उपचारार्थ गाते है) 


[९] 


सर्देव सन्‍्त-सतियाजी की सेवा करना भी प्रापने अपने जीवन का ध्येय बनाया है। झाज स्थासकवासी 
समाज के कोई भी सन्त मुनिराज नहीं है जो भ्रापके नाम व झापकी सेवाभावना से परिचित न हो । 


ग्रापके लधुअता सर्वश्री बादलचन्दजी, सायरचन्दजी भी धाभिक वृत्ति के हैं। वे भी प्रत्येक सत््‌काय॑ 
में आपको पूर्ण सहयोग प्रदान करते है। झापके स्व. भनुज श्री रिखवचन्दजी की भी अपने जीवनकाल में यही 
भावना रही है । 

झापकी धमंपत्नी श्रीमती रतनकवर भी धर्ंश्रद्धा की प्रतिमूति एबं तपस्विनी है। परिवार के सभी सदस्य 
धामिक भावना से प्रभावित है । विशेषत पुत्रवधुएँ आपकी धामिक परम्परा को बराबर बनाये हुए हैं । 

झापने जन-कल्याण की भावना को दृष्टिगत रखते हुए निम्नलिखित ट्रस्टो की स्थापना की है जो उदारता 
से समाज सेवा कर रहे हैं-- 

(१) श्री एम रतनचन्द चोरडिया चेरिटेबल ट्रस्ट 

(२) श्री सिमरथमल गटुटूबाई चोरडिया चेरिटीज ट्रस्ट 

आपका परिवार स्वामीजी श्री ब्रजलालजी भ. सा , पूज्य युवाचार्य श्री मिश्रीलाल म सा , का झनन्‍्य 
भक्त है। आपने श्रीश्रागम-प्रकाशन-समिति से प्रकाशित इस ग्रन्थ के प्रकाशन में श्पना उदार सहयोग प्रदान किया 
है । एतदथें समिति आपका झाभार मानती है एव आशा करती है कि भविष्य में भी श्रापका सम्पूर्ण सहयोग समिति 
को मिलता रहेगा । 

“मन्त्र 


[ १० | 


आदि वचन 
(प्रथम सस्करण से ) 


विश्व के जिन दाशेनिको -दुष्टाह्रो/चिन्तको, ने “आात्मसस्ा' पर चिन्तन किया है, या ग्रात्म-साक्षात्कार 
किया है उन्होंने पर-हितार्थ प्रात्म-विकास के साधनों तथा पद्धतियों पर भी पर्याप्त चिन्तन-मनन किया है। झात्मा 
नथा तत्सम्बन्धित उनका चिन्तन-प्रवचन भ्राज झागम/पिटक/विद/उपनिषद्‌ भ्रादि विभिन्न नामो से विश्वत है । 


जैन दर्शन की यह धारणा है कि झ्रात्मा के विकारो--राग द्व ष भ्रादि को, साधना के द्वारा दूर किया जा 
सकता है, भ्रौर विकार जब पू्णत निरस्त हो जाते हैं तो भ्रात्मा की शक्तियाँ ज्ञान/सुख/वीय॑ भ्रादि सम्पूर्ण रूप में 
उद्घाटित उद्भासित हो जाती हैं । शक्तियों का सम्पूर्ण प्रकाश-विकास ही स्वशता है और सर्वज्ञ/भ्राप्त-पुरुष की 
बाणी, वचन/कथन/प्रूपणा-- आगम” के नाम से भ्रभिष्वित होती है। प्रागम भर्थात्‌ तत्त्वज्ञान, श्रात्म-ज्ञान तथा 
भ्राचार-व्यवहार का सम्यक्‌ परिबोध देने वाला शास्त्र/सूत्र/प्राप्ततचन । 


सामान्यत सर्वज्ञ के बचनो/वाणी का सकलन नही किया जाता, वह बिखर सुमनो की तरह द्वोती है, किन्तु 
विशिष्ट अ्तिशयभम्पन्न सर्वज्ञ पुरुष, जो धरम तीर्थ का प्रवर्तन करते है, सघीय जीवन पद्धति में धर्म-साधना को 
स्थापित करते हैं, वे धर्म प्रवर्तक/ग्ररिहत या तीर्थंकर कहलाते है । तीर्थंकर देव की जनकल्याकारिणी वाणी को 
उन्ही के श्रतिशय सम्पन्न विद्वान्‌ शिष्य मणधर सकलित कर “अभ्रागम या शास्त्र का रूप देते है श्रर्थात्‌ जिन- 
वबचनरूप सुमनों की मुक्त वृष्टि जब मालारूप में ग्रथितः होती हैं तो वह “भ्रागम” का रूप धारण करती है । वही 
आगम ग्रर्थात्‌ जिन-प्रवचन श्राज हम सब के लिए झात्म-विद्या या मोक्ष-विद्या का मूल स्रोत है । 


“श्रागम”” को प्राचीनतम भाग में “गणिपिटक'” कहा जाता था । भ्ररिहतो के प्रवचनरूप समग्र शास्त्र-द्वादशाग 
में समाहित होते है श्लौर द्वादशाग/श्राचाराग-सूत्रक्ताग श्रादि के अग-उपाग ग्रादि भ्रनेक भेदोपभेद विकसित हुए 
हैं । उस द्वादशागी का अध्ययन प्रत्येक सुमुक्षु के लिए श्रवश्यक और उपादेय माना गया है। द्वादशागी में भी 
बारहवा अग विशाल एवं समग्रश्नुत ज्ञान का भण्डार माना गया है, उसका अध्ययन बहुत ही विशिष्ट प्रतिभा एव 
श्रुतसम्पन्न साधक कर पाते थे। इसलिए सामान्यत एकादशाग का अध्ययन साधको के लिए बिहिित हुआ तथा 
इसी झोर सबकी गति/मत्ति रही । 


जब लिखने की परम्परा नही थी, लिखने के साधनों का विकास भी प्रल्पतम था, तब आगमो/शास्त्रो/को स्मृत्ति 
के आधार पर या गु३-परम्परा से कठस्थ करके सुरक्षित रखा जाता था । सम्भवत इसलिए झागम ज्ञान को श्रुतशान 
कहा गया और इसीलिए श्रृति/स्मृति जंसे साथंक शब्दो का व्यवहार किया गया । भगवान्‌ महावीर के परिनिर्वाण 
के एक हजार वर्ष बाद तक ग्रागमो का झ्ञान स्मृति/श्रुति परम्परा पर ही आधारित रहा । पश्चात्‌ स्मृतिदौबंल्य 
शुरुपरम्परा का विच्छेद, दुष्काल-प्रभाव आदि भ्रनेक कारणो से धीरे-धीरे आगमज्ञान लुप्त होता चला गया। 
महासरोवर का जल सूखता-सूखता गोष्पद मात्र रह गया। मुमुक्षु श्रमणो के लिए यह जहाँ चिन्ता का विषय था, वहाँ 
चिन्तन की तत्परता एव जागरूकता को चुनोती भी थी । बे तत्पर हुए श्रुतज्ञान-निधि के सरक्षण हेतु । तभी महान्‌ 
श्रुतपारगामी देवड्धि गणि क्षमाश्रमण ने विद्वान्‌ श्रमणो का एक सम्मेलन बुलाया श्ौर स्मृति-दोष से लुप्त होते भ्रागम 
ज्ञान को सुरक्षित एव सजोकर रखने का भ्राह्वान किया । सर्व-सम्मति से झ्रागमो को लिपि-बद्ध किया ग्रया। 


जिनवाणी को पुस्तकारूढ करने का यह ऐतिहासिक कार्य वस्तुत आज की समग्र ज्ञान-पिपासु प्रजा के लिये एक 
झवर्णनीय उपकार सिद्ध हुमा । संस्कृति, दर्शन, धर्म तथा झात्म-विज्ञान की प्राचीनतम ज्ञानघारा को प्रवहमान रखने 
का यह उपक्रम बीरनिर्वाण के ९६० या ९९३ वर्ष पश्चात्‌ प्राचीन नगरी वलभी (सौराष्ट्र) मे झ्ाचायं श्री देवड्ि- 
भणि क्षमाश्रमण के नेतृत्व में सम्पन्न हुप्ना | वेसे जेन भ्रागमों की यह दूसरी भ्रन्तिम वाचना थी, पर लिपिबद्ध करने 
का प्रथम प्रयास था। ग्राज प्राप्त जैन सूत्रों का अन्तिम स्वरूप-सस्कार इसी वाचना में सम्पन्न किया गया था । 


पुस्तकारूढ होने के बाद झ्रागमो का स्वरूप मूल रूप मे तो सुरक्षित हो गया, किन्तु काल-दोष, श्रमण-सघो 
के श्लान्तरिक मतभेद, स्मृति दुर्बलता, प्रमाद एवं भारतभूमि पर बाहरी आक्रमणो के कारण विपुल' ज्ञान-भण्डारो का 
विध्वस प्रादि झनेकानेक कारणों से आगम ज्ञान की विपुल सम्पत्ति, श्रथंबोध की सम्यक गुरु-परम्परा धीरे-धीरे 
क्षीण एव विलुप्त होने से नही रुकी । झ्रागमो के भनेक महत्त्वपूर्ण पद, सन्दर्भ तथा उनके गूृढार्थ का ज्ञान, छिल्न- 
विच्छिन्न होते चले गए । परिपक्व भाषाज्ञान के श्रभाव में, जो प्रागम हाथ से लिखे जाते थे, वे भी शुद्ध पाठ वाले 
नही होते, उनका सम्यक श्रथं-ज्ञान देने वाले भी विरले ही मिलते । इस प्रकार अनेक कारणो से ग्रागम की पावन 
घारा सकुचित होती गयी । 

विक्रमीय सोलहबी शताब्दी मे वीर लोकाशाह ने इस दिशा में ऋन्‍्तिकारी प्रयत्न किया । श्रागमों के शुद्ध और 
यथार्थ ब्रथ॑ं ज्ञान को निरूपित करने का एक साहसिक उपक्रम पुन चालू हुआ । किन्तु कुछ काल बाद उसमे भी 
व्यवधान उपस्थित हो गये। साम्प्रदायिक-विद्वठ ष, सेद्धांतिक विग्ह, तथा लिपिकारों का प्रत्यल्प ज्ञान आगमो की 
उपलब्धि तथा उसके सम्यक भ्रर्थवोध मे बहुत बडा विध्न बन गया । झागम-प्रभ्यासियो को शुद्ध प्रतिया मिलना 
भी दुलंभ हो गया । 

उन्नीसवी शताब्दी के प्रथम चरण में जब प्रागम-मुद्रण को परम्परा चली तो सुधी पाठकों को कुछ सुविधा 
प्राप्त हुई । धीरे-धीरे विह्वत्‌ू-प्रयासों से आगमो की प्राचीन चूणियाँ, नियु क्तियाँ, टीकाये भ्रादि प्रकाश में श्राई भौर 
उनके भ्राधार पर झागमो का स्पष्ट-सुगसम भाववोध सरल भाषा मे प्रकाशित हुआ । इसमे ग्रागम-स्वाध्यायी तथा 
ज्ञान-पिपासुजनों को सुविधा हुई । फलत श्रागमो के पठन-पाठन की प्रवृत्ति बढी है। मेरा श्रनुभव है, प्राज पहले 
से कही भ्रधिक आगम-स्वाध्याय की प्रवृत्ति बदी है, जनता में श्रागमों के प्रति ध्ाकर्षण व रुचि जागृत हो रही है । 
इस रुचि-जागरण में अनेक विदेशी आगमज्ञ विद्वानों तथा भारतीय जैनेतर विद्वानों की झ्रागम-श्रुत-सेवा का भी 
प्रभाव व अनुदान है, इसे हूम सगौरव स्वीकारते है । 


प्रागम-सम्पादन-प्रकाशन का यह सिलसिला लगभग एक शताब्दी से व्यवस्थित चल रहा है। इस महनीय- 
श्रत-सेवा में पभ्रनेक समर्थ श्रमणो, पुरुषार्थी विद्वानों का योगदान रहा है। उनकी सेवायें नीव की ईंट की तरह आज 
भले ही अ्रदृश्य हो, पर विम्मरणीय तो कदापि नही, स्पष्ट व पर्याप्त उल्लेखो के अ्रभाव में हम भ्रधिक विस्तृत 
रूप में उनका उल्लेख करने में प्रसमर्थ हैं, पर विनीत व क्ृतज्ञ तो हैं ही । फिर भी स्थानकवासी जैन परम्परा के 
कुछ विशिष्ट-प्रागम श्रुत-सेवी मुनिवरों का नामोल्लेख अवश्य करना चाहूँगा । 


आज से लगभग साठ वर्ष पूर्व पूज्य श्री ममोलकऋषिजी महाराज ने जैन आगमो--३२ सूत्रो का प्राकृत 


से खडी बोली में भ्रनुवाद किया था। उन्होने श्रकेले ही बत्तीस सूत्रों का प्रनुवाद कार्य सिर्फ ३ वर्ष व १४ दिन में 
पुर्णं कर एक श्रदृभुत कार्य किया । उनकी दृढ़ लगनशीलता, साहस एवं श्रागम ज्ञान की गम्भीरता उनके काय से ही 


स्वत परिनक्षित होती है। वे २२ ही भ्रागम समय मे प्रकाशित भी हो गये । 


इससे ग्रागमपठन बहुत सुलभ ब व्यापक हो गया और स्थानकवासी-तेरापथी समाज' तो विशेष उपकृत हुझा । 


[ १२] 


गुरुदेव श्री जोराबरमल जी भहाराज का संकल्प 

मैं जब प्रात स्मरणीय गुरुदेव स्वामीजी श्री जोरावरमलजी म के साझ्रिध्य में श्रागमो का अ्रध्ययन-पनुशीलन 
करता था तब झागमोदय सम्रिति द्वारा प्रकाशित ग्राचार्य श्रभयदेव व शीलाक की टीकाडओ्रो से युक्त कुछ प्रागम 
उपलब्ध थे । उन्ही के भ्राधार पर मैं प्रध्ययन-वाचन करता था। गुरुदेवश्ली ने कई बार अनुभव किया--यद्यपि 
यह सस्करण काफी श्रमसाध्य व उपयोगी' हैं, प्रबः तक उपलब्ध सस्करणों में प्राय शुद्ध भी हैं, फिर भी प्रनेक 
स्थल भ्रस्पप्ट हैं, मूलपाठो मे व वत्ति मे कही-कही भरशुद्धता व अभ्र्तर भी है। सामान्य जन के लिये दुरूह् तो हैं 
ही । चू कि गुरुदेवश्री स्वय भ्रागमो के प्रकाण्ड पण्डित थे, उन्हे भागमो के ग्रनेक गूढार्थ ग्रुरु-गम से प्राप्त थे। 
उनकी मेधा भी व्युत्पन्न व तक-प्रवण थी, झत वे इस कमी को प्ननुभव करते थे झौर चाहते थे कि ग्रागमों का 
शुद्ध, सर्वोपयोगी ऐसा प्रकाशन हो, जिससे सामान्य ज्ञानवाले श्रमण-श्रमणी एव जिज्ञासुजन लाभ उठा सके | 
उनके मन की यह तड़प कई बार व्यक्त होती थी। पर कुछ परिस्थितियो के कारण उनका यह स्वप्न-सकल्प 
साकार नही हो सका, फिर भी मेरे मन मे प्रेरणा बनकर झ्वश्य रह गया । 


इसी अन्तराल में आचाये श्री जवाहरलाल जी महाराज, श्रमणसघ के प्रथम आाचाय॑ जनधम दिवाकर 
ग्राचार्य श्री स्‍्लात्माराम जी म०, विद्वद्रत्न श्री घासीलालजी म० आदि मनीथी मुनिवरों ने प्रागमो की हिन्दी, 
सस्कृत, गुजराती श्रादि में सुन्दर विस्तृत टीकाये लिखकर या अपने तत्वावधान मे लिखवा कर कमी को पूरा करने 
का महनीय प्रयत्न किया है । 


एवेताम्बर मूर्तिपुजक ग्राम्नाय के विद्वान्‌ श्रमण परमश्रुतसेवी स्व० मुनि श्री पुण्यविजयजी ने भागम सम्पादन 
की दिशा में बहुत व्यवस्थित व उच्चकोटि का कार्य प्रारम्भ किया था। विद्वानों ने उसे बहुत ही सराहा । किन्तु 
उनके स्वर्गवास के पश्चात्‌ उस में व्यवधान उत्पन्न हो गया। तदपि प्रागमज्ञ मुनि श्री जम्बूविजयजी श्रादि के 
तत्वावधान में श्रागम-सम्पादन का सुन्दर व उच्चकोटि का कार्य प्राज भी चल रहा है । 


वर्तमान में तेरापथ सम्प्रदाय में ग्राचायं श्री तुलसी एवं युवाचाय महाप्रज्ञजी के नेतृत्व में श्रागम-सम्पादन का 
कार्य चल रहा है भौर जो झ्ञागम प्रकाशित हुए है उन्हे देखकर विद्वानों को प्रसन्नता है। यद्यपि उनके पाठ-निर्णय 
में काफी मतभेद की गुजाइश है। तथापि उनके श्रम का महत्त्व है। मुनि श्री कन्हैयालाल जी म० “कमल '' 
भ्रागमो की वक्तव्यता को अनुयोगों मे वर्गीक्रेत करके प्रकाशित कराने की दिशा में प्रयत्नशील हैं। उनके द्वारा' 
सम्पादित कुछ श्रागमो में उनकी कार्यशैली की विशदता एवं मौलिकता स्पष्ट होती है । 


श्रागम साहित्य के व्योवृद्ध विद्वान्‌ प० श्री बेचरदास जी दोशी, विश्रुत-मनीषी श्री दलसुखभाई मालवणिया 
जैसे चिन्तनशील प्रज्ञापुछषष झ्लागमों के प्राधुनिक सम्पादन की दिशा में स्वय भी कार्य कर रहे है तथा भ्रनेक 
विद्वानों का मार्गं-दर्शन कर रहे है | यह प्रसन्नता का विषय है | 


इस सब काय-शेली पर विहगम अभ्रवलोकन करने के पश्चात्‌ मेरे मन में एक सकल्प उठा । आज प्राय सभी 
विद्वानों की कार्यशेली काफी भिन्नता लिये हुए है। कही शआ्रागमों का मूल पाठ मात्र प्रकाशित किया जा रहा है 
तो कही भ्रागमो की विशाल व्याख्याये की जा रही है। एक पाठक के लिये दुर्बोध है तो दूसरी जटिल । सामान्य 
पाठक को सरलतापूर्वक भ्रागम ज्ञान प्राप्त हो सके, एतदर्थ मध्यम मार्ग का प्रनुसरण झावश्यक है। भ्रागमो का एक 
ऐसा सस्करण होना चाहिये जो सरल हो, सुबोध हो, सक्षिप्त और प्रामाणिक हो । मेरे स्वर्गीय ग्रुर्देव ऐसा हो 
प्रागमम-सस्क रण चाहते थे ! इसी भावना को लक्ष्य में रखकर मैंने ५-६ वर्ष पूर्व इस विषय की चर्चा प्रारम्भ को थी, 


[१३ ] 


सुदीध चिन्तन के पश्चात्‌ वि.स २०३६ वेशाख शुक्ला दशमी, भगवान्‌ मह्लाबीर कंवल्यदिवस को यह दृढ़ निश्चय 
घोषित कर दिया और भ्रागबत्तीसी क। सम्पादत-विवेजन कार्य प्रारम्भ भी। इस साहसिक निर्णय मे गुरुत्ाता 
शासनसेवी श्री ब्रजलाल जी म. की प्रेरणा/प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन मेरा प्रमुख सम्बल बना है। साथ ही 
अनेक मुनिवरों तथा सदुगृहस्थी का भक्ति-भाव भरा सहयोग प्राप्त हुआ है, जिनका नामोल्लेख किये बिना मन 
सन्तुष्ट नही होगा । भरागम झनुयोग शैली के सम्पादक मुनि श्रा कन्हैयालालजी म० 'कमल”', प्रसिद्ध साहित्यकार 
श्री देवेन्द्रमुनिजी म० शास्त्री, झ्ाचाय॑ श्री श्रात्मा रामजी म० के प्रशिष्य भडारी श्री पदमचन्दजी म० एवं प्रवचन- 
भूषण श्री भ्रमरमुनिजी, विद्वद्रत्त श्री ज्ञानमुनिजी म०, स्व० विदुषी महासती श्री उज्ज्वलकु वरजी म० की 
सुशिष्याए महासती दिव्यप्रभाजी, एम ए. पी-एच डी, महासती मुक्तिप्रभाजी तथा विदृषी महासती श्री 
उमरावकु वरजी म० 'प्रच॑ंना, विश्वुत विद्वान्‌ श्री दलसुखभाई मालवणिया, सुख्यात विद्वान प श्री शोभाचन्द्र जी 
भारिल्ल, स्व, प श्री हीरालालजी शास्त्री, डा० छगनलालजी शास्त्री एबं श्रीचन्दजी सुराणा “सरस” प्रादि 
मनीषियो का सहयोग झागमसम्पादन के इस दुरूह कार्य को सरल बना सका हैं। इन सभी के प्रति मन भादर 
व कृतज्ञ भावना से प्रभिभूत है । इसी के साथ सेवा-सहयोग की दृष्टि से सेवाभावी शिष्य मुनि विनयकुमार एव 
महेन्द्र मुनि का साहचर्य-सहयोग, महासती श्री कानकु वरजी, महासती श्री कणकारकु वरजी का सेवा भाव सदा 
प्रेरणा देता रहा है । इस प्रसग पर इस कार्य के प्रेरणा-स्नोत स्व श्रावक चिमनसिहजी लोढा, स्व श्री पुखराजजी 
सिसोदिया का स्मरण भी सहजरूप में हो श्राता है जिनके भ्रथक प्रेरणा-प्रयत्नो से भ्रागम समिति प्रपने कार्य मे 
इतनी शीघ्र सफल हो रही है। दो बर्ष के टस भ्रल्पकाल में ही दस झ्ागम ग्रन्थों का मुद्रण तथा करीब १५-२० 
ग्रागमों का झनुवाद-सम्पादन हो जाना हमारे सब सहयोगियो की गहरी लगन का द्योतक है । 


मुझे सुदृढ़ विश्वास है कि परम श्रद्धेय स्वर्गीय स्वामी श्री हजारीमल जी महाराज झ्रादि तपोपूत श्रात्माओ्रो के 
शुभाशीर्वाद से तथा हमारे श्रमणसघ के भाग्यशाली नेता राष्ट्र-सत भ्राचायं श्री ग्रानन्दऋषिजी म० श्रादि मुनिजनो 
के सदभाव-सहकार क बल पर यह सकल्पित जिनवाणी का सम्पादन-प्रकाशन कार्य शीघ्र ही सम्पन्न होगा । 


इसी शुभाशा के साथ * 
“ सुनि सिश्रीमल “सधुकर”' 
(युवाचार्य ) 


[ १४ ) 


सम्पादकीय 


(प्रथम संस्करण से ) 


मौलिक लेखन की अपेक्षा भाषान्तर-प्रनुबाद करने का कार्य कुछ दुरूह होता है। भाषा दूसरी भौर भाव 
भी स्वान्त समुद्भूत नही । उन भावों को भाषान्तर मे बदलना और वह भी इस प्रकार कि झनुवाद की भाषा का 
प्रयाह झस्खलित रहे, उसकी मौलिकता को झ्राच न आए, सरल नही है। विशेषत भ्रागम के भ्नुवाद में तो भर 
भी शभ्रधिक कठिनाई का पनुभव होता है। मूल ग्रागम के तात्पयं-अ्रभिप्राय-पआशय में किचित्‌ भी पग्न्यथापन न शभ्रा 
जाए, इस ओर पद-»पद पर सावधानी बरतनी पडती है। इसके लिए पर्याप्त भाषाज्ञान भौर साथ ही आझ्ागम के 
ग्राशय की विशद परिज्ञा अपेक्षित है । 


जैनागमो की भाषा प्राकृत-भ्रद्धमागधी है । नन्‍्दीसूत्र का प्रणणन भी इसी भाषा में हुआ है। यह झागम 
जेनजगत्‌ में परम मागलिक माना जाता है। भ्रनेक साधक-साधिकाएँ प्रतिदिन इसका पाठ करते है। झ्रतएव इसका 
अपेक्ष कृत अधिक प्रचलन है। इसके प्रणेता श्री देव वाचक हैं । ये वाचक कौन हैं ? जैन परम्परा भे सुविख्यात 
देवाधगणि ही है या उनसे भिश्न ? इस विषय में इतिहासविद विद्वानों में मतभिन्नता है। पन्यास श्रीकल्याणविजय 
जी म० दोनो को एक ही व्यक्ति स्वीकार करते है। अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होने श्रनेक प्रमाण भी उपस्थित 
किए है। किन्तु मुनि श्री पुण्यविजयजी ने अपने द्वारा सम्पादित नन्‍्दीसूत्र की प्रस्तावना मे पर्याप्त ऊहापोह के 
पश्चात्‌ इस' मान्यता को स्वीकार नही किया है । 


नन्‍्दीसूत्र के प्रारम्भ में दी गई स्थविरावली के भ्रन्तिम स्थविर श्रीमान्‌ दृष्यगगणि के शिष्य देववाचक इस 
सूत्र के प्रणेता है, यह निवियाद है! नन्दी-चूणि एवं श्रीहरिभद्र सूरि तथा श्रीमलयगिरि सूरि की टीकाझ्ो के उल्लेख 
से यह प्रमाणित है । हे 


इतिहास मेरा विषय नहीं है । अतएव देववाचक झऔर देवधिगणि क्षमाश्रमण की एकता या भिन्नता का 
निर्णय इतिहासवेत्ताश्ो को ही भ्रधिक गवेषणा करके निश्चित करना है । 


अद्धंमागधी भाषा और आगमो के भाशय को निरन्तर के परिशौलन से हम यत्‌किड्चित्‌ जानते है, किन्तु 
साधिकार जानना और समभना झ्लग बात है । उसमे जो प्रोढटता चाहिए उसका मुझ में अभाव है। श्रपनी इस 
सीमित योग्यता को भली-भाति जानते हुए भी मैं नन्दीसूत्र के अनुवाद-कार्य मे प्रवत्त हुई, इसका मुख्य कारण 
परमश्रद्धेय गुरुदेव श्रमणसघ के युवाचार्य श्री मधुकरमुनिजी म० सा० की तथा मेरे विद्यागुरु श्रीयुत प० शोभाचन्द्रजी 
भारिल्ल की धाग्रहपूर्ण प्रेरणा है। इसीसे प्रेरित होकर मैंने प्रनुवआादक की भूमिका का निर्वाह मात्र किया है। मुझे 
कितनी सफलता मिली या नहीं मिली, इसका निर्णय में विदज्जनो पर छोडती हूँ । 


सर्वप्रथम पूज्य झ्राचायश्री प्रात्मारामजी महाराज के प्रति सविनय झाभार प्रकट करना भ्पना परम 
कत्तंव्य मानती हूँ । श्राचार्यश्रीजी द्वारा सम्पादित एवं अ्रनृदित नन्‍्दीसूत्र से मुझे इस अनुवाद मे सबसे शभ्रधिक 
सहायता मिली है। इसका मैंने अपने अनुवाद मे भरपूर उपयोग किया है। कही-कही विवेचन मे कतिपय नवीन 


[१५] 


विषयों का भी समावेश किया है। तथापि यह स्वीकार करने मे मुझे सकोच नहीं कि श्ाचायंश्री के प्रनुबाद को 
देखे बिना प्रस्तुत सस्करण को तेयार करने का कार्य मेरे लिए अत्यन्त कठिन होता । 

साथ ही प्पनी सुविनीत शिष्याप्रो तथा श्रीकमला जैन 'जीजी' एम० ए० का सहयोग भी इस कार्य में 
सहायक हुआ है । पडितप्रवर श्री विजयमुनिजी म० शास्त्री ने विद्वत्तापूर्ण प्रस्तावना लिख कर प्रस्तुत सस्करण की 
उपादेयता में वृद्धि की है। इन सभी के योगदान क॑ लिए मैं झ्ाभारी हूँ । 


अन्त में एक बात भ्रौर-- 
गच्छत स्खलन क्वापि भवत्येव प्रमादत । 


चलते-चलते असावधानी के कारण कही न कही चूक हो ही जाती है। इस तीति के प्नुसार स्खलना 
की सम्भावना से इन्कार नही किया जा सकता। इसके लिए मैं क्षमाभ्यर्थी हें । सुश एवं सहृदय पाठक यथोचित 


सुधार कर पढेंगे, ऐसी झाशा है । 
[] जेनसाष्वो उसरावकु वर “अ्ना' 


[१६ ] 


प्रस्लावना 


(प्रथम सस्करण से) 


() विजयसुनि शास्त्री 
आगमों को दाहनिक पृष्ठ-भूमि 


वेद, जिन झौर बुद्ध-भारत की दर्शन-परम्परा, भारत की धर्म-परम्परा और भारत की सस्कृति के ये 
मूल-स्रोत हैं । हिन्दू-धर्मं के विधवास के अनुसार वेद ईश्वर की वाणी हैं। वेदों का उपदेष्टा कोई व्यक्ति-विशेष 
नहीं था, स्वय ईश्वर ने उसका उपदेश किया था। प्रथवा वेद ऋषियों की बाणी है, ऋषियो के उपदेशों का 
सग्रह है। वैदिक परम्परा का जितना भी साहित्य-विस्तार है, वह सब वेद-मूलक है। वेद और उसका परिवार 
सस्क्ृत भाषा में है। भत वेदिक-सस्कृति के विचारों की अभिव्यक्ति सस्कृत भाषा से ही हुई है! 


बुद्ध ने अपने जीवनकाल में अपने भक्तों को जो उपदेश दिया था--त्रिपिटक उसी का सकलन है । 
बुद्ध की वाणी को त्रि-पिटक कहा जाता है। बौद्ध-परम्परा के समग्र विचार प्लौर समस्त विश्वासों का मूल 
त्रि-पिटक है । बौद्ध-परम्परा का साहित्य भी बहुत विशाल है, परन्तु पिटको मे बौद्ध सस्कृति के विचारों का 
समग्र सार आ जाता है। बुद्ध ने अपना उपदेश भगवान्‌ महावीर की तरह उस युग की जनभाषा में दिया था । 
बुद्धिवादी वर्ग की उस युग में, यह एक बहुत बडी क्रान्ति थी । बुद्ध ने जिस भाषा में उपदेश दिया, उसको पालि 
कहुते हैं । अत पिठको की भाषा, पालि भाषा है । 


जिन की थाणी को अथवा जिन के उपदेश को झागम कहा जाता है। महाबीर की वाणी--प्रागम है । 
जिन की वाणी मे, जिन के उपदेश में जिनको विश्वास है, वह जैन है। राग और द्वंष के विजेतां को जिन कहते 
हैं। भगवात्‌ महावीर ने राग शौर द्वेष पर विजय प्राप्त की थी। अत वे जिन थे, तीर्थकर भी थे। तीर्थंकर 
की वाणी को जैन परम्परा मे आमम कहते है। भगवान्‌ महावीर के समग्र धिचार भौर समस्त विश्वास तथा 
समस्त भ्राचार का सह जिसमें है उसे द्वादशागवाणी कहते हैं। भगवान्‌ ने अपना उपदेश उस युग की जन- 
भाषा में, जन-बोली में दिया था। जिस भाषी में भ्रगवान्‌ महावीर ने अपना विश्वास, अपना विचार, अपना 
झ्राचार व्यक्त किया था, उस भाषा को अं-मागधी कहते हैं। जैन परम्परा के विश्वास के अनुसार भर्ध- 
मागधी को देव-वाणी भो कहते है। जैन-परम्परा का साहित्य बहुत विशाल है। प्राकृत, सस्कृत, अपभ्र श, 
गुजराती, हिन्दी, तमिल, कन्नढ़, मराठी भ्लोर प्नन्य प्रान्तीय भाषाओं में भी विराट साहित्य लिखा गया है। 
आगम-युग का कालसमान भगवान्‌ महावीर के निर्वाण अर्थात्‌ विक्रम पूर्व ७७० से प्रारम्भ होकर प्राय एक 
हजार वर्ष तक जाता है। वैसे किसी न किसी रूप में आगम-युग की परम्परा वर्तमान युग में चली आ रही 
है। आगमों मे जीवन सम्बन्धी सभी विषयो का प्रतिपादन किया गया है। परन्तु यहाँ पर आगमकाल में दर्शन 


की स्थिति क्या थी, यह बतलाना भी अभीष्द है। जिन प्रागमों में दर्शन-शारुत्र के मूल तत्वों का प्रतिपादन किया 
गया, उनमें से मुख्य आगम हैं--सूत्रकृताग, भगवती, स्थानांग, समवायाग, प्रज्ञापना, राजप्रश्नीय, नदी और 
अनुयोगद्वार । सूत्रकृताग में तत्कालीन अन्य दार्शनिक विचारों का निराकरण करके स्वमत की प्ररूपणा की गई है। 
भूतवादियों का निराकरण करके प्रात्मा का अस्तित्व बतलाया है । ब्रह्मवाद के स्थान मे नानाआत्मवाद स्थिर किया 
है । जीव और शरीर को प्रथक्‌ बतलाया है। कर्म और उसके फल की सत्ता स्थिर की है। जगत्‌ उत्तत्ति के 
विषय में नाना वादों का निराकरण करके विश्व को किसी ईश्वर या अन्य किसी व्यक्ति ने नहीं बनाया, बह तो 
अनादि-अनन्त है--इस सिद्धान्त की स्थापना की गई है। तत्कालीन क्रियावाद, अक्रियावाद, विनयवाद और 
अज्ञानवाद का निराकरण करके विशुद्ध क्रियावाद की स्थापना की गई है। प्रज्ञापना मे जीव के विविध भावों 
को लेकर विस्तार से विचार किया गया है। राजप्रश्नीय में पाश्वंताथ की परम्परा के अनुयायी केशीकुमार 
श्रमण ने राजा प्रदेशी के प्रश्नो के उत्तर में नास्तिकवाद का निराकरण करके आत्मा और तत्सम्बन्धी भ्रनेक 
तथ्यो को €ृष्टान्त एक युक्तिपृवंक समझाया है। भगवती सूत्र के अनेक प्रश्नोत्तरो में नय, प्रमाण झौर निक्षेप 
आदि अनेक दर्शनिक विचार बिखरे पड़े हैं। नन्‍्दीसूत्र जेन दृष्टि से ज्ञान के स्वरूप और भेदो का विश्लेषण 
करने वाली एक सुन्दर एवं सरल क्ृति है। स्थानाग और समवायाग की रचना बौद्ध-परम्परा के अगुतर-निकाय 
के ढंग की है। इन दोनो मे भी आत्मा, पुद्गल, ज्ञान, नय, प्रमाण एव निश्षेप प्रादि विषयों की चर्चा की 
गई है। महावीर के शासन में होने वाले अन्यथावादों निक्वों का उल्लेख स्थानाग में है। इस प्रकार के सात 
व्यक्ति बताये गये हैं, जिन्होने कालक्रम से महावीर के सिद्धाग्तो की भिन्न-भिन्न बातो को लेकर मतभेद प्रकट 
किया था। अनुपोगद्वार में शब्दार्थ करने की प्रक्रिया का वर्णन मुख्य है। किन्तु यथाप्रसग उसमे प्रमाण, नय एव 
निक्षेप पद्धति का प्रत्यन्त सुन्दर निरूपण हुआ है। 
आगभ-प्रासाण्य से सतभेद 

आगम-प्रामाण्य के विषय मे एकमत नही है। श्वेताम्बर स्थानकवासी परम्परा ११ अगर, १२ उपाग, 
४ मूल, ४ छेद, और आवश्यक, इस प्रकार ३२ आगमो को प्रमाणभूत स्वीकार करती है। शेष आगमों को नहीं । 
इनके अतिरिक्त निर्युक्ति, भाष्य, चूंणि और दीकाग्नों को भी सर्वाशत प्रमाणभूत स्वीकार नहीं करती । दिगम्बर 
परम्परा उक्त समस्त प्रागमों को अमान्य घोषित करती है। उसकी मान्यता के अनुसार सभी आगम लुप्त हो चुके 
है । दिगम्बर-परम्परा का विश्वास है, कि वीर-निर्वाण के बाद श्रुत का क्रम से हास होता गया । यहाँ तक हराम 
हुप्ला कि वीर-निर्वाण के ६८३ वर्ष के बाद कोई भी अग्रधर अथवा पूवंधर नहीं रहा । अग प्र पूर्व के अशधर 
कुछ आचार्य अवश्य हुए हैं। अग और पूर्व के अश-ज्ञाता आचायों की परम्परा में होने वाले पुष्पदन्त, और 
भूतबलि आचार्यों ने 'बट्‌ खण्डागम' की रचना--द्वितीय अग्रायणीय पूर्व के अश के आधार पर की, और श्राचार्य 
गुणघर ने पाँचवें पूर्व ज्ञानप्रवाद के अश के आधार पर 'कषायपाहुड' की रचना की । भूतबलि आचाय ने 'महाबन्ध' 
की रचना की। उक्त झआगमों में निहित विषय सुक््य रूप से जीव भोर कम है। बाद मे उक्त प्रस्यो पर आचार्य 
वीरसेन ने धवला ध्लौर जयध्षवला टोका रची । यह टीका भी उक्त परम्परा को मान्य है। दिगम्बर परम्परा का 
सम्पूर्ण साहित्य आचार्यों द्वारा रचित है। आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा प्रणोत ग्रत्थ--समथमार, प्रवचनसार, 
पचास्तिकायसार एव नियमसार आदि भी दिगम्बर-परम्परा में श्रागमवत्‌ मान्य हैं। आचार्य नेभिचन्द्र सिद्धान्त- 
चक्रवर्ती के ग्रन्थ---'गोम्मटसार,' 'लब्धिसार' ओर “द्रब्यसग्रह”* आदि भी उतने ही प्रमाणभूत और मान्य हैं । 
आधाय कुन्दकुन्द के प्र्थो पर आचाय॑ अमृतचन्द्र ने पश्रत्यन्त प्रौढ एवं गम्भीर टीकाएँ लिखी हैं। इस प्रकार 
दिगम्बर आगम-साहित्य भले हो बहुत प्राचीन न हो, फिर भी परिमाण मे वह विशाल है। उबर और सुन्दर है । 


[ रै८ ) 


आग्मों का व्यास्या-साहित्य 


श्वेताम्बर-परम्परा द्वारा मान्य ४५ पश्रागमों पर व्याख्या-साहित्य बहुत व्यापक एवं विशाल है। 
जैन-दर्शन का प्रारम्भिक रूप ही इन व्यास्यात्मक ग्रन्थों में उपलब्ध नहीं होता, बल्कि दर्शन-तत्त्व के गम्भीर 
से गम्भीर विचार भी झागम साहित्य के इन ब्याख्यात्मक साहित्य में उपलब्ध होते हैं। आगमो की व्याख्या एव 
दीका दो भाषा में हुई है--प्राकृत और सस्क्ृत । प्राकृत टीका--निर्युक्ति, भाष्य और चृणि के नाम से उपलब्ध 
है | निर्यूक्ति और भाष्य पद्यमय हैं और चूणि ग़द्यमय है। उपलब्ध निर्युक्तियों का अधिकाश भाग भव्रबाहु 
द्वितीय की रचना है। उनका समय विक्रम भवी या ६6ी शताब्दी है। निर्युक्तियों मे भद्बबाहु ने भ्रनेकः स्थलों 
पर एवं अनेक प्रसगो पर दाशंनिक तत्वों की चर्चाएँ बड़े सुन्दर ढंग से की हैं। विशेष कर बोौद्धों प्रौर चार्वाको 
के विषय मे निर्यक्ति मे जहाँ कही भी अवसर मिला उन्होंने खण्डन के रूप में प्रवश्य लिखा है। श्रात्मा का 
प्रस्तित्व उन्होने सिद्ध किया । ज्ञान का सूक्ष्म निरुषण तथा अहिसा का तात्विक विवेचन किया है। शब्दों के अर्थ 
करने की पद्धति में तो वे निष्णात थे ही । प्रमाण, नय प्रौर निक्षेप के विषय में लिखकर भद्रबाहु ने जैन-दर्शन' 
की भूमिका पक्‍की की है । 

किसी भी विषय की चर्चा का अपने समय तक का पूर्ण रूप देखना हो तो भाष्य देखना चाहिए । 
भाष्यकारो में प्रसिद्ध श्राचायं सघदास' गणि भौर आचाय॑ क्षमाश्रमण जिनभद्र हैं। इनका समय सातवी शताब्दी 
है। जिनभद्र ने 'विशेषावश्यक भाष्य” में ग्राममिक पदार्थों का तकंसगत विवेचन किया है। प्रमाण, नय, और 
निक्षेप की सम्पूर्ण चर्चा तो उन्होंने की ही है, इसके अतिरिक्त तत्वों का भी तात्विक रूप से एवं युक्तिसगत 
विवेचन उन्होने किया है। यह कहा जा सकता है कि दाशंनिक चर्चा का कोई ऐसा विषय नहीं है जिस पर आचारये 
जिनभद्द क्षमाश्रमण ने अपनी समर्थ कलम न चलाई हो । 'बहृत्कल्प' भाष्य में आचार्य सघदास गणि ने साधुभो के 
झ्राचार एबं विहार आदि के नियमों के उत्सर्ग-अपवाद मार्ग की चर्चा दार्शनिक ढग से की है। इन्होने भी 
प्रसगानुकूल ज्ञान, प्रमाण, नय ओर निक्षेप के विषय में पर्याप्त लिखा है। भाष्य साहित्य वस्तुत आगम-युगीन 
दार्शनिक जिचारों का एक विश्वकोष है । 

लगभग ७वी तथा ८वीं शताब्दियो की चूणियों में भी दार्शनिक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते 
हैं। चूणिकारों मे आचाय॑ जिनदास महृत्तर बहुविश्वुत एव प्रसिद्ध हैं। इनकी सबसे बडी चूणि 'निशीय चूणि' है । 
जेन ग्रागम साहित्य का एक मी विषय ऐसा नहीं है, जिसकी चर्चा सक्षेप मे अथवा विस्तार में निशीथ चूणि में 
न की गई हो । 'निशीथ चुणि' में क्या है ”? इस प्रश्न की भ्रपेक्षा, यह प्रश्न करना उपयुक्त रहेगा, कि 'निशीय 
चूणि' में क्या नही हैं। उसमे ज्ञान और विज्ञान है, आचार और विचार हैं, उत्सगं और श्रपवाद हैं, धर्म भौर 
दश्शेत हैं भौर परम्परा और सस्कृति हैं। जैन परम्परा के इतिहास की ही नहीं, भारतीय इतिहास की बहुत सी 
बिछरी कड़ियाँ 'निशीय चूरणि' में उपलब्ध हो जाती हैं। साधक जीवन का एक भी अग ऐसा नहीं है, जिसके 
विषय में चुणिकार की कलम मौन रहो हो । यहाँ तक कि बौद्ध जातकों के ढंग की प्राकृत कथाएँ भी इस चूथणि मे 
काफी बडी सख्या में उपलब्ध हैं। अहिंसा, प्रमेकान्त, श्रपरिग्रह, ब्रह्मचयं, तप, त्याग एवं सपम--इन सभी 
विषयो पर झाचाय॑ जिनदास महृत्तर ने अपनी सर्वाधिक विशिष्ट कृति 'निशीय चूणि' को एक प्रकार से विचार- 
रत्नो का महान्‌ आकर ही बना दिया हैं। 'निशीष चुणि' ज॑न परम्परा के दाशंनिक साहित्य में भी सामान्य नहीं 
एक विशेष कृति है, जिसे समझना आवश्यक है । 

जैन प्रागमों की सबसे प्राचीन ससस्‍्क्ृत टीका आचाय॑ हरिभद्र ने लिखी है। उनका समय ७५७ विक्रम 
से ८५५७ के बीच का है। हरिभद्व ने प्राकृत चूणियो का प्रायः सस्कृत मे अनुवाद ही किया है। कह्दी-कहीं पर 


[ १९ ] 


झपने दाशंतिक झान का उपयोग करना भी उन्होंने ठीक समका है। उतकी दीकाओ में सभी दर्शनों की 
पूर्व पक्ष रूप से चर्चा उपलब्ध होती है। इतना ही नही, किन्तु जैन-तत्त्व को दाशंनिक शान के बल से निश्चित-रूप 
मे स्थिर करने का प्रयत्त भी देखा जाता है। हरिभद्र के बाद आचार शीलाकसूरि ने १०वीं शताब्दी में आचारांग 
झौर सूत्रकृताग पर सस्कृत टीकाप्नो की रचना की। शीलाक के बाद प्रसिद्ध टीकाकार आचायं शान्ति हुए । 
उन्होंने उत्तराध्ययन की बहत्‌ टीका लिखी है। इसके बाद प्रसिद्ध टीकाकार अभयदेव हुए जिन्होंने नौ अगो पर 
सस्कृत भाषा मे टीकाएँ रची हैं। उनका जन्म समय विक्रम १०७२ में और स्वर्गवास विक्रम ११३४५ मे हुआ । 
इन दोनों टीकाकारों ने पूर्व टीकाश्नो का पूरा उपयोग तो किया ही है, अपनी ओर से भी कही-कही नयी दाशंनिक 
चर्चा की है। यहाँ मल्लधारी हेमचन्द्र का नाम भी उल्लेखनीय है । वे १२वीं शताब्दी के महान्‌ विद्वान थे। परन्तु 
आगमों की सस्क्ृत टीका करने वालो में सर्वश्रेष्ठ स्थान तो आचाये मलयगिरि का ही है। प्राब्जल भाषा में 
दार्शनिक चर्चाओों से परिपूर्ण टीका यदि देखना हो, तो मलयगिरि की टोकाएँ देखनी चाहिए। उनकी टीकाएँ 
पढने में शुद्ध दाशंनिक ग्रन्थ पढने का भातन्द आता है। जैन-शास्त्र के धर्म, श्राचार, प्रमाण, नय, निक्षेप ही नहीं 
भूगोल एवं खगोल आदि सभी विषयो में उनकी कलम घाराप्रवाहु से चलती है भ्रौर विषय को इतना स्पष्ट करके 
रखती है कि उस विषय में दूसरा कुछ देखने की आवश्यकता नहीं रहती। ये आचाय॑ हेमचन्द्र के समकालीन थे । 
भत इनका समय निश्चित रूप से १२वीं शताब्दी का उत्तराध एव १३वीं शताब्दी का प्रारम्भ माना 
जाना चाहिए । 

संस्कृत प्राकृत टीकाओ का परिमाण इतना बडा है, श्लौर विषयों की चर्चाएँ इतनी गहन एवं गम्भीर 
हैं, कि बाद में यह आवश्यक समझा गया, कि आगमो का शब्दार्थ करने वाली सक्षिप्त टीकाएँ भी हो । समय की 
गति ने सस्क्ृत व प्राकृत भाषाओं को बोल-चाल की जन भाषाओं से हुटाकर मात्र साहित्य की भाषा बना दिया 
था। अत तत्कालीन अपभ्र श भाषा में बालावबोधो की रचना करने वाले बहुत हुए हैं, किन्तु अठारहवी शती 
में होने वाले लोकागच्छ के धर्मेसिह मुनि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। क्योकि इनकी इष्टि प्राचीन टीकाओ के 
अर्थ को छोडकर कही-कही स्व-सम्प्रदाय-सम्मत अर्थ करने की भी रही है। आगमसाहित्य की यह बहुत ही' 
सक्षिप्त रूपरेखा यहाँ प्रस्तुत की है। इसमे आगम के विषय मे मुख्य-मुद्य तथ्यो का एवं आग्रम के दाशंतिको 
तथ्यो का सक्षेप में सकेत भर किया है। जिससे आगे चलकर आगमो के गुरु गभीर सत्य-तथ्य को समभने में 
सहजता एव सरलता हो सके । इससे दूसरा लाभ यह भी हो सकता है कि अध्ययनशील प्रष्येता आगमो के 
ऐतिहासिक मूल्य एवं महत्त्व को भली-भाँति भ्रपनी बुद्धि की तुला पर तोल सकें। निश्चय ही श्रागम कालीन 
दाशंनिक तथ्यो को समझने के लिए मूल आगम' से लेकर सस्क्ृत टीका पर्यन्त समस्त आगमो के भ्रध्ययन की 
नितान्त' भ्रावश्यकता है । 


आगमों के दाह निक-तत्त्य 

मूल प्रागमों में क्या-क्या दाशेनिक-तत्त्व हैं, और उनका किस प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? उक्त 
प्रश्नो के समाधान के लिए यह आवश्यक हो जाता है, कि हम आगमगत दाशंलिक विचारों को समभने के लिए 
अपनी दृष्टि को व्यापक एवं उदार रखें, साथ ही श्रपनी ऐतिहासिक दृष्टि को भी विलुप्त न होने दें । जिस प्रकार 
वेदकालीन दर्शन की अपेक्षा उपनिषदू-कालीन दर्शन प्रौढतर हैं, भौर गीता-कालीन दर्शन प्रौदतम माना जाता 
है, उसी प्रकार जैन दर्शन के सम्बन्ध मे यही विचार है, कि आगमकालीन दर्शन की अपेक्षा आगभ के व्याख्या- 
साहित्य में जेन दर्शन प्रौढ़तर हो गया है औौर तत्त्वाय सूत्र में पहुँच कर प्रौदतम । यहाँ पर हमे केवल यह देखना 
है, कि मूल ्रागमो मे और गौण रूप से उसके व्यास्या-साहित्य मे जैन दर्शन का प्रारम्भिक रूप क्या और कंसा 


[ २० - | 


रहा है ? आगम-कालीन दर्शन को दो भागों मे विभाजित किया जा सकता है--प्रमेय और प्रमाण अथवा जेय 
भौर शान । जहाँ तक प्रमेय और ज्ञेय का सम्बन्ध है, जैन भ्रागामों में स्थान-स्थान पर अनेकान्त दृष्टि, सप्तभगी, 
मय, निक्षेप, द्रव्य, गुण, पर्याय, तत्व, पदार्थ, द्रव्य-क्षेत्र-काल एवं भाव, निश्चय और व्यवहार निमित्त और 
उपादान-नियति और पुरुषार्थ, कर्म और उसका फल, आचार और योग आदि विषयों का बिखरा हुआ वर्णन 
आगमो में उपलब्ध होता है। श्रव रहा इसके विभाग का प्रशत ! उसके सम्बन्ध में यहाँ पर संक्षेप. में इतना ही 
कहना है, कि ज्ञान का और उसके भेद-प्रभेदों का व्यापक रूप से वर्णन आगमो में उपलब्ध है। ज्ञान के क्षेत्र का 
एक भी अग और एक भी भेद इस प्रकार का नहीं है, जिसका वर्णन आयम और उसके व्याख्या साहित्य मे पूर्णता 
के साथ नही हुआ हो । प्रमाण के सभी भेद और उपभेदों का वर्णन आगमो में उपलब्ध होता है। जैप्ते कि प्रमाण 
धौर उसके प्रत्यक्ष एव. परोक्ष भेद तथा प्नुमान और उसके सभी अग, उपमान और शब्द प्रमाण आदि के भेद 
भी मिलते हैं। नय के लिए झ्रादेश एवं दृष्टि शब्द का प्रयोग भी अति प्राचीन आगमो मे किया गया है। नय के 
द्रव्याथिक और पर्यायाथिक भेद किये गये हैं। पर्यायाथिक के स्थान पर प्रदेशाथिक शब्द प्रयोग भी अनेक स्थानों 
पर आया है। सकलादेश और विकलादेश के रूप मे प्रमाण सप्तभगी एवं नय सप्तभगी का रूप भी आगम एवं 
व्याख्या साहित्य मे उपलब्ध होता है । नाम, स्थापना, द्रव्य, और भाव--इन चार निक्षेपों का वर्णन अनेक प्रकार 
से दिया गया है। स्यादह्वाद एवं अनेकान्त को सुन्दर ढंग से बतलाने के लिए पुस्कोकिल के स्वप्न का कथन भी रूपक 
का काम करता है। जीब की नित्यता एवं भ्रनित्यता पर विचार किया गया है। न्याय-शास्त्र में प्रसिद्ध वाद, 
वितण्डा और जल्प जैसे शब्दों का ही नही, उनके लक्षणों का विधान भी आगमों के व्याख्यात्मक साहित्य में प्राप्त 
होता है। इस प्रकार प्रमाण खण्ड में अथवा ज्ञान सम्बन्धी तस्वों का वर्णन आगमों में अनेक प्रसगो में उपलब्ध 
होता है। जिसे पढकर यह जाना जा सकता है, कि आगम काल में जैन परम्परा की दाश्शनिक दृष्टि क्या रही 
है। आगम काल में पट्द्वव्य और नव पदार्थों का वर्णन किस रूप में मिलता है और भ्रागे चल कर इसका विकास 
और परिवतंन किस रूप में होता है ? निश्चय ही जैन परम्परा का श्रागमकालीन दर्शन वेदकालीन वेद-परम्परा 
के दर्शन से प्रधिक विकसित और अधिक व्यवस्थित प्रतीत होता है। वेद-कालीन दर्शन में और आगमकालीन 
दर्शन भे बडा भेद यह भी है, कि यहाँ पर वेद की भाँति बहु-देववाद एव प्रकृतिवाद कभी नहीं रहा । जेन-दर्शन 
अपने प्रारम्भिक काल से ही अथवा अपने श्रत्यन्त प्राचीन काल से आध्यात्मिक एवं तात्तविक' दर्शन रहा है । 


प्रमेष-विचार 

दर्शन-साहित्य मे प्रमेय एव ज्ञेय दोनो शब्दो का एक ही अर्थ है। प्रमेय का भ्रर्थ है--जो प्रमा का विषय 
हो । शेय का अर्थ है---जो ज्ञान का विषय हो । सम्यकज्ञान को ही प्रमा कहा जाता है। ज्ञान विषयी होता है । 
ज्ञान से जो जाना जाता है, उमको विषय प्रथवा ज्ञेय कहा जाता है। किसी भी ज्ेय और किसी भी प्रमेष का 
जान जैत परम्परा में अनेकान्त दृष्टि से ही किया जाता है। जेन-दर्शन के प्रनुसार जब किसी भी विषय पर, किसी 
भी वस्तु पर प्रथवा किसी भी पदार्थ पर विचार किया जाता है तो अनेकान्त इष्टि के द्वारा ही उस का सम्यक्‌ 
निर्णय किया जा सकता है। प्राचीन तत्त्वव्यवस्था मे, जो भगवान्‌ महावीर से पूर्व पाश्वंनाथ परम्परा से ही 
चली आ रही थी, महावीर युग मे उसमे कया नयापन श्राया, यह एक विचार का विषय है! जैन अनुश्नति के 
अनुसार भगवान्‌ महावीर ने किसी नये तत्त्वदर्शन का प्रचार नहीं किया, किल्तु उनसे २५० वर्ष पूर्व होने वाले 
तीर्थंकर परमयोगी पाश्वनाथ सम्मत आचार में तो महावीर ने कुछ परिवतेन किया है, जिसकी साक्षी श्रागम दे 
रहे हैं, किन्तु पाश्वंनाथ के तत्त्व ज्ञान मे उन्होंने किसी भी प्रकार का परिवर्तेत नही किया था। पाँच ज्ञान, चार 
निक्षेप, स्व-चतुष्टय एवं पर-चतुष्टय, षट द्रव्य, सप्त-तत्व, नव-पदार्थ एवं पचर अस्तिकाय--इनमे किसी भो 


[ २१ ] 


प्रकार का परिवतंन भद्दावीर ने नहीं किया । कर्म और झात्मा की जो मान्यता पााश्वंताथ-युग में और उससे भी 
पूर्व जो ऋषभदेव युग भौर अरिष्टनेमि युग मे थी उसमे किसी प्रकार का परिवर्तत महावीर ने किया हो, अभी तक 
ऐसा उल्लेख नहीं मिलता है। गुणस्थान, लेश्या, एवं ध्यात के स्वरूप मे किसी प्रकार का भेद एवं अन्तर भगवान्‌ 
महावीर ने नहीं डाला। यह सब प्रमेय विस्तार जैन-परम्परा में महावीर से पूर्व भी था। फिर प्रश्न होता है, 
महावीर ने जैन-परम्परा को अपनी क्‍या नयी देन दी ? इसका उत्तर यही दिया जा सकता है, कि भगवान्‌ महाबीर 
ने नय गौर अनेकान्त इृष्टि, स्थाद्वाद और सप्तभगी जैन दर्शन को नयी देन दी है। महावीर से पूर्व के साहित्य 
में एवं परम्परा में अनेकान्त एवं स्थाद्वाद के सम्बन्ध मे उल्लेख मिलता हो, यह प्रमाणित नहीं होता । महावीर के 
युग मे स्वय उनके ही अनुयायी प्रथवा उस युग का श्रन्य कोई व्यक्ति, जब महावीर से प्रश्न करता तब उसका 
उत्तर भगवान्‌ महावीर अनेकान्त इृष्टि एवं स्पाद्वाद की भाषा में ही दिया करते थे। भगवान्‌ महावीर को केवल- 
ज्ञान होने से पहले जिन दस महास्वप्नों का दर्शन हुआ था, उसका उल्लेख भगवती सूत्र में हुआ है। इन स्वप्नो 
मे से एक स्वप्न में महावीर ने एक बड़े चित्र-विचित्र पाँख वाले प्ुस्कोकिल को स्वप्न में देखा था। उक्त 
स्वप्न का फल यह बताया गया था, कि महावीर आगे चलकर चित्र-विचित्र सिद्धान्त (स्व१२-सिद्धान्त) को बताने 
वाले द्वादइशाग का उपदेश करेंगे। बाद के दाशंनिको ने चित्रज्ञान और चित्रपट को लेकर बौद्ध और न्याय 
वेशेषिक के सामने प्रनेकान्त को सिद्ध किया है। उसका मूल इसी में सिद्ध होता है। स्वप्न में दृष्ट पुस्कोकिल 
की पाँखो को चित्र-विचित्र कहने का और आगमो को विचित्र विशेषण देने का विशेष प्रभिप्राय तो यही मालूम 
होता है कि उनका उपदेश एकरगी न होकर अनेक रगी था--अनेकान्तवाद था। प्रनेकान्त शब्द में सप्त तय 
का वर्णन गअ्स्तर्भुत हो जाता है। दूसरी बात जो इस सम्बन्ध में कहनी है, वह यह है, कि जैन आगमो में 
विभज्यवाद का प्रयोग भी उपलब्ध होता है। सूत्रकृताग सूत्र मे भिक्षु कसी भाषा का प्रयोग करे ? इस प्रश्न के 
उत्तर में कहा गया है कि भिक्षु को उत्तर देते समय विभज्यवाद का प्रयोग करना चाहिए। विभज्यवाद का 
तात्पयं ठीक समभने में जैन परम्परा के टीका-पग्रन्थो के अतिरिक्त बौद्ध प्रन्थ भी सहायक होते हैं। बौद्ध 'मज्मिम- 
निकाय' में शुभमाणवक के प्रश्न के उत्तर मे भगवान्‌ बुद्ध ने कहा--हे माणवक । मैं विभज्यवादी हूँ, एकाशवादी 
नहीं । इसका अथं यह है कि जेन परम्परा के विभज्यवाद एवं अनेकान्त को बुद्ध ने भी स्वीकार किया था| 
विभज्यवाद वास्तव में किसी भी प्रश्न के उत्तर देने की अनेकान्तात्मक एक पद्धति एवं शेत्री ही है। विभज्यवाद 
ओर अनेकान्तवाद के विषय में इतना जान लेने के बाद ही स्थाह्रद की चर्चा उपस्थित होती है। स्याद्वाद का 
अर्थ है--कथन करने की एक विशिष्ट पद्धति। जब अनेकान्तात्मक वस्तु के किसी एक धर्म का उल्लेख ही 
अभीष्ट हो तब अन्य धर्मों के सरक्षण के लिए 'स्थात्‌' शब्द का प्रयोग जब भाषा एवं शब्द में किया जाता है तब 
यह कथन स्पाद्वाद कहलाता है। स्याद्वाद और सप्तक्षगी परस्पर उसी प्रकार सयुक्त है, जिस प्रकार नय ओर 
प्रनेकान्‍्त । सप्तभगी में सप्तभ्ग (सप्त-विकल्प) होते हैं। जिज्ञासा सात प्रकार की हो सकती है। प्रश्न भी सात 
प्रकार के हो सकते हैं। अत उसका उत्तर भी सात प्रकार से दिया जा सकता है। वास्तव में यही स्थाद्वाद है। 
जैन-दशेन की भ्पनी मौलिकता और नूतन उद्भावना अनेकान्त और स्याद्वाद में हीहै। 

द्रव्य के सम्बन्ध में जैन आगमों में अनेक स्थानों पर अनेक प्रकार से वर्णन आया है। द्रव्य, गुण और 
पर्याय--जेन-आगम-परम्परा में इन तीनो का व्यापक और विशाल इंहिट से वर्णत किया गया है । द्रव्य में गुण 
रहता है, और गुण का परिणमन ही पर्याय है। इस प्रकार द्रव्य, गुण और पर्याय विभक्त होकर भी अविभक्त 
हैं। मुख्य रूप से द्रव्य के दो भेद हैं--जीव-द्रव्य और अजीव-द्रव्य । झ्रववा अम्य प्रकार से दो भेद समभने 
चाहिए-- रूपी द्रव्य और अरूपी द्रव्य । द्रब्यो की संख्या छह है--जीव, प्रुदूगल, धर्म, अधमें, आकाश और 
काल । इतमें से काल को छोडकर शेष द्रव्यो के साथ जब अस्तिकाय लगा दिया जाता है, तब वह पच॒-अस्तिकाय 


[ २२ ] 


कहलाता है। भ्रस्तिकाय शब्द का अर्थ है--प्रदेशो का समूह । काल के प्रदेश नहीं हीते अत इसके साथ अस्तिकाय 
शब्द नही जोड़ा गया | प्रस्येक द्रव्य मे प्रतन्‍्त गुण एवं धर्मे होते हैं। प्रौर प्रत्येक ग्रण की अनन्त पर्याएँ होती 
हैं। पर्याय के दो भेद हैं--जीव पर्याय और अजीव पर्याय | 


निक्षेप के सम्बन्ध मे आगमो मे वर्णन आता है। निक्षेप का भ्र्थ है-+न्यास । निक्षेप के चार भेद हैं-- 
नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव | जैन सूत्रों की व्याख्याविधि का वर्णन अनुयोगद्वार सूत्र मे आता है। यह 
विधि कितनी प्राचीन है ? इसके विषय मे निश्चित कुछ नहीं कहा जा सकता । परस्तु भनुयोगद्वार सूत्र के 
अध्ययन करने वाले व्यक्ति को इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है, कि व्याख्याविधि का अनुपरोगद्वार सूत्र मे जो 
वर्णन उपलब्ध है, वहू॒पर्याप्त प्राचीन होना चाहिए। अनुयोग या व्याख्या के द्वारों के वर्णन में नाम, स्थापना, 
द्रव्य और भाव--इन चार निक्षेपो का वर्णन आता है। अनुयोगद्वार सूत्र मे तो निक्षेपों के विषय में पर्याप्त 
विवेचन है, किन्तु यह गणधरक्ृत नही समझा जाता । गणधरक्ृत अयो में से स्थानाग सूत्र में सर्व के जो प्रकार 
बताये हैं, वे सूचित करते है, कि निक्षेपों का उपदेश स्वय भगवान्‌ महावीर ने दिया होगा । शब्द व्यवहार तो 
हम करते ही हैं, क्योकि इसके बिना हमारा काम चलता नहीं । पर कभी-कभी यह हो जाता है, कि शब्दों 
के ठीक अर्थ को--वक्ता के विवक्षित अर्थ को न समभने से बडा ग्नर्थ हो जाता है। इस प्रनर्थ का निवारण 
निक्षेप के द्वारा भगवान्‌ महाबीर ने किया है। निक्षेप का अथे है--प्रथ-निरूपण-पद्धति । भगवान महावीर ने 
शब्दों के प्रयोग को चार प्रकार के प्रर्थों मे विभक्त कर दिया है--नाम, स्थापना, द्रव्य ग्रौर भाव । यह निक्षेप 
पद्धति प्राचीन से प्राचीन आगमों में उपलब्ध होती है प्रोर नतन युग के न्याय ग्रन्थों में भी। उत्तर काल के 
आचार्यों ने इसका उल्लेख ही नहीं, नृतन पद्धति से निरूपण भी किया है। उपाध्याय यशोविजयजी ने स्वरचित 
'जैनतर्कभाषा' में प्रमाण एव नय निरूपण के साथ-साथ निक्षेप का निरूपण भी किया है। 


आगमो मे द्रव्य, क्षेत्र काल और भाव का भी अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है। इन चारो को दो 
प्रकार से कहा गया है --स्वचतुष्टय--स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभाव तथा पर-चतुष्टय, पर-द्रव्य, पर-क्षेत्र, 
पर-काल, और पर-भाव | एक ही वस्तु के विषय में जो नाना मतो की सृष्टि होती है, उसमे द्रष्टा की रुचि 
और शक्ति, दर्शन का साधन, दृश्य की दैशिक और कालिक स्थिति, दृष्टा की दैशिक श्रौर कालिक स्थिति, इश्य का 
स्थूल श्र सूक्ष्म रूप ध्रादि प्रनेक कारण है। यही कारण है कि प्रत्येक दृष्टा और दृश्य और प्रत्येक क्षण में 
विशेष-विशेष होकर, नाना मतो के सर्जन में निमित्त बनते हैं। उन कारणों की गणना करना कठिन है। अतएव 
तत्कृत विशेषों की परिगणना भी अ्सभव है। इसी कारण से वस्तुत सूक्ष्म विशेषताओं के कारण से होने वाले 
नाना मतो का परिगणन भी भ्रसभव हैं । इस असभव को ध्यान में रखकर ही भगवान्‌ महावीर ने सभी प्रकार 
की अपेक्षात्रो का साधारणीकरण करने का प्रयत्न किया है श्ौर मध्यम मार्ग से सभी प्रकार की श्रपेक्षाओ का 
वर्गीकरण चार प्रकार से किया है। ये चार प्रकार इस प्रकार हैं--द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव । इन्ही के प्राधार 
पर प्रत्येक वस्तु के भी चार प्रकार हो जाते है । 
प्रमाण-विचार 


जैन प्रागमों मे ज्ञान ओर प्रमाण का वर्णन अनेक प्रकार से है और प्नेक् आगमो में है। प्राचीन भ्रागमो 
में प्रमाण की अपेक्षा ज्ञान का ही वर्णन अधिक व्यापकता से किया गया है। नन्‍दी-सूत्र में ज्ञान का विस्तार के 
साथ निहूपण किया गया है। प्रमाण और ज्ञान किसी भी वस्तु को जानने के लिए साधन हैं। ज्ञान के मुख्य 
रूप से पाँच भेद हैं-“मति, श्ुत, अवधि, सत'पर्यव और केवल । प्नज्ञान की चर्चा जैन-परम्परा में भगवान्‌ 


[ २३ ॥ 


महावीर से भी पहले थी। इसका प्रमाण राजप्रश्नीय सूत्र में है। भगवान्‌ महावीर ने अपने मुख से अतीत में होने 
बाले केशीकुमार श्रमण का व॒सान्त राजप्रश्नीय में कहा है। शास्त्रकार ने केशीकुमार के मुख से पाँच ज्ञान का 
निरूपण कराया है। प्ागमों में पाँच ज्ञानों के भेद तथा उपभेदों का जो वर्णन है, कमं-शास्त्र मे शानावरणीय 
कर्म के जो भेद एबं उपभेदो का वर्णन है, जीव मार्गगाओ में पाँच ज्ञानो का जो वर्णव है, तथा पू॑ गत मे 
ज्ञानो का स्वतन्त्र निरूपण करने वाला जो ज्ञानप्रवाद पूर्व है--इन सबसे यही फलित होता है, कि पत्र ज्ञान की 
चर्चा भगवान्‌ महावीर की पूव्व परम्परा से चली आ रही है। भगवान्‌ महावीर ने अपनी वाणी में उसी को 
स्वीकार कर लिया था। इस ज्ञान चर्चा के विकासक्रम को आगम के प्राधार पर देखना हो, तो उसकी तीन 
पूमिकाएँ स्पष्ट दीखती हैं--प्रथम भूमिका तो वह्‌ है--जिससे ज्ञानो को पाँच भेदों में ही विभक्त किया गया है । 
द्वितीय भूमिका मे ज्ञान को प्रत्यक्ष और परोक्ष दो भेदों मे विभक्त करके पाँच ज्ञानो मे से मति और श्रुत को परोक्ष 
में तथा अवधि, मन पर्याय और केवल को प्रत्यक्ष में माना गया है। तृतीय भूमिका में इन्द्रियजन्य ज्ञानो को 
प्रत्यक्ष भौर परोक्ष उभय में स्थान दिया गया है। इस प्रकार ज्ञान का स्वरूप भ्ौर उसके भेद और उपभेदों के 
कारण ज्ञान के वर्णन ने आगमो मे पर्याप्त स्थान ग्रहण किया है । 


पच-ज्ञान-चर्चा के क्रमक विकास की तीतो आगामिक भूमिकाओं की एक विशेषता रही है, कि इनमे 
ज्ञानचर्चा के साथ इतर दर्शनों मे प्रचलित प्रमाण चर्चा का कोई सम्बन्ध या समस्वय स्थापित नहीं किया गया 
है। इन ज्ञानो में ही सम्यक्त्व झौर मिथ्यात्व के भेद के द्वारा आगमकारों ने वही प्रयोजन सिद्ध किया है, जो 
दूसरों ने प्रमाण और अप्रमाण के द्वारा सिद्ध किया है। आगमकारों ने प्रमाण या अप्रमाण जैसे विशेषण बिता 
दिए ही प्रथम के तीनो में ग्रज्ञान-विपयेय-मिथ्यात्व की कथा सम्यक्त्व की सम्भावता माली है। और अन्तिम 
दो में एकान्त सम्पक्व हो बतलाया है। इस प्रकार आगमकारों ने प्रच-ज्ञानो का प्रमाण और अप्रमाण न 
कहकर उन विशेषणो का प्रयोजन तो दूसरे प्रकार से निध्पन्न ही कर लिया है ज्ञान का वर्णन आगमो मे 
अत्यन्त विस्तृत है। 

प्रमाण के विषय के मुल जेन भ्रागमों मे और उसके व्याख्या साहित्य में भी भ्रति विस्तार के साथ तो 
नहीं, पर सक्षेप में प्रमाण की चर्चा एवं प्रमाण के भेदो-उपभेदों का कथन प्रनेक स्थानों पर आया है । जैन-भागमो 
में प्रमाण-चर्चा ज्ञान चर्चा से स्वतन्त्र रूप से भी बाती है। अनुयोगद्वार सूत्र मे प्रमाण-शब्द को उसके विस्तृत 
अथे में लेकर प्रमाणो का भेद किया गया है| अनुयोगद्वार सूत्र के मत से श्रथवा नन्‍्दी सूत्र के वर्णन से प्रमाण के 
दो भेद किये हैं--इन्द्रिय-प्रत्यक्ष और नोइन्द्रिय-प्रत्यक्ष । इन्द्रिय प्रत्यक्ष में अनुयोगद्वार सूत्र ने पाचों इन्द्रियों के 
द्वारा होने वाले पाँच प्रकार के प्रत्यक्ष का समावेश किया है। नो-इन्द्रिय प्रत्यक्ष प्रमाण मे जैन शास्त्र प्रसिद्ध तीन 
शञानो का समावेश है--अवधि-प्रत्यक्ष, मन पर्याय प्रत्यक्ष और केवल प्रत्यक्ष । प्रस्तुत में 'नो' शब्द का अर्थ है-- 
इन्द्रिय का अभाव । ये तीनो ज्ञान इन्द्रियजन्य नहीं हैं। ये ज्ञान केवल आत्मसापेक्ष हैं। जैन परम्परा के अनुसार 
इन्द्रिव-जन्य ज्ञानों को परोक्ष-प्रमाण कहा जाता है। किन्तु प्रस्तुत में प्रमाण-चर्चा पर-सम्मत प्रमाणो के आधार 
से की है। अतएवं यहाँ उसी के पनुसार दन्द्रियजन्य ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा है। वह भी पर-प्रमाण के सिद्धान्त का 
श्रनुसरण करके ही कहां गया है। अनुयोगद्वार सूत्र में अनुमान के तीन भेद किये गये हैं--पूवंबत्‌ू, शेषवत्‌ झौर 
हृष्ट-साधर्म्यवत्‌ । यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि अनुयोगद्वार में अनुमान के स्वार्थ और पदार्थ भेद नहीं 
बताए हैं। इस प्रकार मूल भ्ागमो में और उसके व्यास्यात्मक साहित्य के अनुमान के अनेक प्रकार के भेदों का एव 
उपभेदों का कथन भी है। अनुमान के अवयबो का भी वर्णन किया गया है। प्रत्यक्ष-प्रमाण और परोक्ष-प्रमाण मे 
अनेक प्रकार से वर्गीकरण किये गये हैं, किन्तु इनका यहाँ पर सक्षेप मे कथन करना ही अभीष्ट है । 


[ २४ ] 


नय-विद्यार 

जैन परम्परा के प्रागमो में प्रमाण के साथ-साथ प्रमाण के ही एक अश नय का भी निरूपण किया 
गया है। नयो के सम्बन्ध में वर्णन स्थानांगसूत्र में, अनुयोगद्वारसूत्र में और भगवतीसूत्र में भी बिखरे हुए रूप मे 
उपलब्ध होता है। आगमों में नय के स्थान पर दो शब्द श्रौर मिलते हैं--भादेश और दृष्टि | श्रमेकान्तात्मक 
वस्तु के भनतन्त धर्मों में से जब किसी एक ही धर्म का शान किया जाता है, तब उसे नय कहा जाता है। भगवान्‌ 
महावीर ने यहू देखा कि जितने मत, पक्ष अथवा दर्शन हैं, वे अपना एक विशेष पक्ष स्थापित करते हैं और 
विपक्ष का निरास करते हैं। भगवान्‌ ने तात्कालिक उन सभी दाशंनिको की दृष्टियो को समभने का प्रयत्त 
किया । उन्होंने अनुभव किया कि नाना मनुष्यों के वस्तु-दर्शन मे जो भेद हो जाता है, उसका कारण केवल वस्तु 
की अनेकरूपता प्रथवा अनेकान्तात्मकता ही नहीं, बल्कि नाता मनुष्यों के देखने के प्रकार की भ्रनेकता एवं नाना- 
रझूपता भी कारण है। इसलिए उन्होने सभी मतो, सभी दर्शनों को वस्तुस्वरूप के दर्शन में योग्य स्थान दिया है । 
किसी मत-विशेष एवं पथ-विशेष का सर्वथा खण्डन एवं सर्वथा निराकरण नहीं किया है। निराकरण मदि किया 
है, तो इस श्रर्थ मे कि जो एकान्त आग्रह का विषय था, अपने ही पक्ष को अपने ही मत या दर्शन को सत्य और 
दूसरों के मत, दर्शन एवं पक्ष को मिथ्या कहने एवं मिथ्या मानने का जो कदाग्रह था तथा हूठाग्रह था, उसका 
निराकरण करके उन सभी मतो को एवं विचारों को नया रूप दिया है, उसे एकांगी या अधूरा कहा गया है । 
प्रत्येक मतवादी कदाग्रही होकर दूसरे के मत को मिथ्या मानते थे। वे समत्वय न कर सकते के कारण एकान्तवाद 
के दलदल में फस जाते थे । भगवान्‌ महावीर ने उन्ही के मतो को स्वीकार करके उनमें से कदाग्रह का एवं मिथ्या- 
ग्रह का विष निकाल कर सभी का समन्वय करके अनेकान्तमयी सजीवनी औषध का भ्राविष्कार किया है। यही 
भगवान्‌ महावीर के नयवाद, इृष्टिवाद, आदेशवाद, और अपेक्षाबाद का रह्टस्य है । 


नयो के भेद के सम्बन्ध मे एक विचार नहीं है। कमसे कम दो प्रकार से आगमो में नय-इष्टि का 
विभाजन किया गया है। सप्तनय--नैमम, सग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ तथा एवभूत । एक दूसरे 
प्रकार से भी नयो का विभाजन किया गया है--द्रब्याधिक श्ौर पर्यायाथिक । वस्तुत देखा जाये तो काल भोर 
देश के भेद से द्रव्यो मे विशेषताएँ अवश्य होती है। किसी भी विशेषता को काल एवं देश से मुक्त नहीं किया जा 
सकता । अन्य कारणों के साथ काल और देश भी अवश्य साधारण कारण होते हैं । प्रतएव काल ओर क्षेत्र पर्यायों 
के कारण होने से यदि पर्यायों मे समाविष्ट कर लिए जाएँ तो मूल रूप से दो दृष्टियाँ ही रह जाती हैं--द्रव्यप्रधान 
दृष्टि--द्रव्पाथिक और पर्पाय-प्रधान दृष्टि--पर्यायाथिक । पर्यायार्थिक नय के लिए भ्रागमो में प्रदेशाथिक शब्द का 
प्रयोग भी किया गम" है। एक अन्य प्रकार से भी नयो का विभाजन किया गया है--निश्वयनय और व्यवहारतय । 
जो दृष्टि स्व-आश्रवित होती है, जिसमे पर की अपेक्षा नहीं रहती, वहू निश्चय हैं और जो दुष्टि पर- 
आश्रित होती है, जिसमे पर की अपेक्षा रहती है, वह व्यवहारनय । नय एक प्रकार का विशेष दृष्टिकोण है, 
विचार करने की पद्धति है और अनेकान्तवाद का मूल श्राधार है। आगमो मे न्‍्याय-शास्त्र समस्त वाद, कथा 
एवं विवाद आदि का भी यथाप्रसग वर्णन आता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि मूल भ्रागमो मे भोर उत्तके निकट- 
वर्ती व्याख्या साहित्य में भी यथाप्रसग जैन-दर्शन के मूल तत्वों का निरूपण, विवेचन और विश्लेषण किया है । 
नन्‍्दोसृत्र का विषय 

नन्‍दी श्ौर अनुयोगद्वार चूलिकासूत्र कहलाते हैं। घूलिका शब्द का प्रयोग उस अध्ययन झ्थवा ग्रन्थ के 
लिए होता है जिसमें अवशिष्ट विषयो का वर्णन अथवा वर्णित विषयों का स्पष्टीकरण किया जाता है । दशवे- 
कालिक और महानिशीय के सम्बन्ध में इस प्रकार की चूलिकाएँ--चूलाएँ---चूड़ाएँ उपलब्ध हैं । इनमे मूल ग्रन्थ 


[ २५ ] 


के प्रयोजत अथवा विषय को दृष्टि मे रखते हुए ऐसी कुछ आवश्यक बातो पर प्रकाश डाला गया है जिनका 
समावेश आचार ग्रन्थ के किसी अध्ययन से न कर सके । आजकल' इस प्रकार का कार्य पुस्तक के अनन्त मे परिशिष्ट 
जोड़कर सम्पन्न किया जाता है। ननन्‍्दी भोर अनुयोगद्वार भी प्रागमों के लिए परिशिष्ट का ही कार्य करते है । 
इतना ही नहीं, भागमो के अध्ययन के लिए ये भूमिका का भी काम देते हैं। यह कथन नन्‍्दी की अपेक्षा अनुयोग- 
द्वार के विषय मे अधिक सत्य है। नन्‍दी में तो केवल शान का ही विवेचन किया गया है, जबकि अनुयोगद्वार मे 
आवश्यक सूत्र की व्याख्या के बहाने समग्र आगम की व्याख्या अभीष्ट है। श्रतएवं उसमे प्राय झ्लागमों के समस्त 
मूलभूत सिद्धान्तो का स्वरूप समझाते हुए विशिष्ट पारिभाषिक शब्दों का स्पप्टीकरण किया गया है जित्तका ज्ञान 
क्षागमों के भ्रध्ययन के लिए प्रावश्यक ही नही, झ्ननिवाय है। अनुयोगद्वारसृत्र समझ लेने के पश्चात्‌ शायद ही 
कोई भ्रागमिक परिभाषा ऐसी रह जाती है जिसे समझने मे जिज्ञासु पाठक को कठिनाई का सामना करना पड़े । 
यह चूलिका-सूत्र होते हुए भी एक प्रकार से समस्त आगमा कौ--अगम ज्ञान की नीव है और इसीलिए अपेक्षाकृत 
कठिन भी है । 

नन्‍्दीसूत्र से प्रचज्ञान का विस्तार से वर्णन किया गया है। निर्यक्तिकार आदि आचार्यों ने नन्‍दी 
शब्द को ज्ञान का ही पर्याय माना है। सूत्रकार ने सर्वप्रथम ५० गाथाभ्रो में ममलाचरण किया है। तदनन्तर 
सूत्र के मूल विषय आमिनिबोधिक आदि पाँच प्रकार के ज्ञान की चर्चा आ्रारम्भ की है। पहले प्राचार्य ने ज्ञान 
के पाँच भेद किये है। तदनन्तर प्रकारान्तर से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप दो भेद किये हैं। प्रत्यक्ष मे इन्द्रियप्रत्यक्ष 
और नोइन्द्रियप्रत्यक्ष के रूप मे पुन दो भेद किये है। इन्द्रिय प्रत्यक्ष मे पाँच भेद किये हैं और उसमे पाँच प्रकार 
की इन्द्रियो से होने वाले ज्ञान का समावेश है। इस प्रकार के ज्ञान को जैन न्य्रायशास्त्र में साव्यवहारिक प्रत्यक्ष 
कहा जाता है। नोइन्द्रियप्रत्यक्ष मे अवधि, मन पर्यय एवं केवलशान का समावेश है। परोक्ष ज्ञान दो प्रकार 
का है--आभिनिबोधिक' और झक्षुत । झ्राभिनिबोधिक को मति भी कहते है। आभिनिवोधिक के श्रुतनिश्चित वे 
प्रश्नतनिश्चित रूप दो भेद हैं! श्रुतज्ञान के अक्षर, अनक्षर, सज्ञी, असज्ञी, सम्यक्‌, मिथ्या, सादि, प्रनादि, सावसान, 
निरवसान, गमिक, ग्रगमिक, अगप्रविष्ट व प्रनगप्रविष्ट रूप चौदह भेद है । 

नन्‍्दीसूत्र की रचना गद्य व पद्य दोनों मे है। सूत्र का ग्रन्थमान लगभग ७०० एलोक़ प्रमाण है। प्रस्तुत 
सूत्र मे प्रतिपादित विषय अन्य सूत्रों में भी उपलब्ध होते हैं। उदाहरण के िए अवधि ज्ञान के विषय, सस्थान, 
भेद धादि पर प्रज्ञापनासूत्र के ३३वें पद में प्रकाश डाला गया है। भगवती (व्याख्याप्रश्नप्ति) आदि सूत्रा में 
विविध प्रकार के श्रज्ञान का उतललेख मिलता है। इसी प्रकार मतिज्ञान का भी भगवती आदि सूत्रों मे वर्णन 
मिलता है। द्वादशागी श्रुत का परिचय समवायागसूत्र में भी दिया गया है। किन्तु वह नन्‍्दीसूत्र से कुछ 
भिन्‍न है। इसी प्रकार अन्यत्र भी कुछ बातो मे नन्दीसूत्र से भिन्‍नता एवं विशेषता दृष्टिगोचर होती है । 


भंगलाचरण 


सर्वप्रथम सूत्रकार ने सामान्य रूप से अहँत्‌ को, तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ महावीर को नमस्कार किया है । 
तदनन्तर जैन सध, चौबीस जिन, ग्यारह गणधर, जिनप्रवचव तथा सुधमं श्रादि स्थविरों को स्तुतिपूर्वक 
प्रणाम किया है । 
जयइ जगजीव-जोणी-वियाणओ जगगुरू जगाणदो । 


जगणाहो जगबधघू, जयई जगप्पियामही भयव | 


[ २६ |] 


ज॑यइ सुआण पभ्चवों, नित्थयराण अपच्छिमों जयइ । 
जयइ गुरू लोगाण, जयदई महप्पा महावीरों ॥ 


मगल के प्रसग से प्रस्तुत सूत्र में श्राचायं ने जो स्थविरावली-गुरु-शिष्य-परम्परा दी है, वह कल्पसूत्रीय 
स्थविरावली से भिन्न है। नन्‍्दीसूत्र मे भगवान्‌ महावीर के बाद की स्थविरावली इस प्रकार है-- 


१ सुधर्म १७ धर्म 

२ जम्बू १८ भद्रगुप्त 

३ प्रभव १९ वज्ञ 

४ शब्यम्भव २० रक्षित 

५ यशोभद्र २१ नन्दिल (आनन्दिल) 
६ सम्भूतविजय २२ नागहस्ती 

७. भद्रबाहु २३ रेवती नक्षत्र 
८ स्थलभद्र २४ ब्रह्मदीपकर्सिह 
९ भमहागिरि २४५ स्कन्दिलाचार्य 
१० सुहस्ती २६ हिमवन्त 

११ बलिस्सह २७ नागार्जुन 

१२ स्वाति २८ श्री गोविन्द 
१३ श्यामार्य २९ भूतदिन्न 
१४ शाण्डिल्य ३० लाछित्य 
१५ समुद्र ३१ दृष्यगणी' 
१६ मग्रु 


श्रीता और सभा 
मगलाचरण के रूप मे अहंन्‌ आदि की स्तुति करने के बाद सूत्रकार ने सूत्र का प्रर्थ ग्रहण करने की 
योग्यता रखने वाले श्रोता का चौदह दुृष्टान्तों से वर्णन किया है। वे दृष्टान्त ये है--१ शैल और घन, २. कुटक 
अर्थात्‌ घडा, हे चालनी, ४ परिपूर्ण, ५ हम, ६ महिष, ७ मेष, ८ मशक, ९ जलौका, १० विडाली, 
११ जाहक, १२ गौ, १३ भरी, १८४ आभीरी । एतद्विषयक गाथा इस प्रकार है-- 
सेल-घधण-कुडग-चालिणि, पतिपुण्णग-हस महिस-मेसे य' । 
मसग-जलूग-बिराली, जागह-गो भरी श्राभीरी ॥ 


इन दुृष्टान्तो का टीकाकारों ने विशेष स्पष्टीकरण किया है । 


श्रोताओ्नो के समृहू को सभा कहते है । सभा कितने प्रकार की होती है ” इस' प्रश्न का विचार करते हुए 
सूत्रकार कहते हैं कि सभा सक्षेप में तीन प्रकार की होती हे ।--ज्ञायिका, भ्रशायिका ओर दुविदग्धा। जेसे हस 
पानी को छोडकर दूध पी जाता है उसी प्रकार गुणसम्पन्न पुरुष दोषो को छोडकर गुणो को ग्रहण कर लेते हैं। इस 
प्रकार के पुषषो की सन्ना ज्ञायिका-परिषद्‌ कहलाती है। जो श्रोता, मृग, सिह और कुक्कुट के बच्चो के समान 
प्रकृति से भोले होते हैं तथा असस्थापित रत्तो के समान किसी भी रूप में स्थापित किये जा सकते हैं-किसी भी 
मार्ग मे लगाये जा सकते हैं, वे अज्ञायिक है । इस प्रकार के श्रोताओ की सभा प्रशायिका कहलाती है। जिस प्रकार 


[ २७ ] 


कोई ग्रामीण पण्डित किसी भी विषय मे विद्धत्ता नही रखता और न अनादर के भय से किसी विद्वान से कुछ 
पूछता ही है किन्तु केवल वातपूर्णवस्ति--वायु से भरी हुई मशक के समान लोगों से अपने पाडित्य की प्रशसा 
सुनकर फूलता रहता है उसी प्रकार जो लोग अपने शझ्ागे किसी को कुछ नही समझते, उनकी समा दुविदग्धा 
कहलाती है । 

शानवाद 


इतनी भूमिका बाँधने के बाद सूत्रकार अपने मूल विषय पर आते हैं। बह विषय है ज्ञान | ज्ञान क्‍या 
है? क्षान पाँच प्रकार का है--१ आभिनिबोधिकज्ञान, २ श्रुतज्ञान, से अवधिज्ञान, ४ मनपर्ययज्ञान स्‍न्‍्लौर 
५. केवलज्ञान । यह ज्ञान सक्षेप में दो प्रकार का है--प्रत्यक्ष और परोक्ष । प्रत्यक्ष का क्‍या स्वरूप है ? प्रत्यक्ष 
के पुन दो भेद हैं--इन्द्रिय-प्रत्यक्ष और नोदर्द्रिय-प्रत्यक्ष । इन्द्रिय-प्रत्यक्ष क्या है ? इन्द्रिय प्रत्यक्ष पाँच प्रकार 
का है--१. श्रोत्रेन्द्रिय-प्रत्यक्ष, २ चक्षुरिन्द्रिय-प्रत्यक्ष, ३ पश्राणेन्द्रिय-प्रत्यक्ष, ४ ॒ जिद्ठे रिद्रिय-प्रत्यक्ष, 
५ स्पशेर्द्रिय-प्रत्यक्ष ।॥ नोइन्द्रिय-प्रत्यक्ष क्या है? नोइन्द्रिय-प्रत्यक्ष तीन प्रकार का है--१. अवधिन्नान-प्रत्यक्ष, 
२, मन पर्ययज्ञान-प्रत्यक्ष, ३ केवलशान-प्रत्यक्ष । 


सक्षेप मे नन्‍्दीसूत्र मे ये ही विषय हैं। वस्तुत मुख्य विषय पञ्चज्ञान-वाद ही है। प्रागमिक पद्धति से 
यहू प्रमाण का ही निरूपण है। जैन-दर्शन ज्ञान को प्रमाण मानता है, उस का विषय विभाजन तथा प्रतिपादन दो 
पद्धतियों से किया गया है--आगमिक-पद्धते और तकं-पद्धति । नन्‍्दीसूत्र मे, प्रावश्यकनिर्युक्ति भे और 
विश्वेषावश्यक भाष्य मे ज्ञानवाद का श्रत्यन्त विस्तार से वर्णन किया गया है। निर्युक्तिकार झाचाय॑ भद्रबाहु, 
नन्‍्दी-सुत्रकार देववाचक भौर भाष्यकार जिनभद्र क्षमाश्रमण आगमिक परम्परा के प्रसिद्ध एव समर्थ व्याख्याकार 
रहे हैं । 

आगमो मे नन्‍्दीसूत्र की परिगणना दो प्रकार से की जाती है--मूल सूत्रों में तथा चूलिका सूत्रों में । 
स्थानकवासी परम्परा की मान्यतानुसार मूल सूत्र चार हैं--उत्तराष्ययत, दशर्वकालिक, नन्‍दी और श्रनुयोगद्वार । 
श्वेताम्बर मूर्तिपुजक परम्परा नन्‍्दीसूत्र और अनुयोगद्वार॒सूत्र को चूलिका सूत्र स्वीकार करती हैं। ये दोनो 
प्रागम समस्त भागमों में चुलिका रूप रहे हैं। दोनो की रचना अत्यन्त सुन्दर, सरस एवं व्यवस्थित है। विषय- 
निरूपण भी प्रत्यन्त गम्भीर है। भाव, भाषा और शैली की दृष्टि से भी दोनों का आगमो मे अत्यन्त गौरबपूण 
स्थान है । 


व्याख्या-साहित्य 


आगमो के गम्भीर भावों को समझने के लिए आचार्यों ने समय-समय पर जो व्याख्या-ग्रन्थ लिखे है, वे 
हैं--निर्युक्ति, भाष्य, चूणि भश्रौर टीका । इस विषय मे, मैं पीछे लिख आया हूँ । नन्‍्दीसूत्र पर निर्युक्ति एवं 
भाष्य--दोनो में से एक भी आज उपलब्ध नही है। चूणि एवं अनेक सस्क्ृत टीकाएँ आज उपलब्ध हैं । चूणि 
बहुत विस्तृत नही है। आचाये हरिभद्र कृत सस्‍्क्ृत टीका, चूणि का ही अनुगमन करती है। प्राचायं मलगगिरि 
कृत नन्‍्दी टीका प्रत्यन्त महृत्त्वपृ्ण है। गम्भीर भावो को समभने के लिए इससे सुन्दर प्रन्य कोई व्याख्या नहीं 
है। श्राचार्य आत्मारामजी महाराज ने नन्‍्दीसूत्र की हिन्दी भाषा मे एक सुन्दर व्याख्या प्रस्तुत की है। आचार्य 
हस्तीमलजी महाराज ने भी नन्‍्दीसूत्र की हिन्दी व्याख्या प्रस्तुत की है। आचार्य घासीलालजी महाराज ने नन्दीसूत्र 
की सस्कृत, हिन्दी और गुजराती मे सुन्दर व्याख्या की है । 


[ रेप ] 


प्रस्तुत संम्पादरन 


नन्‍्दीयूत्र का यह सुन्दर संस्करण ब्यावर से प्रकाशित पश्रागम-ग्रन्थमाला की लड़ी की एक कशी है | 
अल्प काल में ही वहाँ से एक के बाद एक यो अनेक आगमन प्रकाशित हो चुके हैं। पश्राचारागसूत्र दो भागों मे 
तथा सूत्रकृतागसूत्र भी दो भागों में प्रकाशित हो चुका है। ज्ञातासूत्र, उपासकदशागसूत्र अन्तकुद्दशागसूत्र, 
प्रनुत्तरोपपातिकसूत्र और विपाकसूत्र भी प्रकाशित हो चुके हैं। नन्‍्दीसूत्र आप के समक्ष है । 


युवाचाय॑ श्री मिश्रीमलजी म० “मधुकर' ने झागमो का अधुनातन बोली मे नवसस्करण करने की जो 
विशाल योजना प्पने हाथो मे ली है, वह्‌ सचमुच एक भगीरथ कार्य है। यह कार्य जहाँ उनकी दृरदशिता, 
रढ़ सकलप और आगमो के प्रति अगाधभक्ति का सबल प्रतीक है, वहाँ साथ ही श्रमण सध की गुवाचायंश्रीजी 
की अमर कीति का कारण भी बनेगा । वे मेरे पुराने स्नेही मित्र है। उनका स्वभाव मधुर है व समाज को जीडकर, 
कार्य करने की उनकी अच्छो क्षमता है। उनके ज्ञान, प्रभाव और परिश्रम भे सम्पूर्ण भ्रागमो का प्रकाशन सभव हो 
सका तो समस्त स्थानकवासी जैनसमाज के लिए महान्‌ भौरव का विषय सिद्ध होगा । 


प्रस्तुत सस्करण की प्रपनी विशेषताएँ हैं--शुद्ध मूल पाठ, भावार्थ और फिर विवेचन। विवेचन न 
बहुत लम्बा है, और न बहुत सक्षिप्त ही। विवेचन मे, नियुक्ति चुणि शौर सस्कृत टीकाओ का आधार लिया 
गया है। विषय गम्भीर होने पर भी व्याख्याकार ने उसे सरल एव सरस बनाने का भरसक प्रयास किया है । 
विवेचन सरल, सम्पादन सुन्दर और प्रकाशन श्राकषंक है। अत विवेचक, सम्पादक एवं प्रकाशक--तीनों घन्य- 
बाद के पात्र हैं। नन्दीसूत्र का स्वाध्याय केवल साध्वी-साधु ही नहीं करते, श्लाजिका-श्रावक भी करते हैं। 
नन्‍्दी के स्वाध्याय से जीवन मे आनन्द तथा मगल की अमृत वर्षा होती है। ज्ञान के स्वाध्याय से ज्ञानावरण कम 
का क्षयोपश्म भी होता है। फिर ज्ञान की प्रभिवृद्धि होती है। ज्ञान निर्मेल होता है। दर्शन विशुद्ध बनता है । 
चारित्र निर्दोष हो जाता है । तीनो की पूर्णता से निर्वाण का महा लाभ मिलता है। यही है, नन्‍्दीसूत्र के स्वाध्याय 
की फलश्रुति । यह सूत्र अपने रचनाकाल से ही समाज मे अत्यन्त लोकप्रिय रहा है । 


श्रमण संघ के भावी आचार्य पण्डित प्रवर मधुक़र॒जी महाराज की सम्पादकता मे एव सरक्षकता में 
आग्रम प्रकाशन का जो एक महान कार्य हो रहा है, वह वस्तुत प्रशसनीय है । पूज्य अमोलकऋषिजी' महाराज 
के आगम श्रत्यन्त सक्षिप्त थे, और आज वे उपलब्ध भी नही होते । पूज्य घासीलालजी महाराज के आगम 
प्रत्यन्त विस्तृत है, सामान्य पाठक की पहुच से परे हैं। श्री मधुकरजी के आगरम नूतन शैली में, नूतन भाषा में 
भौर नूतन परिवेश में प्रकाशित हो रहे है । यह एक महान हर्ष का विषय है । 


नम्दीसूत्र की व्याख्या एक साध्वी की लेखनी से हो रही है, यह एक और भी महान्‌ प्रमोद का विषय 
है। साध्वीरत्न, महाविदुपी श्री उमरावकुवरजी “अचचना' जी स्थानकवासी समाज में चिरविश्वुता हैं। 
नन्‍्दीसूत्र का लेखन उनकी कीर्ति को प्रधिकः व्यापक तथा समुज्ज्वल करेगा--इसमे जरा भी सनन्‍्देह नहीं। 
अर्चना” जी सस्कृत भाषा एवं प्राकृत भाषा की विदुषी तो है ही, लेकिन उन्होने आगमो का भी गहन प्रध्ययन 
किया है, यह तथ्य इस लेखन से सिद्ध हो जाता है। मुझे प्राशा है, कि श्रनागत में वे प्रन्य प्रागमो की व्याख्या भी 
प्रस्तुत करेंगी | पण्डित प्रवर शोभाच-द्रजी' भारिलल ने इस सम्पादन में पूरा सहयोग दिया है । सब के प्रयास का 
ही यह एक सुन्दर परिणाम समाज के सामने आया है ! ([)[] 


[ २९ 


विषय 

अहंत्स्तुति 

महावीरस्तुति 

सघ-नगर-स्तुति 

सघ-चक्त की स्तुति 

सध-रथ की स्तुति 

सघ-पद्म की स्तुति 

सघ-चन्द्र की स्तुति 

सघ-सूर्य की स्तुति 

सध-समुद्र की स्तुति 
सघ-महामन्द२-स्तुति 

अन्य प्रकार से सघमेर की स्तुति 
सघस्तुति विषमकः उपसहार 
चतुविशति-जिनस्तुति 
गणधरावली 

बीरशासन की महिमा 
युगप्रधान स्थविरावलिका-वदन 
श्रोताओं के विविध प्रकार 
परिषद्‌ के तीन प्रकार 

ज्ञान के पा प्रकार 

प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाण 
प्रत्यक्ष के भेद 

साव्यावहारिक प्रत्यक्ष के प्रकार 
पारमाथिक प्रत्यक्ष के तीन भेद 
प्रवधिज्ञान के छह भेद 
आनुगामिक अवधिज्ञान 

अन्तगत और मध्यगत में विशेषता 
अनानुगामिक पश्रवधिज्ञान 
वर्द्धमान अवधिज्ञान 


विश्रयानुक्रम 


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बिषय 


अ्वधिज्ञात का जधन्य क्षेत्र 
प्रवधिज्ञान का उत्कृष्ट क्षेत्र 
झवधिज्ञान का मध्यम क्षेत्र 
हीयमान अवधिशान 

प्रतिपाति भ्रवधिज्ञान 

अप्रतिपाति अवधिज्ञान 
द्रव्याविक्रम से मवधिश्ञान निरूपण 
अवधिज्ञान विषयक उपसहार 
भ्रवाह्म-बाह्य अवधिज्ञान 

मन पर्यवज्ञान 

मन पर्यायज्ञान के भेद 

ऋजुमति' और विपुलमति मे अन्तर 
अवधि और मन पयंवज्ञान मे अन्तर 
मनःपर्यवज्ञान का उपसहार 
केवलज्ञान 

सिद्धकेवलज्ञान 

सत्पदप्रूपणा 

द्रव्यद्वार 

क्षेत्रद्वार 

स्पर्शनाद्वार 

कालद्वार 

अन्तरद्वार 

भावद्वार 

अल्पबहुत्वद्वा र 
अनन्तरसिद्ध-केवलज्ञान 
प्रम्परसिद्ध-केवलशान 

युगपत्‌ उपयोगवाद 

एकान्तर उपयोगवाद 


३५ 
३६ 
३७ 
३९ 


४१ 
४१ 
डर 
डर 
डड्े 
४९ 
५१ 
५१ 
श्र 
|र 
भर 
२५ 
५७ 
भ्प 
श्प 
२९ 
६० 
६१ 
६६ 
श्र 
द्डं 
६९५ 
६६ 


विषय 


अभिन्न उपयोगवाद 

केवलज्ञान का उपसहार 
वाग्योग और श्रुत 

परोक्ष शान 

मति ओर श्रुत के दो रूप 
आभिनिवोधिक ज्ञान के भेद 
ओत्पत्तिकी बुद्धि के लक्षण 
ओऔत्पत्तिकी बुद्धि के उदाहरण 
वैनयिकी बुद्धि का लक्षण 
बेनयिकी बुद्धि के उदाहरण 
कमंजाबुद्धि--लक्षण और उदाहरण 
पारिणामिकी बुद्धि का लक्षण 
पारिणामिकी बुद्धि के उदाहरण 
श्रुतनिश्चित मतिज्ञान 

अवग्रह 

ईहा 

अवाय 

धारणा 

भ्रवग्रह आदि का काल 
व्यंजनावग्रह-प्रतिबोधक-हृष्टान्त 
मल्लकदष्टान्त से व्यजनावग्रह 
अवग्रहदादि के छह उदाहरण 
मतिज्ञान का विषयवर्णन 
झाभिनिबोधिक ज्ञान का उपसहार 
श्रुतज्ञान 

अक्षरश्रुत 

अनक्षरश्रुत 

सज्षि-अस जिश्रुत 

सम्यकश्रुत 

मिथ्याश्रुत 

सादि सान्‍्त अनादि अनन्तश्रुत 
गमिक-अ्रगमिक, अगप्रविष्ट-अगबाहाश्रुत 
अग्रप्रविष्ट श्रत 

द्वादशागी गणिपिटक 


ह््ष्ड 
६७ 
ध्८ 
६९ 
६० 
७१ 
७२ 
छ्र्‌ 
७रे 
९५ 
९५ 
१०२ 
१०४ 
१०४ 
१२६ 
१२८ 
१३१ 
१३२ 
१३२ 
१३४ 
१३५ 
१३६ 
१३८ 
श्डर 
१४३ 
१४६ 
१४७ 
१४७ 
१४९ 
श्भ्र 
१५५ 
१५७ 
१६० 
१६५ 
१६६ 


विषय 


आचाराग के अन्तवंरत्ती विषय 
सूत्रकंताग 

स्थानाग 

समवायांग 

व्याख्याप्रशप्ति 

जाताधमंकथा 

उपासकदशाग 

अन्तकृ हशाग 
अनुत्तरीपपातिकदशा 
प्रश्वव्याकरण 

प्रश्तव्याकरण के विषय में दिगबरमान्यता 
विपाकसूत्र 

दृष्टिवादश्रुत 

परिकर्म 

सिद्धश्नेणिका परिकर्म 
भनुष्यश्रे णिका परिकर्म 
पृष्टश्रेणिका परिकर्म 
ग्रवगाढश्रेणिका परिकर्म 
उपसम्पादनश्रेणिका परिकर्म 
विप्रजहतृश्नेणिका परिकर्म 
च्युताच्युतश्रेणिका परिकर्म 
सूत्र 

पूर्व 

प्रनुयोग 

चुलिका 

इृष्टिवाद का उपसहार 
द्वादशाग का सक्षिप्त साराश 
द्वादशाग की आराधना का सुफल 
गणिपिटक' की शाश्वतता 
श्रुतज्ञान के भेद और पठनविधि 
व्याख्या करने की विधि 
श्रुतज्ञान किसे दिया जाय ? 
बुद्धि के आठ गुण 

परिशिष्ट 


] 


पृष्द 
१७० 
१७२ 
१७५ 
१७७ 
१७९ 
(१८० 
१८२ 
१८३ 
१८५ 
१८६ 
श्ण्प 
१८९ 
१९० 
१९१ 
१९२ 
१९२ 
१९३ 
१९३ 
१९४ 
१९४ 
१९५ 
१९६ 
१९७ 
१९८ 
२०० 
२०१ 
२०२ 
२०२ 
२०४ 
२०६ 
२०७ 
स्ण्द 
रण्प 
२११ 
()[] 


सिरिवेववायगविर इय 


नन्दीस॒त्तं 


ननन्‍्दीसूञ 


ननन्‍्टदीसूुठा 


अहंत्स्तुति 
१. जयईइ जगजोबजोणी-वियाणझो जगगृरू जगाणंदो । 
जगणाहो जगबंधू जयइ जगप्पियामहों भयवं ।। 


१-धर्मस्तिकाय झादि षड्‌ द्रव्य रूप ससार के तथा जीवोत्पत्तिस्थानो के ज्ञाता, जगदुगुर, 
भव्य जीवो के लिए आनन्दप्रदाता, स्थावर-जगम प्राणियों के नाथ, विश्वबन्धु, लोक में धर्मो- 
त्पादक होने से ससार के पितामह स्वरूप अ्रिहन्त भगवान्‌ सदा जयवन्त हैं, क्योंकि उनको कुछ भी 
जीतना ग्रवशेष नही रहा । 


विवेचन--इस गा मे स्तुतिकर्त्ता के द्वारा सर्वप्रथम शासनेश भगवान्‌ भ्ररिहन्त की तथा 
सामान्य केवली की मगलाचरण के साथ स्तुति की गई है। 

'जयइई' पद से यह सिद्ध होता है कि भगवान्‌ उपसगे, परिषह, विषय तथा घातिकमंसमूह 
के विजेता है। अतएव वे भ्ररिहन्त पद को प्राप्त हुए हैं, और जिनेन्द्र भगवान्‌ हो स्तुत्य और 
वन्दनीय हैं । 

जो अ्रतीत काल में एक पर्याय से दूसरे पर्याय को प्राप्त हुआ, वर्तमान मे हो रहा है और 
भविष्य मे होता रहेगा, वह जगत्‌ कहलाता है। जगत्‌ पचास्तिकायमय या षड़द्रव्यात्मक है। यहाँ 
जीव शब्द से अस-स्थावररूप समस्त ससारी प्राणी समभना चाहिए । 

जीव--पद यह बोध कराता है कि लोक मे आात्माएँ अनन्त हैं श्रौर तीन ही काल में 
उनका श्रस्तित्व है । 


'जोणी --पद का श्रथे है-कर्मबन्ध से युक्त जीवो के उत्पत्ति-स्थान । ये स्थान चौरासी लाख 
हैं। सक्षेप मे योनि के नो भेद भी कहे गए हैं । 


“वियाणश्रो --पद से अरिहन्त प्रभु की सर्वेज्ञता सिद्ध होती है जिससे वे लोक, भ्रलोक के 
भाव जानते हैं । 


“जगगुरू -- इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान्‌ जीवन और जगत्‌ का रहस्य अपने शिष्य- 
समुदाय को दशाते हैं श्रर्थात्‌ बताते हैं। 'गु' शब्द का प्॒र्थ अधकार है और “*' का श्रर्थ उसे नष्ट 
करने वाला । जो शिष्य के भअ्न्तर में विद्यमान अज्ञानान्धकार को नष्ट करता है, वह 'गुरु' 
कहलाता है । 

'जगाणन्दो -- भगवान्‌ जगत्‌ के जीवो के लिए झानन्दप्रद हैं। 'जगत्‌' शब्द से यहाँ सज्ञी 
प्चन्द्रिय जीव समझना चाहिए, क्योकि इन्ही को भगवान्‌ के दर्शन तथा देशनाश्रवण से आनन्द की 
प्राप्ति होती है । 


ड़] [तस्दीसूत्र 


'जगणाहो--पभ्रभु समस्त जीवों के योग-क्षेमकारी हैं । भ्रप्राप्त वस्तु की प्राप्ति को योग और 
प्राप्त वस्तु की सुरक्षा को 'क्षेम' कहते हैं। भगवान्‌ प्रप्राप्त सम्यग्दर्शन, सयम ग्रादि को प्राप्त कराने 
वाले तथा प्राप्त की रक्षा करने वाले हैं, भ्रत जगन्नाथ हैं । 

जगबन्धू'--इस विशेषण से ज्ञात होता है कि समस्त श्रस-स्थावर जीवो के रक्षक होने से 
प्ररिहन्त देव जगद्‌-बन्धु है । यहाँ 'जगत्‌' समस्त त्रस-स्थावर जीवो का वाचक है । 

'जगप्पियामहो -- धर्म जगत्‌ का पिता (रक्षक) है और भगवान्‌ धर्म के जनक ([प्रवत्तेक) 
होने से जगत्‌ के पितामह-तुल्य है। यहा भी 'जगत्‌' शब्द से प्राणिमात्र समभना चाहिए । 

भयव--यह विशेषण भगवान्‌ के भ्रतिशयो का सूचक है। 'भग' शब्द मे छह भ्रर्थ समाहित 
हैं-(१) समग्र ऐश्वयं (२) त्रिलोकातिशायी रूप (३) त्रिलोक मे व्याप्त वश (४) तीन लोक को 
खमत्कृत करने वाली श्री (भ्रनन्त श्रात्मिक समृद्धि) (५) भ्रखण्ड धमं श्रौर (६) पूर्ण पुरुषाथ । इन 
छह पर जिसका पूर्ण श्रधिकार हो, उसे भगवान्‌ कहते हैं । 


सहावीर-स्तुति 
२--जयईइ सुयाणं पभ्चयो, तित्ययराणं अपचष्छिमों जयइ । 
जयदइ गुरू लोगाण, जयदई महप्वा महावीरो ॥। 


२--समग्र श्रुतज्ञान के मूलस्रोत, वत्तेमान श्रवसपिणी काल के चौबीस तीर्थंकरों मे श्रन्तिम 
तीर्थंकर, तीनों लोको के गुरु महात्मा महावीर सदा जयवन्त हैं, क्योकि उन्होंने लोकहिताथथ धम्म-देशना 
दी श्रौर उनको विकार जीतना शेष नही रहा है । 


विवेचन-- प्रस्तुत गाथा मे भगवान्‌ महावीर की स्तुति की गई है। भगवान्‌ महावीर द्रव्य 
तथा भाव-श्रुत के उद्भव-स्थल है, क्योकि सर्वज्ञता प्राप्त करने के बाद भगवान्‌ ने जो भी उपदेश 
दिया वह श्रोताश्रो के लिए श्रुतज्ञान मे परिणत हो गया । 

यहा भगवान्‌ को भ्रन्तिम तीर्थकर, लोकगुरु और महात्मा कहा है । 

३--भहं सव्यजगुज्जोयगस्स भई जिणस्स बोरस्स । 
भट्ट सुराध्सुरणमसियस्स भह घुयरयस्स ।॥। 

३--विश्व मे ज्ञान का उद्योत करने वाले, राग-द्वेष रूप छ्षत्रुओं के विजेता, देवो-दानवों 

द्वारा वन्दनीय, कर्म-रज से विमुक्त भगवान्‌ महावीर का सर्देव भद्र हो । 


विवेचन--प्रस्तुत गाथा मे भगवान्‌ महावीर के चार विशेषण आये हैं। चारो चरणों मे चार 
बार 'भह शब्द का प्रयोग हुआ है। शञानातिशय युक्त, कषाय-विजयी तथा सुरासुरो द्वारा वन्दित 
होने से वे कल्याणरूप हैं । 


संघनगरस्तुति 


४--गुण-भवणगहण ! सुय-रयणभरिय ! वंसण-विसुद्धरत्थागा । 
संघनछगर ! भहूं ते, अखषण्ड--चारित्त-पागारा॥॥ 


संघ-चक्त एवं संघ-रथ स्तुति ] [४ 


४--उत्तर गुण रूपी भव्य भवनों से गहन-व्याप्त, श्रुत-क्षास्त्र-रूप रत्नो से पूरित, विशुद्ध 
सम्यक्त्व रूप स्वच्छ वोधियों से संयुक्त, भ्रतिचार रहित मूल गुण रूप चारित्र के परकोटे से सुरक्षित, 
है सघ-नगर | तुम्हारा कल्याण हो । 


विवेचन “रचनाकार ने प्रस्तुत गाथा मे सघ का नगर के रूपक से श्राख्यान किया है । उत्तर 
गुणों को नगर के भवनों के रूप मे, श्रुत-सम्पादन को रत्नमय वेभव के रूप मे, विशुद्ध सम्यवत्व को 
उसकी गलियों या सड़को के रूप में तथा अखण्ड चारित्र को परकोटे के रूप मे वणित कर उन्होने 
उसके कल्याण-सवधेन या विकास की कामना की है। इससे मालम होता है कि सघ रूप नगर के प्रति 
स्तुतिकार के हृदय मे कितनी सहानुभूति, वात्सल्य, श्रद्धा और भक्ति थी । 


संघ-चक्र की स्तुति 


भ-संजम-तब-तु बारयस्स, नमो सम्भत्त-पारियल्लस्स । 
भ्रप्पडिचक्कसस जहो, होउ सया संध-चक्‍्कस्स ।। 


५४५-सत्तरह प्रकार का सयम, संघ-चक्र का तुम्ब-नाभि है। छह प्रकार का बाह्य तप और 
छह प्रकार का आभ्यन्तर तप बारह श्रारक हैं, तथा सम्यक्त्व ही जिस चक्र का घेरा है भ्रर्थात्‌ परिधि 
है, ऐसे भावचक्र को नमस्कार हो, जो अ्तुलनीय है । उस सघ चक्र की सदा जय हो । यह सघ चक्र 
प्र्थात्‌ भावचक्र भाव-बन्धनो का सर्वथा विच्छेद करने वाला है, इसलिए नमस्कार करने योग्य है । 


विवेखन--शस्त्रास्त्रो मे श्रादिकाल से ही चक्र की मुख्यता रही है। प्राचीन युग मे शत्र्नो 
का नाश करने वाला सबसे बडा अस्त्र चक्र था, जो अर्धचक्री श्लौर चक्रवर्ती के पास होता है । इससे 
ही वासुदेव प्रति-वासुदेव का घात करता है। 


इस चक्र की बहुत विलक्षणता है। चत्रवर्त्ती को दिग्विजय करते समय यह मार्गे-दर्शन देता 
है। पूर्ण छह खण्डो को श्रपने अधीन किये बिना यह श्रायुधशाला मे प्रवेश नही करता, क्योकि वह 
देवाधिष्ठित होता है। ठीक इसी प्रकार श्रीसघ-चक्र भी अपने श्रलौकिक गुणो से सम्पन्न है । 


संघ-रथ को स्तुति 


६-भद्ं सोलपडागूसियस्स, तव-नियमस-तुरणजुत्तस्स । 
सघ-रहस्स भगवओ, सज्याय-सुनविधोसस्स ।। 


६--भ्रठा रह सहस्न शीलाग रूप ऊंची पताकाएँ जिस पर फहरा रही हैं, तप और संयम रूप 
प्रश्व जिसमे जुते हुए हैं, पाँच प्रकार के स्वाध्याय (वाचना, प्रच्छना, परावत्तंना, श्रनुप्रेक्षा और 
धर्म-कथा) का मगलमय मधुर घोष जिससे निकल रहा है, ऐसे भगवान्‌ संघ-रथ का कल्याण हो । 


विवेचन--प्रस्तुत गाथा में श्रीसंघ को रथ से उपमित किया गया है। जैसे रथ पर पताका 
फहराती है उसी प्रकार सघ शोल रूपी ऊंची पताका से मडित है। रथ में सुन्दर घोड़े जुते रहते है, 
उसी प्रकार संघ रूपी रथ मे भी तप और नियम रूपी दो पअ्रश्व हैं तथा उसमे पाँल प्रकार के स्वाध्याय 
का मंगलघोष होता है । 


६] [ नम्बोसूभ 


पताका, झ्श्व और नंदीघोष इन तोनों को क्रमह्द, शील, तप-नियम भर स्वाध्याम से 


बा किया है। जैसे रथ सुपथगामी होता है, उसी प्रकार संघ रूपी रथ भी मोक्ष-पथ का 
गामी है। 


संघ-प्रद्म को स्तुति 
७--कम्सरय-जलोह-विणिग्गयस्स, सुय-रयण-दीहूनालस्स । 
पंचसहव्यय-थिरक प्षियस्स, गुण-केसरालस्स ।। 
८ाासावग-जण-महुअरि-परिवुडस्स, जिणसुरतेयबुद्धस्त । 
सघ-पउमस्स भहूे, समणगण-सहस्सपत्तस्स ॥। 
७-८--जो सघ रूपी पद्म-कमल, कर्म-रज तथा जल-राशि से ऊपर उठा हुग्ना है--अलिप्त है, 
जिसका प्राधार श्रुतरत्नमय दीर्घ नाल है, पाँच महाव्रत जिसकी सुदुढ कणिकाएँ है, उत्तरगुण जिसका 
पराग है, जो भावुक जन रूपी मधुकरो--भवरो से घिरा हुआ है, तीर्थंकर रूप सूर्य के केवलज्ञान रूप 
तेज से विकसित है, श्रमणगण रूप हजार पाँखडी वाले उस सघ-पद्म का सदा कल्याण हो । 


विवेचन--इन दोनो गाथाश्रो में श्री सघ को कमल की उपमा से अ्ललकृत किया गया है। 
जैसे कमलो से सरोवर की शोभा बढ़ती है, वैसे ही श्रीसघ से मनृष्यलोक की शोभा बढती है । पद्चवर 
के दीघं नाल होती है, श्रीसघ भी श्रुत-रत्न रूप दीर्घनाल से युक्त है। पद्मवर की स्थिर कणिका है, 
श्रीसध-पद्म भी पच-महाव्रत रूप स्थिर कणिका वाला है। पद्म सौरभ, पीत पराग तथा मकरन्द के 
कारण भ्रमर-भ्रमरी-समूह से घिरा होता है, बसे ही श्रीसंघ मूल गुण रूप सौरभ से, उत्तर गुण रूपी 
पीत पराग से, ग्राध्यात्मिक रस, एवं घर्म-प्रवचन से, भ्रानन्दरस-रूप मकरन्द से युक्त है और श्रावकगण 
रूप भ्रमरो से परिवृत रहता है । 


पद्मवर सूर्योदय होते ही विकसित हो जाता है, उसी प्रकार श्रीसघ रूप पद्म भी तीर्थकर-सूर्य 
के केवलज्ञान रूप तेज से विकसित होता है। पद्म, जल श्रौर कर्देम से झलिप्त रहता है तो श्रीसघ रूप 
पद्म भी करमंरज से अलिप्त रहता है। पश्चवर के सहस्नो पत्र होते हैं, इसी प्रकार श्रीसध रूप पद्म भी 
श्रमणगण रूप सहस्रो पत्रो से सुशोभित होता है । 


इत्यादिक गुणो से युक्त श्रीसघ रूप पद्म का कल्याण हो । 
संघचन्द्र को स्तुति 
९--तव-सजम-सय-लंछुण | अकिरिय-राहुमुह दुद्धरिस ! निच्च । 
जय सघधचन्द ! निम्मलसम्मत--विसुद्धजोण्हागा ! ॥ 
९--है तप प्रधान | सयम रूप मृगचिह्नलमय ' अक्रियावाद रूप राहु के मुख से सर्व दुद्धंष ! 
प्रतिचार रहित सम्यक्त्व रूप निर्मल चाँदनी से युक्त | हे सघचन्द्र ' श्राप सदा जय को प्राप्त करे । 
विवेधरन--प्रस्तुत गाथा मे श्रीसघ को चन्द्रमा की उपमा से झ्रलकृत किया गया है । 


जैसे चन्द्रमा मृगचिक्न से अंकित है, सौम्य कान्ति से युक्त तथा गृह, नक्षत्र, तारो से घिरा 
हुआ होता है, इसी प्रकार श्रीसघ भी तप, सयम, रूप चिह्न से युक्त है, नास्तिक व मिथ्यादष्टि रूप 


संघ-सूर्थ एव संघ-समुद्द स्तुति] (७ 


राहु से प्रग्रस्य श्रर्थात्‌ ग्रसित नहो होने वाला है, मिथ्यात्व-मल से रहित एवं स्वच्छ लिर्मेल निरतिधार 
सम्यक्त्व रूप ज्योत्स्ना से रहित है। ऐसे सघ-चन्द्र की सदा जय विजय हो । 
संघसूर्य की स्तुति 
१०-परतित्यिय-गहपहनासगस्स, तबतेय-वित्तलेसस्‍्स । 
नाणुज्जोयल्स जए, भट्ट दमसंघ-सूरस्स ।। 
१०- प्रस्तुत गाथा में श्रीसंघ को सूर्य की उपमा से उपमित किया गया है। 
परतीर्थ भ्र्थात्‌ एकान्तवादी, दुनेय का प्राश्रय लेने वाले परवादी रूप प्रहों को श्राभा को 
निस्तेज करने वाले, तप रूप तेज से सर्देव देदीप्यमान, सम्यग्जञान से उजागर, उपश्यम-प्रधान सध रूप 
सूर्य का कल्याण हो । 
विवेचन -स्तुतिकार ने यहाँ सघ को सूर्य से उपभित किया है। जेसे सूर्योदय होते ही भ्रन्य 
सभी ग्रह प्रभाहीन हो जाते है, वेसे ही श्रीसध रूपी सूर्य के सामने अन्य दर्शनकार, जो एकान्तवाद को 
लेकर चलते हैं, प्रभाहीन--निस्तेज हो जाते है। श्रत' साधक जीबो को चतुविध श्रीसघ-सूर्य से दूर 
नही रहना चाहिये । फिर भ्रविद्या, भज्ञान तथा मिथ्यात्व का अन्धकार जीवन को कभी भी प्रभावित 
नही कर सकता । शभ्रत यह सघ-सूर्य कल्याण करने वाला है । 


संघसमुद्र को स्तुति 


११--भहं धिई-वेला-परिगयस्स, सज्ञाय-जोग-सगरस्स । 
झक्खोहस्स संगवओ, संघ-समुहस्स रु वस्‍्स ॥। 
११-जो धृति भ्रर्थात्‌ मूल गुण तथा उत्तर गुणों से वृद्धिगत श्रात्मिक परिणाम रूप बढते 
हुए जल की वेला से परिव्याप्त है, जिसमे स्वाध्याय और शुभ योग रूप मगरमच्छ हैं, जो कर्मंविदारण 
में महाशक्तिशालो है, श्रौर परिषह्हठ, उपसगग होने पर भी निष्कप-निश्चल है, तथा समस्त ऐश्वर्य से 
सम्पन्न एव विस्तृत है, ऐसे सघ समुद्र का भद्र हो । 
विवेचन-प्रस्तुत गाथा मे श्रीसघ को समुद्र से उपभित किया गया है। जैसे जलप्रवाह के 
बढने से समुद्र में ऊमियाँ उठती है, भ्रौर मगरमच्छ आदि जल-जन्तु उसमे विचरण करते हैं, बह 
प्रपनी मर्यादा में सदा स्थित रहता है। उसके उदर मे भ्रसख्य र॒त्नराशि समाहित है--तथा भ्रनेक 
नदियों का समावेश होता रहता है। इसी प्रकार श्रीसघ रूप समुद्र मे भी क्षमा, श्रद्धा, भक्ति, सवेग- 
निर्वेग श्रादि सदगुणो की लहरे उठती रहती है। श्रीसघ स्वाध्याय द्वारा कर्मों का संहार करता है 
और परिषहों एवं उपसर्गों से क्षुब्ध नही होता । 
श्रोसघ मे अनेक सदगुण रूपी रत्न विद्यमान है। श्रीसध श्रात्मिक गुणों से भी महान्‌ है। 
समुद्र चन्द्रमा की शोर बढता है तो श्रीसघ भी मोक्ष की शोर श्रग्रसर होता है तथा श्रनन्त गुणों से 
गम्भीर है। ऐसे भगवान्‌ श्रीसघ रूप समुद्र का कल्याण हो । 
प्रस्तुत सूत्नगाथा मे स्वाध्याय को योग प्रतिपादित करके श्ास्त्रकार ने सूचित किया है कि 
स्वाध्याय चित्त की एकाग्रता का एक सबल साधन है और उससे चित्त की श्रप्नशस्त वृत्तियो का 
निरोध होता है । 


घ] [ गन्दीसूच 


संघ-महामन्द र-स्तुति 
१२-- सम्मंसण-वरवइर,-दढ-रूढ-गाढठावगाठ पेडस्स । 
धम्म-बर-रयणसंडिय-चासीयर-मेहलागस्स  ॥। 


१३--नियमृसियकणय-सिलायलुज्जलजलंत-चित्त-क्डस्स । 
नंदभवण-सणहरसुरभि-सीलग धुद्ध _मायस्स ॥ 

१४- जीवदया-सुन्दर कंद रुहरिय,--मुणिवर-मइंदइच्नस्स । 
हेउसयधाउपगलंत-रयणवित्तोसहिगुहस्स ।॥। 

१५--संवरबर-जलपगलिय-उज्ञ् रपविरायमाणहारस्स । 
सावगजण-पउररवंत-मोर नच्चंत कुहरस्स ६ 


१६--विणयनयप्पवर मुणिवर फुरंत-विज्जुज्जलंतसिहरस्स । 
विविह-गुण-कप्परक्थगा,-- फलभरकुसुमाउलवणस्स ।। 


१७--नाणवर-रयण-दिप्पंत,--कंतवे रलिय-विभलचलस्स । 
बंदासि विणयपणओ,--संघ-महामन्दरगिरिस्स ।॥। 


१२-१७-संघमेरु को भूपीठिका सम्यग्दर्शन रूप श्रेष्ठ वज्ञमयी है श्रर्थात्‌ वत्ननिर्मित है । 
तत्वार्थ-श्रद्धान ही मोक्ष का प्रथम अग होने से सम्यक्‌-दर्शन ही उसकी सुदृढ़ श्राधार-शिला है। वह 
शकादि दृषण रूप विवरों से रहित है । प्रतिपल विशुद्ध श्रध्यवसायो से चिरतन है। तीव्र तत्त्व- 
विषयक भ्रभिरुचि होने से ठोस है, सम्यक्‌ बोध होने से जीव श्रादि नव तत्त्वो एव षड़्‌ द्रव्यों मे निमग्न 
होने के कारण गहरा है। उसमे उत्तर गुण रूप रत्न है और मूल गुण स्वर्ण मेखला है । उत्तर गुणो 
के प्रभाव में मूल गुणो की महत्ता नही मानी जाती श्रत उत्तर गुण हो रत्त हैं, उनसे खचित मूल गुण 
रूप सुवर्ण-मेखला है, उससे सघ-मेरु श्रलुकृत है। 


सघ-मेरु के इन्द्रिय श्रौर नोइन्द्रिय का दमन रूप नियम हो उज्ज्वल स्वर्णमय शिलातल हैं। 
अशुभ भ्रष्यवसायो से रहित प्रतिक्षण कमें-कलिमल के घुलने से तथा उत्तरोत्तर सूत्र भ्रोर अर्थ के 
स्मरण करने से उदात्त चित्त ही उन्नत कूट हैं एवं शील रूपी सोरभ से परिव्याप्त सतोषरूपी मनोहर 
नन्‍्दनवन है। सघ-सुमेरु मे स्व-परकल्याण रूप जीव-दया ही सुन्दर कन्दराएँ हैं। वे कन्दराएँ कर्म- 
शत्रुशओो को पराजित करने वाले तथा परवादी-मृगी पर विजयप्राप्त दुंष तेजस्वी मुनिगण रूपी सिहो 
से श्राकोर्ण हैं भौर कुबुद्धि के निरास से सेकड़ो अल्वय-व्यतिरेकी हेतु रूप धातुश्रो से सघ रूप सुमेर 
भास्वर है तथा विद्विष्ट क्षयोपशम भाव जिनसे कर रहा है ऐसी व्याख्यान-शाला रूप कन्दराएँ 
देदीप्यमान हो रहो हैं । 


सघ-मेरु मे प्राश्नवो का निरोध ही श्रेष्ठ जल है श्लौर सवर रूप जल के सतत प्रवहमान 
भरने ही शोभायमान हार हैं। तथा सघ-सुमेरु के श्रावकजन रूपी मयूरो के द्वारा आनन्द-विभोर 
कह परमेष्ठी की स्तुति एवं स्वाध्याय रूप मधुर घ्वनि किये जाने से कदरा रूप प्रवचनस्थल 
मुख । 


संघ-महामस्दर स्तुति ] [९ 


विनय ग्रुण से विनम्र उत्तम मुनिजन रूप विद्युत्‌ को चमक से सघ-मेरु के झ्राचार्य शो उपाध्याय 
रूप शिखर सुशोभित हो रहे हैं । सघ-सुमेर में विविध प्रकार के मूल भौर उत्तर गुणों से सम्पन्न 
मुनिवर हो कल्पवक्ष हैं, जो धर्म रूप फलो से सम्पन्न हैं मौर नानाविध ऋद्धि-रूप फूलो से युक्त हैं । 
ऐसे मुनिवरों से गच्छ-रूप वन परिव्याप्त है । 


जैसे मेरु पर्वत की कमनीय एवं विमल बेडूयंमयी चुला है, उसी प्रकार संघ की सम्यकज्ञान 
रूप श्रेष्ठ रत्त ही देदीप्यमान, मनोज्ञ, विमल वैडूयमयी चूलिका है। उस सध रूप महामेरु ग्रिरि के 
माहात्म्य को मै विनयपूर्वक नम्नता के साथ वन्दन करता हूँ । 


विवेचन--प्रस्तुत गाथा मे स्तुतिकार ने श्रीसघ को मेरु पंत की उपमा से प्रलकृत किया 
है। जितनी विशेषताएँ मेरु पर्वत की हैं उततनो ही विशेषताएँ सघ रूपी सुमेरु की हैं। सभी 
साहित्यकारो ने सुमेरु पर्बत का माहात्म्य बताया है । मेरु पब॑त जम्बू द्वीप के मध्य भाग में स्थित 
है, जो एक हजार योजन पृथ्वी में गहरा तथा निन्‍्यानवे हजार योजन ऊँचा है। मूल मे उसका व्यास 
दस हजार योजन है । उस पर चार वन है--(१) भद्बशाल, (१) सौसनस वन (३) नन्दन-बन 
(४) और पाण्डक वन | उसमे तीन कण्डक हैं--रजतमय, स्वर्णमय श्रौर विविध रत्नमय । यह पर्वत 
विश्व मे सब पव॑तों से ऊँचा है। उसकी चालीस योजन की चूलिका (चोटी) है । 


मेरु पर्वत की वज्ञमय पीढिका, स्वर्णमय मेखला तथा कनकमयी श्रनेक शिलाए हैं। दीप्ति- 
मान उत्तुग अनेक कट हैं। सभी वनो में नन्दन विलक्षण वन है, जिसमे अनेक कन्दराएं हैं और 
कई प्रकार की धातुएँ है। इस प्रकार मेरु पंत विश्विष्ट रत्नो का स्रोत है । प्रनेकानेक गुणकारी 
ओषधियों से परिव्याप्त है। कुहरो मे श्रनेक पक्षियों के समूह हर्षनिनाद करते हुए कलरव करते हैं 
तथा मयूर नृत्य करते हैं । उसके ऊँचे-ऊंचे शिखर विद्युत को प्रभा से दमक रहे है तथा उस पर वन- 
भाग कल्पवक्षो से सुशोभित हो रहा है। वे कल्पव॒क्ष सुरभित फूलो श्रोर फलो से युक्त हैं। इत्यादि 


विशेषताम्रो से महागिरिराज विराजमान है भ्रौर वह भ्रतुलनोय है । इसी पर्वंतराज की उपभा से 
चतुविध सघ को उपमित किया गया है । 


सघमेरु की पीठिका सम्यग्दर्शन है । स्वर्ण मेखला धर्म-रत्नो से मण्डित है तथा शम दम 
उपशम आदि नियमो की स्व्ण-शिलाएँ है। पवित्र प्रध्यवसाय ही सघ मेरु के दीप्तिमान उत्तु ग॒ कूट हैं । 
झ्रागमो का प्रध्ययन, शील, सन्‍्तोष इत्यादि श्रद्धितीय गुणो रूप नन्‍्दनवन से श्रीसंघ मेरु परिवुत हो 


रहा है, जो मनुष्यो तथा देवो को भो सदा झ्ानन्दित कर रहा है| ननन्‍्दनवन मे आकर देव भी प्रसन्न 
होते हैं । 


संघ-सुमेरु प्रतिवादियो के कुतर्क युक्त श्रसद्वाद का निराकरण रूप नानाविध धातुझो से 


सुशोभित है। श्रुतज्ञान रूप रत्नो से प्रकाशमान है तथा श्रामर्ष श्रादि २८ लब्धिरूप श्रोषधियो से 
परिव्याप्त है । 


वहाँ सवर के विशुद्ध जल के भरने निरन्तर बह रहे हैं। वे करने मानो श्रीसघधमेरु के गले 
में सुशोभित हार हो, ऐसे लग रहे हैं। सघ-सुमेर की प्रवचनशालाएँ जिनवाणी के गभीर घोष से गू ज 
रही हैं, जिसे सुनकर श्लावक-गण रूप मयूर प्रसन्नता से रूम उठते हैं। 


विनय धर्म प्रौर नय-सरणि रूप विद्युत्‌ से संघ-सुमेर दमक रहा है। मूल गुणों एवं उत्तर 


१०] [गन्दीसूच 


गुणों से सम्पन्न मुनिजन कल्पवक्ष के समान शोभायमान हो रहे है क्योकि वे सुख के हेतु एवं कर्मफल 
के प्रदाता विविध प्रकार के योगजन्य लब्धिरूप सुपारिजात कुसुमो से परिव्याप्त हैं। इस प्रकार 
प्रलौकिक श्री से सघ-सुमेरु सुशोभित है । 


प्रलयकाल के पवन से भी मेरु पर्वत कभी विचलित नहीं होता है। इसी प्रकार सघरूपी मेरु 
भी मिध्या-दुष्टियों के द्वारा दिये गये उपसर्गों भ्रौर परिषहों से विचलित नही होता । वह भ्रत्यन्त 
मनोहारी भौर नयनाभिराम है । 


अन्य प्रकार से संघमेरु की स्तुति 
१८-शुण-रयणुम्जलकड॒यं,. सील-सुगंधि-तब-मंडिउद्देस । 
सुय-बारसंग-सिहरं, संघमहामन्दरं बंदे ॥। 


१८-सम्यगज्ञान-दर्शन झोर चारित्र गुण रूप रत्नो से सघमेरु का मध्यभाग देदीप्यमान 
है । इसकी उपत्यकाएँ श्रहिसा, सत्य आदि पचशील की सुगध से सुरभित है और तप से शोभायमान 
हैं । द्वादशागश्रुत रूप उत्तु ग शिखर हैं । इत्यादि विशेषणों से सम्पन्न विलक्षण महामन्दर गिरिराज 
के सदृश सघ को मैं वन्दन करता हूँ । 


विवेचन-:प्रस्तुत गाथा मे सघ-मेरु को पूजनीय बनाने वाले चार विशेषण है-गुण, शील, 
तप और श्रुत । 'गुण' शब्द से मूल गुण उत्तर गुण जानने चाहिए । 


'शील' शब्द से सदाचार व पूर्ण ब्रह्मच्यं, 'तप' शब्द से छह बाह्य और छह भ्राभ्यन्तर तप 
समभना चाहिए तथा श्रुत दाब्द से लोकोत्तर श्रुत | ये ही सघमेरु की विशेषताएं हैं । 


संघ-स्तुति विषयक उपसंहार 
१९- नगर-रह-जक्क-पठमे, चन्दे सूरे समुह-मेरुम्मि। 
जो उवमिज्जइ सययं, त सघगणायरं बंदे।॥। 


१९--नगर, रथ, चक्र, पद्म, चन्द्र, सूर्य, समुद्र, तथा मेरु, इन सब मे जो विश्विष्ट गुण समाहित 
हैं, तदनुरूप श्रीसघ मे भी भ्रलौकिक दिव्य ग्रुण है। इसलिए सघ को सदेव इनसे उपमित किया है। 
सघ अनन्तानन्त गुणो का आगर है । ऐसे विशिष्ट गुणो से युक्त सघ को मै वन्दन करता हूँ । 


विवेचन--प्रस्तुत गाथा मे झाठ उपमाशो से श्रीसघ को उपमित करके सघ-स्तुति का 
उपसहार किया गया है। स्तुतिकार ने गाथा के अन्तिम चरण मे श्रद्धा से नतमस्तक हो श्रीसघ को 
वन्दन किया है। जो तद्गूप गुणो का भ्राकर है वही भाव निक्षेप है। अभ्रत' यहा नाम, स्थापना श्र द्रव्य 
रूप निक्षेप को छोड़कर केवल भाव निक्षेप ही वन्दनीय समभना चाहिए | 


चतुविशति-जिन-त्तुति 


२०--(घंदे) उसभ अजिय॑ संभवमसिनंदण-सुमईं सुप्पर्भ सुपासं । 
ससिपुप्फदंतसीयल-सिज्जंस वासुपुज्ज च ॥। 


२१-बिसलमसणंत य धस्मं संति कु अरं च सल्लि थे । 
मुणिसुब्यवय नसि नेमभि पास तह बठ्धभाणं ऋ्।। 


२०-२१--ऋष भ, प्रजित, सम्भव, भ्रभिनन्दन, सुमति, पदञ्मप्रभ, (सुप्रभ) सुपाश्वे, चन्द्रप्र्भ 
(शशी), सुविधि (पुष्पदन्त), शीतल, श्रेयास, वासुपृज्य, विमल, अ्रनन्त, धर्म, शाति, कु थु, श्रर, मल्लि, 
मुनिसुश्रत, नमि, नेमि, (अरिष्टनेमि), पाश्वे श्रौर वरद्धमान--अश्रमण भगवान्‌ महावीर को वन्दन 
करता हूँ । 


विवेचन--प्रस्तुत दो गाथाओ मे वत्तमान ग्रवसपिणी काल के चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति 
की गई है। पाच भरत तथा पाच ऐराबत--इन दस ही क्षेत्रों मे श्रनादि से काल-चक्र का भ्रवसपंण 
और उत्सपंण होता चला आ रहा है। एक काल-चक्र के बारह ग्रारे होते हैं। इनमें छह प्रारे 
अवसरपिणी के श्लौर छह उत्सपिणी के होते हैं । 


प्रत्येक श्रवसपिणी तथा उत्सरपिणी में चौबीस-चौबीस तीथैकर, बारह चक्रवर्त्ती, नो बलदेव, 
नौ वासुदेव तथा नौ प्रति-बासुदेव इस प्रकार तिरेसठ शलाका-पुरुष होते हैं । 


गणधरायलि 


२२- पड़सित्थ इंदभूई, बोए पुण होइ अग्गिशुइत्ति । 
तइए ये वाउभुई, तशो वियसे सुहम्भे य।। 
२३-मंडिय-सोरियपुसे, अकंपिए वेब अयलभाया य। 
सेयड्जे ये पहासे, गणहरा हुम्ति बोरस्स।॥। 


२२-२३--श्रमण भगवान्‌ महावीर के गण-व्यवस्थापक ग्यारह गणघर हुए हैं, जो उनके 
प्रधान शिष्य थे। उनकी पवित्र नामावलि इस प्रकार है--(१) इन्द्रभूति, (२) झग्निभूति, (३) 
वायुभूति ये तीनो सहोदर भ्राता श्रौर गौतम गोत्र के थे । (४) व्यक्त, (५) सुधर्मा, (६) मण्डितपुत्र 
(७) मौय॑पुत्र, (८) अ्रकम्पित, (९) भ्रचलपअ्राता, (१०) मेताय, (११) प्रभास । 


विवेचन--ये ग्यारह गणधर भगवान्‌ महावीर के प्रमुख शिष्य थे। भगवान्‌ को वेशाख 
शुक्ला दश्लमी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उस समय मध्यपापा नगरी मे सोमिल नामक 
ब्राह्मण ने अपने यश्ञ-समारोह मे इन ग्यारह ही महामहोपाध्यायो को उनके छ्िष्यो के साथ ग्रामन्त्रित 
किया था । 


उसी नगर के बाहर महासेन उद्यान मे भगवान्‌ महावीर का पदापंण हुआा। देवकृत 
समवसरण की श्रोर उमडतो हुई जनता को देखकर सर्वप्रथम महामहोपाध्याय इन्द्रभूति श्रौर उनके 
पश्वात्‌ भ्रन्य सभी महामहोपाध्याय अपने अपने शिष्यो सहित भ्रहकार और क्रोघावेश मे बारी-बारो 
से प्रतिदन्द्दी के रूप में भगवान्‌ के समवसरण मे पहुँचे। सभी के मन मे जो सन्देह रहा हुप्ा था, 
उनके बिना कहे ही उसे प्रकट करके सर्वज्ञ देव प्रभु महावीर ने उसका समाधान दिया । इससे 
प्रभावित होकर सभो ने भगवान्‌ का शिष्यत्व स्वीकार किया। ये गणो की स्थापना करने वाले 
गणधर कहलाए । गण-गच्छ का कार्य-भार गणघरो के जिम्मे होता है । 


१२] [नस्दीसूत्र 


“उप्पन्नेह वा विगमेइ वा धुवेइ बा' भ्र्थात्‌ जगत्‌ का प्रत्येक पदार्थ पर्यायदृष्टि से उत्पन्न भ्रोर 
विनष्ट होता है तथा द्रव्यदृष्टि से ध्रू व नित्य-रहता है । इन तीन पदो से समस्त श्रुतार्थ को जान कर 
गणधर सूत्ररूप से द्वादशाग श्रुत की रचना करते है। वह श्रुत आज भो सासारिक जीवो पर महान्‌ 
उपकार कर रहा है। भ्रत* गणघर देव परमोपकारी महापुरुष हैं । 


बीर-शासन की महिमा 


२४- निव्यइपह्सासणयं, जयइ सया सम्वभावदेसणयं । 
कुसमय-सय-नासणयं, जिणिदवरवोरसासणयं ॥। 


२४--सम्यग-ज्ञान-दर्शन-चा रित्र रूप निर्वाण पथ का प्रदर्शक, जीवादि पदार्थों का प्रर्थात्‌ 
सर्वे भावों का प्ररूपक, और कुदर्शनो के अरहकार का मर्देक जिनेन्द्र भगवान्‌ का शासन सदा-सबेंदा 
जयवन्त है । 

विवेखचन--(१) जिन-छशासन सुक्ति-पथ का प्रदर्शक है, (२) जिन प्रवचन सर्वंभावों का 
प्रकाशक है, (३) जिन-शासन कुत्सित मान्यताओं का नाशक होने से सर्वोत्कृष्ट और सभी प्राणियो 
के लिए उपादेय है । 


युग-प्रधान-स्थविरा लिका-वन्दन 


२५--सुहम्भ भ्रग्गिवेसाणं, जंबू नाम॑ च कासवं । 
पतश्च्ं कच्चायणं बंदे, वचछ॑ सिज्जंभव॑ तहा ।॥। 
२५-भगवान्‌ भहावीर के पट्टधर शिष्य (१) प्रग्निवेश्यायन गोतन्रीय सुधर्मा स्वामी, (२) 
काश्यपगोत्रीय श्रीजम्बूस्वामी, (३) कात्यायनगोतन्रीय श्रीप्रभव स्वामी तथा (४) वत्सगोन्नीय 
श्री शय्यम्भवाचार्य को मैं वन्दन करता हूँ । 


विवेचन-- उक्त तथा पश्रागे की गाथाओ मे भगवान्‌ के निर्वाण पद प्राप्त करने के पश्चात्‌ 
गणाधिपति होने के कारण सुधर्मा स्वामी श्रादि कतिपय पट्टधर आचार्यों का श्रभिवादन किया गया 
है । यह स्थविरावली सुधर्मा स्वामी से प्रारम्भ होती है क्योकि इनके सिवाय शेष गणधरो की 
शिष्यपरम्परा नही चली । 
२६--जसभदई तुगियं बंदे, संभूयं चेव माढरं। 
भहबाहुँ च पाइनन, थूलभह व गोयमं ।। 
२६--(५) तु गिक गीत्रीय यशोभद्र को, (६) माढर गोतन्रीय भद्रबाहु स्वामी को तथा 
(८) गौतम गोत्रीय स्थूलभद्व को वन्दन करता हूँ । 


२७--एलावच्चसगोत्तं, वंदासि सहागिरि सुहत्यि च। 
तत्तो कोसिअ-गोत्तं, बहुलस्स सरिव्ययं बंदे ।॥। 


२७--(९) एलापत्य गोत्रीय शभ्राचाय महागिरि और (१०) सुहस्ती को वन्दन करता हूँ। 
तथा कोशिक-योत्र वाले बहुल मुनि के समान वय वाले बलिस्सह को भी वन्दन करता हूँ । 


युग-प्रधान-ल्वविरालिका-बन्दन ] [ १३ 


(११) बलिस्सह उस युग के प्रधान भ्राचाये हुए हैं। दोनों यमल भ्राता तथा गुरुआता 
होने से स्तुतिकार ने उन्हे बडी श्रद्धा से नमस्कार किया है । 
२८-हारियगुतस्त साइं ज बंदिमो हारियं च सामज्जं । 
बंदे कोसियगोत्तं, संडिल्ल झ्रज्जजीय-धरं ॥॥ 
२८--( १२) हारीत गोज्रीय स्वाति को (१३) हारीत गोत्रीय श्रीश्यामार्य॑ को तथा (१४) 
कौशिक गौत्रीय आयें जीतधर शाण्डिल्य को वन्दन करता हूँ । 
२६-ति-समुदृखाय किंत्ति, दीव-समुहेसु गहियपेयालं । 
बंदे अज्जसमुदं, अक्खुभियससुद्दगं भीरं | 
२९--पूर्व, दक्षिण श्रौर पश्चिम, इन तीनो दिशाप्रो मे, समुद्र पर्यन्त, प्रसिद्ध कीतिवाले, 
विविध द्वीप समुद्रो मे प्रामाणिकता प्राप्त श्रथवा द्वीपसागरप्रश्प्ति के विशिष्ट ज्ञाता, श्रक्षुब्ध समुद्र 
समान गंभीर (१४५) प्रार्य समुद्र को वन्दन करता हूँ । 
'ति-समुह-खाय-कित्ति'--इस पद से ध्वनित होता है कि भारतवर्ष की सीमा तीन दिशाओं 
में समुद्र-प्यन्त है । 
३०-भणगं करग झरग, प्मावग णाणंदंसणगुणाण । 
बंदासि अज्जमंग्रु, सुय-सागरपारगं धीर ॥। 
३०--सदेव श्रुत के भ्रध्ययन-ग्रध्यापन मे रत, शास्त्रोक्त क्रिया करने वाले, धर्म-ध्यान के 
ध्याता, ज्ञान, दर्शन, चारित्र आदि का उद्योत करने वाले तथा श्रुत-रूप सागर के पारगामी धीर 
(विशिष्ट बुद्धि से सुशो भित) (१६) आरा मगु को वन्दन करता हूँ । 
३१--वंदासि श्रज्जधम्म, तत्तो बंदे य भट्गुत्त च । 
तत्तो य अज्जवइरं, तवनियमगर्णोह वहरसमं ।। । 
३१--आ्राचार्य (१७) आर्य धर्म को, फिर (१८) श्री भद्गगुप्त को वन्‍्दन करता हूँ । पुन 
तप नियमादि गरुणो से सम्पन्न वज्रवत्‌ सुदृढ़ (१९) श्री आये वज्नस्वामी को बन्दन करता हूँ । 
३२--वंदासि अज्जर विखियखवर्ण, रक्खिय चरित्तसव्यस्से । 
रमण-करडगभुओ-अणुओगो रक्खिओ जेंहिं।। 
३२-जिन्‍्होने स्वय के एवं भ्रन्य सभी सयमियो के चारित्र सर्वस्व की रक्षा की तथा 
जिन्होने रत्नो की पेटी के समान अनुयोग की रक्षा की, उन क्षपण-तपस्वीराज (२०) श्ाचार्य श्री 
श्रार्य रक्षित को वन्दन करता हूँ । 
३३-णाणसम्मि दंसणम्मि य, तवविणए णिच्चकालसुज्जुत्त । 
झ्ज्ज नंदिल-खप्ण, सिरसा बंदे पसन्नमण ॥॥ 
ज्ञान, दर्शन, तप और विनयादि गुणो मे स्वंदा उद्यत, तथा राग-द्वेष विहीन प्रसन्नमना, 
प्रनेक गुणों से सम्पन्न झआारय (२१) नन्दिल क्षपण को सिर नमाकर बन्दन करता हूँ । 


भृड ] | नन्‍्दीसृत् 


३४-अड्ढ़ज वायगवंसो, जसवंसो अज्जनागहरथीणं। 
वागरण-करण-भंतिय-कसम्सप्पसडीपहाणाणं ।। 

३४--व्याकरण धर्थात्‌ प्रश्नव्याकरण, झ्रथवा सस्कृत तथा प्राकृत भाषा के शब्दानुशासन 

में निपुण, पिण्डविशुद्धि आदि उत्तरक्रियाओ श्लौर भगो के ज्ञाता तथा कर्मप्रकृति की प्ररूपणा करने 


में प्रधान, ऐसे श्राचाय नन्दिलक्षपण के पट्टधधर शिष्य (२२) झाय॑ नागहस्ती का वाचक वश्ञ मूत्तिमान्‌ 
यशोवश की तरह अभिवृद्धि को प्राप्त हो । 


३५-जस्चजणधाउसमप्पहाणं, महियकुबलय-निहाणं । 
वड़्ढउ वायगबंसो, रेबइनक्थत्त-नामाणं ।॥। 


३५-उत्तम जाति के अजन धातु के सदृश प्रभावोत्पादक, परिपक्व द्वाक्षा और नील कमल 
भ्रथवा नीलमणि के समान कातियुक्त (२३) भ्रार्य रेवतिनक्षत्र का वाचक वश वृद्धि प्राप्त करे । 


३६--अयलपुरा णिक्‍्खंते, कालिय-सुय-अआणुओगिए धीरे । 
बंभदीषग-सोहे, वायग-पय-मुत्तम पत्ते ॥। 


३६--जो अ्रचलपुर मे दीक्षित हुए, और कालिक श्रत की व्याख्या-व्याख्यान मे भ्रन्य 
श्राचार्यों से दक्ष तथा धीर थे, जो उत्तम वाचक पद को प्राप्त हुए, ऐसे ब्रह्मद्दीपिक शाखा से 
उपलक्षित (२४) प्राचायं सिह को वन्दन करता हूँ । 


३७--जैसि इसो अणुओगो, पयरइ अज्जाबि झड्ढ-सरहस्सि । 
बहुनयर-निर्गय-जसे, ते बंद खंबिलायरिए ॥। 


३७- जिनका वर्तमान मे उपलब्ध यह भ्रनुयोग झ्राज भी दक्षिणाद्ध भरतक्षेत्र मे प्रचलित 
है, तथा भ्रनेकानेक नगरो मे जिनका सुयश फंला हुआ है, उन (२५) स्कन्दिलाचार्य को मैं वन्दन 
करता हूँ । 


३८--तत्तोी हिमवत-महंत-जिक्कमे घिह-परक्‍्कममर्णते । 
सज्प्तायमणंतधरे, हिमवंते. बंदिमो सिरसा ॥। 


३८-्कन्दिलाचार्य के पश्चात्‌ हिमालय के सदृुश विस्तृत क्षेत्र मे विचरण करनेवाले 
झतएव महान्‌ विक्रमशाली, अनन्त घेर्यवान्‌ श्रौर पराक्रमी, भाव की भ्रपेक्षा से श्रनन्‍्त स्वाध्याय के 
घारक (२६) भ्राचार्य हिमवान्‌ को मस्तक नमाकर वन्दन करता हू । 


३९--कालिय-सुय-अणुशोगस्स धारए, धारए य पुष्वाणं । 
हिमवबंत-खमासमण्ण बदे.. णागज्जणायरिए ॥। 


३९--जो कालिक सूत्र सम्बन्धी श्रनुयोग के धारक भ्ौर उत्पाद आदि पूर्वों के घारक थे, 
महान्‌ विशिष्ट ज्ञानी हिमवन्त क्षमाश्रमण को वन्दन करता हूँ । तत्पश्चात्‌ (२७) श्री नागाजु नाचार्य 
को वन्दन करता हूँ । 


य्रुग-प्रधान-स्थविराणिका-वग्वन ] [१५ 


४०--भिठ-महव सम्पन्ते, अणुपुव्वी-वायगत्तण्ं पे । 
झोहसुयसभायारे, नागज्जुणवायए बंदे।। , 
४०--जो भ्रत्यन्त मृदु-कोमल मार्दव, भ्राजंव आदि भावो से सम्पन्न थे, जो अवस्था व 
चारित्रपर्याय के क्रम से वाचक पद को प्राप्त हुए तथा श्रोषश्रुत का समाचरण करने वाले थे, उन 
(२८) श्री नागाजु न वाचक को वन्दन करता हूँ । 


४१- गोविदाणं वि नमो, अणुओगे विउलधाराणिदाणं । 
णिक्ष्य खंतिदयाणं परुषणे बुल्लभिवाणं ॥। 
४२--तसो थ भुयविश्ञ , निर्च तजसंजसे अनिब्विण्णं । 
पंडियजण-सम्माणं, बंदासों संजमविहिण्णु ॥। 


४१-४२--अ्नुयोग सम्बन्धी विपुल धारणा रखने वालो मे इन्द्र के समान (प्रधान), सदा 
क्षमा और दयादि की प्ररूषणा करने मे इन्द्र के लिए भी दुलंभ ऐसे (२९) श्रीगोविन्दाचायं को 
नमस्कार हो । 


तत्पश्चात्‌ तप-संयम की साधना-श्राराधना करते हुए, प्राणान्त उपसर्ग होने पर भी जो खेद 
से रहित विद्वदू-जनों से सम्मानित, सयम-विधि-उत्सगं श्ौर श्रपवाद मार्ग के परिज्ञाता थे, उन (३०) 
ग्राचार्य भूतदिन्न को वन्‍्दन करता हूँ । 

४३-बर-कणग-तविय-चंपग-विभउल-घर-कसल-गठ्भसरि वन्ने । 
भविय-जण-हियय-बहुए,_ वयागुणविसारए घोरे ॥। 
४४--अ्रडढभरहप्पहाणे बहुविहसज्ञाय-सुमुणिय-पहाणे । 
अणुओणमिय-बरवससभे नाइलकुल-बंसनंदिकरे ।॥ 

४५-जगभूयहियपगब्से, बदे5ह भूयदिन्लमायरिए । ४ 
भव-भय-बु॒च्छेयकरे, सोीसे. नागज्जुगरिसीणं ॥। 


४३-४४-४५-जिनके शरीर की कान्ति तपे हुए स्वर्ण के समान देदीप्यमान थी श्रथवा 
स्वणिम वर्ण वाले चम्पक पुष्प के समान थी या खिले हुए उत्तम जातीय कमल के गर्भ-पराग के 
तुल्य गौर वर्ण युक्त थी, जो भव्यों के हृदय-वल्लभ थे, जन-मानस मे करुणा भाव उत्पन्न करने मे तथा 
करुणा करने मे निपुण थे, धंर्यगुण सम्पन्न थे, दक्षिणाद्ध भरत मे युग प्रधान, बहुविध स्वाध्याय के 
परिज्ञाता, सुयोग्य सयमी पुरुषो को यथा योग्य स्वाध्याय, ध्यान, वेयावृत्य भ्रादि शुभ क्रियायो मे 
नियुक्तिकर्ता तथा नागेन्द्र कुल की परम्परा की अभिवुद्धि करने वाले थे, सभी प्राणियो को उपदेश 
देने मे निपुण और भव-भी ति के विनाशक थे, उन आचायं श्री नागाजु न ऋषि के शिष्य भूतदिश्ल को 
मैं बन्दन करता हूँ । 

विवेशन--श्रीदेववाचक, आचार भूतदिन्न के परम श्रद्धालु थे। इसलिए आचाये के शरीर का, 
गुणों का, लोकप्रियता का, गुरु का, कुल का, वश का श्रौर यद्ष 'कीति का परिचय उपयुक्त तीन 
गाथाझ्नों मे दिया है। उनके विशिष्ट गुणों का दिग्द्शत कराना ही वास्तविक रूप में स्तुति 
कहलाती है । 


१६] [नन्‍्दीसूत्र 


४६--सुमुणिय-णिच्चाणिल्व, सुधुणिय-सुत्तत्थधारयं बंद । 
सब्भावुक्भावणया, ततथ॑ लोहिच्चणामा्ण ।॥। 


४६--नित्यानित्य रूप से द्रव्यो को समीचोन रूप से जानने वाले, सम्यक्‌ प्रकार से समभे 
हुए सूत्र और श्रर्थ के धारक तथा सर्वज्ञ-प्ररूपित सदुभावों का यथाविधि प्रतिपादन करने वाले (३१) 
श्री लोहित्याचायं को नमस्कार करता हूँ । 


४७--प्रत्य-महत्यक्खथा णि, सुसमण वक्खाण-कहण-निव्याणि । 
पयईए सहूरवाणि, पयजो पणसासि दूसगणि ॥॥ 


४७--शा स्त्रो के भ्र्थ और महार्थ की खान के सदृश श्रर्थात्‌ भाषा, विभाषा, वातिकादि से 
अनुयोग के व्याख्याकार, सुसाधुशों को श्रागमों की वाचना देते समय शिष्यो द्वारा पूछे हुए प्रश्नो का 
उत्तर देने मे सतोष व समाधि का अनुभव करने वाले, प्रकृति से मघुर, ऐसे प्राचार्य (३२) श्री 
दृष्यगणी को सम्मानपूर्वन वन्दन करता हूँ । 


४८--तव-नियम-सच्च-संजम-विणयज्जव-खंति-मह॒वरयाण । 
सीलगरुणगद्ठियाणं, झणओग-जुगप्पह्वाणाणं ॥। 


४८ - बे दृष्यगणी तप, नियम, सत्य, सयम, विनय, श्राजंव (सरलता), क्षमा, मार्दव (नम्नता) 
प्रादि श्रमणधर्म के सभी गुणों मे सलग्न रहने वाले, शील के गुणो से प्रख्यात श्रौर श्रनुयोग की व्याख्या 
करने में युगप्रधान थे । (ऐसे श्रीदृष्यमणि को वन्दन करता हूँ ।) 


४९-सुकूमालकीमलतले, लेसि पणमामि लक्खणपसत्थे । 
पाए पावयणीणं, पडिच्छिय-सर्णहू परणिवइए ॥॥ 


४९--पूर्वकथित गुणों से युक्त, उन सभी युगप्रधान प्रवचनकार श्राचार्यो के प्रशस्त लक्षणो से 
सम्पन्न, सुकुमार, सुन्दर तलवे वाले झ्नौर सेकडो प्रातीच्छिको के भ्रर्थात्‌ शिष्यों के द्वारा नमस्कृत, 
महान्‌ प्रवचनकार श्री दृष्यगणि के पूज्य चरणो को प्रणाम करता हूं । 


विवेचन--जो साधु अ्रपने गण के प्राचाय से भ्राज्ञा प्राप्त करके किसी दूसरे गण के आचार्य के 
समीप पश्रनुयोग-सूत्रव्याख्यान श्रवण करने के लिए जाते हैं श्रौर उस गण के भ्राचार्य उन्हे शिष्य के रूप 
में स्वीकार कर लेते हैं, वे प्रातीच्छिक शिष्य कहलाते हैं । 


५० -जे झन्‍्ने भगबंते, कालिय-सुय-आणुओगिए धौीरे। 
ते पणिऊण सिरसा, नाणस्स परूवणं बोच्छ ॥। 


५४०--प्रस्तुत गाथाश्रो मे जिन अनुयोगधर स्थविरों श्रौर श्राचारयों को वन्दन किया गया है, 
उनके भ्रतिरिक्त अन्य जो भी कालिक सूत्रो के ज्ञाता और अनुयोगघर धोर प्राचार्य भगवन्त हुए हैं, 
उन सभो को प्रणाम करके (मैं देव वाचक) ज्ञान की प्ररूुपंणा करू गा । [37 


शभोलाओं के विविध प्रकार 


५१--सेलघण-कुडग-चालिणी, परिपुण्णग-हंस-महिस-समेसे य । 
ससग-जलूग-विराली, जाह॒ग-गो-भेरि-आभीरी ।। 

(५१)--( १) शेलघन-- चिकना गोल पत्थर और पुष्करावत्त मेघ(२)कुटक--घड़ा (३)चालनी 
(४) परिपूर्णक, (५) हस (६) महिष (७) मेष (८) मशक (९) जलौक--जोक (१०) विडाली-- 
बिललो (११) जाहक (चूहे की जाति विशेष) (१२) गौ (१३) भेरी झौर (१४) झ्ाभी री (भीलनी) 
इनके समान श्रोताजन होते है । 

विवेचन - शास्त्र का शुभारम्भ करने से पूर्व विध्न-निवारण हेतु, मगल-स्वरूप अहँत्‌ आदि 
का कीतं॑न करने के पश्चात्‌ झागम-ज्ञान को अवण करने का ग्रधिकारी कौन होता है ? श्रौर किस- 
प्रकार की परिषद्‌ (श्रोतृसमूह) श्रवण करने योग्य होती है ? यह स्पष्ट करने के लिए चौदह दृष्टान्तो 
द्वारा श्रोताझ्रो का वर्णन किया गया है। 


उत्तम वस्तु पाने का अ्रधिकारी सुयोग्य व्यक्ति ही होता है। जो जितेन्द्रिय हो, उपहास नही 
करता हो, किसी का गुप्त रहस्य प्रकाशित नही करता हो, विशुद्ध चारित्रवान्‌ हो, जो अतिचारी, 
भ्रताचारी न हो, क्षमाशील हो सदाचारी एव सत्य-प्रिय हो, ऐसे गुणों से युक्त व्यक्ति ही श्रुतज्ञान का 
लाभ करने का अधिकारी होता है। वही सुपात्र है। इन योग्यताझो मे यदि कुछ न्यूनता हो तो वह 
पात्र है 


इन गुणों के विपरीत जो दुष्ट, मूढ एवं हठी है, वह कुपात्र है। वह श्रुतज्ञान का भ्रधिकारी 


नहीं हो सकता, क्योकि वह प्राय श्रुतज्ञान से दूसरों का ही नही श्रपितु भ्रपना भी भ्रहित करता 
है| यहा सूत्रकार ने श्रोताग्रो को चौदह उपमाश्रो द्वारा वणित किया है। यथा-- 


(१) शेल-घन-यहा शैल का भ्रभिप्राय गोल मू ग के बराबर चिकना पत्थर है। धन पुष्कारा- 
वत्त मेघ को कहा गया है | मुदूगशल नामक पत्थर पर सात श्रहोरात्र पर्यन्त निरन्तर मूसलधार पानी 
वरसता रहे किन्तु वह पत्थर भ्रन्दर से भीगता नही है। इसी प्रकार के श्रोता भी होते हैं, जो 
तीर्थंकर, श्रुतकेवलियो झ्ादि के उपदेशो से भी सन्‍्मार्ग पर नहीं भ्रा सकते, तो भला सामान्य आचाय॑ 
व मुनियो के उपदेशो का उन पर कया प्रभाव हो सकता है ! वे गोशालक आजीवक झौर जमाली के 
समान दुराग्रही होते हैं। भगवान्‌ महावीर भी उनको सन्मार्गगामी नही बना सके । 

(२) कुडग-सस्कृत में इसे 'कुटक' कहते हैं। कुटक का अर्थ होता है घडा । घडे दो प्रकार 
के होते हैं, कच्चे श्रौर पक्के । श्रग्ति से जो पकाया नहीं गया है, उस कच्चे घडे में पानी नही ठहर 
सकता है । इसी प्रकार जो श्रबोध शिशु है, वह श्रुतज्ञान के सर्वथा श्रयोग्य है। 

पक्के घडे भी दो प्रकार के होते हैं --तये और पुराने । इनमे नवीन घट श्रेष्ठ हैं जिसमें डाला 


हुआ गर्म पानी भी कुछ समय मे शीतल हो जाता है, तथा कोई वस्तु जल्दी विक्ृत नही होती । इसी 
प्रकार लघु वय में दीक्षित मुनि में डाले हुए भ्रच्छे संस्कार सुन्दर परिणाम लाते हैं । 


१८] [ नर्दोसूत्र 


पुराने घडे भो दो प्रकार के होते हैं--एक पानी डाला हुआ और एक बिना पानी डाला 
हुम्ना--कोरा । इसी प्रकार के श्रोता होते हैं जो युवावस्था होने पर मिथ्यात्व के कलिमल से लिप्त या 
अलिप्त होते हैं। जो प्ललिप्त हैं, ऐसे व्यक्ति हो योग्य ओत। कहलाते है । 


जो अन्य वस्तुओं से वासित हो गये है, ऐसे घडे भी दो प्रकार के होते हैं -सुगन्धित पदार्थों से 
बासित श्र दुर्गन्धित पदार्थों से वासित । इसी तरह श्रोता भी दो प्रकार के होते हैं। कोई सम्यग्‌ 
ज्ञानादि गरुणो से परिपूर्ण तथा दूसरे क्रोधादि कषायो से युक्त । 


भ्र्थात्‌ जिन श्रोताओ्रो ने मिथ्यात्व, विषय, कषाय के सस्कारो को छोड दिया है, वे श्रुतज्ञान 
के झ्रधिका री है, शोर जिन्होने कुसस्कारो को नही छोडा वे अ्रमधिकारी हैं । 


(३) चालनी-जो श्रोता उत्तमोत्तम उपदेश व श्रुतज्ञान सुनकर तुरन्त ही भुला देते हैं, 
जेसे चालनी मे डाला हुआ पानी निकल जाता है। अथवा चालनी सार-सार को छोड देती है, 
निस्सार (तूसो को) को पपने अन्दर घारण कर रखती है, वसे ही श्रयोग्व श्रोता ग्रुणो को छोडकर 
श्वगुणों को हो ग्रहण करते हैं। वे चालनी के समान श्रोता अ्रयोग्य है । 


(४) परिपूर्णक--जिससे दूध, पानी श्रादि पदार्थ छाने जाते है, वह छनन्‍ना कहलाता है । 
वह भी सार को छोड देता है धौर कडा-कचरा अपने मे रख लेता है। इसी प्रकार जो श्रोता 
भ्रच्छाइयो को छोडकर बुराइयो को ग्रहण करते हैं, वे श्रुत के भ्रनधिकारो हैं । 


(५) हंस--हस के समान जो श्रोता केवल गुणग्राही होते है, वे श्र्‌ तज्ञान के श्रधिकारी होते 
हैं। पक्षियों मे हंस श्रेष्ठ माना जाता है । यह पक्षो प्रायः जलाशय मानसरोवर, गगा श्रादि के 
किनारे रहता है । इस पक्षी की यह विशेषता है कि मिश्रित दूध और पानी मे से भी यह दुग्धाश 
को ही प्रहण करता है । 


(६) मेष--मेढा या बकरी का स्वभाव श्रगले दोनो घुटने टेककर स्वच्छ जल पीने का है। 
वे पानी को गन्दा नहीं करते । इसी प्रकार जो श्रोता शास्त्रश्नवण करते समय एकाग्रचित रहते है, 
भौर गुरु को प्रसन्न रखते हैं, वातावरण को मलीन नही बनाते, वे शास्त्र-अ्रवण के अ्रधिकारी और 
सुपात्र होते हैं । 

(७) महिष--भंसा जलाशय में घुसकर स्वच्छ पानी को गन्दा बना देता है और जल मे 
मृत्र-गोबर भी कर देता है। वह न तो स्वय स्वच्छ पानी पीता है शोर न अपने साथियो को स्वच्छ 
जल पीने देता है । इसी प्रकार कुछेक श्रोता भेसे के तुल्य होते है । जब ग्राचायं भगवान्‌ शास्त्र-वाचना 
दे रहे हो, उस समय न तो स्वय एकाग्रता से सुनते है, न दूसरो को सुनने देते है । वे हँसी-मश्करी, 
कानाफूसी, कुतक तथा वितण्डाबाद मे पडकर शअ्रमूल्य समय नष्ट करते हैं। ऐसे श्रोता श्रतज्ञानी के 
श्रधिकारी नही हैं । 


(८5) सशक--डॉस-मच्छरो का स्वभाव मधुर राग सुनाकर शरोर पर डक मारने का है। 
वेसे ही जो श्रोतागण गुरु की निन्‍्दा करके उन्हे कष्ट पहुंचाते हैं, वे भविनीत होते है । वे भयोग्य हैं। 


(९) जलोका -जिस प्रकार जलौका श्रर्थात्‌ जौक मनुष्य के शरीर मे फोडे झ्रादि से पीड़ित 
स्थान पर लगाने से बहां के दूषित रक्त को ही पोती है, शुद्ध रक्त को नही, इसी प्रकार कुबुद्धि श्रोता 


अरोताओं के विधिध प्रकार | [१९ 


आाचाये झ्रादि के सदगुणों को व आगम ज्ञान को छोडकर दुगुणों को ग्रहण करते हैं। ऐसे व्यक्ति 
श्रुतज्ञान के श्रधिकारी नही होते । 


(१०) विडाली--बिल्ली स्वभावत दूध दही श्रादि पदार्थों को पात्र से नीचे गिराकर 
चाटती है भ्र्थात्‌ धूलियुक्त पदार्थों का श्राह्दार करती है। इसी तरह कई एक श्रोता गुरु से साक्षात्‌ 
ज्ञान नही लेते, किन्तु इधर-उधर से सुन सुनाकर ग्रथवा पढ़कर सत्यासत्य का भेद समझे बिना ही 
ग्रहण करते रहते हैं । वे श्रोता बिल्ली के समान होते हैं और श्रुतज्ञान के पात्र नही होते । 

(११) जाहक--एक जानवर है । दूध-दही आदि खाद्य पदार्थ जहां है, वही पहुच कर वह 
थोडा-थोडा खाता है और बीच-बीच मे श्रपनी बगले चाटता जाता है। इसी प्रकार जो शिष्य पूर्व- 


गृहोत सूत्रार्थ को पक्का करके नवीन सूत्रार्थ ग्रहण करते है वे श्रोता जाहक के समान श्रागम ज्ञान के 
अधिकारो होते है । 


(१२) गौ--गो का उदाहरण इस प्रकार है--किसी यजमान ने चार ब्राह्मणी को एक 
दुधारू गाय दान मे दी । उन चारो ने गाय को न कभी घास दिया न पानी पिलाया, यह सोचकर कि 
यह मेरे भ्रकेले की तो है नही । वे दूध दोहने के लिए पात्र लेकर झा धमकते थे | श्राखिर भूखो गाय 


कब तक दूध देती श्रौर जीवित रहती ? परिणामस्वरूप भूख-प्यास से पीडित गाय ने एक दिन दम 
तोड दिया । 


ठीक इसी प्रकार के कोई-कोई श्रोता होते हैं, जो सोचते हैं कि गुरुजी मेरे भ्रकेले के तो हैं 
नही फिर क्‍यों मैं उनकी सेवा करू ? ऐसा सोच कर वे गुरुदेव की सेवा तो करते नही हैं भौर 
उपदेश सुनने व ज्ञान सीखने के लिए तत्पर हो जाते हैं । वे श्रुतज्ञान के प्रधिकारी नही हैं । 


इसके विपरीत दूसरा उदाहरण है-एक श्रेष्ठी (सेठ) ने चार ब्राह्मणो को एक ही गाय 
दी । वे बडी तन्मयता से उसे दाना-पानी देते, उसकी सेवा करते और उससे खूब दूध प्राप्त करके 
प्रसन्न होते । 


इसी प्रकार विनीत श्रोता गुरु को सेवा द्वारा प्रसन्न करके ज्ञान रूपी दुग्ध ग्रहण करते है । 
वे वास्तव मे ज्ञान के ग्रधिकारी हैं और रत्नत्रय को श्राराधना करके भ्रजर-प्रमर हो सकते हैं । 


(१३) भेरी--एक समय सोौधर्माधिपति ने अपनी देवसभा मे प्रशसा के शब्दों मे श्रीकृष्ण 
की दो विशेषताएं बताई--एक गुण-ग्राहकता और दूसरी नीच युद्ध से परे रहना । 


एक देव उनको परीक्षा लेने के विचार से मध्यलोक मे श्राया । उसने सडे हुए काले कुत्ते का 
रूप बनाया और जिस रास्ते से कृष्ण जाने वाले थे, उसी रास्ते पर मृतकवत्‌ पड गया। उसके शरीर 
से तीन दुर्गन्ध भ्रा रही थी । उसी राज-पथ से श्रीकृष्ण भगवान्‌ अरिष्टनेमि के दर्शनार्थ निकले । 
कुत्ते के शरीर की प्रसह्य दुर्गन्‍्ध से सारी सेना घबरा उठी और द्रुतमति से पथ बदलकर श्रागे बढने 
लगी । किन्तु श्रीकृष्ण ने शौदारिक देह का स्वभाव समझ कर बित्ता घृणा किए, कुत्ते को देखकर 
कहा- देखो तो सही, इस कुत्ते के काले शरीर में सफेद, स्वच्छ श्लोर चमकीले दात कितने सुन्दर 
दिखाई देते हैं! मानो मरकत मणि के पात्र मे मोतियो की कतार हो ।' देव श्रीकृष्ण की इस श्रद्भुत 
गुणग्राहकता को जानकर नतमस्तक हो गया। तत्पश्चात्‌ श्रीकृष्ण भगवान्‌ भ्ररिष्टनेमि के दर्शनार्थ 
द्वारका नमरी के बाहर उद्यान में पहचे । 


२० ] [ सस्दोसूत्र 


कुछ समय पश्चात्‌ वही देव फिर परीक्षा लेने भ्रा गया और अश्वशाला मे से श्रोकृष्ण के 
एक उत्तम अ्रश्व को लेकर भाग गया । सैनिको के पीछा करने पर भी वह हाथ नही पश्राया। श्रन्त 
में श्रीकृष्ण स्वय घोडा छूडाने के लिए गये । तब अ्रपहरणकर्त्ता देवता ने कहा--'भाप मेरे साथ 
युद्ध करके ही भ्रश्व ले जा सकते हैं ।' 

श्रीकृष्ण ने कहा---'युद्ध कई प्रकार के होते है, मल्लयुद्ध, मुष्ठि-युद्ध, दृष्टि-युद्ध भ्रादि। तुम 
कौन-सा युद्ध करना चाहते हो ?' 

उनसे कहा--मैं पीठयुद्ध करना चाहता हु । झ्रापकी भी पोठ हो और मेरो भी पीठ हो ।' 

उत्तर मे श्रीकृष्ण ने कहा--'ऐसा घृणित व नीच युद्ध करना मेरे गौरव के विरुद्ध है, भले तू 
श्रश्व ले जा ।' यह सुनकर देव हर्षान्वित होकर अपने शभ्रसली रूप मे वस्त्राभूषणों से श्रलकृत होकर, 
श्रीकृष्ण के चरणों मे नतमस्तक हो गया । इसने इन्द्र द्वारा की गई प्रशसा को स्वीकार किया। 
वरदानस्वरूप देव ने एक दिव्य भेरी भेट में दी । उसने कहा--इसे छह-छह महीने बाद बजाने से 
इसमे से सजल मेघ जैसी ध्वनि उत्पन्न होगी । जो भी इसको ध्वनि को सुनेगा उसे छह महीने तक रोग 
नही होगा । उसका पूर्वोत्पन्न रोग नष्ट हो जायगा । इसकी ध्वनि बारह योजन तक सुनाई देगी ।' 
यह कहकर देव स्वस्थान को चला गया । 


कुछ समय पश्चात्‌ ही द्वारका मे रोग फैला और भेरी बजाई गई । जहा तक उसकी झ्रावाज 
पहुची बहा तक के सभी रोगी स्वस्थ हो गए । श्रीकृष्ण ने भेरी अपने विश्वासपात्र सेवक को सौप 
दी और सारी विधि समझा दी । एक बार एक धनाढथ गभीर रोग से पीडित होकर और कृष्णजी 
को भेरी की महिमा सुनकर द्वारका भ्राया । दुर्भाग्य से उसके द्वारका पहुचने से एक दिन पूर्व ही 
भेरीवादन हो चुका था। वह सोच-विचार मे पड़ गया--भेरी छह महीने बाद बजेगी और तब तक 
मेरे प्राण-पशचेरू उड जायेंगे । सोचते-सोचते भप्रचानक उसे सूका-“यदि भेरी की ध्वनि सुनने से रोग 
नष्ट हो सकता है तो उसके एक टुकडे को घिस कर पीने से भो रोग नष्ट हो सकता है।' श्राखिर 
उसने भेरीवादक को रिश्वत देकर एक टुकडा प्राप्त कर लिया । उसे घिस कर पीने से वह नीरोग 
हो गया । मगर भेरी-वादक को रिश्वत लेने का चस्का लग गया । दूसरो को भी वह भेरी काट-काट 
कर टुकडे देने लगा। काटे हुए टुकडो के स्थान पर वह दूसरे टुकडे जोड देता था। परिणाम यह 
हुआ कि वह दिव्य भेरी गरीब की गृदडी बन गई । उसका रोगशमन का सामर्थ्य भी नष्ट हो गया । 
बारह योजन तक--सम्पूर्ण द्वारका मे उसकी ध्वनि भी सुनाई न देती । 


श्रीकृष्ण को जब सारा रहस्य ज्ञात हुआ तो कृष्णजी ने भेरीवादक को दण्डित किया तथा 
जनहित की दृष्टि से तेला करके पुन' देव से भेरी प्राप्त की भ्रौर विश्वस्त सेवक को दी । यथाज्ञा छह 
महीने बाद ही भेरी के बजने से जनता लाभान्वित होने लगी । 

इस दृष्टान्त का भावार्थ इस प्रकार है--प्रायं क्षेत्र रूप द्वारका नगरी है, तीर्थकर रूप कृष्ण 
वासुदेव हैं, पुण्य रूप देव हैं । भेरी तुल्य जिनवाणी है। भेरीबादक के रूप में साधु भौर कर्म रूप 
रोग है । 

इसी प्रकार जो श्रोता या शिष्य श्ाचार्य द्वारा प्रदत्त सृत्रार्थ को छिपाते हैं या उसे बदलते 
हैं, मिथ्या प्ररूपणा करते हैं, वे अनन्त ससारी होते हैं। किन्तु जो जिन बचनानुसार झ्ाचरण करते 


शोताओं के विविध प्रकार ] [२१ 


हैं, बे मोक्ष के श्रनन्‍्त सुखों के श्रधिकारी होते है । जेसे श्रोकृष्ण का विश्वासी सेवक पारितोषिक पाता 
है भौर दूसरा निकाला जाता है। 

(१४) प्रहीर बम्पती--एक भ्रही रदम्पती बेलगाडी मे धृत के घड़े भरकर शहर मे बेचने के 
लिए धीमण्डी में श्राया । वह गाडी से घड़े उतारने लगा और अहीरनी नीचे खडी होकर लेने लगी । 
दोनों मे से किसी की प्रसावधानी के कारण घडा हाथ से छूट गया श्रौर घी जमीन मे मिट्टी से लिप्त 
हो गया । इस पर दोनो भंगडने लगे । वाद-विवाद बढ़ता गया। बहुत सारा घो श्रभ्राह्म हो गया, 
कुछ जानवर चट कर गये । जो कुछ बचा उसे बेचने मे काफी विलब हो गया। प्रत. सायकाल वे 
दु.खी शोर परेशान होकर घर लौटे । किन्तु मार्ग मे चोरो ने लूट लिया, मुश्किल से जान बचा कर 
घर पहुचे । 

इसके विपरीत दूसरा अहोरदम्पती घृत के घडे गाडी मे भरकर शहर में बेचने हेतु श्राया । 
प्रसावधानी से घडा हाथ से छूट गया, किन्तु दोनो भ्रपनी-अपनी भ्रसावधानी स्वीकार कर, गिरे हुए 
घी को भ्रविलम्ब समेटने लगे। घी बेच कर सूर्यास्त होने से पहले-पहले ही वे सकुशल घर 
पहुचे गये । 

उपयुक्त दोनों उदाहरण भ्रयोग्य श्र योग्य श्रोताओं पर घटित किये गये हैं। एक श्रोता 
आचार्य के कथन पर क्लेश करके श्रृतज्ञान रूप घृत को खो बेठता है, वह श्रुतज्ञान का श्रधिकारी 
नही हो सकता । दूसरा, आचार द्वारा ज्ञानदान प्राप्त करते समय भूल हो जाने पर प्रबिलम्ब क्षमा- 
याचना कर लेता है तथा उन्हे सतुप्ट करके पुन॒मसूृत्रार्थ ग्रहण करता है; वही श्रुतज्ञान का श्रधि- 
कारी कहलाता है । ल| 


परिषद्‌ के तीन प्रकार 


४२--सा समासओ 8लिविहा पण्णत्ता, तंजहा- जाणिया, झ्रजाणिया, दुव्वियडढा । 
जाणिया जहा-- 
खोरभिव जहा हुंसा, जे घट्ट ति इह गुरु-गण-समिद्धा । 
दोसे श्र विवज्जति, त जाणसु जाणिय परिस ॥। 


५२--वह परिषद्‌ (श्रोताश्रो का समूह) तीन प्रकार की कही गई है। (१) विज्ञपरिषद्‌ 
(२) भ्रविज्ञप रिषद्‌ और दुविदग्ध परिषद्‌ । 
विश-ज्ञाथिका परिषद्‌ का लक्षण इस प्रकार है-- 


जैसे उत्तम जाति के राजहस पानी को छोडकर दूध का पान करते है, वेसे ही गुणसम्पन्न 
श्रोता दोषो को छोडकर गुणो को ग्रहण करते हैं। हे शिष्य ! इसे ही ज्ञायिका परिषद्‌ (समभदारो 
का समूह) समझना चाहिए । 


५३--अजाणिया जहा -- 


जा होइ पगइमहुरा, सियछावय-सोह-कुक्‍्कुडय-सुझ्रा । 
रमणमिव पअ्संठविश्ला अजाणिया सा भवे परिसा॥। 


५३-अ्ज्ञायिका परिषद्‌ का स्वरूप इस प्रकार है--जो श्रोता मृग, शेर और कुक्‍्कुट के 
प्रबोध शिशुओं के सदुश स्वभाव से मधुर, भद्र हृदय, भोले-भाले होते हैं, उन्हे जेसी शिक्षा दी जाए 
वे उसे ग्रहण कर लेते है। वे (खान से निकले) रत्न की तरह भ्रसस्कृत होते हैं। रत्नो को 'ाहे 
जैसा बनाया जा सकता है | ऐसे ही अनभिज्ञन श्रोता्रो मे यथेष्ट सस्कार डाले जा सकते हैं । हे 
शिष्य ! ऐसे अबोध जनो के समूह को अ्रज्ञायिका परिषद जानो । 


५४--दुव्विश्नड़्डा जहा -- 
न य कत्थई निम्माओ, न य पुच्छद परिभवस्स दोसेण । 
वत्थिव्व वायपुण्णो, फुट्टट गासिललय विअड॒ढों ॥। 


५४--दुविदग्धा परिषद्‌ का लक्षण--जिस प्रकार ग्रल्पज्ञ पडित ज्ञान मे शपूर्ण होता है, 
किन्तु श्रपमान के भय से किसी विद्वान से कुछ पूछता नहीं । फिर भी अपनी प्रशसा सुनकर मिथ्या- 
भिमान से वस्ति-मशक की तरह फूला हुआ्ला रहता है। इस प्रकार के जो लोग है, उनकी सभा को, 
है शिष्य | दुविदग्धा सभा समझना । 

विवेचन--आगम का प्रतिपादन करते समय अनुयोगाचायय को पहले परिषद्‌ की परीक्षा 
करनो चाहिए, क्योंकि श्रोता विभिन्न स्वभाव के होते हैं। इसो लिए सभा के तोन भेद किए हैं-- 


परिषद्‌ के तोन प्रकार [२३ 


(१) जिस परिषद्‌ मे तत्त्वजिज्ञासु, गुणश, बुद्धिमान्‌ सम्यर्दृष्टि, विवेकवान्‌ू, विनीत, शात, 
सुशिक्षित, आस्थावान्‌, प्रात्मान्वेषी ग्रादि गुणों से सम्पन्न श्रोता हो वहू विज्परिषद्‌ कहलाती है । 
विज्ञपरिषद्‌ ही सर्वोत्तम परिषद्‌ है। 

(२) जो श्रोता पशु-पक्षियो के भ्रबोध बच्चो की भाँति सरलहृदय तथा मत-मतान्तरो की 
कलुषित भावनाओं से रहित होते है, उन्हे श्रासानी से सन्‍्मागंगामी, सयमो, बिद्वानू, एवं सदगुण- 
सम्पन्न बनाया जा सकता है, क्योकि उनमे कुसस्कार नही होते । ऐसे सरलहृदय श्रोताश्रों की परिषद्‌ 
को अविज्ञ परिषद्‌ कहते है । 

(३) जो भ्रभिमानी, अ्विनीत, दुराग्रही श्र वस्तुत मूढ हो फिर भी अपने आपको पडित 
समभते हो, लोगो से श्रपने पाडित्य की भूठी प्रशसा सुनकर वायु से पूरित मशक की तरह फूल उठते 
हो, ऐसे श्रोताश्नो के समूह को दुविदग्धा परिषद्‌ समझना चाहिये । 

उपयु क्त परिषदो मे विज्परिषद्‌ अनुयोग के लिए सर्वथा पात्र है । दूसरी भी पात्र है किन्तु 
तीसरी दुविदग्धा परिषद्‌ ज्ञान देने के लिए श्रयोग्य है । 

इसी तथ्य को ध्यान मे रखते हुए श्ञास्त्रकार ने श्रोताओं की परिषद्‌ का पहले वर्णन 
किया है । [7 


ज्ञान कं पांच प्रकार 


१-नाणं पंचबिहं पण्णत्त, तंजहा-- 

(१) झासिणिबोहियणनाणं, (२) सुयनाणं, (३) ओहिनाणं, (४) भण-पज्जवनाणं 

(५) केबलनाणं । 

१>ज्ञान पाच प्रकार का प्रतिपादित किया गया है। जैसे--(१) प्राभिनिबोधिकज्ञान, 
(२) श्रुतज्ञान, (३) भ्रवधिज्ञान, (४) मन पर्यवज्ञान, (५) केवलज्ञान । 

विवेचन--प्रस्तुत सूत्र मे ज्ञान के भेदो का वर्णत किया गया है। यद्यपि भगवत्स्तुति, गण- 
घरावली और स्थविरावलिका के द्वारा मगलाचरण किया जा चुका है, तदपि नन्‍्दी शास्त्र का श्राद् 
सूत्र मंगलाचरण के रूप मे प्रतिपादन किया है । 

ज्ञान-नय की दृष्टि से ज्ञान मोक्ष का मुख्य अग है । ज्ञान और दर्शन झ्रात्मा के निज गुण हैं 
शर्थात्‌ श्रसाघारण गुण हैं । विशुद्ध दशा मे आ्रात्मा परिपूर्ण ज्ञाता द्रष्टा होता है | ज्ञान के पूर्ण विकास 
को मोक्ष कहते हैं। श्रत. ज्ञान मगलरूप होने से इसका यहाँ प्रतिपादन किया गया है। 


ज्ञान शब्द का अर्थं--जिसके द्वारा तत्त्व का यथार्थ स्वरूप जाना जाए, जो ज्ञेय को जानता 
है भ्रथवा जानना ज्ञान कहलाता है। ज्ञान शब्द की ब्युत्पत्ति अनुयोगद्वार सूत्र मे इस प्रकार की 
गई है-- 

“ज्ञातिर्शञानिं, कृत्यलुटो बहुलम्‌ (पा ३।३। ११३) इति वचनात्‌ भावसाधन', ज्ञायते- 
परिच्छियते वस्त्व-नेनास्मादस्मिन्वेति वा ज्ञानं, जानाति-स्वविषय परिच्छिनत्तीति वा ज्ञान, ज्ञाना- 
बरणकर्मक्षयोपशमक्षयजन्यो जीवस्तत्त्वभूतो, बोध इत्यर्थ ।” 

नन्दीसूत्र के वृत्तिकार ने जिज्ञासुओ्रों के सुगम बोध के लिए ज्ञान शब्द का केवल भाव-साधन 
श्रौर कारणसाधन ही स्वीकार किया है, जैसे कि--'ज्ञातिर्ज्ञन' ग्रथवा 'ज्ञायते परिच्छिद्यते वस्त्वनेनेति 
ज्ञानम्‌ ।! इसका तात्पयं पहले श्रा चुका है, भ्र्थात्‌ जानना ज्ञान है श्रथवा जिसके द्वारा जाना जाए 
वह ज्ञान है । 

साराश यह है कि आत्मा को ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय भ्रथवा क्षयोपशम से तत्त्वबोध होता 
है, वही ज्ञान है । ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय से होने वाला केवलज्ञान क्षायिक है श्रौर उसके क्षयोपशम 
से होने वाले शेष चार क्षायोपशमिक है । ग्रत ज्ञान के कुल पाँच भेद हैं । 

'पण्णत्त' के अर्थ--इस पद के संस्कृत मे चार रूप होते है--(१) प्रज्ञप्त (२) प्राज्ञाप्त (३) 
प्राज्ञात्त और (४) प्रज्ञाप्तम्‌ । 


(१) प्रज्ञप्त श्र्थात्‌ तीर्थंकर भगवन्‌ ने प्र्थ रूप मे प्रतिपादन किया और उसे गणधरों ने 
सूत्र रूप मे यूथा । 


ज्ञान के पांच प्रकार ] (२५ 


(२) प्राज्ञाप्त भर्थात्‌ जिस भ्र्थ को गणधरो ने प्राशो--सर्वज्ञ तीर्थंकरों--से भाप्त-प्राप्त- 
उपलब्ध किया । 


(३) प्राज्ात्त-प्राज्ञों-गणध रों द्वारा तीरथंकरो से ग्रहण किया भ्रर्थ 'प्राज्ञात्त! कहलाता है । 
(४) पभ्रज्ञाप्तं --प्रज्ञा श्रर्थात्‌ भ्रपने प्रखर बुद्धिबल से प्राप्त किया अर्थ 'प्रज्ञाप्त” कहलाता है । 


पण्णत्त” कहकर सूत्रकार ने बताया है कि यह कथन मैं अपनी बुद्धि या कल्पना से नहीं कर 
रहा हूँ । तीर्थंकर भगवान्‌ ने जो प्रतिपादन किया, उसी श्रर्थ को मैं कहता हूँ । 


शान के पांच भेदो का स्वरूप--(१) आभिनिबोधिक ज्ञान--आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष अर्थात्‌ सामने 
आये हुए पदार्थों को जान लेने वाले ज्ञान को आाभिनिबोधिक ज्ञान कहते हैं। प्रर्थात्‌ जो ज्ञान पाँच 
इन्द्रियो और मन के द्वारा उत्पन्न हो, उसे अ्रभिनिबोधिक ज्ञान या मतिज्ञान कहते हैं । 


(२) श्रुतज्ञान -किसी भी शब्द का श्रवण करने पर वाच्य-वाचकभाव सबंध के श्राघार 
से भ्र्थं की जो उपलब्धि होती है उसे श्रुतज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान भी मन झौर इन्द्रियो के निमित्त 
से उत्पन्न होता है किन्तु फिर भी इसके उत्पन्न होने में इन्द्रियो की श्रपेक्षा मन की मुख्यता होती है, 
अत इसे मन का विषय माना गया है । 


(३) अ्रवधिज्ञान--यह ज्ञान इन्द्रिय और मन की श्रपेक्षा न रखता हुआ केवल आत्मा के 
द्वारा ही रूपी-मूर्त पदार्थों का साक्षात्‌ कर लेता है । यह मात्र रूपी द्रव्यों को प्रत्यक्ष करने की क्षमता 
रखता है, प्ररूपी को नही | यही इसकी श्रवधि-मर्यादा है । अथवा 'भ्रव” का श्रर्थ है--नीचे-नीचे, 
'धि' का श्र्थ जानना है। जो ज्ञान भ्रन्य दिशाओ की श्रपेक्षा ग्रघोदिशा मे प्रधिक जानता है, वह्‌ 
अ्रवधिज्ञान कहलाता है । दूसरे शब्दो मे, द्रव्य, क्षेत्र, काल श्लौर भाव की मर्यादा को लेकर यह ज्ञान 
मूत्ते द्रब्यो को प्रत्यक्ष करने की शक्ति रखता है । 


(४) मन"पर्यवज्ञान -समनस्क, भ्रर्थात्‌ सज्ञी जीवो के मन के पर्यायो को जिस ज्ञान से जाना 
जाता है उसे मन पर्यवज्ञान कहते है। प्रश्न उठता है--“मनत की पर्याये किसे कहा जाय ? ” उत्तर 
है--जब भाव-मन किसी भी वस्तु का चिन्तन करता है तब उस चिन्तनीय वस्तु के झनुसार चिन्तन 
कार्य मे रत द्रव्य-मन भी भिन्न-भिन्न प्रकार की श्राकृतियाँ घारण करता है भ्रौर वे भ्राकृतियाँ ही यहाँ 
मन की पर्याय कहलातो है । 


मन पयंवज्ञान मन और उसकी पर्यायों का ज्ञान तो साक्षात्‌ कर लेता है किन्तु चिन्तनीय 
पदार्थ को वह प्रनुमान के द्वारा ही जानता है, प्रत्यक्ष नही । 


(५) केवलज्ञान- केवल' शब्द के एक, श्रसहाय, विशुद्ध, प्रतिपूर्ण, अनन्त भौर निरावरण, 
अर्थ होते हैं । इनकी व्याख्या निम्न प्रकार से की जाती है-- 

एक--जिस ज्ञान के उत्पन्न होने पर क्षयोपशम-जन्य ज्ञान उसी एक मे विलीन हो जाएँ श्रौर 
केवल एक ही शेष बचे, उसे केवलज्ञान कहते हैं । 

झसहाय--जो ज्ञान मन, इन्द्रिय, देह, भ्रथवा किसी भी भ्रन्य वेशानिक यन्त्र की सहायता के 
बिना रूपो-प्ररूपी, मृत्तं-अमूत्तं त्रैकालिक सभी ज्ञेयो को हस्तामलक की तरह प्रत्यक्ष करने की क्षमता 
रखता है उसे केवलज्ञान कहते हैं । 


२६] [ नस्दीसूत्र 


विशुद्ध--चार क्षायोपद भिक ज्ञान शुद्ध हो सकते हैं किन्तु विशुद्ध नहीं । विशुद्ध एक केवल- 
ज्ञान हो होता है। क्योंकि वह शुद्ध श्लात्मा का स्वरूप है। 

प्रतिपूर्ण--क्षायोपशमिक ज्ञान किसी पदार्थ की सर्व पर्यायो को नही जान सकते किन्तु जो 
ज्ञान स्व द्रब्यो की समस्त पर्यायों को जानने वाला होता है उसे प्रतिपूर्ण कहा जा सकता है। 

अनन्त--जो ज्ञान श्रन्य समस्त ज्ञानो से श्रेष्ठतम, भ्रनन्तानन्त पदार्थों को जानने की शक्ति 
रखने वाला तथा उत्पन्न होने पर फिर कभी नष्ट न होने वाला होता है उसे ही केवलज्ञान कहते हैं । 

निरावरण --केवलज्ञान, घाति कर्मों के सम्पूर्ण क्षय से उत्पन्न होता है,प्रतएव वह निरावरण है । 

क्षायोपशमिक ज्ञानो के साथ राग-द्वेष, क्रोध, लोभ एव मोह झ्रादि का अश विद्यमान रहता 
है किन्तु केवलज्ञान इन सबसे सर्वेथा रहित, पूर्ण विशुद्ध होता है । 

उपयु क्त पांच प्रकार के ज्ञानो मे पहले दो ज्ञान परोक्ष हैं और भ्रन्तिम तीन प्रत्यक्ष । 

श्रुतज्ञान के दो प्रकार हैं--(१) प्रथश्ुत एब (२) सूत्रश्ुत । भ्ररिहन्त केवलज्ञानियो के द्वारा 
भ्रय॑श्रुत प्ररूपित होता है तथा अ्रिहन्तो के उन्ही प्रवचनों को गणधर देव सूत्ररूप मे गुम्फित करते 
हैं। तब वह श्रुत सूत्र कहलाने लगता है| कहा भी है-- 


“अत्थं भासद श्ररहा, सुत्त गंथंति गणहरा निउण्णं। 
सासणस्स  हियद्वाए, तो सुत्त पवतेइ ।” 


अर्थ का प्रतिपादन अरिहन्त करते हैं तथा शासनहित के लिए गणधर उस श्रर्थ को सूत्ररूप 
में गू थते हैं| सूत्रागम में भाव और शभ्रर्थ तीर्थंकरो के होते है, शब्द गणधघरो के । 


प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाण 


२-त7 समासओ डुविहं पण्णत्त, 
त॑ जहा--पच्चक्खं च परोक्‍् च ।। 
२-ज्ञान पाँच प्रकार का होने पर भी सक्षिप्त मे दो प्रकार से वणित है, यथा (१) प्रत्यक्ष 
श्र (२) परोक्ष । 
विवेचन--प्रक्ष जीव या भ्रात्मा को कहते हैं । जो ज्ञान शआ्रात्मा के प्रति साक्षात्‌ हो प्र्थात्‌ 
सीधा आत्मा से उत्पन्न हो, जिसके लिए इन्द्रियादि किसी माध्यम की अपेक्षा न हो, वह प्रत्यक्ष ज्ञान 
कहलाता है । 
अवधिज्ञान और मन.पर्यवज्ञान, ये दोनो ज्ञान देश (विकल) प्रत्यक्ष कहलाते हैं। केवलज्ञान 
स्वप्रत्यक्ष है, क्योकि समस्त रूपी-अरूपी पदार्थ उसके विषय हैं | जो ज्ञान इन्द्रिय और मन आदि की 
सहायता से होता है, वह परोक्ष कहलाता है । 


ज्ञानों को क्रमव्यवस्था--पाच ज्ञानो मे सर्वप्रथम मतिज्ञान और श्रुतज्ञान का निर्देश किया 
है। इसका कारण यह है कि ये दोनो ज्ञान सम्यक्‌ या भिथ्या रूप में, स्यूनाधिक मात्रा मे समस्त 
ससारी जीवो को सरदंव प्राप्त रहते हैं। सबसे अधिक श्रविकसित निगोदिया जीवो में भी श्रक्षर का 


ज्ञान के पांच प्रकार ] [२७ 


झननन्‍्तवा भाग ज्ञान प्रकट रहता है। इसके अतिरिक्त इन दोनो ज्ञानो के होने पर ही शेष ज्ञान होते 
हैं । भ्रतएव इन दोनों का सर्वेप्रथम निर्देश किया गया है । 

दोनो में भी पहले मतिज्ञान के उल्लेख का कारण यह है कि श्रुतज्ञान, मतिज्ञानपूर्वक ही 
होता है । 

मतिज्ञान-श्रुतज्ञान के पश्चात्‌ ग्रवधिज्ञान का निर्देश करने का हेतु यह है कि इन दोनों के 
साथ ग्रवधिज्ञान को कई बातों में समानता है । यथा--जेसे मिथ्यात्व के उदय से मतिशान झौर श्रुत- 
ज्ञान मिथ्यारूप मे परिणत होते हैं, वैसे ही श्रवधिज्ञान भी मिथ्यारूप में परिणत हो जाता है । 

इसके भ्रतिरिक्त कभी-कभी, जब कोई विभगज्ञानी, सम्यग्दृष्टि होता है तब तीनो ज्ञान एक 
ही साथ उत्पन्न होते हैं, श्र्थात्‌ सम्यक्‌ रूप के परिणत होते हैं । 

जैसे मतिज्ञान और श्रुतज्ञान की लब्धि की श्रपेक्षा छयासठ सागरोपम से किचित्‌ भ्रधिक 
स्थिति है, श्रवधिज्ञान की भी इतनी हो स्थिति है। इन समानताझ्रों के कारण मति-श्र्‌ त के भ्रनन्तर 
झ्वधिज्ञान का निर्देश किया गया है । 

प्रवधिज्ञान के पश्चात्‌ मन पर्यवज्ञान का निर्देश इस कारण किया गया है कि दोनो मे 
प्रत्यक्षत्व की समानता है। जैसे अ्रवधिज्ञान पारमार्थिक प्रत्यक्ष है, विकल है तथा क्षयोपशमजन्य है, 
उसी प्रकार मन 'पर्यवज्ञान भी है । 


केवलज्ञान सबके अन्त मे प्राप्त होता है, अतएवं उसका निर्देश भ्रन्त मे किया गया है । 


प्रत्यक्ष के भेद 
३--से कि ल॑ पच्चक्ख ? पर्यक्ख वुविहूं पण्णत्तं, 
त॑ जहा--इंदियपच्चक्स थ जोइंदियपज्चरसं च॑ । 

३-- प्रश्न--प्रत्यक्ष ज्ञान क्या है ? 

उत्तर-प्रत्यक्षज्ञान के दो भेद है, यथा-- 

(१) इन्द्रिय-प्रत्यक्ष और (२) नोइन्द्रिय-प्रत्यक्ष । 

विवेखजन--इहन्द्रिय श्रात्मा की वेभाविक परिणति है। इन्द्रिय के भी दो भेद हैं--(१) द्वब्येन्द्रिय 
(२) भावेन्द्रिय । द्रव्येन्द्रिय के भी दो प्रकार होते है--(१) निवृ त्ति द्रव्येन्द्रिय भौर (२) उपकरण 
द्रव्येन्द्रिय । 

निव त्ति का भ्र्थ है--रचना, जो बाह्य और ग्राभ्यतर के भेद से दो प्रकार की है। बाह्य 
निव त्ति इन्द्रियो के भ्राकार में पुदगलो की रचना है तथा आभ्यतर निवृ त्ति से इन्द्रियों के भाकार मे 
ग्रात्मप्रदेशो का सस्थान । उपकरण का भ्र्थ है-सहायक या साधन । बाह्य श्रौर भ्राभ्यतर निव त्ति की 
शक्षि-विशेष को उपकरणेन्द्रिय कहते है। साराश यह है कि इन्द्रिय की श्राकृति निवंत्ति है तथा 
उनको विशिष्ट पौदूगलिक शक्ति को उपकरण कहते हैं। सर्व जीबों की द्रब्येन्द्रियों की बाह्य 
ग्राकृतियों मे भिन्नता पाई जाती है किन्तु ग्राभ्यन्तर निव्‌ त्ति-इन्द्रिय सभो जोवो की समान होती है । 
प्रज्ञापनासूत्र के पन्द्रहवें पद मे कहा गया है-- 


रष] [ गर्दोसूतष 


श्रोत्रेन्द्रिय का सस्थान कदम्ब पुष्प के समान, चक्षुरिन्द्रिय का सस्थान मसूर झौर चन्द्र के 
समान गोल, प्लाणेन्द्रिय का श्राकार अतिमुक्तक के समान, रसनेन्द्रिय का सस्थान क्षुरप्र (खुरपा) के 
समान और स्परश्शनेन्द्रिय का सस्थान नाना प्रकार का होता है। शअ्रत श्राभ्यन्तर निव त्ति सबकी 
समान ही होती है। प्राभ्यन्तर निव त्ति से उपकरणेन्द्रिय की शक्ति विधिष्ट होती है। 


भावेन्द्रिय के दो प्रकार हैं लब्धि और उपयोग । मतिज्ञानावरणीय कम के क्षयोपशम से 
होते वाले एक प्रकार के झ्रात्मिक परिणाम को लब्धि कहते हैं। तथा शब्द, रूप आदि विषयो का 
सामान्य एवं विशेष प्रकार से जो बोध होता है, उस बोध-रूप व्यापार को उपयोग-इन्द्रिय कहते हैं । 
स्मरणीय है कि इन्द्रियप्रत्यक्ष मे द्रव्य और भाव दोनो प्रकार की इन्द्रियो का ग्रहण होता है और एक 
का भी प्रभाव होने पर इन्द्रिय-प्रत्यक्ष की उत्पत्ति नही हो सकती । 


नो-इंदियपच्चक्ख--इस पद मे 'नो' शब्द सर्व निषेधवाची है | नोइन्द्रिय मन का नाम भी है। 
श्रत. जो प्रत्यक्ष इन्द्रिय मन तथा आलोक श्रादि बाह्य साधनो की श्पेक्षा नही रखता, जिसका सीधा 
सम्बन्ध आ्रात्मा से हो, उसे नोइन्द्रिय-प्रत्यक्ष कहते हैं । 

'से” यह निपात शब्द मगधदेशीय है, जिसका अर्थ श्रथ' होता है । 

इन्द्रियप्रत्यक्ष ज्ञान का कथन लौकिक व्यवहार की श्रपेक्षा से किया गया है, परमार्थ की 
अपेक्षा से नही । क्योकि लोक मे यही कहने को प्रथा है--“मैने आँखों से प्रत्यक्ष देखा है ।” इसी को 
साव्यवहा रिक प्रत्यक्ष कहते हैं, जैसे कि-- 


“यदिन्द्रियाश्नितमप रव्यवधान रहित ज्ञानमुदयते तललोके प्रत्यक्षमिति व्यवहृतम्‌, अपर- 
धूमादिलिड् निरपेक्षतया साक्षा दिन्द्रियमधिक्ृत्य प्रवर्तंनात्‌ ।” इससे भी उक्त कथन की पृष्टि होती है। 


यहाँ एक बात विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है । वह यह कि प्रश्न किया गया है कि 
प्रत्यक्ष किसे कहते हैं ? किन्तु उत्तर मे उसके भेद बतलाए गए है। इसका क्‍या कारण है? उत्तर 
यह है कि यहाँ प्रत्यक्षज्ञान का स्वरूप बतलाना ग्रभीष्ट है। किसी भी वस्तु का स्वरूप बतलाने की 
अनेक पद्धतिया होती हैं । कही लक्षण द्वारा, कही उसके स्वामी द्वारा, कही क्षेत्रादि द्वारा, श्रौर कही 
भेदो के द्वारा वस्तु का स्वरूप प्रदर्शित किया जाता है । यहा श्रौर आगे भी अनेक स्थलो पर भेदो 
द्वारा स्वरूप प्रदर्शित करमे की शेली अपनाई गई है । श्रागम मे यह स्वीकृत परिपादी है। जैसे लक्षण 
द्वारा वस्तु का स्वरूप समझा जा सकता है, उसी प्रकार भेदो द्वारा भी समझा जा सकता है । 


सांव्यावहारिक प्रत्यक्ष के प्रकार 
४--से कि त॑ं इंदिय पच्चक्द्ध ? इंदियपच्चक्खं पंचविहू पण्णत्ं, त जहा--(१) सोइंदिय- 
पच्चक्खं, (२) चष्खिदिय पच्चक्खं, (३) घाणिवियपच्चक्थं, (४) रसनेदियपच्चक्खं, (५) फासि- 
दियपच्चक्ख । से त्तं इंदियपच्चक्ख । 
४--प्रश्न--भगवन्‌ ! इन्द्रियप्रत्यक्ष ज्ञान किसे कहते है ? 
उत्तर--इन्द्रियप्रत्यक्ष पाँच प्रकार का है। यथा-- 
(१) श्रोत्रेनिद्रिय प्रत्यक्ष-जो कान से होता है। 


झान के पांच प्रकार] [२९ 


(२) चक्षुरिन्द्रिय प्रत्यक्ष--जों भ्राँख से होता है । 
(३) प्राणेन्द्रिय प्रत्यक्ष-जों नाक से होता है। 
(४) जिह्ठ रिद्रिय प्रत्यक्ष-जो जिह्ठा से होता है । 
(५) स्पशनेन्द्रिय प्रत्यक्ष--जो त्वचा से होता है । 
विवेखन--श्रोत्रेनिद्रिय का विषय शब्द है | शब्द दो प्रकार का होता है, 'ध्वन्यात्मक' श्रौर 
वर्णात्मक' । दोनो से ही ज्ञान उत्पन्न होता है । इसी प्रकार चक्षु का विषय रूप है। पध्राणेन्द्रिय का 
गन्ध, रसनेन्द्रिय का रस एव स्पशनेन्द्रिय का विषय स्पश है। 
यहाँ एक शका उत्पन्न हो सकती है कि स्पर्शन, रसना, प्राण, चक्ष्‌ और नेत्र, इस क्रम को 
छोडकर श्रोत्रेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय, ध्राणेन्द्रिय इत्यादि क्रम से इन्द्रियो का निर्देश क्यो किया गया है ? 
इस शका के उत्तर मे बताया गया है कि इसके दो कारण हैं। एक कारण तो पूर्वानृपूर्वी और 
पश्चादनुपूर्वी दिखलाने के लिए सूत्रकार ने उत्क्रम की पद्धति भ्पनाई है। दूसरा कारण यह है कि 
जिस जीव मे क्षयोपशम औझौर पुण्य ग्रधिक होता है वह पचेन्द्रिय बनता है, उससे न्यून हो तो 
चतुरिन्द्रिय बनता है । इसी क्रम से जब पुण्य और क्षयोपशम सर्वथा न्‍्यून होता है तब जीव एकेन्द्रिय 
होता है। प्रभिष्राय यह है कि जब क्षयोपशम श्ौर पुण्य को मुख्यता दी जाती है तब उत्करम से 
इन्द्रियो की गणना प्रारम्भ होती है श्ौर जब जाति की श्रपेक्षा से गणना की जाती है तब पहले 
स्पर्शन, रसन भादि क्रम को सूत्रकार अपनाते हैं । पाँचो इन्द्रियाँ और छठा मन, ये सभी श्रुतज्ञान में 
निमित्त हैं किन्तु श्रोत्रेन्द्रिय श्रुतज्ञान मे मुख्य कारण है। भ्रत” सर्वप्रथम श्रोत्रेन्द्रिय का नाम निर्देश 
किया गया है । 
पारमाथिक प्रत्यक्ष के तीन भेद 
५-से कि तं नोईदियपच्चखं ? 
नोइंवियपचचक्ख तिविह पण्णत्त, तं जहा-(१) ओहिणाणपच्चक्ख (२) मणपज्जवणाणपच्चक्खं 
(३) फेवलणाणपच्चक्ख । 
५--शिष्य के द्वारा प्रश्त किया गया--भगवन्‌ ! बिना इन्द्रिय एव मन आदि बाह्य निमित्त 
की सहायता के साक्षात्‌ ग्रात्मा से होने वाला नोइन्द्रिय प्रत्यक्ष क्या है ? 
उत्तर--नोइन्द्रियज्ञान तीन प्रकार का है--( १) अ्रवधिज्ञानप्रत्यक्ष (२) मन पर्यवज्ञानप्रत्यक्ष 
(३) केवलज्ञानप्रत्यक्ष । 
६--से कि तं झ्लोहिणाणपच्चक्खं ? ओहिणाणपच्चक्खं दुविहूं पण्णत्तं, तं जहा--भवपच्चतियं 
उस खओवससियं च । 
६--प्रश्न--भगवन्‌ ! अवधिज्ञान प्रत्यक्ष क्या है ? 
उत्तर--अवधिज्ञान के दो भेद है--(१) भवप्रत्यथिक (२) क्षायोपशमिक । 
७--दोण्हूं भवपच्चलतियं, तंजहा--देवाणं च णेरतियाणं च । 
७--प्रश्न--भवप्रत्ययिक अवधिज्ञान किन्हें होता है ? 


३० ] [नन्दीसूच 
उत्तर-भवप्रत्ययिक प्रवधिज्ञान देवो एव नारको को होता है । 
छ--दोण्डूं खाश्शोबसमियं, त जहा--सणस्साणं थ पंजेंदियतिरिक्शजोणियाणं ल। को हेऊ 
शाओससियं ? 
तयावरणिज्जाणं कम्मराणं उदिण्णाणं खएणं, अण॒दिण्णाण उकसमेण ओहिणाणं सभुप्पफ्जति । 


छ--अश्न--भगवन्‌ | क्षायोपशमिक अवधिज्ञान किनको होता है ? 


उत्तर--क्षायोपशमिक अवधिज्ञान दो को होता है- मनुष्यो को तथा पद्रेन्द्रिय तियंञ्चो को 
होता है। 
९ 


शिष्य ने पुन प्रशत किया--भगवन्‌ ! क्षायोपशमिक अवधिज्ञान की उत्पत्ति का हेतु क्या 
है ? गुरुदेव ने उत्तर दिया-जो कर्म ग्रवधिज्ञान मे रुकावट उत्पन्न करने वाले (भ्रवधिज्ञानावरणीय) 
हैं, उनमे से उदयगत का क्षय होने से तथा अ्नुदित कर्मों का उपशम होने से जो उत्पन्न होता है, वह 
क्षायोपशमिक ग्रवधिज्ञान कहलाता है । 


विवेखन--मन भ्रौर इन्द्रियो की सहायता के बिना उत्पन्न होने वाले नोइन्द्रिय प्रत्यक्षज्ञान के 
तीन भेद बताए गए हैं--अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान एव केवलज्ञान । 

प्रवधिज्ञान भवप्रत्ययिक एव क्षायोपद् मिक, इस प्रकार दो तरह का होता है। भवप्रत्यथिक 
प्रवधिज्ञान जन्म लेते ही प्रकट होता है, जिसके लिए सयम, तप अथवा अनुष्ठानादि की श्रावश्यकता 
नही होती । किन्तु क्षायोपश मिक अवधिज्ञान इन सभी की सहायता से उत्पन्न होता है। 

अ्रवधिज्ञान के स्वामी चारो गति के जीव होते है । भवप्रत्यक्ष ग्रवधिज्ञान देवों भौर नारको 
को तथा क्षायोपशमिक अ्रवधिज्ञान मनुष्यों एब तियंड्व्चों को होता है। उसे 'गुणप्रत्यय' भी कहते हैं । 

शका की जाती है-श्रवधिज्ञान क्षायोपशमिक भाव मे परिगणित है तो फिर नारकों और 
देवो को भव के कारण से क॑से कहा गया ? 


समाधान--वस्तुत अवधिज्ञान क्षायोपशमिक भाव में ही है। नारकों श्रौर देवो को भी 
क्षयोपशम से हो भ्रवधिज्ञान होता है, किन्तु उस क्षयोपशम मे नारकभव श्रौर देवभव प्रधान कारण 
होता है, भ्र्थात्‌ इन भवो के निमित्त से नारको और देवो को श्रवधिज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम 
हो ही जाता है। इस कारण उनका गअ्रवधिज्ञान, भवप्रत्यय कहलाता है। यथा-पक्षियो की उडान- 
शक्ति जन्म-सिद्ध है, किन्तु मनुष्य बिना वायुयान, जधाचरण अथवा विद्याचरण लब्धि के गगन मे 
पति नही कर सकता । 


अवधिजशञान के छह भेद 

६--अहया गुणपडिवण्णत्स अ्रणगारस्स ओहिणाणं समुप्पज्जति । त॑ समासझो छच्विहं 
पण्णस, त जहा--- 

(१) आणुगासियं (२) अणाणुगासियं (३) बड़्ढसाणयं (४) हायमाणयं (५) पड़िवाति 
(६) प्रपडिवाति । 


शान के पाँच प्रकार ] (११ 


९--शान, दर्शन एवं चारित्ररूप गुण-सम्पन्न मुनि को जो क्षायोपश्मिक भ्रवधिशान समुत्पन्न 
होता है, वह सक्षेप में छह प्रकार का है। यथा-- 

(१) भ्रानुगामिक--जो साथ चलता है | 
(२) अनानुगा मिक--जो साथ नहीं चलता । 

(३) वरद्धमान--जो वृद्धि पाता जाता है। 
(४) हीयमान--जो क्षीण होता जाता है । 
(५) प्रतिपातिक--जो एकदम लुप्त हो जाता है । 

(५) श्रप्न तिपातिक--जो लुप्त नही होता । 

विवेखन- मूलगुण और उत्तरगुणो से सम्पन्न अनगार को जो श्रवधिज्ञान उत्पन्न होता है 
उसके छह प्रकार सक्षिप्त मे कहे गए हैं-- 

(१) भ्रानुगामिक--जंसे वलते हुए पुरुष के साथ नेत्र, सूर्य के साथ आतप तथा चन्द्र के साथ 
चादनी बनी रहतो है, इसी प्रकार श्रानुगामिक भ्रवधिज्ञान भी जहा कही भ्रवधिज्ञानी जाता है, उसके 
साथ विद्यमान रहता है, साथ-साथ जाता है । 

(२) अनानुगामिक --जो साथ न चलता हो किन्तु जिस स्थान पर उत्पन्न हुआ हो उसी स्थान 
पर स्थित होकर पदार्थों को देख सकता हो, वह अनानुगामिक अ्रवधिज्ञान कहलाता है। जैसे दीपक 
जहाँ स्थित हो वही से वह प्रकाश प्रदान करता है पर किसी भी प्राणी के साथ नही चलता । यह ज्ञान 
क्षेत्ररूप बाह्य निमित्त से उत्पन्न होता है, अतएव ज्ञानी जब श्रन्यशत्र जाता है तब वह क्षेत्रूप निर्मित्त 
नही रहता, इस कारण वह लुप्त हो जाता है। 

(३) वद्धंमानक--जैसे-जैसे भ्रग्ति मे ईंघन डाला जाता है वंसे-वेसे वह भ्रधिकाधिक वृद्धिगत 
होती है तथा उसका प्रकाश भो बढता जाता है। इसी प्रकार ज्यो-ज्यो परिणामों में विशुद्धि बढती 
जाती है त्यो-त्यो अवधिज्ञान भी बृद्धिप्राप्त होता जाता है। इसीलिए इसे वद्धंमानक अवधिज्ञान 
कहते है । 

(४) हीयमानक --जिस प्रकार ईंधन की निरन्तर कमी से प्रगिनि प्रतिक्षण मन्द होती जाती है, 
उसी प्रकार सकक्‍्लिष्ट परिणामों के बढ़ते जाने पर श्रवधिज्ञान भी हीन, हीनतर एवं हीनतम होता चला 
जाता है । 

(५) प्रतिपातिक--जिस प्रकार तेल के न रहने पर दीपक प्रकाश देकर स्वेधा बुक जाता है, 
उसी प्रकार प्रतिपातिक भ्रवधिज्ञान भी दीपक के समान ही युगपत्‌ नष्ट हो जाता है । 


(६) अ्रप्रतिपातिक--जो अवधिज्ञान, केवलज्ञान उत्पन्न होने से पूर्व॑नहीं जाता है प्रर्थात्‌ 
पतनशील नही होता इसे भ्रप्रतिपातिक कहते है । 


आनुगासिफ अ्रवधिज्ञान 
१०--से कि त॑ भ्राणुयामिय श्रोहिणाणं ? 
आणुगासिय ओहिणाणं दुबिहूं पण्णसं, त॑ जहा--अंतगयं च सज्ञझगयं थ । 
से कि तं अंतगय ? अंतगयं लिविहं पण्णत्तं, त॑ जहा-- 
(१) पुरझो अंतगरय (२) म्गश्नो अंतगय (३) पासतो अंतगयं । 


३२] [मस्दीधूष 


से कि तं पुरतो अंतगयं ? पुरतो अंतग्य से जहानामए केइ पुरिले उक्क वा चड़लियं वा 
अलाय॑ वा मणि वा जोइं वा पईव॑ वा पुरओ काउं परिकड्ढठेमाणे परिकड्ठेसाणे गच्छेम्जा, से त्त॑ पुरझो 
अंतगय । 

से कि त॑ मग्गओ अंतगयं ? से जहानामए केइ पुरिसे उकक था चडुलियं वा आलायं वा सणि 
था पईव॑ था जोईं वा सग्गओं काउं भ्रणुकड्ढेसाणे अणुकडढेमाणे गच्छिज्जा, से त॑ भग्यशो अंतगय । 

से कि त॑ पासओ अंतगयं ? पासओ अन्तगयं--से जहानामए केइ पुरिसे उक्क वा चडुलियं वा 
लाय॑ वा मणि वा पईव॑ वा जोई वा पासओ काउं परिकड़ढेंसाणे परिकड़ढेमाणे गच्छिज्जा, से त 
वासपो अंतगयं । से त्तं अन्तगय । 

से कि तं मज्ञ्गयं ? से जहानामए केइ पुरिसे उकक वा चडुलिय वा झलायं वा सणि वा 
पईय॑ वा जोई वा मत्थए काउं गरछेज्जा । से त्त मज्झगयं । 


१०- शिष्य ने प्रश्न किया- भगवन्‌ | वह श्रानुगामिक ग्रवधिज्ञान कितने प्रकार का है ? 

गुरु ने उत्तर दिया- भ्रानुगामिक श्रवधिज्ञान दो प्रकार का है। यथा-(१) शअ्रन्तगत 
(२) मध्यगत । 

प्रश्न --अ्रन्तगत श्रवशध्चिज्ञान कौनसा है ? 

उत्तर-अन्तगत अवधिज्ञान तीन प्रकार का है--(१) पुरत.प्रन्तगत--श्रागे से श्रन्तगत 
(२) मा्गत अ्रन्तगत-पीछे से ग्रन्तगत (३) पाश्व॑त भ्रन्तगत--पाएव से झ्न्तगत्त । 

प्रश्न-आगे से अन्तगत भ्वधिज्ञान कसा है । 

उत्तर-जैसे कोई व्यक्ति दीपिका, घासफूस की पूलिका अथवा जलते हुए काष्ठ, मणि, प्रदीप 
या किसी पात्र में प्रज्वलित क्‍्नग्नि रखकर हाथ अ्रथवा दण्ड से उसे श्रागे करके क्रमश श्रागे चलता है 
और उक्त पदार्थों द्वारा हुए प्रकाश से मार्ग मे स्थित वस्तुओ्नो को देखता जाता है। इसी प्रकार पुरत - 
ग्रन्तगत अवधिज्ञान भी श्रागे के प्रदेश में प्रकाश करता हुआ साथ-साथ चलता है। 


प्रश्न--मार्गत श्रत्तगत अ्रवधिज्नान किस प्रकार का है ? 

उत्तर--जसे कोई व्यक्ति उल्का, तृणपूलिका, भ्रग्रभग से जलते हुए काष्ठ, मणि, प्रदीप एव 
ज्योति को हाथ या किसी दण्ड द्वारा पीछे करके उक्त वस्तुश्रो के प्रकाश से पीछे-स्थित पदार्थों को 
देखता हुआ चलता है, उसी प्रकार जो ज्ञान पीछे के प्रदेश को प्रकाशित करता है वह मागंत अ्रन्तगत 
अ्वधिज्ञान कहलाता है । 

प्रश्न--पाश्व से अन्तगत अवधिज्ञान किसे कहते हैं ” 


उत्तर-पाश्वतो ग्रन्तगत ग्रवधिज्ञान इस प्रकार जाना जा सकता है--जैसे कोई पुरुष दीपिका, 
चटुली, श्रग्रभाग से जलते हुए काठ को, मणि, प्रदीप या अग्नि को पाश्वंभाग से परिकर्षण करते 
(खीचते) हुए चलता है, इसी प्रकार यह झ्वधिज्ञान पार्श्यवर्त्ती पदार्थों का ज्ञान कराता हुआ आत्मा के 
साथ-साथ चलता है । उसे ही पाश्व॑तो अन्तगत अ्रवधिज्ञान कहते हैं। कोई-कोई झ्रवधिज्ञान क्षयोपशम 
को विचित्रता से एक पाश्व के पदार्थों को ही प्रकाशित करता है, कोई-कोई दोनो पाश्ब॑ के पदार्थों को । 


जुड़ की 
+ (६$%* ४ 6५ + ३ फप फर्म? ६ 7 53... ७४४ 
मन 7 ४७७४४ 


जान के पाँच प्रकार ] [३३ 


यह अ्न्तगत ब्रवधिज्ञान का कथन हुआ । तत्वश्चात्‌ शिष्य ने पुन प्रश्त किया-भगवन्‌ ! 
मध्यगत अवधिज्ञान कौन सा है ? 

गुरु ने उत्तर दिया-भद्र ! जैसे कोई पुरुष उल्का, तृणों की पूलिका, श्रग्नभग में प्रज्वलित 
काठ को, मणि को था प्रदीप को भ्रथवा शरांवादि में रखी हुई प्रग्ति को मस्तक पर रखकर चलता 
है। वह पुरुष उपयुक्त प्रकाश के द्वारा सर्व दिशाओं में स्थित पदार्थों को देखते हुए चलता है । इसी 
प्रकार चारो ओर के पदार्थों का ज्ञान कराते हुए जो ज्ञान ज्ञाता के साथ चलता है उसे मध्यगत 
अ्रवधिज्ञान कहा गया है । 


विवेचन-यहांँ सूत्रकार ने झानुगासिक भ्रवधिशञान और उसके भेदो का वर्णन किया है। 
श्रात्मा को जिस स्थान एवं भव मे प्रवधिज्ञान उत्पन्न हुआ हो यदि वह स्थानान्तर होने पर भी तथा 
दूसरे भव में भी आत्मा के साथ चला जाए तो उसे भ्रानुगामिक भ्रवधिज्ञान कहते हैं | इसके दो भेद 
हैं-अन्तगत भ्रौर मध्यगत । यहाँ 'ग्रन्त' शब्द पर्यत का वाची है। यथा-“बनान्ते” भ्रर्थात्‌ वन के 
किसी छोर में । इसी प्रकार ग्रन्तवर्त्ती भ्रात्म-प्रदेशो के किसी भाग मे विशिष्ट क्षयोपश्षम होने पर 
ज्ञान उत्पन्न होता है उसे श्रन्तगत ग्रवधिज्ञान कहते है। कहा है-- 'भ्रन्तगतम्‌ आ्रात्मप्रदेशाना पय॑न्ते 
स्थितमन्तगतम्‌ ।” जेसे गवाक्ष जाली भ्रादि के द्वार से बाहर भाती हुई प्रदीप की प्रभा प्रकाश करती 
है, वेसे अवधिज्ञान की समुज्ज्वल किरणे स्पद्ध करूप छिद्रों से बाह्य जगत को प्रकाशित करती है। 
एक जीव के सख्यात तथा असख्यात स्पद्ध क हीतें हैं ॥ उनका स्वरूप विचित्र प्रकार का होता है । 

गात्मप्रदेशो के आखिरी भाग मे जो भ्रवधिज्ञान उत्पन्न होता है उसके अनेक प्रकार है। 
कोई ग्रागे की दिशा को प्रकाशित करता है, कोई पीछे की, कोई दाईं और कोई वाई दिशा को । 
कोई इनसे विलक्षण मध्यगत ग्रवधिज्ञान होता है, जो सभी दिश्ाश्रो को प्रकाद्षित करता है । 


अन्तगत श्र सध्यगत में विशेषता 


११--अन्तगयस्स भज्झगयस्स य को पहविसेसो ? पुरओ अतगएणं ओहिनाणेण पुरक्षो चेष 
संखेज्जाणि था असखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणह पासहइ, सग्गओ अंतगएणं श्रोहिलाणेणं भग्यझो 
चेव सलेज्जाणि वा भसंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासह, पासझ्ो अंतगएणं श्रोहिणाणेणं पासओ 
चेब संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणह पासइ, भज्ञगएणं ओहिणाणेणं सब्बभो समंता 
स्वेज्जाणि वा श्रसंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ । से त्तं आणुगामियं श्रोहिणाणं । 


११-शिष्य द्वारा प्रश्न--प्रन्तगत श्रौर मध्यगत भ्रवधिज्ञान मे क्‍या श्रन्तर है ? 


उत्तर -पुरत भ्रवधिज्ञान से ज्ञाता सामने सख्यात भथवा श्रसंख्यात योजनो में स्थित रूपी 
द्रव्यो को जानता है और सामान्‍य ग्राहक आत्मा से देखता है । 


मार्ग से-पीछे से प्रन्तगत भ्रवधिशान द्वारा पीछे से सख्यात प्रथवा ग्रसख्यात योजनो मे 
स्थित द्र॒व्यों को विशेष रूप से जानता है, तथा सामान्य रूप से देखता है । 

पाए्वेत' प्रस्तगत अवधिज्ञान से पाश्वय ( बगल ) में स्थित द्रव्यों को संब्यात श्रथवा भ्रसख्यात 
योजनों तक विशेष रूप में जानता व सामान्य रूप से देखता है। इस प्रकार प्रानुगामिक श्रवधिज्ञान 
का वर्णन किया गया है । 


श्ढ ] [ नष्वीसूच 


विवेचन--सूत्रकार ते अन्तगत ओर मध्यगत अ्रवधिज्ञान मे रहे हुए भ्रन्तर को विस्तृत रूप 
से बताया है। प्रवधिज्ञान का विषय रूपी पदार्थ है। वह ऊँचे-नीचे तथा तिछें--सभी दिल्लाप्रों में 
विशेष व सामान्य रूप से देख व जान सकता है । 

मध्यगत अ्रवधिज्ञान देवो, नारको एव तीर्थकरो को निश्चित रूप से होता है, तिरय॑यों को 
केवल अन्तगत हो सकता है किन्तु मनुष्यो को भ्रन्तगत तथा मध्यगत दोनो हो प्रकार का भानुगासिक 
प्रवधिज्ञान हो सकता है। प्रज्ञापनासूत्र के तेतीसवे पद में बताया गया है-नारकी, भवनपति, 
वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देवों को सर्वत श्रवधिज्ञान होता है, पब्रेन्द्रिय तियब्चो को 
देशत' एवं मनुष्यो को देशत. एवं स्वंत दोनो प्रकार का अवधिज्ञान हो सकता है । 

सूत्र मे सख्यात व ग्रसख्यात योजनो का प्रमाण भी बताया गया है| इससे यह स्पष्ट होता 
है कि झ्रवधिज्ञान के भ्रमख्य भेद है । 

रत्नप्रभा के नारकों को जघन्य साढें तीन कोस उत्कृष्ट चार कोस, शककरप्रभा मे नारको 
को जघन्य तीन और उत्कृष्ट साढे तीन कोस, बालुकाप्रभा मे नारको को जघन्य अ्रढाई कोस, उत्कृष्ट 
तीन कोस, पक प्रभा में नारको को जघन्य दो कोस और उत्कृष्ट अढ़ाई कोस, धूमप्रभा मे नारकों को 
जघन्य डेढ कोस और उत्कृष्ट दो कोस, तम प्रभा मे जधघन्य एक कोस एव उत्कृष्ट डेढ कोस तथा सातवी 
तमस्तमा पृथ्वी के नारकियों को जघन्य झ्राघा कोस एव उत्कृष्ट एक कोस प्रमाण अवधिज्ञान होता है । 


प्रसुरकुमारों को जघन्य २५ योजन तथा उत्कृष्ट असख्यात द्वीप-समुद्रो को जानने वाला, 
नागकुमारो से लेकर स्तनितकुमारो तक और वाणव्यन्तर देवो को जघन्य २५ योजन तथा उत्कृष्ट 
सख्यात द्वीप-समुद्रों को विषय करने वाला अ्रवधिज्ञान होता है। ज्योतिष्क देवों को जघन्य तथा 
उत्कृष्ट सख्यात योजन तक जानने वाला अ्रवधिज्ञान होता है। सौधमेकल्प के देवों का अ्रवधिज्नान 
जघन्य अगुल के असख्यातवे भाग क्षेत्र को, उत्कृष्ट रत्नप्रभा के नीचे के चरमान्त को विषय करने 
वाला अ्रवधिज्ञान होता है । वे तिरछे लोक मे ग्रसख्यात द्वीप-समुद्रो को श्रौर ऊँचो दिशा मे श्रपने कल्प 
के विमानों को ध्वजा तक जानते-देखते है । 


अनानुगामिक अवधिज्ञान 


१२-से कि त॑ अणाणुगासिय ओहिणाणं ! अणाणुगासियं झ्ोहिणाण से जहाणासए केइ 
पुरिसे एग महंत जोइट्टाणं काउं तस्सेव जोइट्टाणस्स परिपेरतेहि परिपरतेहि परिधोलेमाणे 
परिघोलेमाणे तमेव जोहद्ाणं पास, श्रण्णत्थगए ण पासइ, एबामेव अणाणुगामिय ओहिणाणं जत्थेव 
समुप्पज्जइ तत्येव संखेज्जाणि वा असंखेज्ञाणि वा, संब्णि वा असंबद्धाणि वा जोयणाई जाणइ 
पासइ, अण्णत्थगए ण पासइ । से त्त अणाणुगासियं ओहिणाणं । 

१२-- प्रश्न--भगवन्‌ | अनानुगामिक श्रवधिज्ञान किस प्रकार का है ? 

उत्तर---अनानुगामिक भ्रवधिज्ञान वह है--जैसे कोई भी नाम वाला व्यक्ति एक बहुत बड़ा 
श्रग्नि का स्थान बनाकर उसमे भ्रग्नि को प्रज्वलित करके उस अग्नि के चारो श्लोर सभी दिल्ला- 
विदिज्ञाश्रो मे घुमता है तथा उस ज्योति से प्रकाशित क्षेत्र को ही देखता है, प्रन्यत्र न जानता है झोर 
न देखता है। इसी प्रकार अ्नानुगामिक भ्रवधिज्ञान जिस क्षेत्र में उत्पन्न होता है, उसी क्षेत्र मे स्थित 
होकर सख्यात एवं श्रसख्यात योजन तक, स्वावगाढ क्षेत्र से सम्बधित तथा श्रसम्बधित द्वव्यों को 
जानता व देखता है । भ्रन्यत्र जाने पर नही देखता । इसी को श्रनानुगामिक अवधिज्ञान कहते हैं । 


जोन के पांच प्रकार ] [१४ 


विवेचन -श्रनानुगा मिक अ्रवधिज्ञान बह होता है जिसके द्वारा ज्ञानप्राप्त आत्मा जिस भव 
मे या जिस स्थान पर उतपन्न हुआ हो, उसी क्षेत्र मे या उसी भव मे रहते हुए सख्यात या भसब्यात 
योजनो तक रूपी पदार्थों को जान व देख सकता है किन्तु अन्यत्र चले जाने पर जान भ्रोर देख नही 
सकता । उदाहरणार्थ जिस प्रकार कोई व्यक्ति किसी बडे ज्योति-स्थान के समीप बेठकर या उसके 
चारों ध्रोर घुमकर ज्योति के द्वारा प्रकाक्षित पदार्थों को देख सकता है किन्तु उस स्थान से उठकर 
झ्न्‍न्यत्र चले जाने पर वहाँ ज्योति न होने से किसी पदार्थ को देख या जान नही पाता । 

सूत्र मे 'सबद्ध' एव 'अ्सबद्ध' शब्द प्राए है। उनका प्रयोजन यह है कि स्वावगाढ क्षेत्र से लेकर 
निरन्तर--लगातार पदार्थ जाने जाते हैं वे सम्बद्द कहलाते है तथा जिन पदार्थों के बीच मे भ्रन्तराल 
होता है वे भ्रसम्बद्ध कहलाते हैं । तात्पयं यह है कि भ्रवधिज्ञानावरण के क्षयोपशम में बहुत विचित्रता 
होती है, भतएव कोई भनानुगामिक अझवधिज्ञान जहाँ तक जानता है वहाँ तक निरन्तर-लगातार 
जानता है श्रोर कोई-कोई बीच मे अन्तर करके जानता है । जैसे--कुछ दूर तक जानता है, भ्रागे कुछ 
दूर तक नही जानता श्रौर फिर उससे श्रागे के पदार्थों को जानता है--इस प्रकार बीच-बीच में 
व्यवधान करके जानता है । 


वद्ध मान अवधिज्ञान 
१३- से कि त॑ बडुमाणयं ओहिणाण ? 


बडुमाणयं ओहिनाणं पसत्येसु भ्रज्मवताणट्वाणेसु बट्टमाणस्स बट्टमाणचरित्तस्स बिसुज्ञमाणस्स 
विसुज्माणचरित्तस्स सब्बओ समता प्रोही वबहुइ । 


१३-प्रश्न-गुरुदेव ! वद्धंमान अवधिज्ञान किस प्रकार का है ? 

उत्तर--अ्रध्यवसायस्थानो या विचारो के विशुद्ध एव प्रशस्त होने पर श्रौर चारित्र की वृद्धि 
होने पर तथा विशुद्धमान चारित्र के द्वारा मल-कलझ्ू से रहित होने पर प्रात्मा का ज्ञान दिशाझो एवं 
विदिशाओं मे बारो भ्रोर बढता है उसे वद्धंमान भ्रवधिज्ञान कहते है । 


विवेखन--जिस अवधिज्ञानी के प्रात्म-परिणाम विशुद्ध से विशुद्धतर होते जाते है, उसका 
अवधिनान भी उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होता जाता है। वद्धेमानक श्रवधिज्ञान भ्रविरत सम्यग्दृष्टि, 
देशविरत झ्लौर सर्वेविरत को भी होता है। सूत्रकार ने 'विद्युज्कमाणस्स' पद से चतुर्थ गुणस्थानवर्ती 
को तथा (विक्षुज्ममाणचरित्तस्स' पद से देशविरत प्लौर सवंविरत को इस ज्ञान का वृद्धिगत होना 
सूचित किया है । 


अवधिज्नान फा जचधन्य क्षेत्र 


१४--जावतिया तिसमयाहारगस्स सुहुमत्स पणगजोवस्स । 
ओगाहुणः जहन्ना, भ्रोहीसेत्त जहन्तं तु। 
१४--तीन समय के आहारक सृुक्ष्म-निगोद के जीव की जितनी जघन्य श्रर्थात्‌ कम से कम 
प्रवगाहना होतो है--(दूसरे शब्दो मे शरीर की लम्बाई जितनी कम से कम होती है) उतने परिमाण 
में जधन्य भ्रवधिज्ञान का क्षेत्र है । 


३६] [शल्बीसूच 


विवेचन --आागम में 'पणग' प्र्थात्‌ पनक शब्द नौलन-फूलन (निगोद) के लिए आया है। 
सृत्रकार ने बताया है कि सूक्ष्म पसक्त जीव का शरीर तीन समय ग्राहार लेने पर जितना क्षेत्र श्रवगाढ़ 
करता है उतना जघन्य प्रवधिज्ञान का क्षेत्र होता है । 

निगोद के दो प्रकार होते हैं--(१) सूक्म, (२) बादर। प्रस्तुत सूत्र में 'सक्ष्म निगोद' को 
ग्रहण किया गया है--'सुहुमस्स पणगजोवस्स' । सूक्ष्म निगोद उसे कहते हैं जहा एक शरीर में प्रनन्‍्त 
जीव होते है। ये जीव चमं-चक्षुओ से दिखाई नहो देते, किसी के भी मारने से मर नही सकतें तथा 
सूक्ष्म निगोद के एक शरीर मे रहते हुए वे प्रनन्त जीव भ्रन्तमु हुत॑ से श्रधिक श्रायु नही पाते । कुछ तो 
श्रपर्याप्त भ्रवस्था में ही मर जाते हैं तथा कुछ पर्याप्त होते पर । 


एक झावलिका अ्सख्यात समय की होती है तथा दो सौ छप्पन श्रावलिकाश्रो का एक 'खड्डाग 
भव' (क्षुल्लक-क्षद्र भव) होता है। यदि निगोद के जीव श्र॒पर्याप्त अवस्था मे निरन्तर काल करते रहे 
तो एक मुहं मे वे ६५५३६ बार जन्म-मरण करते हैं । इस ग्रवस्था मे उन्हे वहा भ्रसख्यातकाल बीत 
जाता है । 

कल्पना करने से जाना जा सकता है कि निगोद के अ्रनन्‍्त जीव पहले समय में ही सूक्ष्म शरीर 
के योग्य पुद्गलो का सर्वबन्ध करे, दूसरे समय में देशबन्ध करे, तीसरे समय मे शरीरपरिमाण क्षेत्र 
रोके, ठीक उतने ही क्षेत्र मे स्थित पुदूगल जघन्य भ्रवधिज्ञान का विषय हो सकते हैं । पहले और दूसरे 
समय का बना हुआ शरीर भ्रतिसूक्ष्म होने के कारण अवधिज्ञान का जघन्य विषय नही बतलाया गया 
है तथा चौथे समय मे वह छारीर भ्रपेक्षाकृत स्थूल हो जाता है, इसीलिए सूत्रकार ने तीसरे समय के 
झ्राहरक निगोदीय शरीर का ही उल्लेख किया है। 

आत्मा असख्यात प्रदेशी है। उन प्रदेशों का सकोच एवं विस्तार कार्मणयोम से होता है । ये 
प्रदेश इतने सकुचित हो जाते हैं कि वे सूक्ष्म निगोदीय जीव के शरीर मे रह सकते है तथा जब विस्तार 
को प्राप्त होते हैं तो पूरे लोकाकाश को व्याप्त कर सकते है । 

जब श्रात्मा कार्मण शरीर छोडकर सिद्धत्व को प्राप्त कर लेती है तब उन प्रदेशों मे सकोच 
या विस्तार नही होता। क्योकि कार्मण शरीर के भ्रभाव मे कार्मण-योग नही हो सकता है । श्रात्मप्रदेशो 
मे सकोच तथा विस्तार सशरीरी जीवो मे ही होता है। सबसे श्रधिक सूक्ष्म शरीर 'पनक' जीवो का 
होता है । 


अवधिज्नान का उस्कृष्ट क्षेत्र 


१५--सव्ववहु श्रगणिजीया णिरंतरं जत्तियं भरेज्जंसु । 
लेत॑ सव्यदिसाग॑ परमोहीलेस निहिंद्ठ ॥ 
१५-समस्त सूक्ष्म, बादर, पर्याप्त और भ्रपर्याप्त अ्ग्निकाय के सर्वाधिक जीव सब्वेदिशाओं 
में निरन्तर जितना क्षेत्र परिपूर्ण करे, उतना ही क्षेत्र परमावधिश्ञान का मि्दिष्ट किया गया है। 
विवेचन--उक्त गाथा मे सूत्रकार से प्रवधिज्ञान के उत्कृष्ट विषय का प्रतिपादन किया है। 
पांच स्थवरो मे सबसे कम तेजस्काय के जीव हैं, क्योंकि अग्नि के जीव सीमित क्षेत्र मे ही पाये जाते 
है । सूक्ष्म सम्पूर्ण लोक में तथा बादर भ्रढाई द्वीप मे होते है । 


जान के पांच प्रकार] [३७ 


तेजस्काय के जीव चार प्रकार के होते हैं। (१) पर्याप्त तथा प्रपर्याप्त सूक्ष्म तथा (२) पर्याप्त 
एव अपर्याप्त बादर । इन चारो मे से प्रत्येक मे असख्यातासख्यात जीव होते हैं। इन जीवो की 
उत्कृष्ट सख्या तीर्थद्धुर भगवान्‌ अजितनाथ के समय मे हुई थी । यदि उन जीवो मे से प्रत्येक जीव 
को उसकी अभ्रवगाहना के प्रनुसार आकाशप्रदेशो पर लगातार रखा जाए प्रोर उनकी श्रेणी बनाई 
जाए तो वह श्रेणी इतनी लम्बी होगी कि लोकाकाह्ष से भी झ्ागे श्रलोकाकाश मे पहुँच जाएगी । उस 
श्रेणी को सब पशोर धुमाया जाय तो उसकी परिधि मे लोकाकाश्य जितने प्रलोकाकाए के प्रसख्यात 
खण्डो का समावेश हो जायगा । इस प्रकार उन जीवो के द्वारा जितना क्षेत्र भरे उतना क्षेत्र परम- 
ग्रवधिज्ञान का विषय है | 

यहायपि समस्त अग्निकाय के जीवो की श्रेणी-सूची कभी किसी ने बनाई नहीं है श्रौर न उसका 
बनना सम्भव ही है। आलोकाकाश में कोई मूत्त पदार्थ भी नही है जिसे भ्रवधिज्ञानी जाने । किन्तु 
परमावधिज्ञान का सामथ्य प्रदर्शित करने के लिए यह मात्र कल्पना की गई है । 


ग्रवधिज्ञान का मध्यम क्षेत्र 


१६--अंगुलमावलियाणं भागमसलेज्ज दोसु संखेज्जा । 
अगुलमावलियंतोी आवलिया अंगुलपुहुतत ।। 


१६ -प्षेत्र और काल के ग्राश्नित-अ्रवधिज्ञानी यदि क्षेत्र से जगरुल (उत्सेध या प्रामाणागुल) 
के भ्रसख्यातवे भाग को जानता है तो काल से भी प्रावलिका के अ्रसख्यातवे भाग को जानता है । 
इसी प्रकार यदि क्षेत्र से अगुल के सख्यातवे भाग को जानता है तो काल से भी श्रावलिका का 
सख्यातवाँ भाग जान सकता है। यदि अगुलप्रमाण क्षेत्र देखे तो काल से आावलिका से कुछ कम देखे 
झौर यदि सम्पूर्ण आवलिका प्रमाण काल देखे तो क्षेत्र से अगुलपृथक्त्व प्रमाण श्रर्थात्‌ २ से ९ अगुल 
पर्य॑न्त देखे । ' 


१७- हत्यस्बि सुहुत्तंतो दिवसंतो ग/|ठयस्सि बोद्धज्यो । 
जोयण विवसपुहुत्त पकखतो पण्णवोसाओ || 


१७--यदि क्षेत्र से एकहस्तपयंत देखे तो काल से एक मुह से कुछ न्यून देखे और काल से 
दिन से कुछ कम देखे तो क्षेत्र से एक गव्यूति श्र्थात्‌ कोस परिमाण देखता है, ऐसा जानना चाहिए । 
यदि क्षेत्र से योजन परिमाण भ्रर्थात्‌ चार कोस परिमित देखता है तो काल से दिवस पृथकक्‍्त्व--दो से 
नौ दिन तक देखता है। यदि काल से किड्चत्‌ न्यून पक्ष देखे तो क्षेत्र से पच्चीस योजन पर्यन्त देखता 
है भ्र्थात्‌ जानता है । 


१८-भरहम्मि अद्धमासो जंबृह्ीबम्मि साहिझो मासी । 
बासं ज मणयलोए वासपुहु्त अल रा्गस्सि ।। 
१्८यदि क्षेत्र से सम्पूर्ण भरतक्षेत्र को देखे तो काल से भ्रधंमास परिमित भूत, भविष्यत्‌ एव 


वर्तमान, तीनों कालों को जाने । यदि क्षेत्र से जम्बूद्वीप पर्यन्त देखता है तो काल से एक मास से भी 
प्रध्िक देखता है । यदि क्षेत्र से मनुष्यलोक परिभाण क्षेत्र देखे तो काल से एक बचे पर्यन्त भूत, भविष्य 


$८ | | न्दोतूत 


एवं वतंमान काल देखता है। यदि क्षेत्र से रुचक क्षेत्र पर्यन्‍्त देखता है तो काल से पृथषत्व (दो से 
लेकर नौ वर्ष तक) भूत श्रौर भविष्यत्‌ काल को जानता है । 


१९--संखेज्जस्मि उ काले दीव-समुद्दा वि होति सलेज्जा । 
कालस्सि भ्रसंजेज्जे दोब-समुद्दया उ भइयव्या।। 


१९--अवधिज्ञानी यदि काल से सख्यात काल को जाने तो क्षेत्र से भी सख्यात द्वीप-समुद्र 
पर्यन्त जानता है श्लौर अ्रसख्यात काल जानने पर क्षेत्र से द्वीपो एवं समुद्रो की भजना जाननी चाहिए 
अर्थात्‌ संख्यात भ्रथवा भश्रसख्यात द्वीप-समुद्र जानता है । 


२०-- काले चउण्ह ब॒ुड़ी कालो भदयव्यु खेत्तवुड्डीए । 
बुड्डोए दव्य-पज्जव भद्दयव्या खेत्त-काला उ ॥॥ 


२०--काल की वृद्धि होने पर द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव चारो की श्रवश्य वृद्धि होती है । 
क्षेत्र की बुद्धि होने पर काल की भजना है। प्रर्थात्‌ काल की वृद्धि हो सकती है श्रौर नही भी हो 
सकती । द्रव्य और पर्याय की वृद्धि होने पर क्षेत्र श्रौर काल भजनीय होते है श्रर्थात्‌ बृद्धि पाते भी हैं 
और नही भी पाते है । 


२१--सुहभो य होइ कालो तत्तो सुहुमयरयं हयइ खेत्तं । 
अंगुलसेढीमेतसे. ओसप्पिणिओ.. श्रसखेज्जा ।। 
से त्तं बबुमाणयं ओहिणाणं । 


२१--काल सृक्ष्म होता है किन्तु क्षेत्र उससे भी सूक्ष्म श्र्थात्‌ सूक्ष्मतर होता है, क्योकि एक 
अगुलमान्र श्रेणी रूप क्षेत्र में प्राकाश के प्रदेश अ्रसंखयात श्रवसपिणियो के समय जितने होते है | यह 
बढ्धमानक प्रवधिज्ञान का वर्णन है । 

विवेचन--क्षेत्र श्लौर काल मे कौन किससे सूक्ष्म है ? सूत्रकार ने स्वय ही इसका उत्तर देते 
हुए कहा है--काल सूक्ष्म है किन्तु वह क्षेत्र की अपेक्षा से स्थूल है । क्षेत्र काल की श्रपेक्षा से सूक्ष्म है 
क्योकि प्रमाणागुल बाहल्य-विष्कम्भ श्रेणी मे भ्राकाश प्रदेश इतने है कि यदि उन प्रदेशों का प्रतिसमय 
श्रपहरण किया जाय तो निलंप होने मे श्रसख्यात भ्रवसपिणी तथा उत्सपिणी काल व्यतीत हो जाएँ । 
क्षेत्र के एक-एक आकाशप्रदेश पर श्रनन्तप्रदेशी स्कन्धर श्रवस्थित है । द्रव्य की श्रपेक्षा भाव सूक्ष्म है, 
क्योकि उन स्कन्‍्धो मे भ्रतन्त परमाणु रहे हुए है और प्रत्येक परमाणु मे वर्ण, गन्ध, रस झौर स्पर्श की 
अपेक्षा से श्रनन्त पर्याये वर्तमान हैं | काल, क्षेत्र, द्रव्य श्रौर भाव ये क्रमश. सुक्ष्मतर है । 


झ्रवधिज्ञानी रूपी द्रव्यो को ही जान सकता है, प्ररूपी को विषय नहीं करता । भ्रतएव 
मूलपाठ मे जहाँ क्षेत्र और काल को जानना कहा गया है वहाँ उततने क्षेत्र श्रोर काल मे श्रवस्थित रूपी 
द्रव्य समभना चाहिए, क्योकि क्षेत्र और काल अरूपी हैं । 


परमावधिज्ञान केवलज्ञान होने से भ्नन्तमु ह॒त पहले उत्पन्न होता है। उसमे परमाणु को भी 
विषय करने की शक्ति है। इस प्रकार उत्कृष्ट श्रवधिज्ञान का विषय वर्णन किया गया है फिर भी 


शान के पांच प्रकार ] [ ३९ 


जिशासुझो को समझने में आसानी रहे, इसलिए एक तालिका भी काल क्रोर क्षेत्र कौ समभकने के 
लिए दी जा रही है-- 


क्षेत्र काल 
8 5 3 २ ८ 3  म-340- पक 
१ एक अगुल का असख्यातवा भाग देखे एक आवलिका का असख्यातवाँ भाग देखे । 
२ अगुल का सख्यातवा भाग देखे आवलिका का संख्यातवां भाग देखे । 
३ एक अंगुल झ्रावलिका से कुछ न्यून । 
४ पृथवर्व अगुल एक प्रावलिका । 
५ एक हस्त एक मुहूर्त से कुछ न्यून । 
६ एक कोस एक दिवस से कुछ न्यून । 
७ एक योजन पृथक्त्व दिवस । 
८ पच्चीस योजन एक पक्ष से कुछ न्यून । 
९ भरतक्षेत्र श्रद्ध मास । 
१० जम्बूद्वीप एक मास से कुछ अधिक । 
११ श्रढाई द्वीप एक वर्ष । 
१२ रुचक द्वीप पृथक्त्व वर्ष । 
१३ सख्यात द्वीप सख्यात काल । 


लए 2 ४ सख्यात व असख्यात द्वीप एवं समुद्रो की पलल्‍्योपमादि अ्रसख्यात काल । 
भजना । 


हीयमान अवधिज्ञान 


२२-से कि त हीयमाणय ओहिणाणं ? 

हीणमाणयं ओहिंणाण अश्रप्पसत्थेहि अज्ञवसायट्टाणेहि बट्ुमाणस्स, बट्टमाणचरित्तस्स, 
संकिलिस्समाणस्स, सकिलिस्समाणचरित्तस्स सब्बओ समता ओहो परिहोयते । से सत्॑ होयमाणय 
झोहिमसाणं । 


२२-शिष्य ने प्रश्न किया - भगवन्‌ | हीयमान ग्रवधिज्ञान किस प्रकार का है ? 

आचाये ने उत्तर दिया--अप्रशस्त-विचारो मे बतेने वाले ग्रविरति सम्यक्दृष्टि जीव तथा 
प्रप्रशस्त प्रध्यवसाय मे वत्तमान देशविरति और सर्वविरति-चा रित्र वाला श्रावक या साधु जब अ्रशुभ 
विचारो से सकक्‍लेश को प्राप्त होता है तथा उसके चारित्र मे सक्‍लेश होता है तब सब शोर से तथा सब 
प्रकार से भ्रवधिज्ञान का पूर्व भ्रवस्था से ह्ास होता है। इस प्रकार हानि को प्राप्त होते हुए 
झ्रवधिज्ञान को हीयमान अवधिज्ञान कहते हैं । 

विवेघन--जब साधक के चारित्रमोहनीय कर्मों का उदय होता है तब झात्मा मे भ्रशुभ विचार 
प्राते हैं। जब सवेविरत, देशविरत या अ्विरत-सम्यगद्ष्टि सक्लिष्टपरिणामी हो जाते है तब उनको 


४७० ] [ मन्‍्दीसूत्र 


प्राप्त भवधिज्ञान ह्लास को प्राप्त होने लगता है। सारांश यह है कि अ्रप्रशस्त योग एवं सक्‍लेश, ये 
दोनो ही ज्ञान के विरोधी भ्रथवा बाघक हैं । 
प्रतिपाति भ्रवधिज्ञान 

२३-से कि त॑ पडिवाति ओोहिणाणं ? 

पड़िवाति ग्रोहिणाणं जण्णं जह्॒णेणं अंगुलस्स प्रसंसेज्जतिभाग वा संखे्जतिभाग वा, बालरगं 
वा वालग्गपुहुत्त वा, लिक्खं वा लिक्खपुहुत्त वा, जूयं वा जूयपुहुत्तं था, जबं वा जबपुहतं वा, अंगुल 
या अंगुलपुहृत्तं वा, पायं वा पायपुहुसं वा, वियत्यि वा वियत्यिपुहत्त वा, रण वा रयणिपुहुस वा, 
कुच्छि वा कुच्छिपुहुत्त वा, धणुयं वा धणुयपुहु्तं वा, गाउयं वा गाउयपुहुत्तं वा, जोयणं वा जोयणपुहुसं 
या, जोयणसयं वा जोयणसबपुहु्त था, जोयणसहस्सं था जोयणसहस्सपुहुत्त वा, जोयणसतसहस्सं 
वा जोयणसतसहस्सपुहुत्त वा, जोयणकोड़ि वा जोयणकोडिपुहृत्त वा, जोयणकोडाकोर्डि वा जोयण- 
कोडाको डियुहुत्त था उक्कोसेण लोग वा पासित्ता ण पडिवएज्जा । से तं पड़िवातिश्रोहिणाण । 

२३--प्रश्न--प्रतिपाति श्रवधिज्ञान का क्‍या स्वरूप है ? 

उत्तर-प्रतिपाति भ्रवधिज्ञान, जघन्य रूप से अगुल के असख्यातवे भाग को श्रथवा सख्यातवे 
भाग को, इसी प्रकार बालाग्र या बालाग्रपूथक्त्व, लीख या लीख पृथक्त्व, यूका--ज्‌ या यूकापृथक्त्व, 
यव--जौ या यवपृथक्त्व, अगुल या अंगुलपृथक्त्व, पाद या पादपृथक्त्व, अ्रथवा वितस्ति (बिलात) 
या वितस्पिथक्त्व, र॒त्नि-हाथ परिमाण या रत्निपृथक्त्व, कुक्षि--दो हस्तपरिमाण या कुक्षिपृथक्त्व, 
धनुष-चार हाथ परिमाण या धनुषपृथक्त्व, कोस--क्रोश या कोसपृथकत्व, योजन या योजनपृथक्त्व, 
योजनशत (सौ योजन) या योजनशत पृथक्त्व, योजन-सहक्न--एक हजार योजन या सहस्रपृथकत्व, 
लाख योजन भ्रथवा लाखयोजनपृथक्त्व, योजनकोटि--एक करोड योजन या योजन कोटि-पृथक्त्व, 
योजन कोटिकोटि या योजन कोटाकोटिपृथक्त्व, सख्यात योजन या सख्यातपृथक्त्व योजन, 
झ्सख्यात या ग्रसख्यातपृथक्त्व योजन श्रथवा उत्कृष्ट रूप से सम्पूर्ण लोक को देखकर जो ज्ञान नष्ट 
हो जाता है उसे प्रातिपाति ग्रवधिज्ञान कहा गया है | 

विवेशन--प्रातिपाति का भ्रर्थ है गिरते वाला अथवा पतित होने वाला । पतन तीन प्रकार से 
होता है। (१) सम्यकत्व से (२) चारित्र से (३) उत्पन्न हुए विश्विष्ट ज्ञान से । प्रातिपाति भ्वधिज्ञान 
जघन्य अगुल के श्रसख्यातवे भाग को और उत्कृष्ट सम्पूर्ण लोक तक को विषय करके पतन को प्राप्त 
हो जाता है। शेष मध्यम प्रतिपाति के भ्रनेक प्रकार हैं । 

जैसे तेल एवं वतिका के होते हुए भी वायु के भझोंके से दीपक एकदम बुभ जाता है इसी 
प्रकार प्रतिपाति भ्रवधिज्ञान का ह्ास धीरे-घीरे नही होता भ्रपितु वह किसी भी क्षण एकदम लुप्त हो 
जाता है। 


भ्रप्रतिपाति भ्रवधिज्ञान 
२४-से कि त॑ अपडिवाति प्रोहिणाणं ? 


प्रपडिवाति झ्ोहिणाण जेणं अलोगस्स एगसथलि आगासपदेसं पासेज्जा तेण परं झ्रपंडियाति 
ओहिणाणं । से सं श्रपडिवारलि ओहिणाणं । 


ज्ञान के पांच भ्रकार ] [४१ 


२४--प्रशन--अप्रतिपाति अवधिज्ञान किस प्रकार का है । 

उत्त र--जिस ज्ञान से ज्ञाता आलोक के एक भी ग्राकाश-प्रदेश को जानता है-देखता है, वह 
श्रप्रतिपाति अर्थात्‌ न गिरने वाला अवधिज्ञान कहलाता है। यह श्रप्नतिपाति भ्रवधिशान का स्वरूप है। 

विवेचन --जैसे कोई महापराक्रमी पुरुष अपने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके 
निष्कटक राज्य करता है, ठीक इसी प्रकार प्रप्रतिपाति अवधिज्ञानी केवलज्ञानरूप राज्य-श्री को 
अवश्य प्राप्त करके त्रिलोकीनाथ सर्वज बन जाता है। यह ज्ञान बारहवे ग्रुणस्थान के ग्रन्त तक 
स्थायी रहता है, क्योकि तेरहवे गुणस्थान के प्रथम समय मे केवलज्ञान उप्यन्न हो जाता है। 


इस प्रकार अवधिज्ञान के छह भेदो का वर्णन समाप्त हुआ । 


द्रव्यादि क्रम से अवधिज्ञान का निरूपण 


२५ त समासओ चउव्विह पण्णस, त जहा--दव्वशो खेसझो कालओ भावओ । 
तत्य दव्वओ ण ओहिणाणो जहण्णंण गप्रणताणि रूविवव्याइं जाणइ पासइ, उकक्‍्कोसेण सब्याहं 
रूविवव्वाइं जाणइ पासह । 


खेत्तोो ण ओहिणाणी जह॒ण्णेण अग्रुलस्स असखेज्जाइ अलोए लोयमेत्ताइ खंडाई 
जाणइ पासइ । 

कालओ ण॑ ओहिणाणी जहृण्णंण ग्रावलियाए असंखेज्जतिभाग जाणइ पासइ, उक्कोसेण॑ 
असश्ेज्जाओ उस्सपिणीग्रो अवसत्पिणीओ श्रतीत च्‌ श्रणागत श काल जाणइ पासइ। 


भावओ ण झोहिणाणो जह॒ण्णेण अर्णते भावे जाणइ पासइ, उक्‍कोसेण वि अणते भावे जाणइ 
पासइ, सथ्यभावाणसणंतभाग॑ जाणइ पासइ । 


२५- अवधिज्ञान सक्षिप्त में चार प्रकार से प्रतिषादित किया गया है। यथा-द्रव्य से, क्षैत्र से, 
काल से और भाव से । 


(१) द्रब्य से- -अ्वधिज्ञानी जघन्यत --कम से कम ग्रनन्त रूपी द्रव्यों को जानता और देखता 
है | उत्कृष्ट रूप से समस्त रूपी द्रव्यों को जानता-देखता है । 

(२) क्षेत्र से - अवधिज्ञानी जधन्यत अगुल के असख्यातवे भागमात्र को जानता-देखता 
है । उत्कृष्ट अलोक मे लोकपरिमित असख्यात खण्डो को जानता-देखता है । 

(३) काल से - अ्रवधिज्ञान जघन्य- एक आवलिका के असख्यातवे भाग काल को जानता- 
देखता है । उत्कृप्ट- ग्रतीत और अनागत--अ्रसख्यात उत्सपिणी और अवसपिणी परिमाण काल को 
जानता व देखता है । 

(४) भाव से- श्रवधिज्ञानी जधन्यत अनन्त भावों को जानता-देखता है और उत्कृष्ट भी 
अनन्त भावों को जानता-देखता है। किन्तु सर्व भावों के अनन्तवे भाग को ही जानता-देखता है । 

विवेयन- भाव से जधन्य और उत्कृष्ट रूप से अनन्त भावो-पर्यायो को जानना कहा गया 
है किन्तु उत्कृष्ट पद मे जघन्य की गपेक्षा अ्रनन्‍्तगुणी पर्यायों का जानना समझना चाहिए । प्रवधि- 


४२] [ नस्दोसूत्र 


ज्ञानी पुदूगल की प्रनन्त पर्यायो को जानता व देखता है, किन्तु सर्वंपर्यायों को नही । वह सब द्रव्यो 
को जानता व देखता है पर सर्वपर्याय उसका विषय नही है। 


अवधिज्ञानविषयक उपसंहार 


२६ -झोहीभवपच्चतिश्ो, ग्रणपच्चतिओ थ बष्णिओ एसो । 
तस्स य बहू वियप्पा, बब्बे खेत्ते य काले य।। 
से सं ओहिणाणं । 
२६-यह अवधिज्ञान भवश्रत्ययिक और गुणप्रत्ययिक दो प्रकार से कहा गया है। और 
उसके भी द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावरूप से बहुत-से विकल्प (भेद-प्रभेद) होते हैं । 


विवेखन--पूर्वोक्त गाथाप्रो से श्रवधिज्ञान के भेदो के विषय में तथा उनमे से भी प्रत्येक के 
विकल्‍ल्पो का निर्देश किया गया है । 
गाथा में श्राए हुए 'य' शब्द से भाव प्रर्थात्‌ पर्याय ग्रहण करना चाहिए । 


श्रबाह्य-बाह्य अवधिज्ञान 


२७--नेरइय-देव-तित्यकरा य ओहिस्स5बाहिरा हुंति । 
पासंति सब्यभो खलु सेसा बेसेण पासंति ॥॥ 
से त्तं ओहिणाणपच्चक्ख । 
२७--नारक, देव एवं तीर्थंकर अवधिज्ञान से युक्त (श्रबाह्य ) ही होते हैं श्रौर वे सब दिशा प्रो 
तथा विदिशाओ मे देखते हैं । शेष श्र्थात्‌ इनके सिवाय मनुष्य एवं तियँच ही देश से देखते है।इस 
प्रकार प्रत्यक्ष भ्रवधिज्ञान का वर्णन सम्पूर्ण हुआ । 


विवेचन --गाथा मे बताया गया है कि नेरयिक, देव श्रौर तीर्थंकर, इनको निश्चय हो 
प्रवधिज्ञान होता है । दूसरी विशेषता इनमे यह है कि इन तीनो को जो अवधिज्ञान होता है, वह सर्वे 
दिशाओ्रो और विदिशाझ्रो विषयक होता है। शेष मनुष्य व तिर्यच्र ही देश से प्रत्यक्ष करते है। 
तात्पर्य यह है कि नारक देव श्लौर तीर्थंकर अवधिज्ञान से बाहर नही होते, इसके दो भ्रर्थ होते हैं । 
प्रथम यह कि इन्हे भ्रवश्य ही जन्मसिद्ध प्रवधिज्ञान होता है। दूसरा श्रर्थ यह कि ये अपने ग्रवधिज्ञान 
द्वारा प्रकाशित क्षेत्र के भीतर ही रहते है, क्योकि इनका प्रवधिज्ञान सभी दिशा-विदिश्ञाश्रो को 
प्रकाशित करता है। शेष मनुष्यो श्रौर तिर्यचों के लिए यह नियम नहीं है + शेष मनुष्य श्रौर 
तिर्यंच्र श्रवधिज्ञान से कोई श्रबाह्य होते है और कोई बाह्य भी होते है, प्रर्थात्‌ उन्हे दोनो प्रकार का 
ज्ञान हो सकता है । 

देव और नारकी आ्राजीवन अवधिज्ञान से बाह्य रहते है, किन्तु तीर्थकर छद्मस्थकाल तक 
ही अ्रवधिज्ञान से अबाह्य होते हैं। तीर्थकर बनने वाली श्रात्मा यदि देवलोक से या लोकान्तिक 
देवलोको मे से च्यवकर झाई है तो वह विपुल भ्वधिज्ञान लेकर आती है और यदि वह 
पहले, दूसरे एवं तीसरे नरक से श्राती है तो अवधिज्ञान उतना ही रहता है जितना तत्रस्थ नारकी 


जान के पांच प्रकार ] [ ४१३ 


में होता है, किन्तु वह भ्रवधिज्ञान अप्रतिपाति होता है। इस प्रकार भ्रवधिज्ञान का निरूपण 
सम्पन्न हुप्ना । 


मनःपर्यवज्ञान 
र८ से कि त मणपज्जवनाणं ? मणपज्जवणाणे ण॑ भंते! कि सणुस्साणं उपपज्जइ अमजुस्साणं ? 
गोयमा ! सणुस्साण, णो अमणस्साण । 


२८-प्रश्न-भते ! मन पयंवज्ञान का स्वरूप क्‍या है ? यह ज्ञान मनुष्यों को उत्पन्न होता 
है या भ्रमनुष्यों को ? (देव नारक और तिय॑चो को ?) । 

भगवान ने उत्तर दिया-हे गौतम ! मन पर्यवज्ञान मनुष्यों को ही उत्पन्न होता है, अमनुष्यो 
को नही । 

विवेखन -सूत्रकार अवधिज्ञान के पश्चात्‌ श्रब॒ मन पर्यवज्ञान का श्रधिकारी कौन हो सकता 
है, इसका विवेचन प्रश्न और उत्तर के रूप मे करते हैं । प्रश्न किया जा सकता है कि जिन नही कितु 
जिन-सदृश गणधरो मे प्रमुख गोतम स्वामी को यह शका कैसे हो सकती है कि मन:पर्यवज्ञान किसको 
होता है ? 

उत्तर यह है कि प्रश्न कई कारणों से किये जाते है। यथा --जिज्ञासा का समाधान करने 
के लिए, विवाद करने के लिए, किसी ज्ञानी की परीक्षा करने के लिए ग्रथवा भ्रपनी विद्वत्ता सिद्ध 
करने के लिए भी । किन्तु गौतम स्वामी के लिए इनमे से कोई भी कारण सभाव्य नहीं हो सकता 
था । वे चार ज्ञान के धारक, पूर्ण निरभिमान एव बिनीत थे । श्रत उनके प्रश्न पूछने के निम्न कारण 
हो सकते है । जसे- श्रपने श्रवगत विषय को स्पष्ट करने के लिये, अ्रन्य लोगो की शक्का के निवारण 
हेतु, उपस्थित श्रनेक शिष्यो के सशय के निवारणार्थ, लोगो को ज्ञान हो तथा उनकी अभ्रभिरुचि 
सयम-साधना एवं तप मे बढे । यह दृष्टिकोण ही गौतम स्वामी के प्रश्न पूछने मे सभव है । 

इससे यह भी परिलक्षित होता है कि श्रात्मज्ञानी गुरु के साब्नषिध्य का लाभ लेते हुए निकटस्थ 
शिष्य को ग्रति विनम्रता से जानाज॑न करते रहना चाहिए। 


२९--जद मणुस्साणं, कि सम्मुच्छिस-सणुस्साण गन्सवक्कतिय-भणुस्साण ? 
गोयमा | नो समुच्छिम-मणुस्साण, गब्भवक्‍कतिय-सणुस्साण उपपज्जइ । 


२९ -यदि मनुष्यों को उत्पन्त होता है तो क्‍या समूछिम मनुष्यों को या गर्भव्युत्कान्तिक 
(गर्भज) मनृष्यों को उत्पन्न होता है ? 

उत्तर -गौतम ' समूछिम मनुष्यो को नही, गर्भव्युत्कान्तिक मनुष्यो को ही उत्पन्न होता है । 

विवेचन-- भगवान्‌ ने गौतम स्वामी को बताया कि मन पयंवज्ञान गर्भज मनुष्यो को ही 
होता है। गर्भज वे होते है जो माता पिता के सयोग से उत्पन्न हो। समूछिम मनृष्य को यह ज्ञान 
नही होता । समूछिम वे कहलाते हैं जो निम्नलिखित चौदह स्थानों मे उत्पन्न हो, यथा--गर्भज 
मनुष्यों के मल, मूत्र, श्लेष्म, नाक का मेल, वमन, पित्त, रक्त-राध, वीर्य, शोणित में तथा आईं हुए 


डंडे | [ नस्दोसूत्र 


शुष्क शुक्रपुद्ग लो मे, स्त्री-पुरुष के सयोग मे, शव मे, नगर तथा गाव की गदी नालियो मे तथा श्न्य 
सभी भ्रशुत्ति स्थानों मे समूछिम मनुष्य उत्पन्न होते है। समूछिमो की अवगाहना अगुल के अ्रसख्यातवे 
भाग मात्र की ही होती हैं। वे मनरहित, मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी, सभी प्रकार से श्रपर्याप्त होते है । 
उनकी आयु सिफं अ्न्तमु हुत॑ की होती है, झत चारित्र का प्रभाव होने से इन्हे मन पर्यवज्ञान 
नही होता । 


३०--जह गब्भवक्‍क तियमणुस्साण कि कम्मभूसगगब्भवक्‍्कंतियमणुस्साणं, अकस्मभूसगगब्भव- 
कक तियमण स्साण, अतरदीवगगब्भवकक्‍कतियमणुस्साण ? गोयमा | कम्मभूसगगब्भवक्‍्क तियभणुस्साण, 
णो झकस्मभूसगगब्भवक्क तियमणुस्साणं णो अंतरदोवगगब्भवक्‍क तियमणस्साणं । 


३०--यदि गर्भज मनृष्यो को मन पयंवज्ञान होता है तो क्‍या कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यो को 
होता है, अकमंभूमिज गर्भज मनुष्यो को होता है भ्रथवा ग्रन्तरद्वीपज गर्भज मनृष्यो को होता है ? 


उत्तर- -गौतम | कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यों को ही मन पर्यवज्ञान उत्पन्न होता है, प्रकर्मभूमिज 
ग़र्भज और ग्रन्तरद्वीपज गर्भज मनुष्यो को नही होता । 


विवेचन -- जहा अ्रसि, मसि, कृषि, वाणिज्य, कला, शिल्प, राजनीति एवं चार तीर्थों की 
प्रवत्ति हो बह कर्मभूमि कहलाती है। ३० अ्रकमंभूमि श्रोर ५६ अतरद्वीप अ्रकर्मभूमि या भोगभूमि 
कहलाते हैं | अ्रकमंभूमिज मानवों का जीवनयापन कल्पवृक्षो पर निर्भर होता है। इनका विस्तृत 
वर्णन जीवाभिगम सूत्र मे किया गया है । 


३१- जह कम्मभूसग-गब्भवक्कंतिय मणुमस्साण कि संखेज्जवास उय - कसम भूभग- गब्भवक्क तिय- 
समणमस्साणं प्रसंखेज्जवासाउय-कस्सभूसग-गब्भवक्कंतिय मण्णस्साण ? 


गोयसा ' सखेज्जवासाउय-कम्मभूसग-गब्भवक्‍क तिय-सणुस्साण, णो असखेज्जवासाउय- 
कस्मभूसग-गव्भवक्‍्क तिय-सणस्साणं । 


३१-प्रश्न--यदि कर्मभूमिज मनुष्यों को मन पयंवज्ञान उत्पन्न होता है तो क्या सख्यात वर्ष 
की शआ्रायु वाले कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यो को होता है भ्रथवा असख्यात वर्ष की आयु प्राप्त कर्मभूमिज 
मनृष्यो को होता है ? 

उत्तर-गौतम | सख्यात वर्ष की भ्रायु वाले गर्भज मनृष्यो को ही उत्पन्न होता है, प्रसख्यात 
वर्ष की श्रायुष्य प्राप्त कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यों को नही होता । 


विवेचन--गर्भज मनुष्य सख्यात एवं अ्रसख्यात वर्ष की श्रायु वाले, भ्रर्थात्‌ दो प्रकार के होते 
है । सख्यात वर्ष की आयु से यहाँ तात्पयं है, जिसकी झ्ायु कम से कम ९ वर्ष की और उत्कृष्ट करोड 
पूर्व की हो । इससे अधिक झ्ायु वाला असख्यात वर्ष की झायु प्राप्त कहलाता है तथा मन पयंवज्ञान 
प्राप्त नही कर सकता । 


३२--जइ सखेज्जवासाउय-कम्मभूमग-गब्भवक्क तिय-मणुस्साण, कि पज्जत्तगसखेज्जबासाउय- 
फल्मभूसग-गढभवक्‍्क तिय-मणुस्साणं । 


सात के पांच प्रकार ] [४५ 


अपज्जत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्स भूसग-गब्भवक्क तिय-मणस्साण ? 


गोयसा | पज्जतग-सलेज्जवासाउय-कस्सभूसग-गब्भववक तियसणुस्साणं, णो पह्रपज्जत्तम- 
सलेज्ज-वासा उयकम्मधूमग-गब्भवक्कं तियमणुस्साणं । 


३२-- यदि सख्यातवर्ष की भ्रायु वाले कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यो को होता है तो क्या पर्याप्त 
सख्यातवर्ष की आयु वाले कमंभूमिज मनुष्यो को या असख्यात वर्ष की आ्रायु वाले कमंभूमिज 
गर्भज मनुष्यों को होता है ? 

उत्तर--गौतम ' पर्याप्त सख्यात वर्ष की आयु वाले कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यों को होता है, 
अपर्याप्त को नही । 


विवेचन -पर्याप्त एवं अपर्याप्त-- सख्यात वर्ष की आयु वाले कमंभूमिज, गर्भज मनुष्य दो 
प्रकार के होते हैं, (१) पर्याप्त (२) अपर्याप्त । 

पर्याप्त--कर्म प्रकृति के उदय से मनुष्य स्वयोग्य पर्याप्तियों को पूर्ण करे वह पर्याप्त 
कहलाता है । 


श्रपर्याप्त -कर्म के उदय से स्वयोग्य पर्याप्तियों को जो पूर्ण न कर सके उसे श्रपर्याप्त 
कहते है । 


जीव की शक्ति-विशेष की पूण्णता पर्याप्ति कहलाती है। पर्याप्तियाँ छ है। वे इस प्रकार है-- 

(१) ग्राहार-पर्याप्ति - जिस छक्ति से जीव आ्राह्दार के योग्य बाह्य पुदूगलो को ग्रहण करके 
उन्हे वर्ण, रस ञ्रादि रूप में बदलता है उसकी पूर्णता को आहारपर्याप्ति कहते है । 

(२) शरी रवर्याप्ति-- जिस शक्ति द्वारा रस, रूप मे परिणत भ्राहार को श्रस्थि, मास मज्जा 
एवं शुक्रशोणित आदि मे परिणत किया जाता है उसकी पूर्णता को शरीरपर्याप्ति कहते है । 

(३) इन्द्रियपर्याप्ति--इन्द्रियो के योग्य पुदुूगलो को ग्रहण करके श्वनाभोगनिर्वेंतित योग-, 
शक्ति द्वारा उन्हे इन्द्रिय रूप मे परिणत करने की शक्ति की पूर्णता को इन्द्रियपर्याप्ति कहते है । 

(४) श्वासोच्छूवासपर्याप्ति- उच्छवास के योग्य पुदूगलों को जिस शक्ति केद्वारा ग्रहण 
करके छोडा जाता है, उसकी पूर्ति को शवासोच्छवास पर्याप्ति कहते है । 

(५) भाषापर्याप्ति--जिस शक्ति के द्वारा आत्मा भाषावगंणा के पुदगलो को ग्रहण करके 
भाषा के रूप मे परिणत करता और छोडता है उसकी पूर्णता को भाषापर्याप्ति कहते है । 

(६) मन पर्याध्ति-- जिस शक्ति के द्वारा मनोवर्गंणा के पुदुगलो को ग्रहण करके, उन्हे मन 
के रूप मे परिणत करता है उसकी पूर्णता को मन पर्याप्ति कहते हैं। मन पुद्गलो के अवलम्बन से 
हो जोव मनन-सकल्प-विकल्प करता है । 

ग्राहारपर्याप्ति एक ही समय मे पूर्ण हो जाती है। एकेन्द्रिय मे प्रथम की चार पर्याप्तियाँ होती 
हैं। विकलेन्द्रिय श्रौर भ्रसज्ञी पचेन्द्रिय मे पाँच पर्याप्तियाँ पाई जाती है, मन नहीं। सज्ञी मनुष्य में 
छ. पर्याप्तियाँ होती है । ध्यान मे रखने को आ्रावश्यकता है कि जिस जीव में जितनी पर्यापष्तियों पाई 
जाती हैं, वे सब हो तो उसे पर्याप्त कहते है। जब तक उनमे से न्‍्यून हो तब तक वह श्रपर्याप्त कहा 


४६] [ नन्‍्दीसूत्र 


जाता है। प्रथम भ्राहार पर्याप्ति को छोडकर शेष पर्याप्तियो की समाप्ति भ्रन्तमु हृत्त मे होती है। 
जो पर्याप्त होते हैं वे ही मनुष्य मन पर्यवज्ञान को प्राप्त कर सकते है। 


३३-जह पज्जत्तगसखेज्जवासाउयकम्मभूमसगगब्भवक्‍्क तियमणुस्साणं, कि सम्महिट्टिपज्ज- 
सगसखेज्जवासाउय-कम्मभूसग-गब्भवक्क तियमणुस्साणं,.. मिच्छदिट्टिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउय-कस्स- 
भूमग-गग्भवक्‍्क तिय-सणुस्साण, सम्मामिच्छुविट्टि-पज्जत्तग-सख्चेज्जवासाउय-कम्म भूमग-गब्भववक तिय- 
सणुस्साण ? 

गोयमा | सम्महिट्टि-पज्जसग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूसग-गब्शवक्कतिय-सणुस्साण, णो 
मिच्छट्िट्विपज्जत्तग -सखेज्जवासाउय-कम्म भूसग-गब्भवव्क तियम णूसाण, णो सम्मामिच्छहिट्टिपज्जत्तग- 
संखेज्जवासाउय-कम्स भूसग-गब्भवक्कंतियमणुस्साण । 


३३--यदि मन पर्यवज्ञान पर्याप्त, सख्यात वर्ष की प्रायु वाले, कमंभूमिज, गर्भज, मनुष्यो 
को होता है तो क्या वह सम्यक्दृष्टि, पर्याप्त संख्यात वर्ष की श्रायु वाले, कमंभूमिज-गर्भज मनुष्यों 
को होता है, मिथ्यादृष्टि पर्याप्त, सख्यात बर्ष की श्रायुवाले कमंभूमिज गर्भज मनुष्यो को होता है। 
झथवा मिश्रदृष्टि पर्याप्त सख्येय वर्ष की आयु वाले कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यों को उत्पन्न होता है ? 


उत्तर-- सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात वर्ष की श्रायु वाले कमंभूमिज गर्भज मनुष्यों को होता 
है । मिथ्यादृष्टि श्रौर मिश्रदृष्टि पर्याप्त संख्यात वर्ष की आयु वाले क्मंभूमिज गर्भज मनुष्यों को 
नही होता । 


बिवेचन--सम्यक्दुष्टि, भिध्यादृष्टि श्र मिश्रदृष्टि के लक्षण इस प्रकार हैं-- 


(१) सम्यक्दुष्टि--सम्यक्दृष्टि उसे कहते हैं जो आ्ात्मा के, सत्य के तथा जिनप्ररूपित तत्त्व 
के सम्मुख हो । सक्षेप मे, जिसको तत्त्वो पर सम्यक्‌ श्रद्धा हो । 


(२) भिध्यादृष्टि--मिथ्यादृष्टि वह कहलाता है जिसकी जिन-प्ररूपित तत्त्वों पर श्रद्धा न 
हो और जो आत्मबोध एवं सत्य से विमुख हो । 


(३) मिश्रदृष्टि--मिश्रदर्शनमोहनीय कर्म के उदय से जिसकी दृष्टि किसी पदार्थ का यथार्थ 
निर्णय अथवा निषेध करने मे समक्ष न हो, जो सत्य को न ग्रहण कर सकता हो, न त्याग कर सकता 
हो, और जो मोक्ष के उपाय एवं बध के हेतुओं को समान मानता हो तथा जीवादि पदार्थों पर न 
श्रद्धा रखता हो भ्रोर न ही अश्रद्धा करता हो, ऐसी मिश्रित श्रद्धा वाला जीव मिश्रदृष्टि कहलाता 
है । यथा--कोई व्यक्ति रंग की एकरूपता देखकर सोने व पीतल मे भेद न कर पाता हो । 


३४- जइ सम्महिंद्वि-पज्जत्तग-सखेज्जवासाउय-कम्म भूसग-गड्भवषकतियसमणस्साणं,.. कि 
सजय-सम्म-दिट्टि-पज्जत्तग-सखेज्जवासाउय-कम्मभूसग- गरभवक्‍क तिय-मणुस्साण, असजय-सम्महिद्ठि- 
पज्जत्तग-संखेज्जावासाउय-कम्म भूमग-गव्सवक्क तिय-सणुस्साणं,... संजया-संजय-सम्भहिद्टि-पतणजसग- 
संजेज्जवासाउय-कस्सभूसग-गवठ्भवक्‍्क तिय-सणुस्साण ? 


गोयसा ! संजय-सम्महिट्टि-पज्जत्तग-सखेज्ज-वासाउय-कम्मभूमग-गब्भवक्‍्कतिय-मणस्साण, 


काल के पांच प्रकार ] [४७ 


णो असंजय-सम्महिट्टि-पञजततगा-संखेज्जवासाउय-कम्मभूसग-गब्भवक्कंतिय-मणस्साणं,णो संजया-संजय- 
सम्महिट्टि-पज्जसग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूसग-गठ्भवक्क तिय-मणुस्साण । 

३४-पभ्रश्न--यदि सम्यग्दृष्टि पर्याप्त, सख्यावर्ष की भ्रायु वाले कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यों को 
होता है, तो कया सयत --सयमी सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात वर्ष की श्रायु वाले कर्मभूमिज गर्भज 
मनुष्यों को होता है, भ्रथवा असयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात वर्ष की श्रायु वाले कमंभूमिज गर्भज 
मनुष्यो को होता है या सयतासयत-देशविरत्ति सम्यगदृष्टि पर्याप्त सख्यात वर्ष की श्रायु बाले कर्म- 
भूमिज गर्भज मनुष्यों को होता है ? 

उत्तर-गौतम ! सयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात वर्ष की झ्रायु वाले कर्मभूमिज गर्भज 
मनुष्यों को उत्पन्न होता है। प्रसयत और सयतासयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात वर्ष की भ्रायु वाले 
कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यो को नही होता । 

विवेखन--इन प्रश्नोत्तरो मे सयत, प्रसयत भ्रौर सयतासयत जीबो के विषय मे उल्लेख किया 
गया है। इनके लक्षण निम्न प्रकार हैं-- 

संयत--जो सर्वेविरत हैं तथा चारित्रमोहनीय कम के क्षय श्रथवा क्षयोपदाम से जिन्हे स्ब- 
विरति चारित्र की प्राप्ति हो गई है, वे सयत कहलाते है । 

प्रतंघत - जो चतुर्थ गुणस्थानवर्ती हो, जिनके श्रप्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से--देश- 
विरति न हो उन्हे अ्विरत या अ्रसयत सम्यग्दृष्टि कहते है । 

संयतासंयत-सयतासयत सम्यग्दृष्टि मनुष्य श्रावक होते हैं। श्रावको को हिसा आदि पाच 
प्राश्रवो का अश रूप से त्याग होता है, सम्पूर्ण रूप से नही । 

सयतादि को क्रमश. बिरत, श्रविरत श्रौर विरताविरत तथा पच्चकक्‍्खाणी, भपच्चक्खाणी 
एवं पच्चक्खाणापच्चक्खाणी भी कहते हैं । 

प्रभ्रिप्राय यह है कि सयत या सर्वेविरत मनुष्यों को ही मन पर्यवज्ञान उत्पन्न हो सकता है, 
असयत और सयतासयत सम्यकदृष्टि मनुष्य इस ज्ञान के पात्र नही हैं । 

३५--जह संजय-सम्भहिट्टि-पज्जत्तग-संखेज्जावासाउय-कम्सभूसग-गठ्भवक्‍क तिय-सणस्साणां 
कि पमतसजय-सम्महिद्वि-पज्जत्तग-संखेज्ज वासाउयकम्मभूमग-गब्भवकक्‍्क तिय-सणुस्साण कि अप्पमत्त- 
सजय-सम्महिट्ठि-पज्जत्तग-सखंज्जवासाउय-कस्मभूमग-गठसवकक्‍्कंतिय-सणुस्साणं ? 

गोयमा ! अप्पसत्तसजय-सम्महिद्टि-पज्जत्तग - सखेज्जवासाउय - कम्सभूसग - गब्भववक तिय- 
सणुस्साण, णो पमत्तसंजय-सम्महिद्ठि-पज्ञत्तग-संखेज्जवासाउय-कम्मभूसग-गब्भववक तिय-मणुस्साणं । 


३५- प्रश्न--यदि सयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात बर्ष की आयु वाले कममंभूमिज गर्भज 
मनुष्यों को उत्पन्न होता है तो क्‍या प्रमत्त सयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात वर्ष की भ्ायु वाले 
कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यों को होता है या अप्रमत्त सयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यातवर्ष-आयुप्क 
कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यों को ? 

उत्तर-गौतसम ' अ्रप्रमत्त सवत सम्यग्दृष्टि पर्याप्तकक सख्यातवर्ष की श्रायुवाले कर्मभूमिज 
गर्भज मनुष्यों को होता है, प्रमत्त को नही । 


डघ ) [सन्दौसूत्र 
विवेखन--इस सूत्र मे गौतम स्वामी ने प्रश्न किया है कि- भगवन्‌ ! श्रगर सयत को ही मन - 
पर्यवज्ञान उत्पन्न होता है तो सयत भी प्रमत्त एवं अप्रमत्त के भेद से दो प्रकार के होते है । इनमे से 


कौन इस ज्ञान का अधिकारी है ? भगवान्‌ ने उत्तर दिया- श्रप्रम्त सयत ही इस ज्ञान का 
श्रधिकारी है । 


अ्प्रमत्ततयत--जो सातबवे आदि ग्रुणस्थानों मे पहुँचा हुआ हो, जो निद्रा भ्रादि प्रमादों से 
प्रतीत हो चुका हो, जिसके परिणाम सयत मे बृद्धिगत हो रहे हो ऐसे मुनि को अ्रप्रमत्तसयत 


कहते हैं । 
प्रमत्तसयत--जो सज्वलन कषाय, निद्रा, विकथा श्रादि प्रमाद मे प्रवतंते है उन्हे प्रमत्तसयत 
कहते है । ऐसे मुनि मन पर्यवज्ञान के अधिकारी नही होते । 


३६- जइ अप्यमत्तसजय-सम्म हि ट्ि-पज्जसग-स्खेज्जवासाउय-कम्म भूस ग-गब्भववक तिय- 
मणुस्साण, कि इजिपत्त-अ्प्पसससजय -सम्महिट्टि-पज्जत्तग-सखेज्जवासा उय-कम्मभूसग-गब्भवक्‍क तिय- 
मणुस्साण,प्रणिड्डिपत्त-भ्रप्पमत्तसंजय-सम्महिट्टि-पज्जत्तग-स खेज्जवासा उय -कस्स भूसग-गब्भवक्‍क तिय- 
मणुस्साण । 


गोयभा ! इड्डिपस-अप्पससजय-सम्महिट्टिपज्जत्तग-सलेज्जवासा उय-कम्मभूसग-गब्भवकक्‍्क तिय- 
मणस्साण, णो प्रणिड्िप्पत्त-प्रप्पमनत्ततजय -सम्महिट्टि-पञ्जतग-सखेज्जवासा उय-कम्म भूसग - ग ब्सववक तिय - 
मणुस्साण मणपज्जवणाण-समुप्पज्जइ । 


३६--प्रश्न- यदि श्रप्रमत्तसयत सम्यगदुष्टि पर्याप्त सख्यात वर्ष की आयु वाले, कर्म भूमिज 
गर्भज मनुष्यो को मन पयंवज्ञान उत्पन्न होता है तो क्‍या ऋद्धिप्राप्त--लब्धिधारी प्रप्रमत्तसयत 
सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात वर्षायु-कमंभूमिज-गर्भज मनुष्यों को होता है भ्रथवा लब्धिरहित भ्रप्रमत्त 
सयत सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात वर्ष की आयु वाले कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यों को होता है ” 


उत्तर-गौतम ! ऋद्धिप्राप्त अप्रमादी सम्यग्दृष्टि पर्याप्त सख्यात की वर्ष आयु वाले 
कर्मंभूमिज गर्भज मनुष्यों को मन परयंवज्ञान की प्राप्ति होती है। ऋद्धिरहित अ्रप्रमादी सम्यग्दृष्टि 
पर्याप्त सख्यातवर्ष की झायु वाले कमंभूमि मे पेदा हुए गर्भज मनुष्यों को मन पर्यवज्ञान की प्राप्ति 
नही होती । 


बविवेचन--ऋद्धिप्राप्त -जो श्रप्रमत्त आत्मार्थी मुनि अतिशायिनी बुद्धि से सम्पन्न हो तथा 
प्रवधिज्ञान, पूर्वंगतज्ञान, भ्राह्मरकलब्धि, वैक्रियलब्धि, तेजोलेश्या, विद्याचरण, जघाचारण श्रादि 
श्रनेक लब्धियों मे से किन्ही लब्धियो से युक्त हो, उन्हे ऋद्धिप्राप्त कहते है। कुछ लब्धियाँ श्रौदयिक 
भाव मे, कुछ क्षायोपशमिक भाव मे और कुछ क्षायिक भाव मे होती हैं । ऐसी विशिष्ट लब्धियाँ सयम 
एवं तपरूपी कष्टसाध्य साधना से प्राप्त होती हैं। विशिष्ट लब्धि प्राप्त एव ऋद्धि-सम्पन्न मुनि को 
ही मन पर्यवज्ञान उत्पन्न होता है । 


अनुद्धिप्राप्त- अप्रमत्त होने पर भी जिन सयतो को कोई विशिष्ट लब्धियाँ प्राप्त नहीं होती 
उन्हे अनुद्धिप्राप्त अप्रमत्त सयत कहते हैं । ये मन पर्यवज्ञान के श्रधिकारी नही होते । 


शान के पाँच प्रकार ] (४९ 
३७--स॑ च॒ दुविहं उप्पस्जइ, तंजहा--उज्जुमती यप विउलसतो ये । 
त॑ समासओ चडव्विहं पण्णत्त, तं जहा---वच्वन्नी, खेसओ, कालओ, भावओ । 
तत्य दष्यञो णं उज्जुमती अणजंते प्रणंतपवेसिए खंधे जाणईइ पासइ, ते चव विउलमती 
अव्म हियतराएं, विउलतराए, विसुद्धतराएं, वितिमिरतराए जाणह पासइ । 


खित्तओ णं--उज्जुमई जयज्न णं अंग्रुलस्स असंखेज्जइ भागं, उक्कोसेणं अहे जाव इसोीसे 
रयणप्पभाए पुठबीए उवरिमहेटिठल्ले खुडडगपयरे, उड्ड जाब जोइसस्स उवबरिमतले, तिरियं जाव 
अंतोभणुस्सखिले भ्रड्डाइज्जेसु दोवसमुद्ेसु, पन्चरससु कम्मभूसिसु, तीसाए अकम्मभूमिसु, छप्पन्नाए 
अंतरदीवगेसु सब्निपंचिदियाणं पज्जसयाण मणोगए भावे जाणइ पासइ, त॑ च्रेज विउलमई अड्डाइज्जे हि- 
मंगुलेह अब्भहियतरं, विउलतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं खेत जाणइ पासइ । 

कालप्रो णं उज्जुमई जह॒न्नणं पलिओवमस्स प्रसंखिज्जइभागं उककोसएणवि पलिओवमस्स 
असखिज्जदभागं ग्रतीयमणागय वा काल जाणइ पासइ, त चेव विउलसई अव्भहियतरागं विसुद्धतरागं, 
वितिभिरतराग जाणइ पासइ । 


भावओ णं-- उज्जमई श्रणंते भावे जाणइ पासइ, सब्यभावाणं अणंतभागं जाणइ पासइ, त चेव 
विउलमई विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं जाणइ पासइ। 


३७-मन पयंवज्ञान दो प्रकार से उत्पन्न होता है। यथा--(१) ऋणजुमति (२) विपुलमति । 


दो प्रकार का होता हुआ भी यह विषय-विभाग की भपेक्षा चार प्रकार से है। यथा-- 
(१) द्रव्य से (२) क्षेत्र से (३) काल से (४) भाव से । 

(१) द्रव्य से--ऋजुमति अनन्त श्रनन्तप्रदेशिक स्कत्धयो को विशेष तथा सामान्य रूप से 
जानता व देखता है, और विपुलमति उन्ही स्कन्धो को कुछ भ्रधिक विपुल, विशुद्ध और निर्मल रूप ' 
से जानता व देखता है । 

(२) क्षेत्र से-- ऋजुमति जधन्य अगुल के असख्यातवे भाग मात्र क्षेत्र को तथा उत्कषं से 
नीचे, इस रत्नप्रभा पृथ्वी के उपरितन-भ्रधस्तन क्षुल्लक प्रतर को और ऊँचे ज्योतिषचक्र के उपरितिल 
पर्यत और तिरछे लोक मे मनुष्य क्षेत्र के अन्दर भ्रढाई द्वीप समुद्र पर्यत, पन्द्रह कमंभूमियो, तीस भ्रकर्म- 
भूमियों और छप्पन अन्तरद्वीपो मे वर्तेमान सशिपचेन्द्रिय पर्याप्त जीवो के मनोगत भावों को जानता 
व देखता है । और उन्हीं भावो को विपुलमति अ्ढाई अगुल अधिक विपुल, विशुद्ध और निर्मेलतर 
तिमिररहित क्षेत्र को जानता व देखता है । 

(३) काल से--ऋजुम ति जघन्य पत्योपम के असख्यातवे भाग को और उत्कृष्ट भी पल्योपम 
के भ्रसख्यातवे भाग भूत और भविष्यत्‌ काल को जानता व देखता है। उसी काल को विपुलमति 
उससे कुछ प्रधिक, विपुल, विशुद्ध और वितिमिर पर्थात्‌ सुस्पष्ट जानता व देखता है । 

(४) भाव से-- ऋजुमति अनन्त भावो को जानता व देखता है, परन्तु सब भावों के प्रनन्तवें 
भाग को ही जानता व देखता है। उन्ही भावो को विपुलमति कुछ प्रधिक, विपुल, विशुद्ध और निर्मल 
रूप से जानता व देखता है। 


५०] [सन्दीसूच 


विवेखन--. मन :पर्यवज्ञान के दो भेद--(१) ऋजुमति--जो झपने विषय का सामान्य रूप 
से प्रत्यक्ष करता है। 


(२) विपुलमति--बहु कहलाता है जो प्रपने विषम को विशेष रुप से प्रत्यक्ष करता है । 

ग्रब मन पर्यवज्ञान के विषय का द्रठप, क्षेत्र, काल औ्लौर भाव की प्पेक्षा संक्षेप में बर्ण न किया 
जा रहा है। 

(१) द्रब्यत --मन पर्यवज्ञानी मतोवगंणा के मनरूप में परिणत अ्रनन्त प्रदेशी स्कन्धो की 
पर्यायों को स्पष्ट रूप से देखता व जानता है । 


जेनागम मे कही भी मन पर्याय दर्शन का विधान नही है, फिर भी मूल पाठ मे 'जाणह' के 
साथ 'पास$' अर्थात्‌ देखता है, ऐसा कहा जाता है। इसका तात्पयं क्‍या है? इस सबंध मे ग्रनेक 
प्राचार्यों ने श्रनेक अभिमत व्यक्त किए हैं। किन्‍्ही का कथन है कि मन पर्यायज्ञानी अ्रवधिदर्शन से 
देखता है, किन्तु यह समाधान सगत नही है, क्योंकि किसी-किसी मन पर्यायज्ञानी को अवधिदर्शन- 
प्रवधिज्ञान होते ही नही हैं। किसी का मन्तव्य है कि मन पर्यंवज्ञान ईहाज्ञानपूर्वक होता है। कोई 
उसे भ्रचक्षु दर्शनपुरवंक मानते हैं तो कोई प्रज्ञापना सूत्र मे प्रतिपादित पश्यत्तापूवंक स्वीकार करते है । 
विशेषावश्यक भाष्य मे इस विषय को विस्तारपूर्वक मीमासा की गई है। जिज्ञासु जन उसका 
प्रवलोकन करे प्रस्तुत मे टीकाकार मलयगिरि ने लिखा है कि मन पर्यायज्ञान मनरूप परिणत 
पुद्गलस्कन्धो को प्रत्यक्ष जानता है भ्रौर मन द्वारा चिन्तित बाह्य पदार्थों को श्रनुमान से जानता है । 
भाष्यकार और चूणिकार का भी यही अ्रभिमत है। इसी श्रपेक्षा से 'पासइ' शब्द का प्रयोग किया 
गया है। दूसरा समाधान टीकाकार ने यह किया है कि ज्ञान एक होने पर भी क्षयोपशम की विचित्रता 
के कारण उसका उपयोग अनेकविध हो सकता है। श्रतएवं विशिष्टतर मनोद्रब्यो के पर्यायो को 
जानने की श्रपेक्षा 'जाणइ' कहा है, और सामान्य मनोद्रब्यो को जानने की श्रपेक्षा 'पासह' शब्द का 
प्रयोग किया गया है । 

(२) क्षेत्रत --लोक के मध्यभाग में ग्रवस्थित आठ रुचक प्रदेशों से छह दिशाएँ श्ौर चार 
विदिजश्ञाएँ प्रवत्त होती हैं । मानुषोत्तर पर्वत, जो कुण्डलाकार है उसके प्रन्तगेत श्रढाई द्वीप और दो 
समुद्र हैं। उसे समयक्षेत्र भी कहते हैं । इसकी लम्बाई-चबोडाई ४५ लाख योजन की है। मन पर्यव- 
ज्ञानी समयक्षेत्र मे रहने वाले समनस्क जीवो के मन की पर्यायो को जानता व देखता है तथा 
विमला दिशा में सूये-चन्द्र, ग्रह-नक्षज्रादि मे रहने वाले देवों के तथा भद्रशाल वन में रहने वाले 
संज्ञी जीवो के मन की पर्यायों को भी प्रत्यक्ष करता है। वह नीचे पुष्कलावती विजय के श्रन्तर्गत 
ग्राम नगरो मे रहने वाले सज्ञी मनृष्यो श्रौर तिय॑चों के मनोगत भावों को भी भलीभाति जानता है। 
मन की पर्याय ही मन पर्याय ज्ञान का विषय है। 

(३) कालत.--मन.पर्यंवज्ञानी केवल बतंमान को ही नही भ्रपितु भ्रतोतकाल मे पल्योवम के 
झसंख्यातवे काल पर्यत तथा इतना ही भविष्यत्‌काल को श्रर्थात्‌ मनन की जिन पर्यायो को हुए 
पल्योपम का अ्रसंख्यातवाँ भाग हो गया है भौर जो मन की भविष्यकाल मे पर्याये होगी, जिनकी श्रवधि 
पल्योपम के श्रसंख्यातर्वें भाग की है, उतने भूत और भविष्य-काल को वतंमान काल की तरह भली- 

भांति जानता थे देखता है। 


रंग के पांच प्रकार ] 2 [५१ 


(४) भावत --मन'पर्यवज्ञान का जितना क्षेत्र बताया जा चुका है, उसके अन्तगंत जो समनस्क 
जीव है वे सख्यात ही हो सकते हैं, भ्रसख्यात नही । जबकि समनस्क जीव चीरो गतियो में प्रसच्यात . 
हैं, वन सबके मन की पर्यायों को नही जानता । मन का प्रत्यय अ्रवधिज्ञानी भी कर सकता है किन्तु 
मन को पर्यायों को मन पर्यायज्ञानी सूक्ष्मतापूर्वक, भ्रधिक विशुद्ध रूप से प्रत्यय जानता व देखता है । 

यहाँ एक शका होती है कि प्रवधिज्ञान का विषय रूपी है श्र मन'पर्यायज्ञान का विषय भी 
तो रूपी है फिर श्रवधिन्नानी मन पर्येवज्ञानी की तरह मन को तथा मन की पर्यायों को क्यों नही 
जानता ? 

शका का समाधान यह है कि भ्रवधिज्ञानी मन को व उसकी पर्यायों को भी प्रत्यक्ष कर 
सकता है किन्तु उसमे भलकते हुए द्रव्य, क्षेत्र काल और भाव को प्रत्यक्ष नही कर सकता। जैसे 
टेलीग्राफ की टिक-टिक कोई भी कानो से सुन सकता है किन्तु उसके पीछे कया प्राशय है, इसे 
टेलीग्राफ पर काम करने वाले व्यक्ति ही जान पाते हैं । 

एक दूसरी शका भ्रौर भी उत्पन्न होती है कि ज्ञान भ्ररूपी भर प्रमूर्त है जबकि मन 'पर्यव- 
ज्ञान का विषय रूपी है, ऐसी स्थिति मे वह मनोगत भावों को कंसे जान सकता है भर कंसे प्रत्यक्ष 
कर सकता है ? 

इसका समाधान यह है कि क्षायोपशमिक भाव मे जो ज्ञान होता है बह एकान्त रूप से 
प्ररूपी नही होता कथचित्‌ रूपी भी होता है। निश्चय रूप से भ्ररूपी ज्ञान क्षायिक भाव में ही होता 
है | जेसे औदयिक भाव मे जीव क्थंचित्‌ रूपी होता है, वेसे ही क्षायोपशमिक ज्ञान भी कथचित्‌ 
रूपी होता है, स्वंथा भ्ररूपी नही । 

एक उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है । जैसे-- विद्वान्‌ व्यक्ति भाषा को सुनकर 
कहने वाले के भावो को भी समझ लेता है उसी प्रकार विभिन्‍न निर्ित्तो से भाव समभे जा सकते हैं, 
क्योकि क्षायोपशमिक भाव सर्वेथा श्ररूपी नही होता । 

ऋजमति विपुलभति में भ्रन्तर 

ऋजुमति ग्रौर विपुलमति मे अतर एक उदाहरण से समभना चाहिए। जेसे दो छात्रो 
ने एक ही विषय की परीक्षा दो हो और उत्तीर्ण भी हो गये हो। किन्तु एक ने सर्वाधिक अक प्राप्त 
कर प्रथम श्रेणी प्राप्त की श्रैर दूसरे ने द्वितोय श्रेणी । स्पष्ट है कि प्रथम श्रेणी प्राप्त करने वाले 
का ज्ञान कुछ अधिक रहा और दूसरे का उससे कुछ कम । 

ठीक इसी तरह ऋजुमति की ग्रपेक्षा विपुलमति ज्ञान अधिकतर, विपुलतर एव विशुद्धतर 
होता है । ऋतुमति तो प्रतिपाति भी हो सकता है श्रर्थात्‌ उत्पन्न होकर नष्ट हो सकता है, किन्तु 
विपुलमति नही गिरता । विपुलमति मन.पर्यवज्ञानी उसी भव में केवलश्ान प्राप्त करता है। 

झवधिशान और मनःपर्यवशान में अन्तर 

(१) अ्वधिज्ञान की अपेक्षा मनःपर्यवज्ञान भ्रध्विक विशुद्ध होता है । 

(३२) अवधिज्ञाम का विषयक्षेत्र सभी रूपी पदार्थ हैं, जबकि मनःपर्यंचज्ञान का विषय केवल 
पर्याप्त संज्ञी जीवों के मानसिक पर्याय ही हैं । 


५२] [ नम्दौतृत्र 


(३) अवधिज्ञान के स्वामी चारो गतियो मे पाएं जाते है, किन्तु मन पर्याय के भ्रधिकारी 
लब्धरिसपन्‍न सयत हो हो सकते है । 

(४) प्रवधिज्ञान का विषय कुछ पर्याय सहित रूपी द्रव्य है, जबकि मन पयंवज्ञान का विषय 
उसकी प्रपेक्षा श्रनन्तवाँ भाग है । 


(५) अ्वधिज्ञान मिथ्यात्व के उदय से विभद्भुज्ञान के रूप मे परिणत हो सकता है, जबकि 
मन पर्यवज्ञान के होते हुए मिथ्यात्व का उदय होता ही नही । भ्र्थात्‌ इस ज्ञान का विपक्षी कोई 
अज्ञान नही है। 

(६) अवधिज्ञान झ्रगामी भव मे भी साथ जा सकता है जबकि मनःपयवज्ञान इस भव तक 
ही रहता है, ज॑से सयम आ्औौर तप । 


भनःपर्यवज्ञान का उपसंहार 


३८--मणपज्जवनाणं पुण, जणमण-परिचितियत्यपागडणं । 
माणुसखित्तनिबद्ध,. गुणपच्चइअ चरित्तवड्ो ।। 
से त्तं मणपज्जवनाणं । 


३८--मन पर्यवज्ञान मनुष्य क्षेत्र मे रहे हुए प्राणियों के मन द्वारा परिचिन्तित श्रथ को प्रकट 
करने वाला है। क्षान्ति, समम भ्रादि गुण इस ज्ञान की उत्पत्ति के कारण है भ्ौर यह चारित्रसम्पन्त 
श्रप्रमत्तसयम को ही होता है । 

विवेखन--उक्त गाथा में 'जन' शब्द का प्रयोग हुआ है| इसकी व्युत्पत्ति है--“जायते इति 
जन ” । इसके अनुसार जन का भश्रर्थ केवल मनुष्य ही नही, अपितु समनस्क भी है। मनुष्यलोक दो 
समुद्र और भ्रढाई द्वीप तक ही सीमित है। उस मर्यादित क्षेत्र मे जो मनुष्य, तियँच, सन्नी पचेन्द्रिय 
तथा देव रहते है उनके मन के पर्यायो को मन पर्यवज्ञानी, जान सकते है । 

यहा “गुणपच्चइय' तथा “चरित्तवग्नो' ये दो पद महत्त्वपूर्ण है। क्‍झ्वधिज्ञान जैसे भवप्रत्ययिक 
और गुणप्रत्यथिक, इस तरह दो प्रकार का है, वैसे मन पर्याय नहीं | वह केवल ग्रुणप्रत्ययिक ही है । 
श्रवधिज्ञान तो अविरत, श्रावक और प्रमत्तसयत को भी हो जाता है किन्तु मन पर्याय ज्ञान केवल 
चारित्रवान्‌ साधक को ही होता है । 


केवलज्ञान 


३९-से कि तं॑ केवलनाणं ? केवलनाणं दुबिह पण्णसं,त जहा--भवत्यकेवलनाण थे सिद्ध- 
कफेवलनाणं च। 


से कि त भवत्यकेवलनाण ? भवत्थकेबलनाण दुबिह पण्णत्त,त जहा-सजोगि-भवत्यक्ेवल- 
नाणं च अजोगिभवत्थ-केवलनाण थे । 

से कि त सजोगिभवस्य-फेवलणाणं ? सजोगिभवत्थकेवलणाणं दुविहू फण्णसं त॑ जहा-- 
पहमससय-सजोगिभवत्थ-केवलणाणं च, अपडमसमय-सजोगिभवत्थ-केवलणाणं च। जह॒वा चरमसमय- 


शान के पांच प्रकार] [५३ 


सजोगिभवत्य-केवलणाणं च, अचरससमय-सजोगिभवत्थ-फेवलणाणं ये । से सं सओोभिभवत्य- 
केवलणाण । 


से कि त॑ अजोगिभवत्थ-केवलणाणं ? श्रजोगिभवत्य-केवलणाणं दुविहूं पष्णसं त॑ जहा-- 
पढ़ससमय-अजोगि भवत्य-केवलणाणं च, अपडमसमय-प्रजोगिभवत्य-केवलणाणं च। झहवा चरभ- 
समय-अजोगिभवश्थकेवलणाणं, अचरसससय-प्रजोगिभवत्यकेवलणाणं जे । से सं सव॒त्य-केवलणाणं । 


३१--गौतम स्वामी ने पूछा-भगवन्‌ ! केवलज्ञान का स्वरूप कया है ? 

उत्तर-गौतम ! केवलज्ञान दो प्रकार का प्रतिपादन किया गया है, जेसे--(१) भवस्थ- 
केवलज्ञान और (२) सिद्ध-केवलज्ञान । 

प्रशन--भवस्थ-केवलज्ञान कितने प्रकार का है ? 


उत्तर-भवस्थ-केव लज्ञान दो प्रकार का है। यथा--(१) सयोगिभवस्थ-केवलज्ञान एवं (२) 
ग्रयोगिभवस्थ केवलज्ञान । 


प्रश्श--भगवन्‌ ! सयोगिभवस्थ-केवलज्ञान कितने प्रकार का है ? 


भगवान्‌ ने उत्तर दिया--गौतम ! सयोगिभवस्थ-केवलज्ञान भी दो प्रकार का है, यथा-- 
प्रथमसमय-सयोगिभवस्थ केवलज्ञान भ्र्थात्‌ जिसे उत्पन्न हुए प्रथम ही समय हो ओर दूसरा श्रप्रथम- 
समय-सयोगिभवस्थ केवलज्ञान-- जिस ज्ञान को पैदा हुए एक से ग्रधिक समय हो गये हो । 

इसे ग्रन्य दो प्रकार से भी बताया है। यथा (१) चरमसमय-सयोगिभवस्थ केवलशान-सयोगि 
प्रवस्था मे जिसका अस्तिम एक समय शेष रह गया है, ऐसे भवस्थकेवली का ज्ञान (२) भ्रचरम 
समय-सयोगिभवस्थ केवलज्ञान-- सयोगि-भ्रवस्था मे जिसके भ्रनेक समय शेष रहते हैं उसका केवलज्ञान । 
इस प्रकार यह सयोगिभवस्थ-केवलज्ञान का वर्णन है । 


प्रश्न-अयोगिभवस्थ केवलज्ञान कितने प्रकार का है ? 
उत्तर--प्रयोगिभवस्थ केवलज्ञान दो प्रकार का है। यथा--- 


(१) प्रथमसमय-अ्रयोगिभवस्थ केवलज्ञान 
(२) अ्प्रथमसमय-अयोगिभवस्थ-केवलज्ञान 
ग्रथवा (१) चरमसमय- अ्योगिभवस्थ-केवलज्ञान 
(२) अचरमसमय-श्रयोगिभवस्थ-केवलज्ञान 
इस प्रकार अयोगिभवस्थ केवलज्ञान का वर्णन पूरा हुआ । यही भवस्थ-केवलज्ञान है । 


विवेधन-- यहां सकल प्रत्यक्ष का स्वरूप बताया गया है। श्ररिहन्त श्रौर सिद्ध भगवान्‌ मे 
केवलज्ञान समान होने पर भी स्वामी के भेद से उसके दो भेद किये हैं--(१) भवस्थकेवलज्ञान श्रौर 
(२) सिद्धकेवलज्ञान । 


जो ज्ञान ज्ञानावरणोय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और श्रन्तराय, इन चार घातिकर्मों के क्षय 
होने से उत्पन्न होता है, वह आवरण से सवंधा रहित एवं पूर्ण होता है। जिस प्रकार रवि-भण्डल मे 


५६] [ सन्दीसूर्ज 


प्रकाश्ष ही प्रकाश होता है अंधकार का लेछ भी नहीं होता, इसी प्रकार केवलज्ञान पूर्ण प्रकाश-पु ज 
होता है। उत्पन्न होने के बाद फिर कभी वह नष्ट नही होता ! यह ज्ञान सादि अनन्त है तथा सदा 
एक सरीक्षा रहने वाला है । 

केवलज्ञान मनुष्य भव मे ही उत्पन्न होता है, भय किसी भ्रव में तही। उसकी अ्वस्थिति 
सदेह और विदेह दोनो अबस्थाओो मे पाई जाती है। इसीलिए सूत्रकार ने भवस्थ एवं सिद्ध केवलज्ञान 
दो प्रकार का बताया है। मनुष्य शरीर मे भ्रवस्थित तेरहवे-चौदहवे गुणस्थानवर्त्ती प्रभु के केवलशान 
को भवस्थ केवलज्ञान कहते हैं तथा देहरहित मुक्तात्मा को सिद्ध कहते है। उनके ज्ञान को सिद्धकेवल 
कहा है । इस विषय मे वृत्तिकार ने कहा है-- 

“तत्रेह भवो मनुष्यभव एव ग्राह्योअ्न्यत्र केवलोत्पादाभावात्‌, भवे तिष्ठन्ति इति भवस्था' ।” 


भवस्थ केवलज्ञान भी दो प्रकार का बताया गया है। सयोगिभवस्थ केवलज्ञान और अयोगि- 
भवस्थ केवलज्ञान | वीर्यात्मा भ्र्थात्‌ भ्रात्मिक शक्ति से प्रात्मप्रदेशो मे स्पन्दन होने से मन, वचन 
प्रौर काय मे जो व्यापार होता है उसी को योग कहते है। वह योग पहले गुणस्थान से लेकर तेरहवे 
गुणस्थान तक पाया जाता है । चौदहवे गुणस्थान मे योगनिरुन्धन होने पर जीव भ्रयोगी कहलाता है । 
ग्राध्यात्मिक उत्कर्ष के चौदह स्थान या श्रेणिया है, जिन्हे गुणस्थान कहते हैं । बारहवे गुणस्थान में 
बीतरागता उत्पन्न हो जाती है किन्तु केवलज्ञान नहीं हो पाता । केवलज्ञान तो तेरह॒वे ग्रुणस्थान मे 
प्रवेश के पहले समय में ही उत्पन्न होता है। इसलिये उसे प्रथम समय का सयोगिभवस्थ केवलज्ञान 
कहते है । किन्तु जिसे तेरहवे गुणस्थान में रहते हुए एक से श्रधिक समय हो जते हैं, उस भ्रप्रथम- 
समय का सयोगिभवस्थ केवलज्ञान होता है। भ्रथवा जो तेरहवे गुणस्थान के अ्रन्तिम समय पर पहुँच 
गया है, उसे चरम समय सयोगिभवस्थ केवलज्ञान तथा जो तेरहवे गुणस्थान के चरम समय मे नही 
पहुचा उसके ज्ञान को भ्रचरम समय सयोगिभवस्थ केवलज्ञान कहा जाता है। 


श्रयोगिभवस्थ केवलज्ञान के भी दो भेद हैं-जिस केवलज्ञान-प्राप्त श्रात्मा को चौदहवे 
गुणस्थान मे प्रवेश किये हुए पहला समय ही हुआ है, उसके ज्ञान को प्रथम समय अभ्रयोगिभवस्थ-केवल 
ज्ञान कहते है। झौर जिसे प्रवेश किये प्रनेक समय हो यये है, उसके ज्ञान को प्रप्रथम समय भ्रयोगि- 
भवस्थ-केवलज्ञान कहते है। ग्रथवा जिसे सिद्ध होने मे एक समय ही शेष रहा है उसके ज्ञान को 
चरमसमय-श्रयोगिभवस्थ केवलज्ञान तथा जिसे सिद्ध होने भे एक से भ्रधिक समय शेष है, ऐसे चौदहवे 
गुणस्थान के स्वामी के केवलज्ञान को ग्रचरम-समय-प्रयोगिभवस्थ-केवलज्ञान कहते है । 


चौदह॒वे गुणस्थान की स्थिति, श्र, इ, उ, ऋ, और ल इन पाँच श्रक्षरो के उच्चारण में जितना 
समय लगता है, मात्र इतनी ही है । इसे शेलेशी अवस्था भी कहते हैं । 

सिद्ध वे कहलाते हैं जो पभ्राठ कर्मों से सवंथा विमुक्त हो गए हैं। वे सख्या मे श्रनन्त हैं, किन्तु 
स्वरूप सबका सदृश है । उनका केवलज्ञान सिद्ध केवलज्ञान कहलाता है । 


सिद्ध शब्द की व्युत्पक्ति इस प्रकार है-- 


“षिघु सराद्धो, सिध्यति सम इति सिद्ध., यो येन गुणेन परिनिष्ठितो, न पुन साधनीय: स 
सिद्ध उच्यते, यथा सिद्ध श्रोदद सच कर्मासिद्धदिभेदादनेकविध:, श्रथवा सित-बद्ध॑ध्मात भस्मी- 
कृतभष्टप्रकार कर्म येन स सिद्ध, सकलकमं विनिमु क्तो मुक्तावस्थामुपगत इत्यथे' ।” 


शांत के वांच प्रकार ] | ४४ 


प्र्यात्‌ जिन प्रात्माओं ने श्रार्ठों कर्मों को नष्ट कर दिया है भोर उनसे मुक्त हो गए हैं उन्हें 
सिद्ध कहते हैं। यद्यपि सिद्ध भ्रनेक प्रकार के हो सकते हैं, यथा- कर्म सिद्ध, शिल्पसिद्ध, चिणआसिद्ध, 
मंत्रसिड, योगसिद्ध, श्रागमसिद्ध, अ्र्थंसिद्ध, यात्रासिद्ध, तप सिद्ध, कर्मक्षयसिद्ध भ्रादि, किन्तु यहाँ 
कर्मक्षयसिद्ध का ही श्रधिकार है । 

कर्मक्षयजन्य गुण कभी लुप्त नही होते । वे भ्रात्मा की तरह भ्रविनाशी, सहभावी, श्ररूपी भौर 
श्रमृ्त होते है । भ्रत सिद्धों मे इनका होना और सर्देव रहना श्रनिवायं है। 


सिद्ध फेवलज्ञान 


४०-से कि त॑ सिद्धकेवलनाणं ? 
सिद्धकेवलनाणं दुविहूं पण्णसं त॑ जहा- अणंतरसिद्ध-केवलनाणं च, परंपरसिद्ध केवलनाणं जे । 


४०- प्रश्न- सिद्ध केवलज्ञान कितने प्रकार का है 

उत्तर-वह दो प्रकार का है, यथा-(१) श्रनन्तरसिद्ध केवलज्ञान भश्ौर (२) परम्परसिद्ध 
केवलज्ञान । 

विवेच्वन--जन दर्शन के भ्रनुसार तेजस और कार्मण शरीर से आत्मा का सर्वधा मुक्त या 
पृथक हो जाना ही मोक्ष है। प्रस्तुत सूत्र मे सि्धकेवलज्ञान के दो भेद किये गये हैं-- 


(१) श्रनन्तरसिद्ध केवलज्ञान--जिन्हे सिद्ध हुए एक समय ही हुआ हो उन्हे ग्रनन्त रसिद्ध कहते 
है | उनका ज्ञान भ्रनन्तरसिद्ध-केवलज्ञान है । 


(२) परम्परसिद्ध-केवलज्ञान--जिन्हे सिद्ध हुए एक से भ्रधिक समय हो गये हो उन परम्पर- 
सिद्ध केवलज्ञानियों का केवलज्ञान । 

वत्तिकार ने निम्न भ्राठ द्वारो के ग्राघार पर सिद्ध स्वरूप का वर्णन किया है। वे है-- 

(१) सत्पदप्रूपणा, (२) द्रव्यप्रमाणद्वार, (३) क्षेत्रद्वार, (४) स्पर्शवाद्वार, (५) कालद्वार 
(६) प्रन्तरद्वार, (७) भावद्वार, (८) अल्पबहुत्वद्वार । 

इन प्राठो द्वारो पर भी पन्द्रह-पन्द्रह उपद्वार घटाये गये हैं। ये क्रमश इस प्रकार हैं-- 

(१) क्षेत्र, (२) काल, (३) गति, (४) वेद, (५) तीर्थ, (६) लिड्भर, (७) चारित्र, (८) बुद्ध, 


(९) ज्ञान, (१०) भ्रवगाहना, (११) उत्कृष्ट, (१२) अन्तर, (१३) भनुसमय, (१४) सख्या, 
(१५) प्रल्पबहुत्व । 


सत्पदप्ररूपणा 
(१) क्षेत्रद्ार--भ्रढाईद्वीप के भ्रन्तगंत पन्द्रह कर्मभूमि से सिद्ध होते हैं। सहरण की भ्रपेक्षा 


दो समुद्र, प्रकमंभूमि, प्रन्तरद्वोप, ऊध्वेंदिशा में पण्डुकवन तथा भ्रधोदिशा में प्रधोगामिनी विजय से 
भी सिद्ध होते हैं । 


५६] [नम्दौसूत 


(२) कालद्वार-भ्रवसपिणी काल के तीसरे भ्रारे के उतरते समय ३ बर्ष साढे आठ मास शेष 
रहने पर, सम्पूर्ण चौथे भारे तथा पाँचवें भारे में ६४ वर्ष तक सिद्ध होते हैं । उत्सपिणी काल के तीसरे 
ग्रारे मे भर चौथे झारे मे कुछ काल तक सिद्ध हो सकते है । 

(३) गतिद्वार- प्रथम चार नरको से, पृथ्वी-पानी श्रोर बादर वनस्पति से, सज्ञी तिर्य॑च- 
पच्चेन्द्रिय, मनुष्य, भवनपति, बानव्यन्तर, ज्योतिष्क और वेमानिक--चारो जाति के देवो से निकले हुए 
जीव मनुष्यगति प्राप्त कर सिद्ध हो सकते हैं । 


(४) वेदद्वार--वर्तमानकाल की भ्रपेक्षा प्रषणत-वेदी (वेदरहित) ही सिद्ध होते है, पहले चाहै 
उन्होने (स्त्री वेद, पुरुष वेद या नपु सक वेद) तीनों वेदो का अनुभव किया हो । 


(५) तीथ्द्वार- तीर्थकर के शासनकाल मे ही श्रधिक सिद्ध होते हैं। बहुत कम जीव श्तीर्थ 
में सिद्ध होते हैं । 


(६) लिडूद्वार-द्रव्य से स्वलिज्ी, श्रन्यलिज्जी और गृहिलिड्डी सिद्ध होते है। भाव से 
स्वलिज्री ही सिद्ध होते हैं । 


(७) चारित्रद्वार-चारित्र पाँच होते हैं। इनके झ्राधार पर कोई सामायिक, सृक्ष्मसपराय 
झौर यथाख्यात चारित्र से, कोई सामायिक, छेदोपस्थानीय, सूक्ष्मसपराय एवं यथाख्यात चारित्र से 
तथा कोई पाँचो से ही सिद्ध होते हैं । यथाख्यातचारित्र के भ्रभाव मे कोई ग्रात्मा सिद्ध नही हो सकती, 
वह सिद्धि का साक्षात्‌ कारण है । 


(८) बुद्धद्वार-प्रत्येकबुद्ध, स्वयबुद्ध श्रौर बुद्धबोधित -इन तीनो गअवस्थाओं से सिद्ध होते है । 


(९) ज्ञानद्वार-साक्षत्‌ रूप से केवलज्ञान से ही सिद्ध होते है, किन्तु पूर्वावस्था की श्रपेक्षा से 
मति, श्रुत, श्रोर केवलज्ञान से, कोई मति, श्रुत श्रवधि और केवलज्ञान से श्रौर कोई मत्ति, श्रुत, 
मनःपर्यंव ओर केवलज्ञान से तथा कोई मति, श्रुत, श्रवधि, मन पयेव और केवलज्ञान से सिद्ध होते है । 

(१०) श्रवगाहनाद्वार--जघन्य दो हाथ, मध्यम सात हाथ श्लौर उत्कृष्ट ५०० घनुष की 
प्रवगाहना वाले सिद्ध होते हैं । 

(११) उत्कृष्टद्वा र--कोई सम्यक्त्व प्राप्त होने के बाद प्रतिपाती होकर देशोन भ्रद्धंपुदूगल 
परावर्ततन काल व्यतीत होने पर सिद्ध होते है। कोई प्रतन्‍्तकाल के बाद सिद्ध होते है तथा कोई 
असख्यात और कोई संख्यातकाल के पश्चात्‌ सिद्ध होते है । 


(१२) भ्रन्तरद्वार--सिद्ध होने का श्रन्तरकाल जघन्य एक समय श्रौर उत्कृष्ट छह मास है । 
छुह मास के पश्चात्‌ कोई न कोई जीव सिद्ध होता ही है । 


(१३) प्रनुसमयद्वार--जघन्य दो समय तक झ्रौर उत्कृष्ट श्राठ समय तक लगातार सिद्ध होते 
रहते हैं | भ्राठ समय के पश्चात्‌ अन्तर पड जाता है । 

(१४) सख्याद्वार -जघन्य एक समय में एक श्ौर उत्कृष्ट एक सौ श्राठ सिद्ध होते है। इससे 
झधिक सिद्ध एक समय मे नही होते । 


शाम के पांच प्रकार ] [५७ 


(१५) प्रल्पबहुत्वद्वार- एक समय में दो, तीन भ्ादि सिद्ध होने वाले स्वल्प जीव हैं। एक- 
एक सिद्ध होने वाले उनसे सख्यात गुणा प्रधिक हैं। 


(२) द्रव्यद्ार 


(१) क्षेत्रद्वा र--ऊध्व॑ दिशा मे एक समय में चार सिद्ध होते है। जंसे--निषधपवंत, नन्दनवन, 
प्रौर मेरु श्रादि के शिखर से चार, नदी नालों से तीन, समुद्र मे दो, पण्डकवन मे दो, तीस अकमंभूमि 
क्षेत्रो मे से प्रत्येक मे दस-दस, ये सब सहरण की श्रपेक्षा से हैं। प्रत्येक विजय मे जधन्य २०, उत्कृष्ट 
१०८ । पन्द्रह कर्मभूमि क्षेत्रों मे एक समय में उत्कृष्ट १०८ सिद्ध हो सकते है, ग्रधिक नही । 


(२) कालद्वार-- श्रवसपिणी काल के तीसरे झ्लौर चौथे भारे में एक समय में उत्कृष्ट १०८ 
तथा पाँचवे आरे मे २० सिद्ध हो सकते हैं, श्रधिक नहीं। उत्सपिणी काल के तीसरे भ्रौर चौथे ग्रारे 
में भी ऐसा ही समझता चाहिए । शेष सात आरो मे सहरण की अपेक्षा एक समय मे दस-दस सिद्ध 
ही सकते है। 


(३) गतिद्वार--रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा और बालुकाप्रभा, इन नरकभूमियों से निकले हुए एक 
समय में दस, पकप्रभा से निकले हुए चार, सामान्य रूप से तिर्यंच से निकले हुए दस, विशेष रूप से 
पृथ्वीकाय श्रौर अ्रपूकाय से चार-चार श्रौर वनस्पतिकाय से आए छह सिद्ध हो सकते है । 


विकलेन्द्रिय तथा असज्ञी तियंकपचेन्द्रिय से निकले हुए जीव सिद्ध नही हो सकते । सामान्यतः 
मनुष्य गति से आए हुए बीस, मनुष्यपुरुषो से निकले हुए दश, मनुष्यस्त्री से बीस। सामान्यत देव- 
गति से श्राए हुए एक सौ ग्राठ सिद्ध हो । भवनपति एव व्यन्तर देवो से दस-दस तथा उनकी देवियों से 
पॉच-पाँच । ज्योतिष्क देवो से दस, देवियो से बीस भश्रौर वैमानिक देवो से श्राए हुए १०८ तथा उनकी 
देवियों से ग्राए हुए एक समय में बोस सिद्ध हो सकते है । 


(४) वेदद्वा र--एक समय मे स्त्रीवेदी २०, पुरुषवेदी १९०८ श्रौर नपु सकवेदी १० सिद्ध हो 
सकते है | पुरुष मरकर पुन पुरुष बनकर १०८ सिद्ध हो सकते है । 

(५) तीर्थकरद्वार- एक समय मे पुरुष और तीर्थंकर चार श्रौर स्त्री तीर्थंकर दो सिद्ध हो 
सकते हैं । 

(६) बुद्धदा र--एक समय मे प्रत्येकबुद्ध १०, स्वयबुद्ध ४, बुद-बोधित १०८ सिद्ध हो 
सकते है ! 

(७) लिज़ुद्वार -एक समय मे गृहलिज्धी चार, अन्यलिजड्री दस, स्वलिज्री एक सौ आ्राठ सिद्ध 
हो सकते है । 

(८) चारित्रद्वा र--सामायिक चारित्र के साथ सृक्ष्मससाम्पराय तथा यथाख्यात चारित्र पालकर 
एक समय मे १०८ तथा छेदोपस्थापनासहित चार घारित्रो का पालन करने वाले भी १०८ और पाँचो 
की प्राराधना करने वाले एक समय मे १० सिद्ध हो सकते हैं। 


(९) ज्ञानद्वार --पुर्वभाव की श्रपेक्षा से एक समय मे मति एवं श्रुतज्ञान के धारक उत्कृष्ट 


भ्रष | [ नम्दीसूत्र 


चार, मति श्रुत व मन 'पयंव ज्ञान वाले दस, मति, श्रुत, भ्रवधिज्ञानी तथा चार ज्ञान के स्वामी केवल- 
ज्ञान प्राप्त करके एक सौ भ्राठ सिद्ध हो सकते हैं । 


(१०) भ्रवगहनद्वार--एक समय में जघन्य अवगाहना वाले उत्कृष्ट चार, मध्यम भ्रवगाहना 
वाले उत्कृष्ट १०८, उत्कृष्ट भ्रवगाहना वाले दो सिद्ध हो सकते हैं । 


(११) उत्कृष्टद्वा र-श्रनन्तकाल के प्रतिपाती यदि पुन सम्यक्त्व प्राप्त करे तो एक समय मे 
एक सौ ग्राठ, अ्सख्यातकाल एव सख्यातकाल के प्रतिपाती दस-दस। श्रप्नतिपाती सम्यक्त्वी चार 
सिद्ध हो सकते है। 


(१२) भ्रन्तरद्वार--एक समय के श्रन्तर से ग्रथवा दो, तीन एव चार समयो का अन्तर पाकर 
सिद्ध हो । इसी क्रम से आगे समझना चाहिए । 


(१३) अ्नुसमयद्वा र-यदि आठ समय पर्यत निरन्तर सिद्ध होते रहे तो पहले समय में जधघन्य 
एक, दो, तीन, उत्कृष्ट बत्तीस, इसी क्रम मे दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवे, छठे, सातवे ग्रौर झराठव 
समय मे समझना । फिर नौवे समय मे ग्रवश्य अ्रन्तर पडता है श्रर्थात्‌ कोई जीव सिद्ध नहीं होता । 
३३ से ४८ निरन्तर सिद्ध हो तो सात समय पर्यन्त हो, आरठवे समय मे अवश्य अन्तर पड जाता है । 
यदि ४९ से लेकर ६० पर्यन्त निरन्तर सिद्ध हो तो छह समय तक सिद्ध हो, मातवे मे ग्रन्तर पड 
जाता है | यदि ६१ से ७२ तक निरन्तर सिद्ध हो तो उत्कृष्ट पाँच समय पर्यन्त ही हो, बाद मे निश्चित 
विरह पड जाता है। यदि ७२ से लेकर ८४ पर्यन्त सिद्ध हो तो चार समय तक सिद्ध हो सकते है, 
पाँचवें समय में अवश्य अन्तर पड जाता है। यदि ८५ से लेकर ९६ पर्यन्त सिद्ध हो तो तीन समय्र 
पर्यन्त हो । यदि ९७ से लेकर १०२ सिद्ध हो तो दो समय तक हो, फिर अन्तर पड जाता हे । यदि 
पहले समय मे ही १०३ से १०८ सिद्ध हो तो दूसरे समय मे भ्रन्तर ग्रवश्य पडता है । 


(१४) सख्याद्वार--एक समय मे जघन्य एक झोर उत्कृष्ट १०८ सिद्ध हो । 
(१५) अल्पबहुत्व- पूर्वोक्त प्रकार से ही है। 


(३) क्षेत्रद्वार 
मानुषोत्तर पर्वत के शअन्तगंत श्रढाई ढवीप, लवण और कालोदधि समुद्र हैं। कोई भी जीव 
सिद्ध होता है तो इन्ही द्वीप समुद्रो से होता है। ग्रढाई द्वीप से बाहर केवलज्ञान नहीं हो सकता और 
केवलज्ञान के बिना मोक्षप्राप्ति सम्भव नही है। इसमे भी १५ उपद्वार है जिन्हे पहले की भाति 
समभाना चाहिये । 


(४) स्पर्शनाहार 


जो भी सिद्ध हुए है, हो रहे है या आगे होगे वे सभी भ्रात्मप्रदेशों से परस्पर मिले हुए है । 
यथा --/एक माँहि श्रनेक राजे श्रनेक माहि एककम्‌ ।” जैंसे--हजारो, लाखो प्रदीपो का प्रकाश 
एकीभूत होने से भी किसी को किसी प्रकार की अ्ड़चन या बाधा नही होती, बसे ही सिद्धों के विषय 
में भी समभना चाहिए | यहाँ भी १५ उपद्वार पहले की तरह जाने । 


मान के पांच प्रकार ] [५९ 


(५) कालद्वार 


जिन क्षेत्रों मे से एक समय मे १०८ सिद्ध हो सकते हैं, वहाँ से निरन्तर झ्राठ समय तक सिद्ध 
हो, जिस क्षेत्र से १० या २० सिद्ध हो सकते हैं, वहाँ चार समय तक निरन्तर सिद्ध हो, जहा से 
२, ३, ४, सिद्ध हो सकते है, वहाँ दो समय तक निरन्तर सिद्ध हो । इसमे भी क्षेत्रादि उपद्वार 
घटाते हैं-- 

(१) क्षेत्रद्वार-- एक समय मे १५ कर्मभूमियों मे १०८ उत्कृष्ट सिद्ध हो सकते है, वहाँ 
अन्तर रहित श्राठ समय तक सिद्ध हो सकते है । प्रकर्मभूमि तथा पअ्रधोलोक मे चार समय तक, 
नन्‍्दन बन, पाण्डक-वन श्र लवण समुद्र मे निरतर दो समय तक, श्रौर ऊध्वंलोक मे निरतर चार 
समय तक सिद्ध हो सकते है । 

(२) कालद्वार- प्रत्येक अवसपिणो श्रौर उत्सपिणी के तीसरे, चौथे आरे मे निरतर आाठ- 
ग्राठ समय तक और शेष आरो मे ४-४ समय तक निरतर सिद्ध हो सकते है। 

(३) गतिद्वार --देवगति से आये हुए उत्कृष्ट आठ समय तक, शेष तीन गतियो मे चार-चार 
समय तक निरतर सिद्ध हो सकते हैं । 

(४) वेदद्वार-जो पूर्व॑जन्म मे पुरुष थे और इस भव मे भी पुरुष हो, वे उत्कृष्ट ८ समय तक 
श्रौर शेष भगो वाले ४ चार समय तक निरतर सिद्ध हो सकते है। 

(५) तीर्थद्वार--किसी भी तीर्थकर के शासन मे उत्कृष्ट 5 समय तक तथा पुरुष तीर्थंकर 
श्रौर स्त्री तीर्थथर निरतर दो समय तक सिद्ध हो सकते है, श्रधिक नही । 

(६) लिज्रद्वार -स्वलिड्ू में आठ समय तक, अ्रन्य लिड्भ मे ४ समय तक, गृहलिग मे 
निसतर दो समय तक सिद्ध हो सकते है । 

(७) चारित्रद्वा र--जिन्होने क्रमश पाचो हो चारित्रों का पालन किया हो, वे चार समय | 
तक, शष तोन या चार चारित्र वाले उत्कृष्ट श्राठ समय तक लगातार सिद्ध हो सकते हैं । 

(८) बुद्धद्धार--बुद्धधोधित ग्राठ समय तक, स्वयबुद्ध दो समय तक, सामान्य साधु या साध्वी 
के द्वारा प्रतिबुद्ध हुए चार समय तक निरतर सिद्ध हो सकते है। 

(९) ज्ञानद्वार- प्रथम दो ज्ञानो से (मति, श्रुतसे) केवली हुए दो समय तक, मति, श्रुत 
एवं मन पर्यवज्ञान से केवली हुए ४ समय तक तथा मति, श्रुत, भ्रवधि ज्ञान से शौर चारो ज्ञानपूर्वक 
केवली हुए ८ समय तक सिद्ध हो सकते है । 

(१०) भ्रवगहनाद्वार-- उत्कृष्ट प्रवगाहना वाले दो समय तक, मध्यम अवगाहना वाले 
निरतर ८ समय तक, जघन्य भ्रवगाहना वाले दो समय तक निरन्तर सिद्ध हो सकते है । 

(११) उप्कृष्टद्वार - -अप्रतिपाती सम्यक्त्वी दो समय तक, सख्यात एवं भ्रसख्यात काल तक 
के प्रतिपाती उत्कृष्ट ४ समय तक, अनन्तकाल प्रतिपाती सम्यक्त्वी उत्कृष्ट ८ समय तक सिद्ध 
हो सकते हैं । 

नोट--शेष चार उपद्वार घटित नही होते । 


६०] [ नम्दीसूत 


(६) अल्तरद्वार 


जितने काल तक एक भो जीव सिद्ध न हो उतना समय अन्तरकाल या विरहकाल कहलाता 
है। यही विरहकाल यहाँ विभिन्न द्वारो से बतलाया गया है-- 


(१) क्षेत्रद्वार-संमुच्चय अढाई द्वीप मे विरह जधन्य १ समय का, उत्कृष्ट ६ मास का। 
जम्बूद्ीप के महाविदेह गौर धातकीखण्ड के महाविदेह में उत्कृष्ट पृथकृत्व (२से ९ तक) वर्ष का, 
पुष्कराद्ध द्वीप मे एक वर्ष से कुछ अधिक काल का विरह पड़ सकता है। 


(२) कालद्वार--जन्म को अपेक्षा से--५ भरत ५ एरावत मे १८ कोडाकोडी सागरोपम से कुछ 
न्यून समय का श्रन्तर पडता है। क्योंकि उत्सपिणी काल का खौथा ग्रारा दो कोडाकोडी सागरोपभ, 
पाँचबा तोन और छठा चार कोड़ाकोडी सागरोपम का होता है। भ्रवसपिणी काल का पहला आरा 
चार, दूसरा तोन और चौथा दो कोडाकोडी सागरोपम का होता है। ये सब १८ कोड़ाकोडी हुए । 
इनमे से उत्सपिणी काल में चौथे आरे की झ्रादि मे २४ वे तीर्थंकर का शासन सख्यात काल तक 
चलता है । तत्पश्चात्‌ विच्छेद हो जाता है | भ्रवसपिणी काल के तीसरे श्रारे के श्रन्तिम भाग मे पहले 
तीर्थकर पैदा होते है। उनका शासन तीसरे झ्नारे मे एक लाख पूर्व तक चलता है, इस कारण श्रठारह 
कोडाकोडी से कुछ न्यून कहा । उस शासन मे से सिद्ध हो सकते हैं, उसके व्यवच्छेद होने पर उस क्षेत्र 
में जन्मे हुए सिद्ध नही होते । सहरण को अपेक्षा से उत्कृष्ट भ्रन्तर सख्यात हजार वर्ष का है । 

(३) गतिद्वार--नरक से निकले हुए सिद्ध होने का उत्कृष्ट श्रन्तर पृथकत्व हजार वर्ष का, 
तिर्यच से निकले हुए सिद्धो का अतर प्रथक्त्व १०० वर्ष का, तिर्यचो शोर सौधमं-ईशान देवलोक के 
देवो को छोडकर शेष सभी देवो से श्राए सिद्धो का श्रन्तर १ वर्ष से कुछ श्रधिक का एवं मानृषी 
का भ्रन्तर, स्वयबुद्ध होने का सख्यात हजार वर्ष का । पृथ्वी, पानी, वनस्पति, सौधमं-ईशान देवलोक 
के देव श्रौर दूसरी नरकभूमि, इनसे निकले हुए जीवो के सिद्ध होने का उत्कृष्ट ग्रन्तर हजार बर्ष का 
होता है। जघन्य सर्वे स्थानों मे एक समय का श्रन्तर जानना चाहिए । 

(४) वेदद्वार--पुरुषवेदी से ग्रवेदी होकर सिद्ध होने का उत्कृष्ट विरह एक वर्ष से कुछ 
ग्रधिक, स्त्रीवेदी श्रौर नपु सक बेदी से भ्रवेदी होकर सिद्ध होने बालो का उत्कृष्ट विरह्‌ सख्यात हजार 
वर्ष का है। पुरुष मरकर पुन पुरुष बने, उनका सिद्धिप्राप्ति का उत्कृष्ट भ्रन्तर एक वर्ष से कुछ 
ग्रधिक है । शेष झ्राठ भगो के प्रत्येक भग के श्रनुतार सख्यात हजार वर्षों का अन्तर है। भ्रत्येकबुद्ध 
का भी इतना ही श्रन्तर है। जघन्य भ्रन्तर सर्व स्थानों मे एक समय का है । 

(५) तीर्थक रद्वार--तीर्थकर का मुक्तिप्राप्ति का डल्कृष्ट अतर पृथक्त्व हजार पूर्व श्रोर 
स्‍त्री तीर्थकर का उत्कृष्ट अनन्तकाल । प्तीर्थकरो का उत्कृष्ट बिरह एक वर्ष से अ्रधिक, नोतीर्थसिद्धो 
(प्रत्येकबुद्धी) का सख्यात हजार दर्ष का तथा जधघन्य सभी का एक समय का । 

(६) लिडुद्धार- स्वलिज्भजी सिद्ध होने का जघन्य एक समय, उत्कृष्ट एक वर्ष से कुछ अधिक, 
प्रन्य लिगी श्रौर गृहिलिगी का उत्कृष्ट सख्यात सहन वर्ष का । 

(७) चारित्रद्वार- पूर्वभाव की अपेक्षा से सामायिक, सूक्सपराय और यथाख्यात चारित्र 
पालकर सिद्ध होने का अ्रन्तर एक वर्ष से कुछ अधिक काल का, शेष का अर्थात्‌ छेदोपस्थापनीय और 


शत के पांच प्रकार ] (६१ 


परिहार-विशुद्धि चारित्र का प्रन्तर १८ कोड़ाकोडी सागरोपम से कुछ भ्रधिक का। ये दोनों चारित्र 
भरत और ऐरावत क्षेत्र में पहले श्ौर अंतिम तीर्थंकर के समय मे होते हैं । 


(८) बुद्धद्वार--बुद्धयोधित हुए सिद्ध होने का उत्कृष्ट भ्रन्तर १ वर्ष से कुछ भ्रधिक का, शेष 
प्रत्येकबुद्ध तथा साध्वी से प्रतिबोधित हुए सिद्ध होने का सख्यात हजार वर्ष का तथा स्वयद्ुद्ध का, 
पृथक्त्व सहख्र पूर्व का अन्तर जानना चाहिए । 

(९) ज्ञानद्वार--मति-श्रुत ज्ञानपूर्वंक केवलज्नान प्राप्त करके सिद्ध होने वालो का भ्रन्तर 
पल्योपम के अ्रसख्यातवे भाग प्रमाण का तथा मत्ति, श्रुत एवं श्रवधिज्ञान के केवलज्ञान प्राप्त करने 
वालो का सिद्ध होने का अतर वर्ष से कुछ अधिक । इनके ग्रतिरिक्त चारो ज्ञानों के केवलज्ञान प्राप्त 
कर सिद्ध होने वालो का उत्कृष्ट अतर सख्यात सहस्र वर्ष का जानना चाहिए । 

(१०) अवगाहनाद्वार--१४ राजूलोक का घन बताया जाय तो ७ राजूलोक हो जाता है। 
उसमे से, एक प्रदेश की श्रेणी सात राज्‌ लम्बी है, उसके असख्यातवे भाग में जितने श्ाकाश प्रदेश 
है, यदि एक-एक समय में एक-एक भ्राकाक्ष प्रदेश का अपहरण करे तो उन्हे रिक्त होने मे जितना काल 
लगे उतना उत्कृष्ट श्रवगाहना वालो का उत्कृष्ट अन्तर पडे । मध्यम पश्रवगाहना वालो का उत्कृष्ट 
अन्तर एक वर्ष से कुछ अधिक । जघन्य अन्तर सर्वस्थानो मे एक समय का । 


(११) उत्कृष्टद्वा र-- अप्रतिपाती सिद्ध होने का अन्तर सागरोपम का अ्रसख्यातवाँ भाग, 
सख्यातकाल तथा असख्यातकाल के प्रतिपाती हुए सिद्ध होने वालो का अ्रन्तर उ० सख्यात हजार वर्ष 
का तथा ग्रनन्तकाल के प्रतिपाती हुए सिद्ध होने वालो का अन्तर १ वर्ष से कुछ अधिक का । जधन्य 
सब स्थानों मे एक समय का श्रन्तर । 


(१२) भ्रनुसमयद्वा र--दो समय से लेकर ग्राठ समय तक निरन्तर सिद्ध होते है । 
(१३) गणनाद्वार - एकाकी या प्ननेक सिद्ध होने का भ्रन्तर उत्कृष्ट सख्यात हजार वर्ष का । 
(१४) अल्पबहुत्वद्वार--पूर्ववत्‌ । 


(७) भावद्वार 
भाव छ होते है--औदबिक, श्पशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक, पारिणामिक और साज्नि- 
पातिक | क्षायिक भाव से ही सब जीव सिद्ध होते है । 
इस द्वार मे १५ उपद्वारों का विवरण पूबंवत्‌ समझ लेना चाहिए। 


(८) अल्पबह॒त्वद्वार 


ऊध्बेलोक से सबसे थोडे ८ सिद्ध होते है | प्रकमंभूमि क्षेत्र मे १० सिद्ध होते हैं। वे उनसे 
सख्यातगुणा हैं । स्त्री श्रादि से २० सिद्ध होते हैं । वे सख्यात गुणा होते है क्योकि साध्वी का सहरण 
नही होता । उनसे भ्रलग-अलग विजयो में तथा श्रधोलोक मे २० सिद्ध हो सकते हैं। उनसे १०८ 
सिद्ध होने वाले सख्यातगुणा अ्रधिक है । 


इस प्रकार श्रनस्तरसिद्ध-केवलज्ञान का वर्णन समाप्त हुआ । 


६१| [ नम्बौसूत्र 


परमभ्परसिद्ध केवलज्ञान 


जिनको सिद्ध हुए एक समय से ग्रधिक ग्रथवा अनन्त समय हो गए है वे परम्परसिद्ध कहलाते 
है । उनका द्रव्यप्रमाण सात द्वारो मे तथा १५ उपद्वारों में प्रनन्त कहना चाहिए क्योकि ये प्नन्त- 
रहित हैं, काल भ्रनन्त है । सर्वक्षेत्रो से श्रनन्‍्त जीव सिद्ध हुए है । 


श्रनन्तरसिद्ध-के वलज्ञान 
४९- से कि ते श्रणंतरसिद्धकेवलनाणं ? 
अणतरसिद्धकेवलनाणं पण्णरसबिहं पण्णत्त, त॑ं जहा- 


(१) तित्यसिद्धा (२) अतित्थसिद्धि 

(३) तित्थयरसिद्धा (४) अतित्थयरसिद्धा 

(५) सयब॒ुद्धसिद्धा (६) पत्तेयबुद्धसिद्धा (७) बुद्धबोहियसिद्धा 

(८) इत्यिलिगसिद्धा (९) पुरिर्सालगसिद्धा (१०) नपु सर्गालगसिद्धा 
(११) सलिगसिद्धा (१२) प्रन्नलिगसिद्धा (१३) गिहिलिगसिद्धा 
(१४) एगसिद्धा (१५) अणेगसिद्धा, 
से त्त प्रणतरसिद्धकेवलनाण । 


प्रशन--अन्त रसिद्ध-केवलज्ञान कितने प्रकार का है ? 

उत्तर- प्नन्तरसिद्ध केवलज्ञान १५ प्रकार से वणित है। यथा - 

(१) तोर्थंसिद्ध (२) अतोर्थसिद्ध (३) तीर्थकरसिद्ध (४) अ्रतीर्थकरसिद्ध (५) स्वयबुद्ध- 
सिद्ध (६) प्रत्येकबुद्धसद्ध (७) बुद्धयोधितसिद्ध (८) स्त्रीलिगसिद्ध (९) पुरुषलिगसिद्ध 
(१०) नपु सकलिगसिद्ध (११) स्वलिगसिद्ध (१२) भ्रन्यलिगसिद्ध (१३) गृहिलिगसिद्ध (१४) 
एकसिद्ध (१५) अनेकसिद्ध । 


विवेचन- प्रस्तुत सूत्र मे श्रनन्तरसिद्ध केवलज्ञान के सबंध मे विवेचन किया गया है । जिन 
प्रात्माओं को सिद्ध हुए एक ही समय हुआ हो, उन्हे अनन्तरसिद्ध कहते हैं प्रौर उनका ज्ञान अनन्तर- 
सिद्धकेवलज्ञान कहलाता है। अनन्तरसिद्ध केवलज्ञानी भवोपाधि भेद से १५ प्रकार के है । यथा -- 


(१) तोर्थंसिझ--जिसके द्वारा ससार तरा जाए उसे तोर्थ कहते है। चतुविध श्रीसघ का नाम 
तीथं है। तीर्थ की स्थापना होने पर जो सिद्ध हो, उन्हे तीर्थसिद्ध कहते है। तीर्थ की स्थापना तीर्थकर 
करते है । 


(२) अतीर्थसिद्ध--तोीर्थ की स्थापना होने से पहले श्रथवा तीथ के व्यवच्छेद हो जाने के 
पश्चात्‌ जो जीव सिद्धगति प्राप्त करते हैं बे श्रतीर्थंसिद्ध कहलाते हैं । जेसे माता मरुदेवी ने तीर्थ की 
स्थापना से पूर्व सिद्धगति पाई । भगवान्‌ सुविधिताथजों से लेकर शातिनाथ भगवान्‌ के शासन तक 
बीच के सात अन्तरो में तीर्थे का विच्छेद होता रहा । उस समय जातिस्मरण भ्रादि ज्ञानसे जो 
श्रन्तकृत केवली हुए उन्हे भी अतीर्थंसिद्ध कहते है । 


ज्ञान के पांच प्रकार ] [ ६३ 


(३) तीर्थकरसिद्ध-विश्व मे लौकिक लोकोत्तर पदो में तीर्थंकर का पद सर्वोपरि है। जो 
इस पद की प्राप्ति करके सिद्ध हुए हैं वे तीर्थंकर सिद्ध हैं । 


(४) अतीर्थकरसिद्ध-तीर्थंकर के भ्रतिरिक्त भ्रन्य जितने चक्रवर्ती, बलदेव, माण्डलिक, 
सम्राट, आचार्य, उपाध्याय, गणघर, अन्तकृत्‌ केवली, सामान्य केवली श्रादि सिद्ध हुए वे श्रतीर्थंकर 
सिद्ध कहलाते है । 


(५) स्वयबुद्धसिद्ध-जजो किसी बाह्य निमित्त के बिना जातिस्मरण अ्रथवा अ्रवधिज्ञान के 
द्वारा स्वयं ससार से विरक्त हो जाएँ उन्हे स्वयबुद्ध कहते है। स्वयबुद्ध होकर सिद्ध होने वाले 
स्वयबुद्धसिद्ध है । 


(६) प्रत्येकबुद्धसिद्धझजो उपदेशादि श्रवण किये बिना, बाह्य किसी निमिल्त से बोध प्राप्त 
करके सिद्ध होते है वे प्रत्येकबुद्ध सिद्ध कहलाते है । जैमे--करकण्ड एवं नमिराज ऋषि ग्रादि । 


(७) बुद्धबोधितसिद्ध- जो तीर्थकर अथवा आचार्य आदि के उपदेश से बोध प्राप्त कर सिद्ध- 
गति प्राप्त कर उन्हे बुद्धयोधितसिद्ध कहते है। यथा--चन्दनबाला, जम्बूकुमार एवं अतिमुक्तकुमार 
आदि। 

(८) स्त्रीलिगसिद्ध-- सूत्रकार ते स्त्नीत्व के तीन भेद बताये है। यथा--(९) वेद से (२) 
नि त्ति से और (३) वेष से | वेद के उदय से और वेष से मोक्ष सभव नहीं है, केवल शरीरनिव त्ति 
से ही सिद्ध होना स्वीकार किया गया है । जो स्त्री के शरीर मे रहते हुए मुक्त हो गए है, वे स्त्रीलिग- 
सिद्ध है । 


(५९) पुरुषलिगसिद्ध- पुरुष की आकृति मे रहते हुए मोक्ष प्राप्त करने वाले पुरुषलिग सिद्ध 
कहलाते है । 


(१०) नपु सकलिगसिद्ध --नपु सक दो त्तरह के होते है। (१) स्त्री-नपु सक (२) पुरुष- 
नपु सक । जो पुरुषनपु सक सिद्ध होते है वे नपु सकलिग सिद्ध कहलाते है। 


(११) स्वलिगसिद्ध-- भ्रमण का वेष, रजोहरण, मुखवस्त्रिका श्रादि को धारण करके सिद्ध 
होता है, उसे स्वलिग सिद्ध कहते है । 


(१२) भ्रन्यलिगसिद्ध--जों साधुवेष के धारक नही है किन्तु क्रिया जिनागमानुसार करके 
सिद्ध होते हैं वे प्रन्यलिग सिद्ध कहलाते है । 


(१३) गृहस्थलिगसिद्ध - गृहस्थ वेष मे मोक्ष प्राप्त करनेवाले, जेसे मरुदेवी माता। 
१४) एकसिद्ध--एक समय में एक-एक सिद्ध होने वाले एक सिद्ध कहलाते हैं । 


( 
(१५) अनेकसिद्ध--एक समय मे दो से लेकर उत्कृष्ट १०८ सिद्ध होने वाले अ्रनेकसिद्ध के 
जाते है। इन सबका केवलज्ञान अ्नन्तरसिद्ध केवलज्ञान है। 


६४] [ सन्दीसूत्र 


परम्परप्तिद फेवलज्ञान 


४ड३-से कि तं॑ परम्परसिद्ध-केवलनाणं ? 
परम्परसिद्ध-केवलनाण प्रणेगविहू पण्णत्त, तंजहा-अपढससमय-सिद्धा, वुससय-सिद्धा, 
तिससयसिद्धा, अडससयसिद्धा, जाव दससमयसिद्धा, संखिज्जसमयसिद्धा, असंखिज्जसमयसिद्धा, 
अगंतसमयसिद्धा । 
से स॑ परम्परसिद्ध-केवलनाण, से त्त सिद्ध केवलनाण । 
त॑ समासओ चउच्बिहूं पण्णसं, तंजहा--दव्बओ, खित्तओ, कालओ, भावओ । 
तत्थ दव्बझो णं केवलनाणी सब्बदव्याइं जाणइ, पासइ । 
खित्तओ णं केवलनाणी सब्बं॑ खिस॑ जाणह, पासह। 
कालझो ण॑ केवलनाणी सब्यं काल॑ जाणह, पास । 
भावओ णं केवक्‍लनाणो सब्बे भावे जाणइ, पासह। 


प्रश्न--वह परम्परसिद्ध-केवलज्ञान कितने प्रकार का है ? 


उत्तर-परम्परसिद्ध-केवलज्ञान भ्रनेक प्रकार से प्ररूपित है। यथा-अश्रप्रथमसमयसिद्ध, 
द्विसमयसिद्ध, त्रिसमयसिद्ध, चतु समयसिद्ध, यावत्‌ दससमयसिद्ध, सख्यातसमयसिद्ध, भ्रसख्यातसमय- 
सिद्ध भ्रौर प्रनन्तसमयसिद्ध । इस प्रकार परम्परसिद्ध केवलज्ञान का वर्ण न है। तात्पय यह है कि 
परम्परसिद्धो के सूत्रोक्त भेदो के अनुरूप ही उनके केवलज्ञान के भेद है । 


संक्षेप में वह चार प्रकार का है-द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से और भाष से । 


(?) द्रव्य से केवलज्ञानी सर्वेद्रव्यों को जानता व देखता है । 

(२) क्षेत्र से केवलज्ञानी सर्वे लोकालोक क्षेत्र को जानता-देखता है । 

(३) काल से केवलज्ञानी भूत, वर्तमान श्रौर भविष्यत्‌ तीनो कालो को जानता व देखता है । 
(४) भाव से केवलज्ञानी सर्व द्रव्यो के सर्व भावों-पर्यायों को जानता व देखता है । 


विवेखन--सूत्रकार ने परम्परसिद्ध-केवलज्ञानी का वर्णन किया है । वस्तुत' केवलज्ञान प्रौर 
सिद्धो के स्वरूप में किसी प्रकार की भिन्नता या तरतमता नही है। सिद्धों मे जो भेद कहा गया है 
वह पूर्वोपाधि या काल श्रादि से ही है। केवलज्ञान मे मात्र स्वामी के भेद से भेद है । 

केवलज्ञान श्रौर केवलदर्शन के उपयोग के विषय मे झ्राचार्यों की विभिन्न धारणाएँ हैं, जिनका 
उल्लेख ग्रावश्यक प्रतोत होता है। जेनदशेन पाँच ज्ञान, तीन भ्रज्ञान भौर चार दशेन इस प्रकार 
बारह प्रकार का उपयोग मानता है। इनमे से किसी एक में कुछ समय के लिए स्थिर हो जाने को 
उपयोग कहते हैं । केवलज्ञान भौर केवलदर्शन के सिवाय दस उपयोग छट्मस्थ मे पाए जाते हैं । 

मिथ्यादृष्टि में तीन भज्ञान और तीन दर्शन भ्र्थात्‌ छः उपयोग और छद्मस्थ सम्यगदृष्टि मे 
घार ज्ञान तथा तीन दर्शन इस प्रकार सात उपयोग हो सकते हैं। केवलज्ञान श्रौर केवलदर्शन, ये दो 
उपयोग भ्रनावुत क्षायिक एवं सम्पूर्ण हैं। शेष दस उपयोग क्षायोपशमिक छाद्मस्थिक--आवृतानावुत- 


अरीशमरवापललप लक > पता 


ज्ञान के पांच प्रकार ] [६५ 


सज्ञक हैं । इनमें ह्ास-विकास, एवं न्‍्यूनाधिकता होती है। किन्तु केवलज्ञान श्लरौर केवलदर्शन मे 
'हास-विकास या न्यून-प्राधिक्य नही होता । वे प्रकट होने पर कभी भ्रस्त नहीं होते । 


छाप्मस्थिक उपयोग क्रमभावी हैं, गर्थात्‌ एक समय में एक ही उपयोग हो सकता है, एक 
से अधिक नहीं। इस विषय में सभी प्राचार्य एकमत हैं, किन्तु केवली के उपयोग के विषय मे तीन 
घारणाएँ है । यथा -- 

(?) निरावरणन्ञान-दर्शन होते हुए भी केबली मे एक समय में एक ही उपयोग होता है। 
जब ज्ञान-उपयोग होता है तब दर्शन-उपयोग नहीं होता श्रौर जब दर्शन-उपयोग होता है तब ज्ञान- 
उपयोग नही हो सकता । इस मान्यता को क्रम-भावी तथा एकान्तर-उपयोगवाद भी कहते हैं । इसके 
समर्थक जिनभद्र-गणो क्षमाश्रमण आदि है। 


(२) केवलज्ञान और केवलदर्शन के विषय मे दूसरा मत युगपद्वादियो का है। उनका कथन 
है--जैसे सूर्य श्रौर उसका ताप युगपत होते हैं, वैसे ही निरावरण ज्ञान-दर्शत भी एक साथ प्रकाश 
करते है श्र्थात्‌ अपने-अपने विषय को ग्रहण करते रहते हैं, क्रण्म नहीं । इस मान्यता के समर्थक 
आचार्य सिद्धसेन दिवाकर आदि हैं जो भ्रपने समय के अद्वितीय ताकिक विद्वान थे । 


(३) तीसरी मान्यता अभेदवादियों की है। उनका कथन है कि केवलज्ञान श्रौर केवलदर्शन 
दोनो एकरूप हो जाते है। जब ज्ञान से सब कुछ जान लिया जाता है तब पृथक दर्शन की क्‍या 
आवश्यकता है ? दूसरे, ज्ञान प्रमाण माना गया है, दर्शन नही, श्रत बह प्रधान है। इस मान्यता के 
समर्थक भ्राचार्य वृद्धवादी हुए है । 


युगपत्‌ उपयोगवाद 


यहाँ पर एकान्तर-उपयोगवादियो की मान्यता का खडन करते हुए युगपद्वादियो ने विभिन्न 
प्रमाणों द्वारा श्रपने मत को पुष्टि की है । युगपद्वादियो का मत है कि केवलज्ञान भौर केवलदर्शन 
दोनो उपयोग सादि-अ्रनन्त हैं, इसलिए केवली एक साथ पदार्थों को जानता भी है और देखता भी है । 
कहा भी है - 
ज केवलाइ सादी, झपउजवसिताईं दोषथि भणिताईं । 
तो बेंति केइ जुगव, जाणइ पासइय सब्वण्ण॥। 


(१) उनकी मान्यता है कि एकान्तर उपयोग पक्ष में सादि-भ्रनन्तता घटित नहीं होती, 
क्योकि जब ज्ञान का उपयोग होता है तब दर्शन का नही रहता श्रौर जब दर्शनोपयोग होता है तब 
ज्ञानोपयोग नही रहता । इससे उक्त ज्ञान, दर्शन सादि-सान्त सिद्ध होते हैं । 

(२) एकान्तर-उपयोग मे दूसरा दोष मिथ्यावरणक्षय है । केवलज्ञानावरण भौर दर्शनावरण 
का पु्णरूप से क्षय हो जाने पर भी यदि ज्ञान के समय दर्शन का और दर्शन के साथ ज्ञान का उपयोग 
नही रहता तो ग्रावरणो का क्षय मिथ्या-- बेकार हो जाएगा । जैसे दो दीपको को निरावरण कर देने 
से वे एक साथ प्रकाश करते है, इसी प्रकार दोनों उपयोग एक साथ प्रकाश करते है क्रमश. नही। 
यही मान्यता निर्दोष है । 


(३) युगपद्वादो एकान्तर-उपयोग पक्ष मे तीसरा दोष इततरेतरावरणता सिद्ध करते हैं। यदि 


६६ | [ नस्दीसृ्त 


दर्शन के उपयोग से ज्ञान का उपयोग रुक जाता है और ज्ञानोपयोग होने पर दर्शनोपयोग नहीं रहता 
तो निष्कर्ष यह हुआ कि ये दोनो एक दूसरे के आवरण है। किन्तु ऐसा मानना आगम-विरुद्ध है । 


(४) एकान्तर-उपयोग के पक्ष मे चौथा दोष 'निष्कारण भ्रावरणता' है-ज्ञान भौर दर्शन 
को आवत करने वाले ज्ञान-दर्शनावरण का सर्वथा क्षय हो जाने पर भी यदि उनका उपयोग निरन्तर- 
सर्देव चाल नही रहता और उनको श्रावुत करने वाला ग्रन्य कोई कारण हो नहीं सकता तो यह 
मानना पडेगा कि बिना कारण ही उन पर बीच-बीच में आवरण ग्रा जाता है। भ्र्थात्‌ आवरण-क्षय 
हो जाने पर भी निष्कारण श्रावरण का सिलसिला जारी ही रहता है जो कि सिद्धान्तविरोधी है। 


(५) एकास्तर-उपयोग के पक्ष मे केवली का असवंज्ञत्व और असवंदशित्व सिद्ध होता है। 
क्योकि जब केवली का उपयोग ज्ञान मे है तब दर्शन मे उपयोग न होने से वे श्रसवंदर्शी होते है और 
जब दर्शन मे उपयोग है तब ज्ञानोपयोग न होने से उनमे असरव॑ज्ञव्व का प्रसग आ जाता है| श्रत 
युगपद्‌ उपयोग मानना ही दोष रहित है । 


(६) क्षीणमोह गुणस्थान के चरम समय मे ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय श्ौर ग्रन्तराय, ये 
तीन कर्म एक साथ ही क्षीण होते है | तेरहवे गुणस्थान के प्रथम समय मे आवरण नष्ट होने पर ज्ञान- 
दर्शन एक साथ प्रकाशित होते है। इसलिए एकान्तर-उपयोग पक्ष उपयुक्त नहीं है । 


एकान्तर उपयोगवाद 


(१) केवलज्ञान और केवलदर्शन, ये दोनो सादि-अ्रनन्‍न्त है, इसमे तनिक भी सन्देह नहीं, 
किन्तु यह कथन लब्धि की श्रपेक्षा से है, न कि उपयोग की श्रपेक्षा से | मति, श्रुत और श्रवधिज्ञान 
का लब्धिकाल ६६ सागरोपम से कुछ अ्रधिक है, जब कि उपयोग श्रन्तम्‌ ह॒तं से भ्रधिक नहीं रहता । 
इस समाधान से उक्त दोष की निवृत्ति हो जाती है । 


(२) निरावरण ज्ञान-दर्शन का युगपत्‌ उपयोग न मानने से ग्रावरणक्षय मिथ्या सिद्ध हो 
जायगा, यह कथन भी उपयुक्त नही । क्योकि किसी विभगज्ञानी को सम्यकत्व उत्पन्न होते ही मति, 
श्रुत और श्रवध्चि, ये तीनो ज्ञान एक साथ उत्पन्न होते हैं, यह भ्रागम का कथन है । किन्तु उनके 
उपयोग का युगपत्‌ होना श्रावश्यक नही है । जंसे चार ज्ञानों के धारक को चतुज्ञानी कहते है फिर भी 
उसका उपयोग एक ही समय मे चारो मे नही रहता, किसी एक में होता है । स्पष्ट है कि जानने व 
देखने का समय एक नही अपितु भिन्न भिन्न होता है। (प्रज्ञापना सूत्र, पद ३० तथा भगवती सूत्र 
श २५) 


(३) एकान्तर-उपयोग पक्ष मे इतरेतरावरणता नामक दोष कहना भी उपयुक्त नही है, क्योकि 
केवलज्ञान और केवलदर्शन सदंव निरावरण रहते है। इनको क्षायिक लब्धि भी कहते है और इनमे 
से किसी एक मे चेतना के प्रवाहित हो जाने को उपयोग कहा जाता है | छद॒मस्थ का ज्ञान या दर्शन 
में उपयोग अन्तमु हुतं से श्रधिक नही रहता । केवली के ज्ञान श्रौर दर्शन का उपयोग एक-एक समय 
तक हो रहता है । इस प्रकार उपयोग सदा सादि सान्‍्त हो होता है। वह कभी ज्ञान मे श्रौर कभी 
दर्शन मे परिवर्तित होता रहता है । इससे इतरेतरावरणता दोष मानना ग्रनुचित है। 


(४) अनावरण होते हो ज्ञान-दर्शन का पूर्ण विकास हो जाता है, फिर निष्कारण-भ्रावरण 


शान के पांच प्रकार ] [६७ 


होने का प्रश्न ही नही उठता । क्योंकि श्रावरण भ्रौर उसके हेतु नष्ट होने पर ही केबलज्ञान होता है । 
किन्तु उपयोग का स्वभाव ऐसा है कि वह दोनो मे से एक समय मे किसी एक मे ही प्रवाहित होता 
है, दोनो में नहीं । 


(५) कैवली जिस समय जानते हैं उस समय देखते नहीं, इससे भ्रसवंदशित्व और जिस समय 
देखते हैं उस समय जानते नही, इससे असर्वज्ञत्व सिद्ध होता है, इस कथन का प्रत्युत्तर यही है कि 
प्रागम में केवली को सर्वज्ञ-सवंदर्शी भी लब्धि की अपेक्षा से कहा गया है, न कि उपयोग की अश्रपेक्षा 
से | ग्रत एकान्तर-उपयोग पक्ष निर्दोष है । 


(६) युगपत्‌ उपयोगवाद की मान्यता यहाँ तक तो युक्तिसगत है कि ज्ञानावरणीय-दर्शना- 
वरणोय कम युगपत्‌ ही क्षीण होते हैं किन्तु उपयोग भी युगपत्‌ ही हो, यह श्रावश्यक नही है। कहा 
भी है-- 

“जुगव दो नत्यि उबोगा। 


अर्थात्‌ दो उपयोग साथ नही होते । यह नियम केवल छद॒मस्थो के लिए नहीं है। अ्रतएव 
केवलियों मे भी एक साथ, एक समय मे एक हो उपयोग पाया जा सकता है दो नही । 
अभिन्न-उपयोगवाद 

(१) केंवलज्ञान अनुत्तर अर्थात्‌ सर्वोपरि ज्ञान है, इसके उत्पन्न होने पर फिर केवलदर्शन की 
कोई उपयोगिता नही रह जाती । क्योकि केवलज्नान के ग्रन्तर्गत सामान्य श्रौर विशेष सभी विषय श्रा 
जाते है । 

(२) जैसे चारो ज्ञान केवलज्नान मे प्रन्तभू त हो जाते है उसी प्रकार चारो दर्शन भी इसमे 
समाहित हो जाते हैं। प्रत केवलदर्शन को अलग मानना निरर्थक है । 


॥ 
(२) अल्पज्ञता मे साकार उपयोग, अनाकार उपयोग तथा क्षायोपशमिक भाव की विभिन्नता 
के कारण दोनो उपयोगी में परस्पर भेद हो सकता है, किन्तु क्षायिक भाव मे दोनो मे विशेष अन्तर न 
रहने से केवलज्ञान ही शेष रह जाता है श्रत केवली का उपयोग सदा केवलज्ञान मे ही रहता है। 


(४) यदि केवलदर्शन का ग्रस्तित्व भिन्न माना जाय तो वह सामान्यग्राही होने से अल्प 
विषयक सिद्ध हो जाएगा, जबकि वह अनन्त विषयक है । 


(५) जब केवलो प्रवचन करते है, तब वह ॒केवलज्ञानपूर्वक होता है, इससे अ्रभेद पक्ष ही 
सिद्ध होता है । 


(६) नन्‍्दीसूत्र एवं अन्य आ्रागमो में भी केवलदर्शन का विशेष उल्लेख नही पाया जाता, 
इससे भी भासित होता है कि केवलदर्शन केवलज्ञान से भिन्न नही रह जाता । 


सिद्धान्तवादी का पक्ष--प्रत्येक वस्तु अनन्तधर्मात्मक है, चाहे वह दृश्य हो या भ्रदृश्य, रूपी 
हो या ग्ररूपी और अ्रणु हो या महान्‌ । विशेष धर्म भी भ्रनन्तानन्त हैं प्रौर सामान्य धर्म भी । विशेष 
धर्म केवलज्ञानग्राह्म हैं श्रौर सामान्य धर्म केवलदर्शन द्वारा ग्राह्म । दोनो की पर्यायें समान हैं । 
उपयोग एक समय में दोनो में से एक रहता है । जब वह विशेष की झोर प्रवहमान रहता है तब 


ध८] [ नन्दीसूत्र 


केवलज्ञान कहलाता है तथा सामान्य की ओर प्रवहमान होने पर केवलदर्शन । इस दृष्टि से चेतना 
का प्रवाह एक समय मे एक प्र ही हो सकता है, दोनो श्लोर नही । 

(२) जैसे देशज्ञान के विलय से केवलज्ञान होता है बसे ही देशदर्शन के बिलय से केवल- 
दर्शन । ज्ञान की पूर्णता को केवलशान और दर्शन की पूर्णता को केवलदर्शन कहते हैं। इससे सिद्ध 
होता है कि ज्ञान-दर्शन दोनो का स्वरूप पृथक्‌-पृथक्‌ है और दोनो को एक मानना ठीक नही । 

(३) छग्नस्थ काल मे जब ज्ञान और दर्शनरूप दो विभिन्न उपथोग पाये जाते है तब उनकी 
पूर्ण प्रवस्था मे वे एक कैसे हो सकते हैं ? प्रवधिज्ञान एव प्रवधिदर्शन को जब एक नही माना जाता 
तो फिर केवलज्ञान और केवलदर्शन एक कैसे माने जा सकते है । 

(४) नन्‍्दीसूत्र मे प्रमुख रूप से पाँच ज्ञानो का ही वर्णन है, दर्शनो का नही । इससे दोनो की 
एकता सिद्ध नही होती | इस बात की पुष्टि सोमिल ब्राह्मण के प्रसग से होती है । 

सोमिल के प्रश्नो का उत्तर देते हुए भगवान्‌ महावीर ने कहा है-- 

“हे सोमिल ! मैज्ञान और दर्शन की प्रपेक्षा द्विविध हू । (भगवती सूत्र० श० १८, उ० १०) 
भगवान्‌ के इस कथन से सिद्ध होता है कि दर्शन भी ज्ञान की तरह स्वतन्त्र सत्ता रखता है। नन्‍्दीसृत्र 
मे भो सम्यक्‌ श्रुत के अतर्गत “उप्पन्ननाण-दसणघरेहिं” कहा है। इसमे ज्ञान के श्रतिरिक्त दर्शन 
पद भी जुडा हुआझा है, जिससे ज्ञात होता है कि केवली मे दर्शन का अस्तित्व अलग होता है । 


नयो को दुष्टि से उक्त विषय का समन्वय 


उपाध्याय यशोविजय ने तीनो ही मान्यताग्रो का समन्वय नयो की शैली से किया है, 
यथा-- 

(१) ऋजु सूत्र नय के दृष्टिकोण से एकान्तर-उपयोगवाद उपयुक्त है। 

(२) व्यवहारनय के दृष्टिकोण से युगपद्‌-उपयोगवाद सत्य प्रतीत होता है। तथा-- 

(३) सग्रहनय से भ्भेद-उपयोगवाद समुचित ज्ञात होता है। 

उपयु क्त केवलज्ञान प्रौर केवलदर्शन के विषय मे तीनो मतो को जानने के लिये नन्‍दोसूत्र को 
चूणि, मलयगिरिक्ृत वृत्ति तथा हरिभद्रकृत वृत्ति देखना चाहिये। जिनभद्रगणी कृत विशेषावश्यक 
भाष्य मे भी यह विषय विशद रूप से वरणित है। 


ज्ञातव्य है कि दिगम्बरपरम्परा मे युगपदू-उपयोगवाद का एक ही पक्ष मान्य है। वह दोनो 
का उपयोग एक ही साथ मानती है | 
केबलज्ञान का उपसंहार 


४३-अह सब्यदब्य-परिणास-भाव-विण्णतसिकारणमणंतं । 
सासयमप्पड़िवाई, एगविहं केवल नाणं ।। 
केवलज्ञान सम्पूर्ण द्वव्यों को, उत्पाद श्रादि परिणामों को तथा भाव-सत्ता को ग्रथवा वर्ण 


गन्ध, रस आदि को जानने का कारण है। वह भ्रनन्त, शाश्वत तथा भ्रप्रतिपाति है । ऐसा यह 
केवलज्ञान एक प्रकार का ही है। 


ज्ञान के पाँच प्रकार ] [६९ 


विवेचन --प्रस्तुत गाथा मे केवलज्ञान का उपसहार किया गया है भ्रौर उसका आ्रान्तरिक 
स्वरूप भी बताया है। पाच विशेषणो के द्वारा सूत्रकार ने इसके स्वरूप को स्पष्ट किया है । वे 
निम्न हैं-- 

(१) सब्वदब्ब-परिणाम-भावविण्णत्तिकारण-स्ंद्रव्यो को, उनकी पर्यायों को तथा 
ग्रौदयिक आ्रादि भावों को जानने का हेतु है । 


(२) प्रणत-बह प्नन्त है क्योकि जेय प्रननन्‍्त है तथा ज्ञान उससे भो महान्‌ है। 
(३) सासय --सादि-श्रनन्त होने से केवलज्ञान शाश्वत है । 
(४) अप्पडिवाई -यह ज्ञान पप्रतिपाति श्र्थात्‌ कभी भी गिरने वाला नही है। 


(५) एगविह--सब प्रकार की तरतमता एवं विसदृशता से रहित तंथा सदाकाल ब स्वदेश 
मे एक समान प्रकाश करने वाला व उपयुक्त पच-विशेषणों सहित यह केवलज्ञान एक ही है । 


वाग्योग और श्रुत 


४४--केवलनाणेणउत्थे, नाउ जे तत्थ पण्णवणजोग्गे । 
ते भासइ तित्ययरो, वबइजोगसुअं हवह सेस । 
से त्त केवलनाण से त्त नोइन्दियपच्चक्ख । 


केवलज्ञान के द्वारा सब पदार्थों को जानकर उनमे जो पदार्थ वर्णन करने योग्य होते है, 
अर्थात्‌ जिन्हे वाणी द्वारा कहा जा सकता है, उन्हे तीर्थंकर देव अपने प्रवचनों में प्रतिपादन करते हैं । 
वह उनका वचनयोग होता है ग्र्थात्‌ वह श्रप्रधान द्रव्यश्रुत है। यहाँ 'शेष' का श्रर्थ 'प्रप्रधान' है । 

इस प्रकार केवलज्ञान का विषय सम्पूर्ण हुआ ग्रौर नोइन्द्रिय प्रत्यक्ष का प्रकरण भी 
समाप्त हुआ्ना । 


विवेचन --स्पष्ट है कि तीर्थंकर भगवान्‌ जितना केवलज्ञान से जानते है, उसमे से जिनना 
कथनीय है उसी का प्रतिपादन करते हैं । सभी पदार्थों का कहना उनकी शक्ति से भी परे है, क्योकि 
पदार्थ श्रनन्तानन्त है भ्ौर आयुष्य परिमित समय का होता है। इसके श्रतिरिक्त बहुत-से सूक्ष्म श्र्थ 
ऐसे हैं जो वचन के भ्रगोचर हैं। इसलिये प्रत्यक्ष किये हुये पदार्थ का ग्रनन्तवों भाग ही वे कह 
सकते हैं । 

केवलज्ञानो जो प्रवचन करते है वह उनका श्रुतज्ञान नही, भ्रपितु भाषापर्याप्ति नाम कर्मोदय 
से करते हैं । उनका वह प्रवचन वाग्योग-द्रव्यश्रुत कहलाता है कक्‍्योक्रि सुनने वालों के लिए वह 
द्रव्यश्नत, भावश्ुत का कारण बन जाता है । 

इससे सिद्ध होता है कि तीर्थकर भगवान्‌ का वचनयोग द्रव्यश्रुत है, भावश्रुत नहीं । वह 
केवलज्ञान-पूर्वक होता है। वर्तमान काल मे जो झ्यागम है, वे भावश्रुतपूवंक है, क्योकि वे गणधरो के 
द्वारा सूत्रबद्ध किये गए है । गणधरों को जो श्रुतज्ञान हुआ, वह भगवान के वचनयोग रूप द्रव्यश्रत 
से हुआ्ना है । 

इस प्रकार सकल पारमार्थिक प्रत्यक्ष एव नोइन्द्रिय-प्रत्यक्ष ज्ञान का प्रकरण समाप्त हुआ । 


3० [| [ सम्दोसूत्र 


परोक्षज्ञान 

४५ “से कि त॑ परोक्‍लनाणं ? 

परोक्‍्चनाणं दुबिहू पद्तचत्त, त जहा-आभिणिवोहिअनाणपरोक्‍त च, सुप्रनाणपरोषस थे । 

जत्य भ्राभिणिबोहियनाण तत्थ सुयनाणं, जत्य सुअनाणं तत्थ ग्राभिणियोहियनाणं । 

दोषवि एयाइ भ्रण्णमण्णमणुगयाइ तहथि पुण इत्य झायरिआ नाणत्तं पण्णवर्यति-प्भिनि- 
बुज्झद त्ति आभिणिवोहियनाण, सुणेह त्ति सुअ, मइपुन्ब जेण सुभ, न मई सुझ्नपुव्विश्ा । 

प्रश्न--वह परोक्षज्ञान कितने प्रकार का है ? 

उत्तर --परोक्षज्ञान दो प्रकार का प्रतिपादित किया गया है । यथा -- 

ग्राभिनिबोधिक ज्ञान और श्रुतज्ञान । 

जहाँ श्राभिनिबोधिक ज्ञान है वहाँ पर श्रुतज्ञान भी होता है । जहाँ श्रतज्ञान है वहाँ 
श्राभिनिवोधिक ज्ञान भी होता है । 

ये दोनो ही भ्रन्योन्‍्य अनुगत-- एक दूसरे के साथ रहने वाले है। परस्पर अनुगन होने पर 
भी आचार्य इन दोनो मे परस्पर भेद प्रतिपादन करते है। जो सन्मुख आए हुए पदार्थों को प्रमाण- 
पूर्वक प्रभिगत करता है वह प्राभिनिबोधिक ज्ञान है, किन्तु जो सुना जाता है बह श्रुतज्ञान है, जो कि 
श्रवण का विषय है। श्रुतज्ञान मतिपूर्वक ही होता है किन्तु मतिज्ञान भ्रुत-पृव क नही होता । 


विवेचन --जो सन्मुख झाए हुए पदार्थों को इन्द्रिय श्रौर मन के द्वारा जानता है, उस ज्ञान- 
विशेष को भ्राभिनिबोधिक ज्ञान कहते है। शब्द सुनकर वाच्य पदार्थ का जो ज्ञान होता है वह 
ज्ञानविशेष श्रुतजञान कहलाता है । इन दोनों का परस्पर अ्रविनाभाव सम्बन्ध है। अत दोनों एक 
दूसरे के बिना नही रह सकते । जैसे सूय भ्रौर प्रकाश, इनमे से एक जहाँ होगा, दूसरा भी प्रनिवार्य 
रूप से पाया जायेगा । 


“मइपुव्व जेण सुय, न मई सुअपुव्यिया । 


श्रुतज्ञान मतिपूव क होता है किन्तु श्रुतपूविका मति नहीं होती । जैसे वस्त्र में ताना बाना 
साथ ही होता है किन्तु फिर भी ताना पहले तन जाने के बाद ही बाना काम देता है । यद्यपि 
व्यवहार में यही कहा जाता है कि जहा ताना होता है वहाँ बाना रहता है और जहाँ बाना है वहाँ 
ताना भो है। ऐसा नहीं कहा जाता कि ताना पहले तना श्र बाना बाद में डाला गया । तात्पर्य यह 
है कि लब्धि रूप से दोनो सहचर है, उपयोग रूप से प्रथम मति और फिर श्रुत का व्यापार होता है । 


शका हो सकती है कि एकेन्द्रिय जीवों मे मति-अ्रज्ञान और श्रुत-प्रज्ञान दोनो है, ये दोनो 
भी ज्ञानमरण के क्षयोपशम से होते हैं, किन्तु इनका भ्रस्तित्व कंसे माना जाए ? 


उत्तर यह है कि श्राह्रादि सज्ञाएँ एकेन्द्रिय जीवो मे भी होती है । बे बोध रूप होने से 
भावश्रुत उनमे भी सिद्ध होता है । इस विषय में श्रागे बताया जाएगा। अभी तो यही जानता है कि 


सलिज्ञान | (७१ 


ये दोनो ज्ञान एक जीव मे एक साथ रहते हैं। दोनो ही ज्ञान परस्पर प्रतिबद्ध है फिर भो इनमे जो 
भेद है वह इस प्रकार है-मतिज्ञान वर्ततानकालिक वस्तु मे प्रवत्त होता है और श्रुतज्ञान त्रिकाल- 
विषयक होता है। मतिज्ञान कारण है और श्रुतज्ञान उसका काये है। मतिज्ञान के होने पर ही 
श्रृतज्ञान हो सकता है। एकेन्द्रिय से लेकर चतुरिन्द्रिय तक द्रव्यश्रुत नही होता किन्तु भावश्रुत उनमें 
भो होता है । 

ग्रब मति और श्रुत का विवेचन भ्रन्य प्रकार से किया जाता है ! 


मति और श्रत के दो रूप 


४६- अधिसेसिआ सई सइनाण सर महअन्नाण च । विसेसिआा सम्मदिद्विस्स मई महनाणं, 
मिच्छदिद्विस्स मइ सइ-अन्नाणं । अविसेसिअं सुय सुयनाणं च सुयअन्नाण च्। विसेसिअं सुय सम्भविट्ठिस्स 
सुय सुयनाणं, भिच्छुदिट्विस्स सुयं सुयअन्नाणं । 


सामान्य रूप से मति, मतिज्ञान और मत्ति-श्रज्ञान दोनो प्रकार का है। परन्तु विशेष रूप से 
वही मति सम्यक्दृष्टि का मतिज्ञान है और मिथ्यादृष्टि की मति, मति-अज्ञान होता है। इसी प्रकार 
विशषता रहित श्रुत, श्रुतज्ञान और श्रुत-ग्रज्ञान उभय रूप है। विशेषता प्राप्त वही सम्यक्दृष्टि का 
श्रुत, श्रुतज्ञान और मिथ्यादृष्टि का श्रुत-भअज्ञान होता है । 

विवेचन-- प्रस्तुत सूत्र मे सामान्य-विशेष, ज्ञान-अ्ज्ञान और सम्यगदृष्टि-मिथ्यादुष्टि के विषय 
मे उल्लेख किया गया है। ज॑से सामान्यतया “मति” शब्द ज्ञान और गज्ञान दोनो श्रर्थों मे प्रयुक्त 
होता है । 


जैसे किसी ने कहा- फल द्रव्य अथवा मनुप्य । इन शब्दों मे क्रमश सभी प्रकार के फलो, 
द्रव्यो और मनुष्यों का श्रन्तर्भाव हो जाता है किन्तु श्राम्रफल, जीवद्रब्य एवं मुनिवर कहने से उनकी 
विशेषता सिद्ध होती है। इसी प्रकार स्वामी विशेष की श्रपेक्षा किये बिना मति शब्द ज्ञान और 
प्रज्ञान दोनो रूपो मे प्रयुक्त किया जा सकता है । किन्तु जब हम विशेष रूप से विचार करते हैं तब 
सम्यगदृष्टि आत्मा की 'मत्ति' मतिज्ञान भौर मिध्यादृष्टि श्रात्मा की 'मति” मति-श्ज्ञान कहलाती है। 
क्योकि सम्यग्दृष्टि स्याद्वाद दृष्टि द्वारा, प्रमाण और नय की अपेक्षा से प्रत्येक पदार्थ के स्वरूप का 
निरीक्षण करके यथार्थ वस्तु को स्वीकार करता है तथा श्रयथार्थ का परित्याग करता है। सम्यग्दृष्टि 
की 'मति गआरात्मोत्थान श्रोर परोपकार को ओर प्रवृत्त होती है। इसके विपरीत मिथ्यादृष्टि की 
'मति' ग्रनन्तधर्मात्मक वस्तु में एक धर्म का ग्रस्तित्व स्वीकार करती है, शेष का निषध करती है । 

सामान्यतया “श्रुत' भी ज्ञान-ग्रज्ञान दोनो के लिए प्रयुक्त होता है। जब श्रुत का स्वामी 
सम्यग्दृष्टि होता है तो वह ज्ञान कहलाता है और यदि उसका स्वामी मिथ्यादृष्टि होता है तो बह 
अज्ञान कहलाता है | सम्यकदृ ष्टि का ज्ञान आत्मोत्थान श्रौर दूसरो की उन्नति मे प्रवृत्त होता है तथा 
मिथ्यादृष्टि का श्लुतज्ञान आत्मपतन के साथ पर की श्रवनति का कारण बनता है। सम्यक्दृष्टि 
मिथ्याश्रुत को भी अपने श्रुतज्ञान के द्वारा सम्यकूश्रुत में परिवर्तित कर लेता है तथा मिथ्यादृष्टि 
सम्यकश्रुत को भी मिथ्याश्रुत मे बदल लेता है । 


साराश यह है कि ज्ञान का फल भज्ञान की निवृत्ति, आध्यात्मिक आनन्द की श्रनुभूति एव 
निर्वाण पद को प्राप्ति करता है। सम्यगृदृष्टि जीव की बुद्धि और उसका शब्दज्ञान, दोनों ही 


७२] [ नम्दीसूत्र 


मार्गशंक होते हैं। इसके विपरीत मिथ्यादृष्टि की मति झौर शब्दज्ञान, दोनो ही विवाद, विकथा एव 
पतन का कारण बनते हुए जीव को पथश्रष्ट करते हैं, साथ ही दूसरो के लिये भी अ्रहितकर बन 
जाते हैं । 


कहा जा सकता है कि जब मतिज्ञान और मति-प्रज्ञान दोनो ज्ञानावरणीय कम के क्षयोपशम से 
उत्पन्न होते हैं, तब दोनो मे सम्यक्‌-मिथ्या का भेद किस कारण से होता है ? उत्तर यह है कि ज्ञाना- 
बरण के क्षयोपशम से उत्पन्न हुआ ज्ञान मिथ्यात्वमोहनीय के उदय से मिथ्या बन जाता है । 


आभिनिबोधिक ज्ञान के दो भेद 
४७--से कि त आभिणिबोहियनाण ? 
आभिनिबोहियनाण दुविहं पण्णत्तं, त जहां- सुयनिस्सिय तर अस्सुयनिस्सिय च । 
से कि त ग्रसुयनिस्सियं ? असुयनिस्सिय चउब्विह पण्णत्त, त जहां-- 
उप्पत्तिया वेणइया कम्मया पारिणामियां । 
बुद्धी चउब्विहा बृत्ता, पचसा नोवलब्भइ । 
भगवन्‌ | वह आभिनिबोधिक ज्ञान किस प्रकार का है ? 
उत्तर-आभिनिबोधिकज्ञान-मतिज्ञान दो प्रकार का है, जंसे - (१) श्रुतनिश्चि ओर 
(२) अश्रुतनिश्चित । 
प्रशन-अ्श्रुतनिश्चित कितने प्रकार का है ? 
उत्तर--अश्रुतनिश्चित चार प्रकार का है। यथा-- 
(१) भ्रौत्पत्तिकी--क्षयोपशम भाव के कारण, श्ञास्त्र अभ्यास के विना ही सहसा जिसकी 
उत्पत्ति हो, उसे श्रौत्पत्तिकी बुद्धि कहते हैं । 
(२) वेनयिकी--गुरु श्रादि की विनय-भक्ति से उत्पन्न बुद्धि वेनयिकी है । 
(३) कमंजा--शिल्पादि के निरन्तर ग्भ्यास से उत्पन्न बुद्धि कमजा होती है । 
(४) पारिणामसिकी--चिरकाल तक पूर्वापर पर्यालोचन से श्रथवा उम्र के परिपाक से जो 
बुद्धि उत्पन्न होती है उसे पारिणामिकी बुद्धि कहते है । 
ये चार प्रकार की बुद्धियाँ शास्त्रकारो ने वर्णित की हैं, पाँचवा भेद उपलब्ध नहों होता । 


(१) ओत्पत्तिकोी ब॒द्धि का लक्षण 
४८- पुव्वमविद्दु-भस्सुय-सवेइथ, तकक्‍्खणविसुद्गहियत्या । 
झव्बवाहय-फलजोगा, बुद्धी उप्पत्तिया नाम ॥। 


जिस बुद्धि के द्वारा पहले बिना देखे भौर बिना सुने ही पदार्थों के विशुद्ध श्रथं-भ्रभिप्राय को 
तत्काल ही ग्रहण कर लिया जाता है और जिससे भ्रव्याहत-फल-बाधारहित परिणाम का योग 
होता है, उसे ग्रौत्पत्तिको बुद्धि कहा जाता है । 


मतिशात ] [ ७रे 


श्रौत्पसिकी बुद्धि के उदाहरण 
४९--भरह-सिल-मिह-कुक्कुड-तिल-बालुय-हस्थि-अगड-वणसंडे । 
पायस-अहआ-पत्ते, खाइहिला-पंचपियरों य ।।१॥। 
भरह-सिल-पणिय-रकले, खुड्डग-पड-सरड-काय-उच्चारे । 
गय-घयण-गोल-खंभे-खु ड्डग़ -मग्गित्यि-पइ-पुरे ।॥२॥ 
मह॒सित्य-मुहि-अंके नाणए भिकखु चेडग-निहाणे । 
सिक्‍्खा य अत्यसत्ये इच्छा य महू सयसहस्से ॥॥३॥। 


विवेखन-- गाथाओ का भर्थ विवेचन से ही समझना चाहिए । 


श्रागमो मे तथा ग्रन्य ग्रस्थो मे उन बुद्धिमानो का नाम विश्रुत रहा है जिन्‍्होने भ्रपनी 
तत्काल उत्पन्त बुद्धि या सूक-बूक से कही हुई बातो से शभ्रथवा किये गये प्रदूभुत कृत्यों से लोगो 
को चमत्कृत किया है । ऐसे व्यक्तियों मे राजा, मन्री, न्यायाधीश, सत-महात्मा, शिष्य, देव, दानव, 
कलाकार, बालक, नर-नतारी आदि के वर्णन उल्लेखनीय होते है श्रौर उनके वर्णन इतिहास, कथानक, 
दृष्टान्त, उदाहरण या रूपक आदि मे मिलते है । 


ग्राजकल यद्यपि अ्नेको दृष्टात ऐसे पाये जा सकते है जो प्रौत्पत्तिकी, वेनयिकी, कर्मजा एव 
पारिणामिकी बुद्धि से सबधित हैं, किन्तु यहाँ पर सूत्रगत उदाहरणी का ही उल्लेख किया जाता है- 


(१) भरत --उज्जयिनी नगरी के निकट नटो के एक ग्राम में भरत नामक नट रहता था। 
उसकी पत्नी का देहान्त हो गया श्रौर बह रोहक नामक एक पुत्र को छोड गई | बालक बडा होनहार 
और बुद्धिमान्‌ था, किन्तु छोटा था, भ्रत उसकी व अ्रपनी देखभाल के लिए भरत ने दूसरा विवाह 
, कर लिया । 

रोहक की विमाता दुष्ट स्वभाव की स्त्री थी । वह उसके प्रति दुष्यंबहार किया करतो थी। 
एक दिन रोहक से रहा नही गया तो बोला--'माताजी ! आप मुझसे अ्रच्छा व्यवहार नही करती, 
बया यह ग्रापके लिए उचित है ?” रोहक के यह शब्द सुनते ही विमाता ग्रागबबूला होती हुई बोली 
दुष्ट ! छोटे मुह बडी बात कहता है ! जा मेरे दुव्यंबहार के कारण जो तुभसे बने कर लेना । यह 
कहकर वह अपने कार्य मे लग गई । 


रोहक ने विमाता के वचन सुने तो उससे बदला लेने की ठान ली और उपयुक्त भ्रवसर की 
प्रतीक्षा करने लगा*। समय आया श्रोर एक दिन जब वह प्पने पिता के पास सोया हुआझ्आा था, श्रचानक 
उठकर बोला--'पिताजी ! कोई पुरुष दौडकर जा रहा है ।' भरत नट ने यह सुनकर सोचा कि मेरी 
पत्नी सदाचारिणी नही है। परिणामस्वरूप वह पत्नी से विभुख हो गया तथा उससे बोलना भी 
बन्द कर दिया । 

पति के रग-ढग देखकर रोहक की विभाता समभ गई कि किसी प्रकार रोहक ने ही प्रपने 
पिता को मेरे विरुद्ध भडकाया है। उसकी अ्रक्‍्ल ठिकाने श्राई ग्रौर वह रोहक से बोली--'बेटा ! 
मुभसे भूल हुई । भविष्य में मैं तेरे साथ मधुर झौर अच्छा व्यवहार रखूगी ।' 

रोहक का क्रोध भी शान्त हो गया और वह अपने पिता के भ्रम-निवारण का अवसर खोणने 
लगा। एक दित चाँदनो रात में उसते अगुली से श्रपनी ही छाया दिखाते हुए पिता से कहा-- 


७४ ] [गन्दीसूत्र 


“पिताजी ! देखिये वह पुरुष भागा जा रहा है |” भरत नट ने क्रोधित होकर प्रपनी तलवार उठाई 
प्रौर उस लम्पट पुरुष को मारने के लिये दौडा । रोहक से उसने पूछा--“कहाँ है वह दुष्ट ? इस पर 
रोहक ने प्रपनो हो छाया की शोर इंगित करके कहा- 'यह रहा ।' 


भरत नट बहुत लज्जित हुआ्ला यह सोचकर कि मैंने इस बालक के कहने से पत्नी को 
दुराचारिणी समझ लिया | मन ही मन पश्चात्ताप करते हुए वह अपनी पत्नी से पूर्ववत्‌ मधुर व्यवहार 
रखने लगा । फिर भी बुद्धिमान रोहक ने विचार किया-“'विमाता, विभाता ही होती है। कही मेरे 
द्वारा किये गये व्यवहार से कुपित रहने के कारण यह किसी दिन मुभे विष झ्रादि के प्रयोग से मार 
न डाले ।” यह सोचकर वह छाया की तरह पिता के साथ रहने लगा । उन्ही के साथ श्वाता-पीता, 
सोता था। 


एक दिन किसी कार्यवश भरत को उज्जयिनी जाना था। रोहक भी पिता के साथ ही गया | 
नगरी का वेभव भ्रौर सौन्दर्य देखकर वह मुग्ध-सा हो गया और वहा घूम-घुमकर उसके नक्शे को 
ब्रपने मस्तिष्क में बिठाने लगा । कुछ समय पश्चात्‌ जब वह पिता के साथ अपने गाँव की ओर लौटा 
तब नगरी के बाहर क्षिप्रा नदी के तट तक श्राते ही भरत को किसी भूली हुई वस्तु का स्मरण आया। 
पग्रत रोहक को नदी के तट पर बिठाकर वह पुन नगरी को ओर लौट गया । 


रोहक नदी के तीर पर रेत से खेलने लगा । अकस्मात्‌ ही उसे न जाने क्या सूका कि उसने 
रेत पर उज्जयिनी का महल समेत हुवहू नक्शा बना दिया । सयोगवश उसी समय नगरी का राजा 
उधर भ्रा गया । चलते हुए वह रोहक के बनाए हुए नक्शे के समीप श्राया शौर उस पर चलने को 
हुआ । उसी क्षण रोहक ने टोकते हुए कहा -'महाशय ' इस मार्ग से मत जाओ ।' 


राजा चौककर बोला--''क्यों क्या बात है ? 


रोहक ने उत्तर दिया- “यहाँ राजभवन है, इसमे कोई व्यक्ति बिना इजाजत के प्रवेश नही 
कर सकता । 


राजा ने यह सुनते ही कोतृहलपूर्वक रोहक द्वारा बनाया हुआ अपनी नगरी का नक्शा देखा । 
देखकर हैरान रह गया और सोचने लगा --'यह छोटा-सा बालक कितना बुद्धिमान्‌ है जिसने नगरी मे 
घूमकर ही इसका इतना सुन्दर और सही नक्शा बना लिया । उसी क्षण उसके मन मे यह विचार भी 
भ्राया कि--'मेरे चार सौ निन्‍्यानवे मन्त्री हैं। श्रगर इनसे भी ऊपर इस बालक के समान एक शअ्रतीव 
कुशाग्र बुद्धि वाला महामन्त्री हो तो राज्यकार्य कितने सुन्दर ढग से चले । इसके बुद्धिबल के कारण 
प्रन्य बल न्यून होने पर भी मैं निष्कटक राज्य कर सक्‌ गा तथा किसी भी शत्रु पर सहज ही विजय पा 
लूगा। किन्तु पहले इसकी परीक्षा कर लेनी चाहिए ।' यह विचार करके राजा रोहक का, उसके 
पिता का तथा गाँव का नाम पूछकर नगर की श्रोर चल दिया । 

हर अपने पिता के लौटकर श्राने पर रोहक भी अपने गाँव की ओर रवाना हो गया | राजा 
भूला तही और कुछ समय बाद ही उसने रोहक की परीक्षा लेना प्रारम्भ कर दिया । 

(२) शिला--राजा ने सर्वप्रथम रोहक के ग्रामवासियों को बुलाकर कहा- तुम लोग मिलकर 
एक ऐसा मण्डप बनाओ जो राजा के योग्य हो और उसका श्राच्छादन गाँव के बाहर पडी हुई महाशिला 
हो | किन्तु शिला को वहां से उच्ाड़ा न जाय ।' 


मतिशान | [७४५ 


राजा की आज्ञा सुनकर गाँव के निवासी नट बडी चिन्ता में पड़ गये । सोचने लगे--मण्डप 
बनाना तो मुश्किल नहीं पर शिला को उठाए बिना वह झण्डप पर कंसे छाई जाएगी ” लोग इकट्ठे 
होकर इसी पर विचार विमर्श कर रहे थे कि रोहक भूखा होने के कारण प्रपने पिता को बुलाने के 
लिए वहाँ श्रा पहुँचा । उसने सब बात सुनी और नटो की चिन्ता को समझ गया । समझ लेने के 
बाद बोला-“भाप लोग इस छोटी-सी बात को लेकर चिन्ता मे पडे हुए हैं। मैं श्रापकी चिन्ता 
मिटा देता हूँ ।' 


लोग हैरान होकर उसकी श्रोर देखने लगे, एक ने उपाय पूछा । रोहक ने कहा-- पहले श्राप 
सब शिला के चारो प्रोर की भूमि खोदो । चारो तरफ भूमि खुद जाने पर नीचे सुन्दर खम्भे खडे कर 
दो श्रौर फिर शिला के नोचे को जमीन खोद डालो । यह हो जाय तब फिर शिला के नीचे की 
तरफ चारो ओर सुन्दर दीवारे खडी कर दो । बस मडप तैयार हो जाएगा भ्रौर शिला हटानी भी 
नही पड़ेगी ।' 

रोहक की बात सुनकर लोग बडे प्रसन्न हुए और उसकी हिदायत के भ्रनुसार ही काम प्रारम्भ 
कर दिया । थोडे दिनो मे ही महाशिला के नीचे भव्य स्तभ लगा दिये गए श्र वेसा ही सुन्दर 
परकोटा झ्रादि बनाकर मडप तेयार किया गया। बिना हटाये ही शिला मडप का भ्राच्छादन 
बन गई । 


कार्य समाप्त होने पर भरत सहित अ्रन्य नटो ने जाकर राजा से निवेदन किया--“महाराज ! 
आपकी आज्ञानुसार मडप तेयार कर दिया गया है। कृपा करके उसका निरीक्षण करने के 
लिए प्रधारे ।' 

राजा ने स्वय आकर मडप को देखा और प्रसन्न होकर पूछा--'तुम लोगो को मडप बनाने 
का यह तरीका किसने बताया ?' 

ग्रामीणो ने एक स्वर से रोहक की श्लोर इगित करते हुए कहा--'राजाधिराज ' यह इस 
नन्हे बच्चे रोहक की बुद्धि का चमत्कार है। इसी ने हमे यह उपाय बताया और हम भ्रापकी इच्छा- 
नुसार कार्य कर सके है । 

राजा को इसी उत्तर की श्राशा थी । उसने रोहक को एक परीक्षा मे उत्तीर्ण पाकर उसकी 
प्रशसा की तथा नगर की ओर रवाना हो गया । 

(३) सिण्ह--राजा ने दूसरी बार रोहक की परीक्षा करने के लिए उसके गाँव वालो के पास 
एक मेढा भेजा, साथ ही कहलवाया कि--“यह मेढा एक पक्ष पश्चात्‌ लौटाना, पर ध्यान रखना कि 
इसका वजन न बढे और न ही घटने पाए ।” 

गाँव वाले फिर चिन्ताग्रस्त हो गये । सोचने लगे--'अगर इसे भ्रच्छा खाना खिलायेगे तो 
इसका बजन बढेगा ही, भौर भूखा रखेंगे तो घट जायगा ।' 

कोई उपाय न सूमने पर उन्होने रोहक को ही बुलाया श्लौर उससे अ्रपनी चिन्ता का हल 
पूछा । रोहक ने भ्रविलम्ब तरीका बताया भौर उसके निर्देशानुसार गाँव वालो ने मेढे को श्रच्छी खुराक 
देना शुरू किया । किन्तु उसके सामने ही एक पिंजरे में व्याध्र को रख दिया । परिणाम यह हुआ कि 
ग्रच्छी खुराक मिलने पर भी व्याप्न के भय से मेढे का वजन न बढा और न घटा । एक पक्ष के बाद 


) 


७६] [ गन्दौसूत्र 


गाँव वालो ने मेढे को लौटा दिया । राजा ने उसका वजन करवाया तो वह बराबर उतना ही निकला 
जितना गाँव भेजे जाने के समय था । राजा ने इस घटना के पीछे भी रोहक की ही चतुराई जानकर 
उसकी सराहुता की । 


(४) --कुछ दिनो के अ्रनन्तर राजा ने पुन' रोहक की परीक्षा लेने के लिए एक 
कुक्कुट-भ्र्थात्‌ मुर्गा उसके गाँव भेज दिया । मुर्गा लडना ही नहीं जानता था, फिर भी कहलवाया 
कि इसे श्रन्य किसी मुर्गे के बिना ही लडाक्‌ बनाया जाय । 


गाँववाले इस बार भी घबराए कि भ्रन्य मुर्गे के सामने हुए बिना यह लडना कंसे सीखेगा ? 
पर रोहक ने यह समस्या भी हल की । एक बड़ा तथा मजबूत दर्पण मगवाकर मुर्गे के सामने रखवा 
दिया । इस दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब को ही अपना प्रतिद्वन्द्दी समभकर सुर्गा धीरे-धीरे उससे लडने 
का प्रयत्न करने लगा । कुछ ही समय में लडाका बन गया। राजा के पास वापस मुर्गा भेजा गया 
प्रौर जब राजा ने उसे भ्रन्य किसी मुर्गे के बिना ही लडते देखा तो रोहक की बुद्धि पर दग होते हुए 
अतीव प्रसन्नता प्रकट की | 


(५) तिल--उक्त घटना के कुछ दिन पश्चात्‌ राजा ने रोहक को और परीक्षा लेने के लिए 
उसके गाँववालों को दरबार मे बुलाकर ग्राज्ञा दी--'तुम्हारे समक्ष तिलो का यह ढेर है, इसे बिना 
गिने ही बतलाग्ो कि इसमे कितने तिल है ? यह भी ध्यान रखना कि सख्या बताने मे श्रधिक विलम्ब 


नहो।' 


राजा की यह प्रनोखी ग्राज्ञा सुनकर लोग किकर्त्तव्यविमूढ हो गए । उन्हे कुछ भी समझ मे 
नहीं श्राया कि ग्रब क्या करे ? कंसे बिना गिने ही तिलो की सख्या बताएँ ” पर उन्हे रोहक का 
ध्यान श्राया और दौडे-दौडे वे उसी के पास पहुँचे । रोहक गॉववालो की बात श्रर्थात्‌ राजाज्ञा सुनकर 
कुछ क्षण मौन रहा, फिर बोला-आप लोग जाकर महाराज से कह देना कि हम गणित के विद्वान्‌ तो 
नही है, फिर भी तिलो की सख्या उपमा के द्वारा बताते हैं। वह इस प्रकार है--“इस उज्जयिनी 
नगरी के ऊपर बिल्कुल सीध में आराकाश में जितने तारे है, ठोक उतनी ही सख्या इस ढेर मे तिलो 
की है।* 


ग्रामीण लोगो ने प्रसन्न होते हुए राजा के पास जाकर यही कह दिया । राजा ने रोहक की 
बुद्धिमत्ता देखकर दातो तले अगुली दबाई भ्रौर मन ही मन प्रसन्न हुआ । 


(६) बालुका--कुछ दिन के बाद राजा ने पुन रोहक की परीक्षा करने के लिए उसके गाँव 
वालो को प्रादेश दिया कि-- तुम्हारे गाँव के ग्रासपास बढ़िया रेत है। उस बाल रेत की एक डोरी 
बनाकर शीघ्र भेजो ।' 


बेचारे नट घबराए, भला बालू रेत की डोरी क॑से बट सकती थी ? पर वहाँ रोहक जो था, 
उसने चुटकी बजाते ही उन्हे मुसीबत से उबार लिया। उसी के कथनानुसार गाँववाला ने जाकर 
राजा से प्रार्थना की--''महाराज | हम तो नट है, बाँसो पर नाचना ही जानते है। डोरी बनाने का 
काम कभी किया नही । फिर भी झापकी श्राज्ञा का पालन करने का प्रयत्न अवश्य करेगे । कृपा करके 
श्राप अपने भण्डार मे से रेत की बती हुई डोरी का एक तमूता दिलवादे ।” 


धलिशान | [७७ 


राजा श्र क्या उत्तर देता ? मत ही मन कंटंकर रह गंया। रोहक की बुद्धि के सामने 
उसकी श्रपनी अकल पानी भरने लगी । 


(७) हुष्ती -एक दिन राजा ने एक वृद्ध ही नही भ्रपितु मरणासबन्न हाथी नटो के गाँव मे 
भेज दिया और कहलवाया--इस हाथी की भ्रच्छी तरह सेवा करो और प्रतिदिन इसके समाचार 
मेरे पास भेजते रहो, पर कभी आकर यह मत कहना कि वह मर गया है, भ्रल्यथा दड दिया जायगा ।” 


लोगो ने फिर रोहक से सलाह ली । रोहक ने उत्तर दिया-- हाथी को अच्छी खुराक देते 
रहो, झ्रागे जो होगा, मै सम्हाल लू गा ।' यही किया गया । हाथी को शाम को उसके श्रनुकूल खुराक 
दो गई किन्तु वह रात्रि को हो मर गया । लोग घबराए कि ग्रब राजा को जाकर क्‍या समाचार दें ? 
किन्तु रोहक ने उन्हे तसल्ली दी श्रौर उसके निर्देशानुसार ग्रामवासियों ने जाकर राजा से कहा-- 
“महाराज ! झ्ञाज हाथी न कुछ खाता है, नपीता है, न उठता है, न ही कुछ चेष्टा करता है। 
यहाँ तक कि वह श्राज सास भी नही लेता ।” 


राजा ने कुपित होते हुए पूछा--“तो क्या हाथी मर गया ?” ग्रामीण बोले--“प्रभु ' हम 
ऐसा कैसे कह सकते है, ऐसा तो श्राप ही फरमा सकते है । 


राजा ने समझ लिया कि हाथी मर गया किन्तु रोहक की चतुराई से गाववालो ने यही बात 
अन्य प्रकार से समकाई है । राजा चुप हो गया । गाँववासी भी जान बचाकर सहर्ष भश्रपने घरो की 
शोर लौट झाए । 


(८) अगड़-कप -एक बार राजा ने नटो के गाँव फिर सदेश भेजा--“तुम्हारे यहाँ जो 
कुशा है वह श्रत्यन्त मधुर एव शीतल जल वाला है। श्रत उसे हमारे यहाँ भेज दो, पभ्रन्यथा दड के 
भागी बनोगे । 


राजाज्ञा प्राप्तकर लोग चिन्ताग्रस्त होते हुए पुन॒रोहक की शरण मे दौडे। रोहक ने ही 
उन्हे फिर चिन्तामुक्त कर दिया। उसके द्वारा सिखाये हुए व्यक्ति राजा के पास पहुचे और कहने 
लगे- -- 


“महाराज ! हमारे यहाँ का कुश्रा ग्रामीण है । वहु बडा भीरु श्रौर सकोचशील है । इसलिये 
आप अपने यहाँ के किसी कुए को हमारे यहाँ भेजने की कृपा कीजिए | श्रपने सजातीय पर विश्वास 
करके वह उसके साथ नगर मे श्रा जाएगा ।” 


राजा रोहक को बुद्धि की प्रशसा करता हुआ चुप हो गया । 


(६) बन-खण्ड- कुछ दिन निकल जाने के बाद एक दिन राजा ने फिर रोहक के गाँववालों 
को सन्देश भेजा--'तुम्हारे गाँव के पूर्व में जो वन-खण्ड है उसे पश्चिम मे कर दो ।' 


ऐसा करना क्या गांव वालो के वश की बात थी ? रोहक ने ही उन्हे सुकाया--“इस गाँव को 
ही वनखण्ड की पूवेदिशा मे बसा लो । ऐसा करने पर वनख्ण्ड स्वय पश्चिम दिशा मे हो जायगा ।' 
लोगो ने ऐसा हो किया तथा राजकर्मचा रियो के द्वारा कार्य पूर्ण हो जाने का सन्देश भेज दिया गया । 


ऊ८ ] [ नग्वीसूभ 


रोहक की भ्रद्भुत बुद्धि के चमत्कार का राजा को पुन. प्रमाण मिला और वह मन ही मन 
बहुत आानन्दित हुआ । 


(१०) पायस--एक दिन झ्चानक ही राजा ने नटो को शआराज्ञा दी कि--बिना श्रग्नि मे पकाये 
खीर तेयार करके भिजवाओो ।' 

नट लोग फिर हैरान हुए, किन्तु रोहक ने उन्हे सुझाव द्विया --“चावलो को पहले पानी में 
भिगोकर रख दो, तत्पश्चात्‌ उनको दूध-भरी देगची मे डाल दो । देगची को चूने के ढेर पर रखकर 
चूने मे पानी डाल दो । चूने की तीत् गर्मी से खीर पक जाएगी ।' 


ऐसा ही किया गया झौर पकी हुई खीर राज-दरबार मे पेश हुई । उसे तंयार करने की विधि 
जब राजा ने सुनी तो एक बार फिर वे रोहक की बुद्धि के कायल हुए । 


(११) अधिग- उक्त घटना के कुछ समय पश्चात्‌ राजा ने रोहक को श्रपने पास बुला भेजा 
झौर कहा-- 

“मेरो आ्राज्ञा पालन करने वाला बालक कुछ शर्तों को मानकर मेरे पास आए । वे शर्ते है-- 
आ्रानेवाला न शुक्ल पक्ष मे आए और न कृष्ण पक्ष मे, न दिन में श्राए श्र न रात मे, न धूप में आए 
श्र न छाया मे, न आकाशमार्ग से श्राए शौर न भूमि से, न मार्ग से आए श्ौर न उन्माग्ग से, न स्नान 
करके झ्राए श्रौर न विना स्नान किये, किन्तु आए गअ्रवश्य । 


राजा को ऐसी निराली शर्तों को सुनकर वहाँ जितने भी व्यक्ति उपस्थित थे मानो सभी को 
साँप सू घ गया । कोई नहो सोच सका कि ऐसी प्रदभुत शर्ते पूरी हो सकेगी । किन्तु रोहक ने हार 
नही मानी । वह निश्चिन्ततापूर्वक धीरे-धीरे राजमहल से बाहर निकला भ्रौर अपने गाँव की श्रोर 
बढ गया । उसने अनुकूल समय की प्रतीक्षा की और श्रमावस्या तथा प्रतिपदा की सन्धि के पूर्व कण्ठ 
तक स्नान किया । सन्ध्या के समय सिर पर चालनी का छत्र धारण करके मेढ पर बेठकर गाडी के 
पहिये के बीच के मार्ग से राजा के पास चल दिया । साथ ही राजदर्शन, देवदर्शन एवं गुरुदर्शन खाली 
हाथ नही करना चाहिए, इस नीतिवचन को ध्यान मे रखते हुए हाथ में एक मिट्टी का ढेला भी ले 
भ्राया । 

राजा की सेवा मे पहुंचकर उसने उचित रीति से नमस्कार किया तथा मिट्टी का ढेला उनके 
समक्ष रख दिया । राजा ने चकित होकर पूछा --'यह कया है ?” रोहक ने विनयपूर्वक उत्तर दिया-- 
“देव | आप पृथ्वीपति हैं, श्रत मैं पृथ्वी लाया हूँ ।'' 

रोहक के मागलिक वचन सुनकर राजा भअत्यन्त प्रमुदित हुआ भर उसे श्रपने पास रख लिया । 
गाँववाले भी अ्पने-प्रपने घरो को लौट गये। रात्रि मे राजा ने रोहक को श्रपने पास ही सुलाया । 
प्रथम प्रहर व्यतीत होने के पश्चात्‌ दूसरे प्रहर मे राजा की नींद खुली झौर उन्होने रोहक को 
सम्बोधित करते हुए पूछा--“रोहक ! जाग रहा है या सो रहा है ?” रोहक ने उसी समय उत्तर 
दिया--जाग रहा हूँ महाराज ! 

“क्या सोच रहा है ?” --राजा ने फिर पूछा । रोहक ने कहा--मैं सोच रहा हूँ कि श्रजा 
(बकरी) के उदर मे गोल-गोल भिंगनियाँ कंसे बन जाती हैं ?” राजा को इसका उत्तर नहीं 
सूका । उसने रोहक से ही पूछ लिया- “क्या सोचा ? वे कंसे बनती हैं ?” रोहफ बोला--“देव ! 


मतिशान ] [७९ 


बकरी के उदर में सकतेक नामक एक विशेष प्रकार की वायु होती है, उसी के कारण मिगतिया 
गोल-गोल हो जाती हैं । यह कहकर रोहक सो गया । 

(१२) पत्र--रात के तीसरे प्रहर मे राजा ने फिर पूछ लिया--“रोहक, जाग रहा है ? 
रोहक पभविलम्ब बोल उठा--“जाग रहा हूँ स्वामी !” राजा के फिर यह पूछने पर कि क्या सोच 
रहा है, रोहक ने कहा-- 

“मैं यह सोच रहा हूँ कि पीपल के पत्ते का डठल बड़ा होता है या शिख्वा ?” राजा सशय मे 
पड गया और रोहक से ही उसका निवारण करने के लिये कहा । रोहक ने उत्तर दिया--जब तक 
शिखा का भाग नही सूखता तब तक दोनो तुल्य होते हैं ।” उत्तर देकर राजा के सोने के पश्चात्‌ वह 
भी सो गया | 


(१३) खाइहिला (गिलहरी)-रात्रि का चतुर्थ प्रहर चल रहा था कि प्रचानक राजा ने 
रोहक को फिर पुकार लिया। रोहक जाग ही रहा था। राजा ने पूछा--“क्या सोच रहा है ? 
रोहक बोला --'सोच रहा हूँ कि गिलहरी की पृ छ उसके शरीर से बडी होती है या छोटी ” राजा 
ने इसका भी निर्णय उसी से पूछा । रोहक बोला--“'देव, दोनो बराबर होते है ।” उत्तर देकर वह 
पुन सो गया। 


(१४) पच पियरो (पांच पिता)-रात्रि व्यतीत हो गई। सूर्योदय से पूर्ष जब मगलवाद्य 
बजने लगे, राजा जाग गया किन्तु रोहक प्रगाढ निद्रा मेसो रहा था। पुकारने पर जब वह नही 
जागा तो राजा ने श्रपनी छडी से उसे कुछ कौचा । रोहक तुरन्त जाग गया । राजा ने कौतृहलवश 
पूछ लिया-- क्यो रोहक, अब क्‍या सोच रहा है ?' 


इस बार रोहक ने बडा अ्रजीब उत्तर दिया । बोला--'महाराज ! मैं सोच रहा हूँ कि आपके 
पिता कितने है ”” रोहक की बात सुनकर राजा चक्कर मे पड गया किन्तु उसकी बुद्धि का कायल 
होने के कारण विना क्रोध किये उसी से प्रश्न किया--तुम्ही बताओ्रो मैं कितनो कौ पुन्र हूँ ? 


रोहक ने उत्तर दिया--'महाराज आप पाँच से पेदा हुए है। एक तो वैश्रवण से, क्योकि 
ग्राप कुबेर के समान उदारचित्त है। दूसरे चाण्डाल से, क्योंकि दुश्मनो के लिए आप चाण्डाल के 
समान क्रूर है। तीसरे घोबी से, जैसे घधोबी गीले कपडे को भली-भाति निचोडकर, सारा पानी 
निकाल देता है, उसी तरह आप भी राजद्रोही और देशद्रोहियों का सर्वस्व हर लेते हैं। चौथे बिच्छू 
से, क्योंकि बिचछू डक मारकर दूसरो को पीडा पहुँचाता है, बसे ही मुझ निद्राधीन बालक को आपने 
छडी के प्रग्रभाग से कौचकर कष्ट दिया है। पाचवे, झ्राप भ्रपने पिता से पैदा हुए हैं, क्योकि अपने 
पिता के समान ही झ्राप भी न्यायपूर्वक प्रजा का पालन कर रहे हैं ।' 


रोहक की बाते सुनकर राजा गअ्रवाक्‌ रह गया। प्रात नित्यक्रिया से निवृत्त होकर वह 
अ्रपनी माता को प्रणाम करने गया तथा उनसे रोहक की कही हुई सारी बाते कह दी । राजमाता ने 
उत्तर दिया--/पुत्र | विकारी इच्छा से देखना ही यदि तेरे सस्कारो का कारण हो तो ऐसा ग्रवश्य 
हुप्ना । जब तू गर्भ मे था, तब मैं एक दिन कुबेर की पूजा करने गई थी । कुबेर की सुन्दर मूर्ति को 
देखकर तथा वापिस लौटते समय मार्ग मे एक धोबी और एक चाण्डाल को देखकर मेरी भावना 
विकृत हुई । इसके बाद घर झाने पर एक बिच्छु-युगल को रति-क्रीडा करते देखकर भी मन मे कुछ 
विकारी भावना पैदा हुई । वस्तुतः तो तुम्हारे जनक जगतृप्रसिद्ध पित्ता एक ही हैं।' 


८०] [ सम्दीसूत 
यह सुनकर राजा रोहक की अलौकिक बुद्धि का चमत्कार देखकर दग रह गया। माता को 
प्रणाम कर वह वापिस लौट श्राया और दरबार का समय होने पर रोहक को महामन्त्री के पद पर 


नियुक्त कर दिया । 
इस प्रकार ये चौदह उदाहरण रोहक की भ्रोत्पत्तिकी बुद्धि के है | 
(१) भरत व शिला के उदाहरण पहले दिये जा चुके हैं । 


(२) पणित्त (प्रतिज्ञा-शर्त )--किसी समय एक भोलाभाला ग्रामीण किसान अपने गाँव से 
ककड़ियाँ लेकर शहर मे बेचने के लिये गया । नगर के द्वार पर पहुँचते ही उसे एक धूत॑ मिल गया । 
उस धू्त ने उसे ठगने का विचार किया और कहा--“भाई ' भ्रगर मैं तुम्हारी सारी ककडियाँ खा 
ल तो तुम मुझे क्‍या दोगे ? ” ग्रामीण ने कहा--'भरगर तुम सारी ककडियाँ खा लोगे तो मैं तुम्हे इस 
द्वार मे न आ सके ऐसा लड्ड दू गा ।” दोनो मे यह शर्त तय हो गई तथा वहाँ उपस्थित कुछ ब्यक्तियो 
को साक्षी बना लिया गया । 

नागरिक धूत॑ ने अपना वचन पूरा करने के लिए ग्रामीण की ककड़ियो मे से प्रत्येक को 
उठाया तथा थोडा-थोडा खाकर सभी को जूठी करके रख दिया। तत्पश्चात्‌ बोला -“लो भाई ! 
मैंने तुम्हारी सारी ककडियाँ खा ली ।' 

बेचारा ग्रामीण श्राखे मल-मलकर देखने लगा कि कही उसे भ्रम तो नही हो रहा है ” किन्तु 
भ्रम नही था, ककड़ियाँ तो थोडी-थोडी खाई हुई सभी सामने पडी थी। इसलिए उसने कहा-- 
“तुमने ककडियाँ कहाँ खाई हैं! सब तो पडी हैं । 


धूर्त ने कहा--मैंने ककडियाँ खा ली हैं, इसका विश्वास भ्रभी कराये देता हूँ ।” ऐसा कहकर 
उसने ग्रामीण को साथ लेकर सारी ककडिया बाजार मे बेचने के लिए रख दी | ग्राहक श्राने लगे पर 
ककडियो को देखकर सभी लौट गये, यह कहकर कि ये ककडियाँ तो खाई हुई हैं । 

लोगो की बातो के आधार पर नगर के धूते ने ग्रामीण से कहा -- “देखो, सभी कह रहे है कि 
ककंडियाँ खाई हुई है । भ्रब लाझो मेरा लड्डू । धूत॑ ने साक्षियो को भी इसी प्रकार विश्वास करने 
के लिए बाध्य कर दिया । 


ग्रामीण घबराया कि धूर्ते ने ककडियाँ खाई भी नही और लड्डू भी माँग रहा है । भ्रब कैसे 
इतना बड़ा लड्डू इसे दू ” भयभीत होकर उसने धूत को रुपया देकर पीछा छुडाना चाहा । वह उसे 
एक रुपया देने लगा, न लेने पर दो श्रौर इसी प्रकार सो रुपये तक श्रा गया, किन्तु धूत ने रुपया लेने 
से इन्कार कर दिया । वह लड्डू लेने की ही मॉग करता रहा । हारकर ग्रामीण ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी 
करने के लिए कुछ समय की माँग की श्रोर किसी ऐसे व्यक्ति को खोजने लगा जो उसे इस सकट 
से उबारे। 


आखिर उसे एक दूसरा धूर्त मिल गया जिसने चुटकियों मे ही उसकी समस्या हल कर देने 
का आश्वासन दिया । उसी के कथनानुसार ग्रामीण ने बाजार जाकर एक छोटा सा लड्डू खरीदा। 
तत्पश्चात्‌ वह धूत॑ अन्य साक्षियो को बुला लाया। सबके श्रा जाने पर उसने लड्डू को नगर-द्वार के 
बाहर रख दिया और पुकारने लगा- “अरे लड्डू ! चलो, श्रो लड्डू , इधर इस दरवाजे में झ्राग्रो ।” 


दर 7 


सतिलान ] [ब१ 


पर लड्डू कहाँ चलनेवाला था । वह तो जहाँ था वही पड़ा रहा। तब ग्रामीण ने उस 
नागरिक धूतं को सभी साक्षियो के समक्ष सबोधित करते हुए कहा--भाई ! मैंने तुमसे प्रतिज्ञा की 
थी कि हार गया तो ऐसा लड्डू दू गा जो इस द्वार से नही निकल सके । भ्रब तुम्ही देख लो यह लड्ड्‌ 
द्वार से नहों निकल रहा है। चलो, अ्रपना लड्डू ले जाओ्रो ! मैं प्रतिज्ञा से मुक्त हो गया हूँ ।' 

नागरिक धूर्त कट कर रह गया । सारे साक्षी भी कुछ न कह सके । 

(३) ब॒क्ष-कुछ यात्री एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हुए मार्ग में एक सघन श्राम्र-वृक्ष 
के नीचे विश्राम करने के लिये ठहर गये । वृक्ष पर लगे हुए झ्रामो को देखकर उनके मु हू मे पानी भर 
आया । वे किसो प्रकार श्राम प्राप्त करने का उपाय सोचने लगे। वृक्ष पर बन्दर बेठे हुए थे भौर 
उनके डर से वृक्ष पर चढकर झ्राम तोडना कठिन था । ग्राखिर एक व्यक्ति की औत्पत्तिकी बुद्धि ने काम 
दिया और उसने पत्थर उठा-उठाकर बन्दरों की श्रोर फेंकना प्रारम्भ कर दिया । बदर चचल श्रौर 
नकलचो होते ही है | पत्थरो के बदले पत्थर न पाकर पेड़ से आराम तोड-तोडकर नीचे ठहरे हुए 
व्यक्तियों की ओर फेकने लगे । पथिको को श्रौर क्या चाहिये था, मन-मागी मुराद पूरी हुई। सभी ने 
जी भरकर आराम खाये भौोर मार्ग पर झागे बढ गये । 


(४) खड्डग (अगृठो )--राजगृह नामक नगर के राजा प्रसेनजित ने भ्रपनी न्यायप्रियता एवं 
बुद्धिबल से समस्त शत्रुओ पर विजय प्राप्त कर ली थी। वह निष्कटक राज्य कर रहा था। प्रतापी 
राजा प्रसेनजित के बहुत से पुत्र थे । उनमे एक श्रेणिक नामक पुत्र समस्त राजोचित ग्रुणो से सम्पन्न 
अति सुन्दर और राजा का विशेष प्रेमपात्र था। किन्तु राजा प्रकट रूप मे उस पर अपना प्रेम 
प्रदर्शित नहो करता था । राजा को डर था कि पिता का प्रेम-पात्र जानकर उसके भ्रन्य भाई ईर्ष्यावश 
श्रेणिक को मार न डाले । किन्तु श्रेणिक बुद्धिसम्पन्न होने पर भी पिता से प्रेम व सम्मान न पाकर 
मन ही मन दु खी व क्रोधित होते हुए घर छोडने का निश्चय कर बंठा । भ्रपनी योजनानुसार एक दिन 
वह चुपचाप महल से निकल कर किसो अन्य देश में जाने के लिए रवाना हो गया । 


चलते-चलते वह वेश्नातट नामक नगर मे पहुंचा झोर एक व्यापारी की दूकान पर जाकर 
कुछ विश्राम के लिए ठहर गया । दुर्भाग्यवश उस व्यापारी का सम्पूर्ण व्यापार और वेभव नष्ट हो 
चुका था, किन्तु जिस दिन श्रेणिक उसकी दृकान पर जाकर बेठा उस दिन उसका सचित 
माल, जिसे कोई पूछता भी न था, बहुत ऊँचे भाव पर बिका तथा विदेशों से व्यापारियों से लाए हुए 
रत्न प्रल्प मूल्य मे प्राप्त हो गये । इस प्रकार अभ्रचिन्त्य लाभ हुआ देखकर व्यापारी के मन में विचार 
झ्राया 'प्राज मुर्भे जो महान्‌ लाभ प्राप्त हुआ है इसका कारण निश्चय ही यह पुण्यवान्‌ बालक है। 
आज यह मेरी दूकान पर आकर बेठा हुआ है । कोई बडी महान्‌ श्रात्मा है यह । यो भी कितना सुन्दर 
ओर तेजस्वी दिखाई देता है।' 

सयोगवश उसी रात्रि को सेठ ने स्वप्न में देखा था कि उसकी पुत्री का विवाह एक 
'रत्नाकर' से हो रहा है भौर भ्रगले दिन ही जब श्रेणिक उसकी दूकान पर झ्राकर बंठा झौर दिन भर 
में लाभ भी ग्राशातीत हुआ तो सेठ को लगा कि यही वह रत्नाकर है। मन ही मन प्रमुदित होकर 
व्यापारी ने श्रेणिक से पूछ लिया-- “झाप यहाँ किसके गृह में अतिथि बन कर श्राए है ?” श्रेणिक 
ने बडे मधुर भौर विनम्र स्वर में उत्तर दिया--“श्रीमान्‌ | मैं श्रापका ही अ्रतिथि हूँ ।” इस मधुर 
एवं प्रात्मीयतापूर्ण उत्तर को सुनकर सेठ का हृदय प्रफुल्लित हो गया | वह बडे प्रेम से श्रेणिक को 


दर] [मम्दीसूत्र 


प्रपने घर ले गया । उत्तमोत्तम वस्त्राभूषणो से एव भोजनादि से उसका सत्कार किया। घर में ही 
रहने का भ्राग्रह किया । श्रेणिक को तो कही निवास करना ही था, वह उसी सेठ के यहाँ ठहर गया । 
सौभाग्यवश उसके पुण्य से सेठ की घन-सम्पत्ति, व्यापार एवं प्रतिष्ठा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती 
गई तथा खोई हुई साख पुन' प्राप्त हो गई | परम आनन्द का अनुभव करते हुए सेठ ने कुछ ही दिनो 
के बाद श्रेणिक का विवाह श्रपनी सुयोग्य पुत्री नदा के साथ कर दिया। पत्नी के साथ श्रेणिक 
सुखपूवंक ससुराल मे रहने लगा । कुछ ही समय के बाद नदा ग्रभंवती हुई श्र यथाविधि गर्भ का 
संरक्षण करने लगी । 


इधर बिना बताए श्रेणिक के चले जाने से राजा प्रसेनजित बहुत दु.खी हुए भर चारो 
दिशाओं में उसकी खोज के लिए आदमी भेज दिये । पता लगने पर राजा ने कुछ सेनिक श्रेणिक को 
लिवा लाने के लिए वेन्नातट भेजे । सनिको ने जाकर श्रेणिक से प्रार्थना की--महाराज प्रसेनजित 
झापके वियोग मे बहुत व्याकुल है। कृपा करके आप शीघ्र ही राजगृह पधारे।” श्रेणिक ने 
राजपुरुषो की प्रार्थना स्वीकार करके राजगृह जाने का निश्चय किया तथा अपनी पत्नी नदा की 
सहमति लेकर झौर अपना विस्तृत परिचय लिखकर एक दिन राजगुह की ओर प्रस्थान किया । 


इधर नदा के गर्भ में देवलोक से च्युत होकर श्राए हुए जीब के पृण्य-प्रभाव से एक दिन 
नदादेवी को दोहद उत्पन्न हुआ कि--मैं एक महान्‌ हाथी पर श्रारूढ होकर नगर-जनो को धन-दान 
और भ्रभय दान दूँ ।' मन में यह भावना झाने पर नदा ने अपने पिता से श्रपनी इच्छा को पूर्ण करने 
की प्रार्थना की । पिता ने सहर्ष पुत्री के दोहद को पूर्ण किया। यथासमय नदा की कुक्षि से एक 
अनुपम बालक ने जन्म लिया । बाल-रवि के समान सम्पूर्ण दिशाओ को प्रकाशित करने वाले बालक 
का जन्मोत्सव मनाया गया तथा उसका नाम 'अभयकुमार' रखा गया । समय व्यतीत हो चला तथा 
अभयकुमार ने प्रारभिक ज्ञान से लेकर ग्रनेक शास्त्रो का श्रभ्यास करते हुए समस्त कलाश्ो का भी 
पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया । 


एक दिन अ्रकस्मात्‌ ही श्रभयकुमार ने अपनी माता से पूछा--'माँ ! मेरे पिता कौन है और 
कहाँ निवास करते है ?' नदा ने उपयुक्त समय समझकर श्रभयकुमार को उसके पिता श्रेणिक का 
परिचय-पत्र बताया तथा प्राद्योपान्त्य सारा बृत्तान्त भी कह सुनाया । पिता का परिच्रय पाकर 
प्रभयकुमार को भ्रतीव प्रसन्नता हुई श्रौर वह्‌ उसी समय राजगृह जाने को व्यग्न हो उठा । माता के 
समक्ष उसने प्रपनी इच्छा व्यक्त करते हुए साथ के साथ राजगृह जाने की श्राज्ञा मागी। नदादेवी ने 
प्रभयकुमार के साथ स्वयं भी चलना चाहा। परिणामस्वरूप ग्न॒भयकुमार भ्रपनी माता सहित 
सार्थ के साथ राजगृह की श्रोर चल दिया । 


चलते-चलते राजगृह के बाहर पहुँचे । अभयकुमार ने भ्रपनी माता को सार्थ की सुरक्षा मे, 
नगर के बाहर एक सुन्दर स्थान पर छोडकर स्वय नगर मे प्रवेश किया । यह जानने के लिये कि 
शहर का वातावरण कैसा है श्रौर किस प्रकार राजा के समक्ष पहुँचा जा सकता है। 

नगर मे प्रविष्ट होते ही प्रभयकुमार ने देखा कि एक जलरहित कुएं के चारो शोर लोगो की 
भोड इकट्ठी हो रही है । अभयकुमार ने एक व्यक्ति से लोगो के इकट्ठे होने का कारण पूछा । उस 
ने बताया--“इस सूखे कुए मे राजा की स्वर्ण-मुद्रिका गिर गई है ग्रौर राजा ने घोषणा की है कि 
जो व्यक्ति कूप के तट पर खडा रहकर अपने हाथ से अँगूठी निकाल देगा उसे भहान्‌ पारितोषिक 


अतिज्ञाम न [ दे 


दिया जायगा । किन्तु यहाँ खडे हुए व्यक्तियों मे से किसी को भी उपाय नहीं सूक रहा है अंगूठी 
निकालने का । 


प्रभयकुमार ने उसी क्षण कह्ा-- “प्रगर सुझे भ्रनुमति मिले तो मैं अँगूठी निकाल दूं ।” 
उस व्यक्ति के द्वारा यह बात जानकर राजकमंचारियो ने श्रभयकुमार से अंगूठी निकाल देने का 
अनुरोध किया । भ्रभयकुमार ने सर्वप्रथम कुएं मे फाककर अंगूठी को भलीभाँति देखा । तत्पश्चात्‌ 
कुछ ही दूर पर पडा हुआ गोबर उठाया झौर कुएं मे पडी हुई अँगूठी पर डाल दिया । अँगूठी गोबर 
में चिपक गई । कुछ समय पश्चात्‌ गोबर के सूखने पर उससे कुए मे पानी भरवाया और अभँगूठी 
समेत उस गोबर के ऊपर तेर आने पर हाथ बढाकर उसे निकाल लिया | एकत्रित लोग यह देखकर 
चकित और प्रसन्न हुए । अँगूठी निकलने का समाचार राजा तक पहुचा | राजा ने ग्रभयकुमार को 
बुलवाया औ्रौर पूछा--वत्स, तुम कौन हो, कहाँ के हो ? ” 


अ्रभयकुमार ने उत्तर दिया -“मैं श्रापका ही पुत्र हूँ ।/ यह कल्पनातीत उत्तर सुनकर राजा 
हैरान हो गया किन्तु पूछने पर प्रभयकुमार ने श्रपने जन्म से लेकर राजगृह मे पहुचने तक का सारा 
वत्तान्त कह सुनाया । सुनकर राजा को श्रसीम प्रसन्नता हुई | उसने श्रपने बुद्धमान्‌ और सुयोग्य पुत्र 
को हृदय से लगा लिया । पूछा--'तुम्हारी माता कहाँ हैं ?” श्रभयकुमार ने उत्तर दिया--'मैं उन्हे 
नगर से बाहर छोडकर आया हूँ ।' 

यह सुनते ही राजा अपने परिजनो के साथ स्वय रानो नदा को लिवाने के लिये चल पडा। 
इधर श्रभयकुमार ने पहले ही पहुँचकर अपनी माता से पिता के मिलने का तथा उनके राजमहल से 
चल पडने का समाचार दे दिया । रानी नदा ह्षे-विह्लल हो गई । इतने मे ही महाराजा श्रेणिक भी 
भ्रा पहुँचे । समग्र जनता हृषं-विभोर थी । प्रपनी महारानी के दशेन करके लोगो ने भ्रति उत्साह व 
समारोह से उन्हे राजमहल मे पहुँचाया । राजा ने श्रौत्पत्तिकी बुद्धि के धनी प्रपने पुत्र श्रभयकुमार 
को मत्रिपद प्रदान किया तथा सानन्द समय व्यतीत होने लगा । 


(५) पट--दो व्यक्ति कही जा रहे थे । रास्ते मे एक सुन्दर व शीतल जल का सरोदर 
देखकर उनकी इच्छा स्नान करने की हो गई। दोनो ने अपने-अपने वस्त्र उतारकर सरोवर के किनारे 
रख दिये तथा सतान करने के लिए सरोवर में उतर गये। उनमे से एक व्यक्ति जल्दी बाहर आरा 
गया और अपने साथी का ऊनी कम्बल ओढकर चलता बना । जब दूसरे ने यह देखा तो वह घबरा- 
कर चिल्लाया--“श्रे भाई, मेरा कम्बल क्यो लिए जा रहा है ?” किन्तु पहले व्यक्ति ने कोई उत्तर 
नही दिया । तब कम्बल का मालिक दोडता हुआ उसके पास गया | वह अपना कम्बल मागने लगा, 
पर ले जाने वाले ने कम्बल नहीं दिया श्रौर दोनों मे परस्पर रूंगडा हो गया। अ्रन्ततोगत्वा यह 
भंगडा न्यायालय में पेश हुआ । न्यायाधीश की समझ मे नही आया कि कम्बल किसका है ? न 
कम्बल पर नाम था और न हो कोई साक्षी था जो कम्बल वाले को पहचान सकता । किन्तु श्रवानक 
ही अपनी ग्रोत्पत्तिकी बुद्धि के बल पर न्यायाधीश ने दो कथियों मगवाई झऔर दोनो के बालो मे 
फिरवाई । उससे मालूम हुआ कि जिस व्यक्ति का कम्बल था उसके बालों में ऊन के धागे थे श्रौर 
दूसरे के बालों मे कपास के तन्‍्तु । इस परीक्षा के बाद कम्बल उसके वास्तविक स्वामी को दिलवा 
दिया गया। दूसरे को श्रपराध के भ्नुसार दंड मिला । 


(६) सरट (गिरगिट )--एक बार एक व्यक्ति जंगल में जा रहा था। उसे शौच की हाजत 


चड] [ सम्दीसूज 


हुई | शीघ्रता मे वह जमीन पर एक बिल देखकर, उसी पर शरीर-चिन्ता की निवृत्ति के लिए बंठ 
गया । ग्रकस्मात्‌ वहाँ एक गिरगिट भ्रा गया श्रौर उस व्यक्ति के गुदा भाग को स्पर्श करता हुआ बिल 
में घुस गया । शौचार्थ बंठे हुए व्यक्ति के मन में यह समा गया कि निश्चय ही गिरगिट मेरे पेट मे 
प्रविष्ट हो गया है । बात उसके दिल मे जम गई ओर वह इसी चिन्ता मे घुलने लगा । बहुत उपचार 
कराने पर भी जब स्वस्थ नही हो सका तो एक दिन फिर किसी श्रनुभवी वंद्य के पास पहुँचा । 

वैद्य ने नाडी-परीक्षा के साथ-साथ भ्रन्य प्रकार से भी उसके शरीर की जाच की, किन्तु कोई 
भी बीमारी प्रतीत न हुई । तब वंद्य ने उस व्यक्ति से पूछा--“तुम्हारी ऐसी स्थिति कबसे चल रही 
है ?” व्यक्ति ने आद्योपान्त्य समस्त घटित घटना कह सुनाई वद्य ने जान लिया कि यह भ्रमवश 
घुल रहा है। उसकी बुद्धि श्रौत्पत्तिकी थी। अत. व्यक्ति के रोग का इलाज भी उसी क्षण उसके 
मस्तिष्क मे झा गया । 

बद्यजी ने कही से एक गिरगिट पकडवा मगाया । उसे लाक्षारस से अवलिप्त कर एक भाजन 
में डाल दिया । तत्पश्चात्‌ रोगी को विरेचन की औषधि दी श्रौर कहा--“तुम इस पात्र मे शौच 
जाओ ।” व्यक्ति ने ऐसा ही किया । बद्य उस भाजन को प्रकाश मे उठा लाया और उस व्यक्ति को 
गिरगिट दिखा कर बोला--“देखो ! यह तुम्हारे पेट मे से निकल आ्राया है ।” व्यक्ति को संतोष हो 
गया और इसी विश्वास के कारण वह बहुत जल्दी स्वास्थ्य-लाभ करता हुआ पूर्ण नीरोग हो 
गया । 

(७) काक--वेश्नातट नगर मे भिक्षा के लिए भ्रमण करते समय एक बोद्धभिक्षु को जैन मुनि 
मिल गये । बौद्ध भिक्षु ने उपहास करते हुए जेन मुनि से कहा--“मभुनिराज ! तुम्हारे शअ्रहंन्त सब्वेज्ञ 
है भर तुम उनके पुत्र हो तो बताश्रो इस नगर मे वायस श्रर्थात्‌ कोए कितने हैं ? ” 

जैन मुनि ने भिक्षु की धूतंता को समक लिया और उसे सीख देने के इरादे से अपनी 
श्रौत्पत्तिकी बुद्धि का प्रयोग करते हुए कहा--“भते ! इस नगर मे साठ हजार-कौए है, श्रौर यदि 
कम हैं तो इनमे से कुछ बाहर मेहमान बन कर चले गए हैं श्रौर यदि भ्रधिक हैं तो कही से मेहमान 
के रूप में आए हुए हैं। श्रगर आपको इसमे शंका हो तो गिनकर देख लीजिये ।” 

जैन मुनि की बुद्धिमत्ता के समक्ष भिक्षु लज्जावनत होकर वहाँ से चल दिया । 

(८) उच्चार-भल-परीक्षा--एक बार एक व्यक्ति श्रपनी नवविवाहिता, सुन्दर पत्नी के साथ 
कही जा रहा था । रास्ते मे उन्हे एक धूते व्यक्ति मिला । कुछ समय साथ चलने एव वार्तालाप करने 
से नववधू उस घू्तं पर भ्रासक्त हो गई भर उसके साथ जाने के लिए भी तंयार हो गई । धूर्त ने 
कहना शुरू कर दिया कि यह स्त्री मेरी है। इस बात पर दोनो में भगडा शुरू हो गया । भ्रन्त मे 
विवाद करते हुए वे न्यायालय मे पहुँचे । दोनो स्त्री पर अपना श्रधिकार बता रहे थे। यह देखकर 
न्यायाधीश ने पहले तो तीनो को अभलग-भ्रलग कर दिया। तत्पश्चात्‌ स्त्री के पति से पूछा--'तुमने 
कल क्या खाना खाया था ?' रत्री के पति ने कहा--मैंने झौर मेरी पत्नी ने कल तिल के लडड खाए 
थे ।” न्यायाधीश ने घ॒र्त से भो यही प्रश्न किया शौर उसने कुछ अन्य खाद्य पदार्थों के नाम बताये । 
न्यायाधीश ने स्त्री और धू्त को विरेचन देकर जाँच कराई तो स्त्री के मल मे तिल दिखाई दिए, 
किन्तु धूर्त के नहीं। इस प्राधार पर न्यायाधीश ने ग्रसली पति को उसकी पत्नी सौंप दो तथा ध्ते 
को उचित दड देकर अ्रपनी ग्रौत्पत्तिकी बृद्धि का परिचय दिया । 


सतिज्ञान ] [द५ 


(९) गज-किसी राजा को एक बु्धिमान्‌ मत्री की ग्रावश्यकता थी। श्त्यन्त मेधावी एवं 
प्रोत्पत्तिकी बुद्धि के धनी व्यक्ति की खोज व परीक्षा करने के लिए राजा ने एक बलवान्‌ हाथी को 
चौराहे पर बाँध दिया भौर घोषणा करवादी कि--“जो व्यक्ति इस हाथी को तोल देगा उसे बहुत 
बडी वृत्ति दी जावगी ।” 


हाथी का तौल करना साधारण व्यक्ति के वश की बात नही थी। धीरे-धीरे लोग बहा से 
खिसकने लगे । किन्तु कुछ समय पश्चात्‌ एक व्यक्ति वहाँ आया और उसने सरोवर मे नाव डलवाकर 
हाथी को ले जाकर उस पर चढा दिया । हाथी के वजन से नाव पानी मे जितनी डूबी, वहाँ पर उस 
व्यक्ति ने निशान लगा दिया । तत्पश्चात्‌ हाथी को उतारकर नाव मे उतने पत्थर भरे, जितने से 
नाव पूर्व चिह्नित स्थान तक ड्बी । उसके बाद पत्थर निकालकर उन्हे तौल लिया । जितना वजन 
पत्थरो का हुआ्ना, वही तौल हाथी का है, ऐसा राजा को सूचित कर दिया । राजा ने उस व्यक्षित की 
विलक्षण बुद्धि की प्रशसा की तथा उसे ग्रपनी मत्री-परिषद्‌ का प्रधान बना दिया । 


(१०) घयण (साॉँड)-किसी राजा के दरबार मे एक भाँड रहा करता था । राजा उससे 
प्रेम किया करता था| वह राजा का मु हलगा हो गया था । राजा स्देव उसके समक्ष श्रपनी महारानी 
की प्रशसा किया करता था श्रौर कहता था कि वह बडी ही श्राज्ञाकारिणी है। किन्तु एक दिन भाँड़ 
ने कह दिया--“महाराज | रानी स्वाथंवश ऐसा करती हैं। विश्वास न हो तो परीक्षा करके देख 
लीजिए ।” 


राजा ने भाँड के कथनानुसार एक दिन रानी से कहा--देबी ! मेरी इच्छा है कि मैं दूसरी 
शादी करलू शरौर उस रानी के गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न हो उसे राज्य का उत्तराधिकारी बनाऊ ।” 
रानी ने उत्तर दिया--“महाराज ! दूसरा विवाह श्राप भले ही करले किन्तु राज्याधिकारी तो 
परम्परा के अनुसार पहला राजकुमार ही हो सकता है ।” राजा भाँड़ की बात को ठीक समभकर हँस 
पडा । रानी ने हँसने का कारण पूछा तो राजा ने भाँड की बात कह दी । रानी को यह जानकर बडा 
क्रोध भ्राया । उसने उसी समय राजा के द्वारा भाँड को देश-निकाले की श्राज्ञा दिलवा दी । ह 

देश-परित्याग की श्राज्ञा मे रानी का हाथ जानकर भाँड ने बहुत से जूतों की एक गठरी 
बाँधी भ्रौर उसे मस्तक पर रखकर रानी के दर्शनार्थ उनके भवन पर जा पहुँचा । रानी ने आ्राश्चर्य 
पूर्वक पूछा--''सिर पर यह क्या उठा रखा है ? ” भोड़ ने उत्तर दिया-- महारानी जी | इस गठरी 
मे जूतो के जोड़े हैं। इनको पहन कर जिन-जिन देशो मे जा सक्‌ गा, उन-उन देशो तक आ्रापका 
झ्रपयक्ष फैला दूगा। 

भाँड़ की यह बात सुनकर रानी घबरा गई और देश-परित्याग के श्रादेश को वापिस ले लिया 
गया । भॉड भ्रपनी औत्पत्तिकी बुद्धि के प्रयोग से सानन्‍द वही रहने लगा । 

(११) गोलक (लाख की गोली)--किसी बालक ने खेलते हुए कौतृहलवश लाख की एक 
गोली नाक में डाल ली । गोली भअ्रन्दर जाकर श्वास की नली में अटक गई और बच्चे को सास लेने 
में रुकावट होने के कारण तकलीफ होने लगी । उसके माता-पिता बहुत घबराये । इतने मे एक सुनार 
वहाँ से निकला श्लौर उसने समग्र वत्तान्त सुनकर उपाय ढुढ निकाला । एक बारीक लोह-शलाका 
मगवाई गई झ्ौर सुनार ने उसके प्रग्रभाग को गरम करके बडी सावधानी से बालक की नाक मे 


घट ] [ सम्वोसूत्र 


डाला । गर्म होने के कारण लाख की गोली छलाका के भ्रग्रभाग मे चिपक गई और सुनार ने उसे 
सावधानी से बाहर निकाल लिया । यह उदाहरण स्वर्णकार की औत्पत्तिकी बुद्धि का परिचायक है । 


(१२) खंभ--एक राजा को श्रत्यन्त बुद्धिमान्‌ मत्री को श्रावश्यकता थी । बुद्धिमत्ता की 
परीक्षा करने के लिए उसने एक विस्तीर्ण और गहरे तालाब मे एक ऊँचा खभा गडवा दिया । 
तत्पश्चात्‌ घोषणा करवादी कि --“जो व्यक्ति पानी मे उतरे विना किनारे पर रहकर हो इस खभे को 
रस्सी से बाँध देगा उसे एक लाख रुपया इनाम में दिया जाएगा ।” 


यह घोषणा सुनकर लोग टुकुर-टुकुर एक दूसरे की शोर देखने लगे । किसी से यह कार्य नही 
हो सका । किन्तु ग्राखिर एक व्यक्ति वहाँ ग्राया जिसने इस कार्य को सम्पन्न करने का बीडा उठाया । 
उस व्यक्ति ने तालाब के किनारे पर एक जगह मजबूत खू'टी गाडी श्रौर उससे रस्सो का एक सिरा 
बाँध दिया । उसके बाद वह रस्सी के दूसरे सिरे को पकड़कर तालाब के चारो ओर धूम गया । ऐसा 
करने पर खभा बीच मे बध गया । राजकमंचा रियो ने यह समाचार राजा को दिया। राजा उस 
व्यक्त की श्रोत्पत्तिकी बुद्धि से बहुत प्रसन्न हुआ श्रौर एक लाख रुपया देने के साथ ही उसे प्रपना 
मत्रो भी बना लिया । 


(१३) क्ुल्लक--बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर मे एक सन्यासिनी रहती थी। 
उसे भ्रपने आचार-विचार पर बड़ा गय॑ था। एक बार वह राजसभा में जा पहुँची और बोली-- 
“महाराज, इस नगर मे कोई ऐसा नही है जो मुझे परास्त कर सके ।” सनन्‍्यासिनी की दर्प भरी बात 
सुनकर राजा ने उसी समय नगर मे घोषणा करवादी कि जो कोई इस सन्यासिनी को परास्ल करेगा 
उसे राज्य की ओर से सम्मानित किया जाएगा | घोषणा सुनकर तो कोई नगरवासी नहीं आया, 
किन्तु एक क्षुल्लक सभा मे प्राया शऔर बोला--“मैं इसे परास्त कर सकता हूँ ।” 


राजा ने झ्राज्ञा दे दी। सनन्‍्यासिनी हँस पड़ी और बोली--'इस मुद्धित से मेरा क्‍या 
मुकाबला ?” क्षललक गभीर था वह सन्यासिनी की धूतंता को समझ गया और उसके साथ उसी तरह 
पेश झाने का निश्चय करके बोला--“जँसा मैं करू श्रगर वेसा ही तुम नही करोगी तो परास्त मानी 
जाप्रोगी ।” यह कहकर उसने समीप ही बंठे मत्री का हाथ पकड़कर उसे सिंहासन से उत्तार कर 
नीचे खडा कर दिया और श्रपना परिधान उतार कर उसे ओ्रोढा दिया । तत्पश्चात्‌ सनन्‍्यासिनी से भी 
ऐसा हो करने के लिए कहा । किन्तु सन्‍्यासिनी श्रावरण रहित नहीं हो सकती थी, श्रत लज्जित व 
पराजित होकर वहाँ से चल दी । क्षुल्लक की श्रौत्पत्तिकी बुद्धि का यह उदाहरण है । 


(१४) भाग--एक पुरुष श्रपनी पत्नी के साथ रथ में बैठकर किसी श्रन्य ग्राम को जा 
रहा था। मार्ग मे एक जगह रथ को रुकवा कर स्त्री लघुशका-निवारण के लिये किसी कांडी की 
झ्रोट मे चली गईं । इधर पुरुष जहाँ था वही पर एक वक्ष पर किसी व्यन्तरी का निवास था। वह 
पुरुष के रूप पर मोहित होकर उसकी स्त्री का रूप बना आई भौर श्राकर रथ मे बैठ गई । रथ चल 
दिया किन्तु उसो समय फ्राडियो के दूसरी शोर गई हुई स्त्री ग्राती दिखाई दी । उसे देखकर रथ मे 
बेठी हुई व्यन्तरी बोली-- “अरे, वह सामने से कोई व्यन्तरी मेरा रूप धारण कर श्राती हुई दिखाई 
दे रही है। आप रथ को द्रुत गति से ले चलिये ।”” 

पुरुष ने रथ की गति तेज करदी किन्तु तब तक स्त्री पास भ्रा गई थी झौर वह रथ के साथ- 
साथ दौडती हुई रो-रोकर कह रही थी--“रथ रोको स्वामी ! झ्रापके पास जो बैठी है वह तो कोई 


मतिशाम ] [६७ 


व्यन्तरी है जिसने मेरा रूप बना लिया है |” यह सुनकर पुरुष भौचक्‍का रह गया। वह समझ नहीं 
पाया कि क्‍या करू, किन्तु रथ की गति उसने धीरे-धीरे कम कर दी । 

इसी बीच भ्रगला गाँव निकट ञ्रा गया था अश्रत. दोनो स्त्रियों का झगड़ा ग्राम-पंचायत मे 
पहुचाया गया। पद ने दोनो स्त्रियों के कगडे को सुनकर अपनी बुद्धि से काम लेते हुए दोनो को उस 
पुरुष से बहुत दूर खडा कर दिया । कहा--“जो स्त्री पहले इस पुरुष को छू लेगी उसी को इस पुरुष 
की पत्नी माना जायगा ।/' 


यह सुनकर श्रसली स्त्री तो दौडकर अपने पति को छूने का प्रयत्न करने लगी, किन्तु व्यन्तरी 
ने वेक्रिय-शक्ति के द्वारा भ्रपने स्थान से ही हाथ लम्बा किया और पुरुष को छ दिया। न्यायकर्ता ने 
समभ लिया कि यही व्यन्तरी है। व्यन्तरी को भगाकर उस पुरुष को उसकी पत्नी सौंप दी गई । 
यह न्यायकर्ता की झ्रौत्पत्तिकी बुद्धि का उदाहरण है । 

(१५) स्त्री--एक समय मूलदेव श्र पृण्डरीक दो मित्र कही जा रहे थे। उसी मार्ग से 
एक भप्न्य पुरुष भी भ्रपनी पत्नी के साथ चला जा रहा था । पुण्डरीक उस स्त्री को देखकर उस पर 
मुग्ध हो गया तथा श्रपने मित्र मूलदेव से बोला- “मित्र ! यदि यह स्त्री मुझे मिलिगी तो मैं जीवत 
रहूंगा, भ्रन्यथा मेरी मृत्यु निश्चित है ।” 

मूलदेव यह सुनकर परेशान हो गया । मित्र का जीवन बचाने की इच्छा से उसे साथ लेकर 
एक अन्य पगडडी से चलता हुआ्ला उस युगल के आगे पहुँचा तथा एक भाडी मे पुण्डरीक को बिठाकर 
स्वय पुरुष के समीप जा पहुंचा शौर बोला-- “भाई ! मेरी स्त्री के इस समीप की भझाडी मे ही बालक 
उत्पन्न हुआ है । भरत श्रपनी पत्नी को तनिक देर के लिए वहाँ भेज दो ।” पुरुष ने मूलदेव को 
वास्तव मे ही सकटग्रस्त समझा और अ्रपनी पत्नी को भाडी की श्लोर भेज दिया । वह भाडी मे बैठे 
पुण्डरीक की तरफ गई किन्तु थोड़ी देर मे ही लौट कर वापिस भरा गई तथा मूलदेब से हँसते हुए 
कहने लगी--“भ्रापको बधाई है। बड़ा सुन्दर बच्चा पैदा हुप्रा है ।” यह सुनकर मूलदेव बहुत शर्भिन्दा 
हुपा भौर वहाँ से चल दिया। यह उदाहरण मूलदेव शोर उस स्त्री की औत्पत्तिकी बुद्धि का 
प्रमाण है । 

(१६) पति-किसी गाँव मे दो भाई रहते थे पर उन दोनो की पत्नी एक ही थी । स्त्री बडी 
चतुर थी झ्त कभी यह जाहिर नही होने देती थी कि अपने दोनो पतियो मे से किसी एक पर उसका 
अनुराग भ्रधिक है। इस कारण लोग उसकी बडी प्रशंसा करते थे। धीरे-धीरे यह बात राजा के कानो 
तक पहुँची और वह बडा विस्मित हुआ । किन्तु मन्त्री ने कहा--“महाराज ! ऐसा कदापि नही हो 
सकता। उस स्त्री का अवश्य ही एक पर प्रेम श्रधिक होगा ।” राजा ने पूछा--“यह कंसे जाना 
जाए ?” मन्त्री ने उत्तर दिया--“देव | मैं शीघ्र ही यह जानने का उपाय करूँगा । 


एक दिन मन्त्री ने उस स्त्री के पास सन्देश लिखकर भेजा कि वह अपने दोनो पतियों को पूर्व॑ 
श्रोर पश्चिम दिश्षा मे भ्रमुक-अ्रमुक ग्रामो मे भेजे । ऐसा सन्देश प्राप्त कर स्त्री ने अपने उस पति को, 
जिस पर कम राग था, पूर्वबर्ती ग्राम मे भेज दिया और जिस पर अधिक स्नेह था उसे पश्चिम के गॉँव 
में भेजा। पूर्व की ओर जाने वाले पति को जाते और ग्राते दोनो बार सूर्य का ताप सामने रहा । 
पश्चिम को शोर जाने वाले के लिए सूर्य दोनो समय पीठ की तरफ था । इससे सिद्ध हुआ कि स्त्री का 
पश्चिम की श्रोर जाने वाले पति पर भ्रधिक भ्रनुराग था । किन्तु राजा ने इस बात को स्वीकार मही 


घ८ ] [नम्बीसूत्र 


किया, क्योंकि दोनों को दो दिशाओं मे जाना झ्रावश्यक था, श्रत' कोई विशेषता ज्ञात नही होती थी । 
इस पर मंत्री ने दूसरे उपाय से परीक्षा लेना तय किया । 


श्रगले दिन ही मंत्री ने पुन एक सदेश दो पतियो वाली उस स्त्री के लिये भेजा कि वह भ्रपने 
पतियों को एक ही समय दो प्रलग-प्रलग गाँवो मे भेजे। स्त्री ने फिर उसी प्रकार दोनो को दो गांवों 
के भेज दिया किन्तु कुछ समय बाद मत्री के द्वारा भेजे हुए दो व्यक्ति एक साथ ही उस स्त्री के पास 
ग्राए शौर उन्होने उसके दोनो पतियों को ग्रस्वस्थता के समाचार दिये । साथ ही कहा कि जाकर 
उनकी सार-सम्हाल करो । , 


पतियों के समाचार पाने पर जिसके प्रति उसका स्नेह कम था, उसके लिए स्त्री बोली-- 
“यह तो हमेशा ऐसे ही रहते हैं ।” श्रौर दूसरे के लिए बोली--“"उन्हे बडा कष्ट हो रहा होगा । मैं 
पहले उनकी ओर ही जाती हूँ ।” ऐसा कहकर वह पहले पश्चिम की श्लोर रवाना हो गई । इस प्रकार 
एक पति के लिए उसका प्रधिक प्रेम मन्त्री की औत्पत्तिकी बुद्धि से साबित हो गया और राजा बहुत 
सम्तुष्ट हुआ । 


(१७) पुश्च--किसी नगर मे एक व्यापारी रहता था। उसकी दो पत्नियाँ थी । एक के पुत्र 
उत्पन्न हुआ्ना पर दूसरो बन्ध्या ही रही । किन्तु वह भी बच्चे को बहुत प्यार करतो थी तथा उसकी 
देख-भाल रखती थो । इस कारण बच्चा यह नहीं समझ पाता था कि मेरी असली माता कौन सी 
है ” एक बार व्यापारी भ्रपनी पत्नियों के और पुत्र के साथ देशान्तर मे गया | दुर्भाग्य से मार्ग मे 
व्यापारी की मृत्यु हो गई । उसकी मृत्यु के पश्चात्‌ दोनो स्त्रियों मे पुशत्र के लिए विवाद हो गया । एक 
कहती--“बच्चा मेरा है, श्रत घर-बार की मालकिन मैं हूं ।” दूसरी कहती--“नही, पुत्र मेरा है, 
इसलिए पति की सम्पूर्ण सम्पत्ति की स्वामिनी मैं हूँ ।' विवाद बहुत बढा और न्यायालय मे पहुँचा । 
न्यायकर्ता बहुत चक्कर मे पड गया कि बच्चे की असली माता की पहचान कंसे करे ! किन्तु तत्काल 
ही उसकी श्रौत्पत्तिकी बुद्धि ने साथ दिया और उसने कमंचारियो को श्राज्ञा दी -- 


“पहले इन दोनो में व्यापारी की सम्पत्ति बाँट दो और उसके बाद इस लड़के को श्रारी से 
काटकर आ॥राधा-भराधा दोनो को दे दो ।” यह श्रादेश पाकर एक स्त्री तो मौन रही, किन्तु दूसरी बाण- 
विद्ध हरिणी की तरह छटपटाती श्रौर बिलखती हुई बोल उठी--“नही ! नही | यह पुत्र मेरा नही 
है, इसका ही है। इसे ही सौप दिया जाय । मुझे धन-सम्पत्ति भी नहीं चाहिये । वह भी इसे ही दे दे । 
मैं तो दरिद्र श्रवस्था मे रहकर दूर से ही बेटे को देखकर सन्तुष्ट रह लूगी |” 


न्यायाधीश ने उस स्त्री के दु ख को देखकर जान लिया कि यही बच्चे की शभ्रसली माता है । 
इसलिये यह धन-सम्पत्ति श्रादि किसी भी कीमत पर अपने पुत्र की मृत्यु सहन नहीं कर सकती। परिणाम- 
स्वरूप बच्चा और साथ व्यापारी की सब सम्पत्ति भी असली माता को सौप दी गई । बन्ध्या स्त्री को 
उसकी धूतंता के कारण धक्के मारकर भगा दिया गया । यह न्यायाधीश की श्ौत्पत्तिकी बुद्धि है । 


(१८) मधु-सित्थ (सघु छत्ने )--एक जुलाहे को पत्नी का आचरण ठीक नही था । एक बार 
जुलाहा किसी भ्रन्य ग्राम को गया तो उसने किसी दुराचारी पुरुष के साथ गलत सम्बन्ध बना लिया । 
वहाँ उसने जाल-वृक्षो के मध्य एक मधु छत्ता देखा किन्तु उसकी श्रोर विशेष ध्यान दिये बिना वह 


सतिशाम ] [४६९ 


घर लोट श्राई । ग्राम से लौटकर एक बार सयोगवश जुलाहा मथु खरीदने के लिए बाजार जाने को 
तैयार हुमा । यह देखकर स्त्री ने उसे रोका और कहा--“तुम मधु खरीदते क्‍यों हो ? मैं मधु का 
एक विशाल छत्ता ही तुम्हें बताए देती हु ।” ऐसा कहकर वह जुलाहे को जाल वृक्षों के पास ले गई 
पर वहाँ छत्ता दिखाई न देने पर उस स्थान पर पहुची जहाँ घने वक्ष थे श्रौर पिछले दिन उसने 
अनाचार का सेवन किया था | वही पर छत्ता था जो उसने पति को दिखा दिया । 


जुलाहे ने छत्ता देखा पर साथ ही उस स्थान का निरीक्षण भी कर लिया । अपनी श्रौत्पत्तिकी 
बुद्धि से वह समझ गया कि इस स्थान पर उसकी स्त्री निरर्थक नहीं श्रा सकती । निश्चय ही यहाँ 
आकर यह दुराचार-सेवन करती है । 


(१९) सुद्रिका -किसी नगर मे एक ब्राह्मण रहता था। नगर भे प्रसिद्ध था कि वह बडा 
सत्यवादी है और कोई श्रपनी किसी भी प्रकार की धरोहर उसके पास रख जाता है तो, चाहे कितने 
भी समय के बाद मांगे, वह ब्राह्मण पुरोहित तत्काल लौटा देता है। यह सुनकर एक द्रमक--गरीब 
व्यक्ति ने श्रपनी हजार मोहरो की थेली उस पुरोहित के पास धरोहर के रूप मे रख दी और स्वय 
देशान्तर मे चला गया। बहुत समय पश्चात्‌ जब वह लौटा तो पुरोहित से अपनी थैली मांगने 
आया किन्तु ब्राह्मण ने कहा - 


“तू कौन है ? कहाँ से आया है ? कंसी तेरी धरोहर | 


बेचा रा गरीब व्यक्ति ऐसा टका-सा जवाब पाकर पागल-सा हो गया श्रौर “मेरी हजार मोहरो 
की थैली” इन शब्दों का बार-बार उच्चारण करता हुआ्ला नगर भर मे घूमने लगा । 


एक दिन उस व्यक्ति ने राज्य के मत्रो को कही जाते हुए देखा तो उनसे ही कह बैठा-- 
“पुरोहित जी ! मेरी हजार मोहरो की थैली, जो ग्रापके पास धरोहर मे रखी है, लौटा दीजिए ।” 
मत्री उस दरिद्र व्यक्ति की बात सुनकर चकराया पर समझ गया कि <दाल में कुछ काला है।' इस 
व्यक्ति को किसी ने धोखा दिया है | वह द्रवित हो गया और राजा के पास पहुचा । राजा ने जब 
उस दीन व्यक्ति की करुण-कथा सुनी तो उसे और पुरोहित दोनो को बुलवा भेजा ) दोनो राजसभा 
में उपस्थित हुए तो राजा ने पुरोहित से कहा--“ब्राह्मण देवता ! तुम इस व्यक्ति की धरोहर लौदाते 
क्यो नही हो ?” पुरोहित ने राजा से भी यही कहा -“महाराज ! मैंने इसे कभी नही देखा श्रौर न 
ही इसकी कोई धरोहर मेरे पास है । यह सुनकर राजा चुप रह गया ओर पुरोहित भी उठकर घर 
को रवाना हो गया । इसके बाद राजा ने द्रमक को बहुत दिलासा देकर शान्त किया और पूछा--- 
“क्या सचमुच ही पुरोहित के यहाँ तुमने मोहरो की थेली धरोहर के रूप मे रखो थी ?” द्वमक ने 
जब राजा से आश्वासन पाया तो उसकी बुद्धि ठिकाने आई और उसने अपनी सारी कहानी तथा 
धरोहर रखने का दिन, समय, स्थान भ्रादि सब बता दिया। राजा बुदिमान्‌ था श्रत' उसने धूत्ते 
पुरोहित को घृतंता से ही पराजित करने का विचार किया । 


एक दिन उसने पुरोहित को बुलाया तथा उसके साथ शतरज खेलने मे मग्न हो गया। 
खेलते-खेलते हो दोनो ने भ्रापस मे अगूठियाँ बदल ली । राजा ने मोका देखकर पुरोहित को पता न 
लगे, इस प्रकार एक व्यक्ति को पुरोहित की अग्रठी देकर उसके घर भेज दिया और ब्राह्मणी को 
कहलाया कि “यह अगूठी पुरोहित जी ने निश्ञानी के लिए भेजी है। कहलवाया है कि अ्रमुक दिन, 


९०] _गम्दोसूच 


झमुक समय पर द्रमुक के पास से ली हुई एक हजार सुवर्ण मुद्राप्नों से भरी हुई थेली, जो भ्रमुक स्थान 
पर रखी है, शीघ्र ही इस व्यक्ति के साथ भिजवा देना ।* 

ब्राह्मणी ने पुरोहित की नामाकित अंगूठी लाने वाले को थैली दे दी । सेवक ने राजा को 
लाकर सौप दी । राजा ने दूसरी भी बहुत-सी थेलियाँ मगवाई | उनके बोच मे द्रमक की थंली रख 
दो श्रोर उसे अपने पास बुलवाया। द्रमक ने आते ही श्रपनी थैली पहचान ली और कहा-- 
“महाराज ! मेरी थैली यह है ।” राजा ने थैली उसके मालिक को दे दी तथा पुरोहित की जिद्ठा छेद 
कर वहाँ से निकाल दिया । यह उदाहरण राजा की प्रौत्पत्तिकी बुद्धि का परिचायक है । 

(२०) झ्द्धू--एक व्यक्ति ने किसी साहुकार के पास एक हजार रुपयो से भरी हुई नोली 
घरोहर के रूप मे रख दो । वह देशान्तर मे भ्रमण करने चला गया । उसके जाने के बाद साहुकार ने 
नोली के नीचे के भाग को बडी सफाई से काटकर उसमे खोटे रुपये भर दिये श्रौर नोली को सी 
दिया । कुछ समय पश्चात्‌ नोली का मालिक लौटा और साहूकार से नोली लेकर श्रपने घर चला 
गया । घर जाकर जब उसने नोली मे से रुपये निकाले तो खोटे रुपये निकले । यह देखकर वह बहुत 
घबराया और न्यायालय मे पहुँचकर न्यायाधीश को अपना दू ख सुनाया । न्यायाधीश ने उस व्यक्ति से 
पूछा --“तेरी नोली मे कितने रुपये थे ?” “एक हजार” उस व्यक्ति ने उत्तर दिया । तब न्यायाधीण 
ने खोटे रुपये निकालकर नोली मे भ्रसली रुपये भरे, केवल उतने शेष रहे जितनी जगह काटकर सी 
दी गई थी । न्यायकर्ता ने इससे अनुमान लगाया कि अवश्य ही इसमे खोटे रुपये डाले गये है | इस 
पर साहुकार से हजार रुपये उस व्यक्ति को दिलवाए गये तथा साहूकार को न्यायकर्त्ता ने यथोचित 
दड देकर अ्रपनी श्रोत्पत्तिकी बुद्धि का परिचय दिया । 

(२१) नाणक--एक व्यक्ति ने किसी सेठ के यहाँ एक हजार सुवर्ण-मोहरो से भरी हुई थ॑ली 
मुद्रित करके घरोहर रूप में रख दी भ्रौर देशान्तर मे चला गया। कुछ समय बीत जाने पर सेठ ने 
थैली मे से शुद्ध सोने की मोहरे निकालकर नकली मोहरे भर दी तथा पुन थैली सीकर मुद्रित 
कर दी | कई वर्ष पश्चात्‌ जब मोहरो का स्वामी ग्राया तो सेठ ने थैली उसे थमा दी। व्यक्ति ने 
अपती थैली पहचानी और श्रपने नाम से मुद्रित भी देखकर घर लौट श्राया । किन्तु घर भ्राकर जब 
मोहरे निकाली तो पाया कि थेली मे उसकी भ्रसली मोहरे नहीं भ्रपितु नकलो मोहरे भरी थी । वह 
घबराकर सेठ के पास आया । बोला--“'सेठजी ! मेरी मोहरे अ्रसली थी किन्तु इसमे से तो नकली 
निकली हैं ।” सेठ ने उत्तर दिया--“मैं श्रसली नकली कुछ नही जानता । मैंने तो तुम्हारी थैली जैसी 
की तेसी वापिस कर दी है । पर वह व्यक्ति हजार मोहरो की हानि कंसे सह सकता था ! वह 
न्यायालय जा पहुँचा । 


न्यायाधीश ने दोनो के बयान लिये तथा सारी घटना समझी | उसने थैली के मालिक से 
पूछा--“तुमने किस वर्ष सेठ के पास थेली रखी थी ?” व्यक्ति ने वर्ष श्रोर दिन बता दिया | तब 
न्यायाधीश ने मोहरो की परीक्षा की और पाया कि भरी हुई मोहरे नई बनी थी। वह समझ गया 
कि मोहरे बदली गई है । उसने सेठ से श्रसली मोहरें मगवाकर उस व्यक्ति को दिलवाई तथा दण्ड भी 
दिया । इस प्रकार न्यायाधीश ने झ्रपनी औत्पत्तिकी बुद्धि से सही न्याय किया । 


(२२) भिक्षु--किसी व्यक्ति ने एक सन्‍्यासी के पास एक हजार सोने को मोहरे धरोहर के 
रूप मे रखी । वह विदेश मे चला गया । कुछ समय बाद लौटा भ्रौर भ्राकर भिक्षु से श्रपनी धरोहर 


सततिज्ञान ] (९१ 


माँगी । किन्तु भिक्ष टाल-मटोल करने लगा भौर झ्राज-कल करके समय निकालने लगा । व्यक्ति बडी 
चिन्ता मे था कि किस प्रकार भिक्षु से भ्रपनी अभ्रमानत निकलवाऊं । 


सयोगवश एक दिन उसे कुछ जुभ्नारी मिले । बातचीत के दौरान उसने अपनी चिन्ता उन्हे 
कह सुनाई । जुभ्रारियों ने उसे झ्राश्वासन देते हुए उसको श्रमानत भिक्षु से निकलवा देने का 
वायदा किया श्रौर कुछ सकेत करके चले गये । अगले दिन जुश्रारी गेरुए रग के कपडे पहन, सन्यासी 
का वेश बनाकर उस भिक्षु के पास पहुँचे और बोले--/हमारे पास ये सोने की कुछ खू टियाँ हैं, ग्राप 
इन्हे अपने पास रख ले । हमे विदेश श्रमण के लिए जाना है । श्राप बडे सत्यवादी महात्मा हैं, ग्रत 
आपके पास हो धरोहर रखने श्राए हैं । 


साधु-वेशधारी वे जुश्रारी भिक्षु से यह बात कह ही रहे थे कि उसी समय वह व्यक्ति भी 
पूर्व सकेतानुसार वहाँ भरा गया बोला--“महात्मा जी वह हजार मोहरो वाली थैली मुभे 
वापिस दे दीजिए ।' 


भिक्षु सन्‍्यासियों के सामने अपयश के कारण तथा सोने की खू टियो के लोभ के कारण पहले 
के समान इन्कार नहीं कर सका और अन्दर जाकर हजार मोहरो वाली थली ले श्राया । थैली उसके 
स्वामी को मिल गई । वे धू्त सन्‍्यासी किसी विशेष कार्य याद श्रा जाने का बहाना कर चलते बने । 
जुआारियो की श्रौत्पत्तिकी बुद्धि के कारण उस व्यक्ति को अपनी श्रमानत वापिस मिल गई । धूते भिक्षु 
हाथ मलता रह गया । 


(२३) चेटकनिधान - दो व्यक्ति आपस मे घनिष्ठ मित्र थे । एक बार वे दोनो शहर से बाहर 
जगल मे गये हुए थे कि अ्रचानक उन्हे वहाँ एक गडा हुआ निधात उपलब्ध हो गया । दोनो निधान 
पाकर बहुत प्रसन्न हुए | उनमे से एक ने कहा. “मित्र ! हम बड़े भाग्यवान्‌ हैं जो अ्रकस्मात ही हमे 
निध्वान मिल गया । पर इसे हम श्राज नही, कल यहाँ से ले चलेगे। कल का दिन बडा शुभ है ।” दूसरे 
मित्र ने सहज ही उसको बात मान ली ओर दोनो ग्रपने-अपने धर श्रा गए | किन्तु जिसने धन अगले 
दिन लाने का सुझाव दिया था वह बडा मायावी और धूत॑ था । वह रात को ही पुन जगल मे गया 
और सारा धन वहाँ से निकालकर उस स्थान पर कोयले भर कर चला आया । 

अगले दिन दोनो पूर्व निश्चयानुसार निधान की जगह पहुंचे पर धन होता तो मिलता । वहाँ 
तो कोयले ही कोयले थे । यह देखकर कपटी मित्र सिर और छातो पीट-पीट कर रोने और 
कहने लगा -- 

“हाय, हम कितने भाग्यहीन हैं कि देव ने धन देकर भी हमसे छीन लिया और उसे कोयला 
कर दिया ।” इसी तरह बार-बार कहता हुझ्ना वह चोर नजरो से मित्र की ओर देखता जाता था कि 
उस पर क्या प्रतिक्रिया हो रही है | धूसरा मित्र सरल अ्रवश्य था किन्तु इतना मूर्ख नहीं था। अपने 
मित्र के बनावटी विलाप को वह समझ गया और उसे विश्वास हो गया कि इस धूर्त ने ही घन 
निकालकर यहाँ कोयले भर दिये है । फिर भी उसने अपने कपटी भित्र को सास्त्वना देते हुए कहा -- 
“मित्र | रोग्नो मत, श्रब दु ख करने से निधान वापिस थोडे ही आएगा ! ” तत्पश्चात्‌ दोनो अपने- 
ग्रपने धर लौट ग्राए, किन्तु सरल स्वृभावी मित्र ने भी अपने मायावी मित्र को सबक सिखाने का 
निश्चय कर लिया । उसने उसकी एक प्रतिमा बनवाई जो बिल्कुल उसी को शक्ल से मिलती थी । 
घूर्ते मित्र को प्रतिमा को उसने अ्रपने धर पर रख लिया और दो बदर पाले। वह बदरो के खाने 


९२] [नरदीसूत्र 


योग्य पदार्थ उसो प्रतिमा के मस्तक पर, कन्धो पर, हाथो पर, जथा पर तथा परो पर रथ देता था । 
बन्दर उन स्थानों पर से भोज्य-पदार्थ खा जाते तथा प्रतिमा पर उछल-कूद करते रहते । इस प्रकार 
वे प्रतिमा की शक्ल को पहचान गये श्रोर उससे खूब खेलने लगे । 


कुछ दिन बोतने पर एक पर्व के दिन उस भले मित्र ने अपने मायावी मित्र के यहाँ जाकर 
उससे कहा--“झाज त्यौहार का दिन है। प्रपने दोनो पुत्रो को मेरे साथ भोजन करने के लिए भेज 
दो ।” मित्र ने प्रसन्न होकर लडको को खाने के लिए भेज दिया। भले मित्र ने समय पर बच्चो को 
बहुत प्यार से खिलाया ध्रौर फिर एक भ्रन्य स्थान पर सुखपूर्वक छिपा दिया। 


सायंकाल के समय कपटी मित्र अपने लडको को लेने के लिये श्राया | उसे दूर से भ्राता देख 
कर ही शीघ्षतापूर्वक पहले मित्र ने कपटी की उस प्रतिमा को वहाँ से हटा दिया श्लौर उसी स्थान पर 
एक आसन बिछा दिया । कपटी मित्र सहज भाव से उसी श्रासन पर बठ गया । उसके मित्र ने दोनों 
बन्दरों को एक कमरे से बाहर निकाल दिया । दोनो उछलते-कदते हुए सीधे उस मायावी मिन्न के 
पास भ्राए और अ्रभ्यासवश् उसके सिर पर कधो पर व गोद में बैठकर किलकारियाँ भरते हुए श्रपनी 
भाषा में खाना माँगने लगे । क्योकि उसी स्थान पर पहले उसकी प्रतिमा थो जिससे दोनो परिचित 
थे। यह देखकर मायावी ने पूछा-- मित्र, यह क्‍या तमाशा है? ये दोनो बन्दर तो मेरे साथ इस 
प्रकार व्यवहार कर रहे हैं जेसे मुझ से परिचित हो ।'' 


यह सुनकर उस व्यक्ति ने गर्दन कुकाकर उदास भाव से कहा --“मिन्र, ये दोनो तुम्हारे ही 
पुत्र है। दुर्भाग्य से बन्दर बन गये, इसी कारण तुम्हे प्यार कर रहे है ।” मायावी मित्र अपने मित्र की 
बात सुनकर उछल पडा और उसे पकड़कर ऋभोडते हुए बोला--“क्या कह रहे हो ? मेरे पुत्र तो 
तुम्हारे घर भोजन करने आ्लाये थे | बन्दर कंसे हो गये ? क्‍या मनुष्य भी कभी बन्दर बन 
सकते हैं ? ' 


पहले वाले मित्र ने शान्तिपूर्वक उत्तर दिया--''मित्र | लगता है आपके श्रशुभ कर्मों के 
कारण ऐसा हुग्ना है, क्या सुवर्ण कभी कोयला बना करता है, पर हमारे भाग्यवश वैसा हुआ । मित्र 
की यह बात सुतकर कपटी मित्र के कान खड़े हो गये उसे लगा कि इसको मेरी धोखेबाजी का पता 
चल गया है किन्तु उसने सोचा--अ्रगर मैं शोर मचाऊँगा तो राजा को पता लगते ही मुर्के पकड लिया 
जायगा श्रौर धन तो छिनेगा ही, मेरे पुत्र भी पुत मनृष्य न बन सकेंगे । यह विचार कर उस मायावी 
ने यथातथ्य सारी घटना मित्र को कह सुनाई। जगल से लाए हुए धन का श्राधा भाग भी उसे दे 
दिया। सरल स्वभाव मित्र ने भी उसके दोनो पुत्नो को लाकर उसे सौप दिया। यह उदाहरण सरल 
स्वभाव मित्र की श्रौत्पत्तिकी बुद्धि का सुन्दर उदाहरण है । 

(२४) शिक्षा : धनुर्वेद--एक व्यक्ति धनुविद्या मे बहुत निपुण था। किसी समय वह भ्रमण 
करता हुआ एक नगर में पहुचा । वहाँ जब उसकी कलानिपुणता का लोगो को पता तो बहुत 
से अ्मीरो के लडके उससे धनुविद्या सीखने लगे । विद्या सीखने पर उन घनिक-पुत्रो ने अपने कलाचाये 
को बहुत धन दक्षिणा के रूप मे भेट किया। जब लडको के श्रभिभावकों को यह बात हुआ्ना तो 
उन्हे बहुत क्रोध आया श्रौर सबने मिलकर तय किया कि जब बह व्यक्ति धत लेकर श्रपने घर लौटेगा 
तो रास्ते मे इसे मार कर सब छीन लेंगे। इस बात का किसी तरह धनुविद्या के शिक्षक को पता 
चल गया । 


म्रतिशान] [९३ 


यह जान कर उसने एक योजना बनाई । उसने अपने गांव मे रहने वाले बन्घुओं को समाचार 
भेजा--“मैं प्रमुक दिन रात्रि के समय कुछ गोबर के पिण्ड नदी मे प्रवाहित करूगा । उन्हें तुम लोग 
निकाल लेना ।” इसके बाद शिक्षक ने प्रपने द्रव्य को गोबर में डालकर कुछ पिण्ड बना लिये झ्लनौर 
उन्हे भ्रच्छी तरह सुखा लिया । तत्पश्चात्‌ अपने शिष्यो को बुलाकर उन्हे कहा--“हमारे कुल में यह 
परम्परा है कि जब शिक्षा समाप्त हो जाए तो किसी पर्व श्रथवा शुभ तिथि मे स्नान करके मत्रो का 
उच्चारण करते हुए गोबर के सूखे पिण्ड नदी मे प्रवाहित किये जाते है। श्रत' प्रमुक रात्रि को यह 
कार्यक्रम होगा ।* 

निश्चित की गई रात्रि मे शिक्षक ने उनके साथ जाकर मत्रोक्ष्चारण करते हुए गोबर के सब 
पिण्ड नदी में प्रवाहित कर दिये श्रौर जब वे निश्चित स्थान पर पहुचे तो कलाचार्य के बन्घुबान्धव 
उन्हे सुरक्षित निकालकर श्पने घर ले गये । 

कुछ समय बीतने पर एक दिन वह शिक्षक भ्रपने शिष्यो और उनके सगे-सम्बन्धियो के समक्ष 
मात्र शरीर पर वस्त्र पहनकर विदाई लेकर अपने ग्राम की ओर चल दिया। यह देखकर लडको के 
प्रभ्रिभावको ने समक लिया कि इसके पास कुछ नही है। भ्रत उसे लूटने और मारने का विचार छोड 
दिया । शिक्षक ग्रपनी औत्पत्तिकी बुद्धि के फल-स्वरूप सकुशल अपने घर पहुच गया । 


(२५) अर्थज्ञास्त्र-नीतिशञास्त्र--एक व्यक्ति की दो पत्नियाँ थी । दोनों में से एक बाँस थी 
तथा दूसरी के एक पुत्र था । दोनो माताएँ पुत्र का पालन-पोषण समान रूप से करती थी । भ्रतः 
लडके को यह मालूम ही नही था कि उसकी सगी माता कौन है ? एक बार वह वणिक प्रपनी दोनो 
पत्नियों और पुत्र को साथ लेकर भगवान्‌ सुमतिनाथ के नगर मे गया किन्तु वहाँ पहुचने के कुछ समय 
पश्चात्‌ ही उसका देहान्त हो गया । उसके मरणोपरान्त उसकी दोनो पत्नियों मे सम्पूर्ण घन-वैभव 
तथा पुत्र के लिये विवाद होने लगा, क्योकि पुत्र पर जिस स्त्री का प्रधिकार होता वही गृह-स्वामिनी 
बन सकती थी । कुछ भी निर्णय न होने से विवाद बढ़ता चला गया श्रौर राज-दरबार तक पहुचा । 
वहाँ भी फंसला कुछ नही हो पाया । इसी बीच इस विवाद को महारानी सुमगला ने भी सुना | वह 
गर्भवती थी । उसने दोनो वणिक-पत्नियो को अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया । उनके 
श्राने पर कहा-- कुछ समय पश्चात्‌ मेरे उदर से पुत्र जन्म लेगा भ्रौर वह ग्रमुक प्रशोक वक्ष के नीचे 
बैठकर तुम्हारा विवाद निपटाएगा । तब तक तुम दोनो यही प्रानन्दपूर्वक रहो । 

भगवान्‌ सुमतिनाथ की माता, सुमगला देवी की यह बात सुनकर वणिक की वन्ध्या पत्नी ने 
सोचा--“भ्रभी तो महारानी के पुत्र का जन्म भी नही हुआ । पुत्र जन्म लेकर बडा होगा तब तक तो 
यहाँ भ्रानन्द से रह लिया जाय । फिर जो होगा देखा जायगा ।” यह विचारकर उसने तुरन्त ही 
सुमंगला देवी की बात को स्वीकार कर लिया। यह देखकर महारानी सुमंगला ने जान लिया कि 
बच्चे की माता यह नही है। उसे तिरस्कृत कर वहा से निकाल दिया तथा बच्चा श्रसली माता को 
सौपकर उसे गृह-स्वामिनी बना दिया । 

यह उदाहरण माता सुमगला देवी की अर्थशास्त्रविषयक भ्रौत्पत्तिकी बुद्धि का है । 

(२६) इच्छायमहं -किसी नगर में एक सेठ रहता था । उसकी मृत्यु हो गई। सेठानी बडी 
परेशानी का श्रनुभव करने लगी, क्योकि सेठ के द्वारा ब्याज आदि पर दिया हुआ रुपया वह वसूल 
नही कर पाती थी । तब उसने सेठ के एक मित्र को बुलाकर उससे कहा--“महानुभाव ! क्ुपया भ्राप 


९४] [ नन्दीसूच 


मेरे पति द्वारा ब्याज श्रादि पर दिये हुये रुपये वसूल कर मुझे दिलवा दें ।” सेठ का मित्र बडा स्वार्थी 
था । वह बोला--“झगर तुम मुझे उस धन में से हिस्सा दो तो मैं रुपया वसूल कर लाऊंँगा ।” सेठानी 
ने इस बात को स्वीकार करते हुये उत्तर दिया-'जो श्राप चाहते हो वह मुझे दे देना ।” तत्पश्चात्‌ 
सेठ के मित्र ने सेठ का सारा रुपया वसूल कर लिया किन्तु वह सेठानी को कम देकर स्वय अ्रध्िक 
लेना चाहता था । इस बात पर दोनो के बीच विवाद हो गया और वे न्यायालय भे पहुचे । 


न्यायाधीश ने मित्र को श्राज्ञा देकर सम्पूर्ण धन बहाँ मेंगवाया और उसके दो ढेर किये । एक 
ढेर बडा था भश्रोर दूसरा छोटा । इसके बाद न्यायाधीश ने सेठ के मित्र से पूछा-“तुम इन दोनो 
भागों में से कौन सा लेता चाहते हो ?” मित्र तुरन्त बोला--“मै बडा भाग लेना चाहता हू ।” तब 
न्यायाधीश ने सेठानी के शब्दो का उल्लेख करते हुए कहा--“तुमसे सेठानी ने पूर्व॑ में ही कहा था-- 
जो आप चाहते हो बह मु दे देना' इसलिये प्रब इन्हे यही बडा ,भाग दिया जाएगा, क्योकि तुम इसे 
चाहते हो ।” सेठ का मित्र सिर पीटकर रह गया भ्रौर चुपचाप घन का छोटा भाग लेकर चला गया । 
न्यायाधीश की श्रौत्पत्तिको बुद्धि का यह उदाहरण है । 


(२६) शतसहस््न-एक परिक्राजक बड़ा कुशाग्रबुद्धि था। वह जिस बात को एक बार सुन 
लेता उसे ग्रक्षर्ष याद कर लेता था। उसके पास चाँदी का एक बहुत बडा पात्र था जिसे वह 
खोरक' कहता था । 


अपनी प्रज्ञा के भ्रभिमान मे चूर होकर उसने एक बार बहुत से व्यक्तियों के समक्ष प्रतिज्ञा 
की--“जो व्यक्ति मुझे पूर्व मे कभी न सुनी हुई यानी '“अश्रुतपूर्व” बात सुनायेगा उसे मैं चाँदी का यह 
बृहत्‌ पात्र दे दू गा।” इस प्रतिज्ञा को सुनकर बहुत से व्यक्ति भ्राये और उन्होने श्रनेको बाते परिव्नाजक 
को सुनाई, किन्तु परित्राजक भ्रपनी विशिष्ट स्मरणशर्ति के कारण उन बातों को उसी समय अक्षरश 
सुना देता था और कहता - “यह तो मैंने पहले भी सुनी है । 


परिव्राजज की चालाकी को एक सिद्धपुत्र ने समझा और उसने निश्चय किया कि मै 
परिब्राजक को सबक सिखाऊँगा । परिब्राजक की प्रतिज्ञा की सत्र प्रसिद्धि हो गई थी। वहाँ के 
राजा ने अ्रपने दरबार में परिब्राजक ओर उस सिद्धपुत्र को बुलाया जिसने परिब्राजक को परास्त 
करने की चुनौती दी थो । 


राजसभा में सबके समक्ष सिद्धपुत्र ने कहा - 


“तुज्म पिया मह पिउणों, धारेइ अणूणग सयसहस्स । 
जद सुयपुणष्च दिज्जज, अह॒न सुय॑ खोरय वेसु ॥” 


अर्थात्‌ “तुम्हारे पिता को मेरे पिता के एक लाख रुपये देने हैं । यदि यह बात तुमने पहले 
सुनो है तो अपने पिता का एक लाख रुपये का कजे चुका दो, और यदि नही सुनी है तो अपनी प्रतिज्ञा 
के प्रनुसार चाँदी का पात्र (खोरक) मुझे सौप दो ।” बेचारा परिव्राजक अपने फंलाये हुये जाल मे 
खुद ही फस गया । उसे भ्रपनी पराजय स्वीकार करनी पडी भ्रौर खोरक सिद्धपुनत्रन को मिल गया। 
यह सिद्धपुत्र की ओौत्पत्तिकी बुद्धि का अनुपम उदाहरण है। 


//९"". 00300 जल! +०उफ्रलाआक्ाबक.. ५ णमा्त क्र... ह को के ६ वमफकाननभग्न 


सतिशान ] [९५ 


(२) वेनमिकी बुद्धि का लक्षण 
४०-भरनित्थरण-समत्या,. तिबग्ग-सुत्तत्थ-गहिय-पेयाला । 
उभप्नो लोग फलवई, विणयसमुत्या हुवई बुढ़ी !॥ 


... विनय से पंदा हुई बुद्धि कार्य भार के निरस्तरण श्रर्थात्‌ बहन करने मे समर्थ होती है। 
त्रिवर्ग -धर्म, श्र्थ, काम का 2408 करने वाले सूत्र तथा श्रर्थ का प्रमाण-सार ग्रहण करनेवाली है 
तथा यह विनय से उत्पन्न बुद्धि इस लोक झ्रौर परलोक में फल देने वाली होती है । 


वेनयिकी बुद्धि के उदाहरण 
निमित्ते-अत्यसत्थे अ, लेहे गणिए श्र कव भ्रस्से य । 
गहभ-लक्खण गंठो, घगए रहिए ये गणिया ये ॥ 
सीआ साड़ी दीहूं च तणं, अवसब्वयं च कु चस्स । 
निव्योदए ये गोणें, घोड़ग पड़णं ते रुकखाओ ॥। 
५० - (१) निमित्त (२) अर्थशास्त्र (३) लेख (४) गणित (५) कप (६) अश्व (७) गर्दभ 
(८) लक्षण (९) ग्रथि (१०) अ्रगड (११) रथिक (१२) गणिका (१३) शीताशाटी (गीली 
धोती) (१४) नीब्रोदक (१५) बेलो की चोरी, भ्रश्व का मरण, वृक्ष से गिरना। ये वेनयिकी बुद्धि 
के उदाहरण है । 


(१) निमित्त--किसी नगर मे एक सिद्ध पुरुष रहता था। उसके दो शिष्य थे। गुरु का 
दोनो पर समान स्नेह था । वह समान भाव से दोनो को निमित्त शास्त्र का अध्ययन कराता था । 
दोनो शिष्यो मे से एक बडा विनयवान्‌ था । अ्रत ग्रुरु जो भ्राज्ञा देते उसका यथावत्‌ पालन करता 
तथा जो भी सिखाते उस पर निरन्तर चिन्तन-मनन करता रहता था । चिन्तन करने पर जिस 
विषय में उसे किसी प्रकार की शका होती उसे समभने के लिये अपने गुरु के समक्ष उपस्थित होता 
तथा विनयपूर्वक उनकी चरण वबदना करके शका का समाधान कर लिया करता था। किन्तु दूसरा 
शिष्य अविनीत था श्रौर बार-बार ग्रुरु से कुछ पूछने मे भी अपना अपमान समभता था। प्रमाद के 
कारण पठित विषय पर विमर्श भी नही करता था। श्रत उसका अध्ययन अपूर्ण एवं दोषपूर्ण रह 
गया जबकि पहला विनीत शिष्य सर्वंगुणसम्पन्न एवं निमित्तज्ञान मे पारगत हो गया । 

एक बार गुरु की श्राज्ञा से दोनो शिष्य किसी गाँव को जा रहे थे। मार्ग मे उन्हे बडे-बडे 
पैरो के पद्चिक्त दिखाई दिये। भ्रविनीत शिष्य ने श्रपने गुरुभाई से कहा-“लगता है कि ये पद- 
चिह्न किसी हाथी के है ।” उत्तर देते हुए दूसरा शिष्य बोला--“नही मित्र ! ये पेरो के चिह्न हाथी 
के नही, हथिनो के हैं । वह हथिनी वाम नेत्र से कानी है। इतना ही नही, हथिनी पर कोई रानी 
सवार है और वह सधवा तथा गर्भवती भी है। रानी श्राजकल मे ही पुत्र का प्रसव करेगी ।” 

केवल पद-चिह्नो के श्राधार पर इतनी बाते सुनकर अविचारी शिष्य की श्राँसखे कपाल पर 
चढ़ गईं । उसने कहा-- “यह सब बातें तुम किस आधार पर कह रहे हो ?” विनीत शिष्य ने 
उत्तर दिया-- “भाई ' कुछ श्रागे चलने पर तुम्हे सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा ।” यह सुनकर प्रश्नकर्ता 
दिष्ष्य चुप हो गया और दोनो चलते-चलते कुछ समय पश्चात्‌ श्रपने गन्तव्य भ्रम तक पहुच गये । 


९६] [नत्दीसूत्र 


उन्होने देखा कि ग्राम के बाहर एक विशाल सरोबर के तोर पर किसी अतिसम्पन्न व्यक्ति का पड़ाव 
पडा हुआ है। तम्बुओ के एक झोर बाँये नेत्र से कानी एक हथिनी भी बँधी हुई है। ठीक उसी समय 
दोनो शिष्यो ने यह भी देखा कि एक दासी जेसी लगने वाली सरुत्री एक सुन्दर तम्बू से निकली भ्रौर 
वही खड़े हुए एक प्रभावशाली व्यक्ति से बोली--“मन्त्रिवर ! महाराज को जाकर बधाई दीजिए--- 
राजकुमार का जन्म हुआा है । 


यह सब देख सुनकर जिस शिष्य ने ये सारी बाते पहले हो बता दी थी, वह बोला -- "देखो 
वाम नेत्र से कानी हथिनी खडी है और दासी के वचन सुनकर हमे यह भी ज्ञात हो गया है कि उस 
पर गर्भवती रानी सवार थी जिसे श्रभी-प्रभी पुशनलाभ हुआ है ।” पश्रविनीत शिष्य ने बेदिली से उत्तर 
दिया-- "हाँ मैं समझ गया, तुम्हारा ज्ञान सही है श्रन्यथा नही । तत्पश्चात्‌ दोनो सरोवर में हाथ- 
पैर धोकर एक वट वक्ष के नीचे विश्राम हेतु बेठ गये । 


कुछ समय पश्चात्‌ ही एक वृद्धा स्त्री अपने मस्तक पर पानो का घड़ा लिए हुए उधर से 
निकली । वृद्धा की नजर उन दोनों पर पडी । उसने सोचा--'ये दोनो विद्वान्‌ मालम होते हैं, क्यो न 
इनसे पूछू” कि मेरा विदेश गया हुआ पुत्र कब लौटकर आएगा ?” यह विचार कर वह शिष्यो के 
समीप गई श्र प्रश्न करने लगी । किन्तु उसी समय उसका घडा सिर से गिरा और फूट गया । सारा 
पानी मिट्टी मे समा गया । यह देखकर अ्रविनोत शिष्य कट बोल पडा--“बुढ़िया | तेरा पुत्र घड़े के 
समान ही मृत्यु को प्राप्त हो गया है।” 


वुद्धा सन्न रह गई किन्तु उसी समय दूसरे ज्ञानी छषिष्य ने कहा--”मित्र, ऐसा मत कहो । 
इसका पुत्र तो घर आ चुका है ।” उसके बाद उसने बुद्धा को सबोधित करते हुए कहा- "माता ! तुम 
शीघ्र घर जाशो, तुम्हारा पुत्र तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है ।* 


वृद्धा की जान मे जान भ्राई । उसने भ्पने घर की श्रोर कदम बढा दिये । घर पहुँचते ही देखा 
कि लडका घूलि घूसरित पैरो सहित ही उसकी प्रतीक्षा मे बेठा है। हर्ष-विह्लल होकर उसने पुत्र को 
अपने कलेजे से लगा लिया श्रौर उसी समय नंमित्तिक शिष्य के विषय मे बताकर पुत्र सहित उस बट 
वक्ष के नीचे आई । शिष्य को उसने यथायोग्य दक्षिणा के साथ अनेक श्राशीर्वाद दिये । 


इधर प्रविनीत शिष्य ने जब यह देखा कि मेरी बाते मिथ्या सिद्ध होती हैं श्रीर मेरे साथी की 
सत्य, तो वह दु ख श्रोर क्रोध से भरकर सोचने लगा--“यह सब ग्रुरुजी के पक्षपात के कारण ही हो 
रहा है। उन्होने मुझे ठीक तरह से नही पढाया । ऐसे हो विचारो के साथ वह गुरु का कार्य सम्पन्न 
होने के पश्चात्‌ वापिस लोटा । लौटने पर विनीत शिष्य आनन्दाश्रु बहाता हुआ गदगद भाव से गुरु 
के चरणों पर झुक गया किन्तु अविनीत 2 5 की तरह खडा रहा | यह देखकर गुरु ने प्रश्नसूचक दृष्टि 
से उसकी श्रोर देखा । तुरन्त ही वह बोला--आपने मुझे सम्यक्‌ रूप से नहीं पढाया है, इसलिए मेरा 
ज्ञान भ्रसत्य है और इसे मन लगाकर पढाया है, भ्रत इसका ज्ञान सत्य । गझ्ापने पक्षपात किया है।' 


गुरुजी यह सुनकर चकित हुए पर कुछ समझ न पाने के कारण उन्होंने श्रपने विनयी शिष्य 
से पूछा--'वत्स क्या बात है ? किन घटनाझो के झ्राधार पर तुम्हारे गुरुभाई के मन मे ऐसे विचार 
भ्राए ?' विनीत शिष्य ने मार्ग में घटो हुई घटनाएँ ज्यो की त्यो कह सुनाई । 


अतिशान ] [९७ 


गुरु ने उससे पूछा-- तुम यह बताओ कि उक्त दोनो बातो की जानकारी तुमने किस प्रकार 
की ?' विनयवान्‌ छिष्य ने पुनः गुरु के चरण छूकर उत्तर दिया-- गुरुदेव, श्रापके चरणो के प्रताप से 
ही मैंने विचार किया कि पेर हाथी के होने पर भी इसके मूत्र के हग के कारण वह हथिनी होनी 
चाहिए । मार्ग के दाहिनी ओर के घास व पत्रादि ही खाए हुए थे, बायी श्रोर के नही, ग्रतः अनुमान 
किया कि वह बाये नेत्र से कानी होगी । भारो जन-समूह के साथ हाथी पर झ्रारूढ होकर जाने वाला 
राजकीय व्यक्ति ही हो सकता है। यह जानने के बाद हाथी से उतर कर की जाने वाली लघुशका से 
यह जाना कि वह रानी थी। समीप की भाडी में उलभे हुए रेशमी शौर लाल बस्त्र-ततुओं को 
देखकर विचार किया कि रानी सधवा है। वह दाँया हाथ भूमि पर रखकर खडी हुई, इससे गर्भवती 
होने का तथा दाँया पैर प्रधिक भारी पडने से मैने उसके निकट प्रसव का अ्रनुमान किया और सारे 
ही निर्मित्तो से यह जान लिया कि उसके पुत्र उत्पन्न होगा । 

दूसरी बात वृद्धा स्त्री की थी । उसके प्रश्न पूछते ही घडे के गिरकर फूट जाने से मैंने विचार 
किया कि जिस मिट्टी से घडा बना था उसी में मिल गया है, श्रत माता की कोख से जन्मा पुत्र भी 
उससे मिलने वाला है ।' 


शिष्य की बात सुनकर गुरु ने स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखते हुए उसकी प्रशसा की । श्रविनीत 
से कहा-- देख, तू न मेरी श्राज्ञा का पालन करता है श्रौर न ही भ्रध्ययन किये हुए विषय पर चिन्तन- 
मनन करता है । ऐसी स्थिति मे सम्यकज्ञान का अधिकारी कंसे बन सकता है ? मै तो तुम दोनो 
को सदा हो माथ बंठाकर एक सरीखा विद्याभ्यास कराता हू किन्तु--“विनयाद्याति पात्रताम्‌” यानी 
विनय से पाज्नता, सुयोग्यता प्राप्त होती है। तुभमे विनय का प्रभाव है, इसलिये तेरा ज्ञान भी 
सम्यक नही है ।' गुरु के वचन सुनकर अ्रविनीत शिष्य लज्जित होकर मौन रह गया । 

यह उदाहरण शिष्य की वेनयिकी बुद्धि का है । 

(२) अत्थसत्थे (३) लेख (४) गणित भ्रर्थात्‌ श्रादि का ज्ञान भी विनय के द्वारा होता है। 


(५) क्ष--एक भूवेत्ता अपने शिक्षक के पास अध्ययन करता था । उसने शिक्षक की प्रत्येक 
आ्राज्ञा को एवं सुझाव को इतने विनयपूर्षक माना कि वह अपने विषय मे पूर्ण पारगत हो गया | श्रपनी 
चामत्कारिक, वेनयिकी बुद्धि के द्वारा प्रत्येक कार्य मे सफलता प्राप्त करने लगा । 


एक बार किसी ग्रामीण ने उससे पूछा--'मेरे खेत मे कितनी गहराई तक खोदने पर पानी 
निकलेगा ? ” भूवेत्ता ने परिमाण बताया। उसी के अनुसार किसान ने भूमि मे कुआ खोद लिया 
किन्तु पानी नहीं निकला । किसान पुन भूवेत्ता के पास जाकर बोला--''आपके निर्देशानुसार मैने 
कुआ खोद डाला । किन्तु पानी नहीं निकला ।” भूमि परीक्षक ने खोदे हुए कुए के पास जाकर 
बारीकी से निरीक्षण किया और तब किसान से कहा- “इसके पाश्व भूभाग पर एडी से प्रहार 
करो ।” किसान ने वही किया और चकित रह गया, यह देखकर कि उस छोटे से स्थान से पानी का 
स्रोत मानो बाँध तोडकर बह निकला है। किसान ने भूवेत्ता की वेनयिकी बुद्धि का चमत्कार देखकर 
उसकी बहुत प्रशसा की तथा अ्रपनी सामर्थ्यं के भ्रनुसार द्रव्य भेट किया । 

(६) भ्रश्य--एक बार बहुत से व्यापारी द्वारका नगरी में अपने घोडे बेचने के लिए गये। 
नगर के कई राजकुमारो ने मोटे-ताजे और डोल-डौल से बडे देखकर घोड़े खरीद लिये, किन्तु 
वासुदेव नामक एक युवक ने जो अश्व-परीक्षा मे पारगत था, एक दुबला-पतला घोड़ा खरींदा। 


९८] [ नम्दोसृत्र 


आश्चर्य की बात यह्‌ थी कि जब घुड़दोड़ होती तो वासुदेव का घोड़ा ही सबसे श्रागे रहता, सभी 
मोटे-ताजे घोडे पीछे रह जाते । इसका कारण वासुदेव की भ्रश्वपरीक्षा की प्रवीणता थी । यह विद्या 
उसने श्रपने कलाचाये से बहुत विनयपूर्वक सीखी थी । विनय द्वारा ही बुद्धि तीक्ष होती है तथा 
सीखे जाने वाले विषय का पूर्ण ज्ञान होता है । 

(७) गर्दभ--किसी नगर मे एक राजा राज्य करता था। वह युवा था। उसने सोचा कि 
युवावस्था श्रेष्ठ होती है और युवक ही श्रधिक परिश्रम कर सकता है । यह विचार श्राते ही उसने 
झपनी सेना के समस्त भ्रनुभवी एवं वृद्ध योद्धाओ्रो को हटाकर तरुण युवकों को श्रपनी सेना मे भर्ती 
किया । 

एक बार वह भ्रपनी जवानों की सेना के साथ किसी राज्य पर आक्रमण करने जा रहा था 
किन्तु मार्ग भूल गया और एक बीहड वन मे जा फसा । बहुत खोजने पर भी रास्ता नही मिला । 
सभो प्यास के कारण छंटपटाने लगे | पानी कही भी दिखाई नही दिया । तब किसी व्यक्ति ने राजा 
से प्राथना की--“महाराज ! हमे तो इस विपत्ति से उबरने का कोई मार्ग नही सूकता, कोई ग्रनुभवी 
वयोव॒द्ध हो तो बही सकट टाल सकता है ।” यह सुनकर राजा ने उसी समय घोषणा करवाई-- 
'सेन्यदल में भ्रगर कोई भ्रनुभवी व्यक्ति हो तो वह हमारे समक्ष प्राकर हमे सलाह प्रदान करे । 

सौभाग्यवश सेना में एक वयोवुद्ध योद्धा छक्मवेश मे आया हुआ था, जिसे उसका पितृभक्त 
सेनिक पुत्र लाया था । वह राजा के समीप आया श्रौर राजा ने उससे प्रश्न किया--“महानुभाव ' 
मेरी सेना को जल-प्राप्त हो सके ऐसा उपाय बताइये ।” वृद्ध पुरुष ने कुछ क्षण विचार करके कहा-- 
“महाराज ! गधो को छोड दीजिए । वे जहाँ पर भूमि को सूधेगे वही सेना के लिए जल प्राप्त हो 
जायगा ।” राजा ने ऐसा ही किया तथा जल प्राप्त कर सभी सेनिक तरोताजा होकर श्रपने गन्तव्य 
की ओर चल पडे । यह स्थविर पुरुष की वेनयिकी बुद्धि के द्वारा सम्भव हुआ । 

(८) लक्षण--एक व्यापारी ने अपने घोडो की रक्षा के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त किया 
झ्रौर वेतन के रूप मे उसे दो घोड़े देने को कहा । व्यक्ति ले इसे स्वीकार कर लिया तथा घोडो की 
रक्षा व सार-सभाल करना प्रारम्भ कर दिया । कुछ समय मे व्यापारी की पुत्री से उसका स्नेह हो 
गया । सेवक चतुर था श्रत उसने कन्या से पूछ लिया--“इन सब घोडो मे से कौन से घोडे श्रेष्ठ 
हैं ?” लडकी ने उत्तर दिया- “यो तो सभी घोडे उत्तम है किन्तु पत्थरो से भरे हुए कुप्पे को वक्ष 
पर से गिराने पर उसकी श्रावाज से जो भयभीत न हो वे श्रेष्ठ लक्षण-सम्पन्न है ।” 

लडकी के कथनानुसार उस व्यक्ति ने उक्त विधि से सब घोडो की परीक्षा कर ली । दो घोड़े 
उनमे से छाट लिए । जब वेतन लेने का समय श्राया तो उसने व्यापारी से उन्ही दो घोडो की माग 
की । अश्वो का स्वामी मन ही मन घबराया कि ये दोनो ही सर्वोत्तम घोड़े ले जायगा । भरत, बोला - 
“भाई ! इन घोडो से भी ग्रधिक सुन्दर और हृष्ट-पुष्ट घोड़े ले जा ।” सेवक नही माना तब चिन्तित 
गृहस्वामी अन्दर जाकर अपनी पत्नी से बोला--“भलीमानस ! यह सेवक तो बडा चतुर निकला । 
न जाने कंसे इसने अपने सबसे अच्छे दोनो घोडो की पहचान कर ली है श्रौर उन्ही को वेतन के रूप 
में माँग रहा है। श्रत. अच्छा यही है कि इसे गृहजामाता बना ले ।” 

यह सुनकर स्त्री नाराज हुई, कहने लगी--“तुम्हारा दिमाग फिर गया है क्‍या ? नौकर को 
जमाई बनाझोगे ?” इस पर व्यापारी ने उसे समकाया--“अ्रगर ये सर्वलक्षण युक्त दोनो घोड़े चले गये 


| ::054200॥ 0 ७७७एआआ है शाकधाण 2 जन 


सतिजञान] [९९ 


तो हमारी सब तरह से हानि होगी | हम भी इस सेवक जेसे हो जाएँगे। किन्तु इसे जामाता बना 
लेने से घोडे यही रहेगे तथा भोर भी गुणयुक्त घोड़े बढ जाएँगे । सभी प्रकार से हमारी उन्नति होगी । 
दूसरे, यह श्रश्व-रक्षक सुन्दर युवक तो है हो, बहुत बुद्धिमान्‌ भो है ।” स्त्रो सहमत हो गई झौर सेवक 
को स्वामी ने जमाई बनाकर दूरदशिता का परिचय दिया । यह सब श्रश्वो के व्यापारी की विनय से 
उत्पन्न बुद्धि के कारण हुआ । 

(९) ग्रन्थ--किसी समय पाटलिपुत्र मे मुरुण्ड नामक राजा राज्य करता था। एक भ्रन्य 
राजा ने उसे तीन विचित्र वस्तुएँ भेजी । वे इस प्रकार थी--ऐसा सूत जिसका छोर नहीं था, एक 
ऐसी लाठी जिसकी गाँठ का पता नही चलता था और एक डिब्बा जिसका द्वार दिखाई नही देता 
था । उन सब पर लाख इस प्रकार लगाई गई थी कि किसी को इनका पता नहीं चलता था। राजा 
ने सभी दरबारियों को दिखाया किन्तु कोई भी इनके विषय मे नहीं बता सका । 

राजा ने तब आ्राचारय पादलिप्त को बुलवाया और उनसे पूछा--'“भगवन्‌ ! क्या आप इन 
सबके विषय मे बता सकते हैं ?  आचाये ने स्वीकृति देते हुए गर्म पानी मंगवाया और पहले उसमे सूत 
को डाल दिया । उसमे लगी हुई लाख पिघल गई और सूत का छोर नजर आने लगा | तत्पश्चातत 
लाठी को पानी में डाला तो गॉठवाला भारी किनारा पानी मे डब गया, जिससे यह साबित हुश्ना कि 
लाठी में भ्रमुक किनारे पर गॉठ है। अन्त मे डिब्बे को भी गरम पानी में डाला गया और लाक्षा 
पिघलते ही उसका द्वार दिखाई देते लगा । सभी व्यक्तियों ने एक स्वर से श्राचार्य की प्रशसा की । 

तत्पश्चात्‌ राजा मुरुण्ड ने ग्राचार्य पादलिप्त से प्रार्थना की--“देव ! श्राप भी कोई ऐसी 
कौतुकपूर्ण वस्तु तैयार कीजिए जिसे मै बदले मे भेज सक्‌' ।” इस पर आचार्य ने एक तृम्बे को बडी 
सावधानी से काटा और उसमे रत्न भरकर यत्नपूर्वक काटे हुए हिस्से को जोड दिया । दूसरे राज्य से 
आए हुए पुरुषों से कहा -/इसे तोड़े बिना इसमे से रत्न निकाल लेना ।” किन्तु उनके राज्य मे कोई 
भी बिना तृम्बे को तोडे रत्न नही निकाल सका । इस पर पुन राजा समेत समस्त सभासदों ने 
आचार्य को वेनयिकी बुद्धि की भूरि-भूरि सराहना की । 

(१०) अगद--एक नगर के राजा के पास सेना बहुत थोडी थी । पडोसी शत्रु राजा ने उसके 
राज्य को चारो ओर से घेर लिया । इस पर राजा ने आदेश दिया कि जिसके पास भी विष हो वह 
ले आए । बहुत से व्यक्ति राजाज्ञानुसार विष लाए श्रौर नगर के बाहर स्थित उस कूप के पानी को 
विषमय बना दिया, जहाँ से शत्रु के सेन्य-दल को पानी मिलता था| इसी बीच एक वैद्य भी बहुत 
अल्प मात्रा मे विष लेकर आया । राजा एक वंद्य को अत्यल्प विष लाया देखकर बहुत क्रद्ध हुआ । 
किन्तु वद्यराज ने कहा --“महाराज ' आप क्रोध न करे । यह सहख्रवेधो विष है । भ्रभी तक जितना 
विष लाथा गया होगा श्रौर उससे जितने लोग मर सकेंगे उससे भ्रधिक नर-सहार तो इतने से विष से 
ही हो जाएगा । राजा ने आश्चयें से कहा--“यह केसे हो सकता है ? क्‍या झ्राप इसका प्रमाण 
दे सकेगे ? 

बद्य ने उसी समय एक वृद्ध हाथी मंगवाया और उसकी पूछ का एक बाल उखाड़ लिया। 
फिर ठीक उसी स्थान पर सुई की नोक से विष का सचार किया । विष जैसे-जैसे दरीर मे आगे बढा 
वैसे-वंसे ही हाथी के शरीर का भाग जड़ होता चला गया । तब वंद्य ने कहा -'महाराज ! देखिए ! 
यह हाथी विषमय हो गया है, इसे जो भो खाएगा, वह विषधमय हो जायेगा। इसीलिए इस विष को 
सहस्रवेधी कहा जाता है !' 


१७० ] [ मस्वीसूत्र 


राजा को वैद्य की बात पर विश्वास हो गया किन्तु हाथी के प्राण जाते देख उसने कहा-- 
“वैद्य जी ! क्‍या यह पुन स्वस्थ नहीं हो सकता ?” वैद्य बोला--'क्यो नहीं हो सकता ।” वैद्य ने 
पूछ के बाल के उसी रन्ध्र मे प्रन्य किसी औषधि का सचार किया और देखते ही देखते हाथी 
सचेतन हो गया । वैद्य की विनयजा बुद्धि के चमत्कार की राजा ने खूब सराहना की । उसे पुरस्कृत 
किया | 

(११-१२) रथिक एवं गणिका- रथिक अर्थात्‌ रथ के सारथी और गणिका के उदाहरण 
स्थल-भद्र की कथा मे वरणित हैं । वे भी वैनयिकी बुद्धि के उदाहरण हैं । 

(१३) श्ाटिका, तण तथा क्रौडज--किसी नगर मे श्रत्यन्त लोभी राजा था। उसके 
राजकुमार एक बडे विद्वान्‌ आचार्य से शिक्षा प्राप्त करते थे। सभी राजकुमार श्रपने पिता से 
विपरीत उदार एवं विनयवान्‌ थे | अत आचार्य ने श्रपने उन सभी छिष्यो को गहरी लगन के साथ 
विद्याध्ययन कराया । शिक्षा समाप्त होने पर राजकुमारो ने श्रपने कलाचार्य को प्रचुर धन भेंट 
किया । राजा को जब इस बात का पता लगा तो उसने कलाचार्य को मारकर उसका धन ले लेने 
का विचार किया | राजकुमारों को किसी प्रकार इस बात का पता चल गया । श्रपने भ्राचार्य के 
प्रति उनका भ्रसीम प्रेम तथा श्रद्धा थी अत उन्होने अ्रपने गुरु की जान बचाने का निश्चय किया। 


राजकुमार श्राचाये के पास गये । उस समय वे भोजन से पहले स्नान करने की तंयारी मे 
थे । राजकुमारो से उन्होने पहनने के लिए सूखो धोती माँगी, पर कुमारो ने कह दिया --“शाटिका 
गीली है | इतना ही नही, वे हाथ मे तृण लेकर बोले--“तृण लम्बा है। एक श्रोर राजकुमार 
बोला- “पहले क्रौज्च सदा प्रदक्षिणा किया करता था, अब वह बाई ओर घूम रहा है।” आचार्य 
ने जब राजकुमारों की ऐसी श्रटपटी बाते सुनी तो उनका माथा ठनका और उनकी समभ मे श्रा 
गया कि--मेरे धन के कारण कोई मेरा शत्रु बन गया है और मेरे प्रिय शिष्य मुझे चेतावनी दे रहे 
हैं ।' यह ज्ञान हो जाने पर उन्होने अपने निश्चित किए हुए समय से पहले ही राजकुमारो से विदा 
लेकर चुपचाप अपने घर की ओर प्रस्थान कर दिया । यह राजकुमारों की एवं कलाचार्य की 
वैनयिकी बुद्धि के उत्तम उदाहरण है । 


(१४) नीब्ोदक-एक व्यापारी बहुत समय से विदेश मे था। उसकी पत्नी ने वासनापूर्ति 
के लिए श्रपनी सेविका द्वारा किसी व्यक्ति को बुलवा लिया | साथ ही एक नाई को भी बुलवा भेजा, 
जिसने आगत व्यक्ति के नाखून एव केशादि को सवारा तथा स्नानादि करवाकर शुप्न वस्त्र पहनाए। 

रात्रि के समय जब मूसलाधार पानी बरस रहा था, उस व्यक्ति ने प्यास लगने पर छज्जे 
से गिरते हुए वर्षा के पानी को ओक से पी लिया। संयोगवश उसी छज्जे के ऊपरी भाग पर एक 
मृत सर्प का कलेवर था श्रौर पानी उस पर से बहता हुआ्रा श्रा रहा था। जल विष-मिश्रित हो गया 
था भ्रौर उसे पीते ही दुराचारी पुरुष की मृत्यु हो गयी । 


यह देखकर वणिकपत्नी घबराई और सेवको के द्वारा उसी समय मृत व्यक्ति को एक जन- 
शून्य देवकुलिका मे डलवा दिया । प्रात:काल लोगो को मृतक का पता चला तथा राजपुरुषो ने 
प्राकर उसकी मृत्यु का कारण खोजना प्रारम्भ कर दिया। उन्होने देखा कि मृत व्यक्ति के नख व 
केश तत्काल ही काटे हुए हैं। इस पर शहर के नाइयो को बुलवाकर प्रत्येक से प्रलग-प्रलग पूछा 
गया कि इस व्यक्ति के नाखून भर केश किसने काटे हैं ? उनमे से एक नाई ने मृतक को पहचानकर 


मतिभान ] [ १०१ 


बता दिया कि--“मैने श्रमुक वणिक-पत्नी की दासी के बुलाए जाने पर इसके नख व केश काटे 
थे।” दासी को पकड़ लिया गया । उसने भयभीत होकर सम्पूर्ण घटना का वर्णन कर दिया। यह 
उदाहरण राजकर्मचारियो की वेनयिकी बुद्धि का उदाहरण है । 


(१५) बेलों का चुराया जाना, प्रइव की मृत्यु तथा वक्ष से गिरना 


एक व्यक्ति श्रत्यन्त ही पुण्यहीन था । वह जो कुछ भी करता उससे सकट में पड जाता था। 
एक बार उसने अपने मित्र से हल चलाने के लिए बंल माँगे और कार्य समाप्त हो जाने पर 
उन्हे लौटाने के लिए ले गया । उसका मित्र उस समय खाना खा रहा था। ग्रत श्रभागा श्रादमी 
बोला तो कुछ नही पर उसके सामने ही बेलो को बाड़े में छोड आया, यह सोचकर कि वह देख 
तो रहा ही है । 

दुर्भाग्यवश बेल किसी प्रकार बाड़े से बाहर निकल गये और उन्हे कोई चुराकर भगा ले 
गया । बैलो का मालिक बाड़े में अपने बेलो को न देखकर पुण्यहीन के पास जाकर बलों को मॉगने 
लगा। किन्तु वह बेचारा देता कहाँ से ” इस पर कोधित होकर उसका मित्र उसे पकडकर राजा 
के पास ले चला । 

मार्ग मे एक घुड्सवार सामने से आ रहा था। उसका घोड़ा बिदक गया औ्रौर सवार को 
नीचे पटक कर भागने लगा। इस पर सवार चिल्लाकर बोला--“अरे भाई | इसे डण्डे मारकर 
रोको ।” पुण्यहीन व्यक्ति के हाथ मे एक डडा था, भ्रत उसने घुडसवार की सहायता करने के उहूं श्य 
से सामने आते हुए घोडे को डडा मारा, किन्तु उसकी भाग्यहीनता के कारण डडा घोड़े के ममंस्थल 
पर लगा और धोडे के प्राण-प्रखेरू उड गये । घोडे का स्वामी यह देखकर बहुत क्रोधित हुश्रा श्रोर 
उसे राजा के द्वारा दड दिलवाने के उहं श्य से साथ हो लिया । इस प्रकार एक अपराधी और सजा 
दिलाने वाले दो, तीनो नगर की ओर चले । 


चलते-चलते रात हो गई श्रौर नगर के द्वार बद मिले। श्रत वे बाहर ही एक सघन वृक्ष ' 
के नीचे सो गये, यह सोचकर कि प्रात काल द्वार खुलने पर प्रवेश करेंगे। किन्तु भ्रभागे भ्रपराधी 
को निद्रा नही भ्राई श्रौर वह सोचने लगा--“भाग्य मेरा साथ नही देता । भला करने पर भी बुरा 
ही होता है । ऐसे जोवन से क्या लाभ ”? मर जारऊँ तो सभी विपत्तियो से पिड छूट जाएगा। श्रन्यथा 
न जाने और क्या-क्या कष्ट भोगने पड़ेंगे । 


यह विचारकर उसने मरने का निश्चय कर लिया और श्रपने दुपट्ट को उसी वृक्ष की डाल 
से बाँधकर फेंदा बनाया श्रौर अपने गले मे डालकर लटक गया। पर मृत्यु ने भी उसका साथ नही 
दिया । दुपट्टा जीर्ण होने के कारण उसके भार को नही भेल पाया तथा टूट गया। परिणाम यह 
हुआ कि वह धम्म से गिरा भी तो नटो के मुखिया पर जो ठीक उसके नीचे सो रहा था। नटो के 
सरदार पर ज्यो ही वह गिरा, सरदार की मृत्यु हो गई । नटो में चीख-पुकार मच गई और सरदार 
की मौत का कारण उस पुण्यहीन को जानकर गुस्से के मारे वे लोग भी उसे पकड़कर सुबह होते ही 
राजा के पास ले चले । 


राज-दरबार मे जब यह काफिला पहुचा, सभी चकित होकर देखने लगे । राजा ने इनके 
भ्राने का कारण पूछा । सभी ने श्रपना-प्रपता अभियोग कह सुनाया। राजा ने पृण्यहीन व्यक्ति से 


१०२ |] । [ नम्दोसूच 


भी जानकारी की और उसने निराशापूवंक सभी घटनाएँ बताते हुए कहा--“महाराज ! मैंने जान- 
बूक्रकर कोई अपराध नही किया है । मेरा दुर्भाग्य ही इतना प्रबल है कि प्रत्येक भ्रच्छा कार्य उलटा 
हो जाता है। ये लोग जो कह रहे है, सत्य है। मैं दण्ड भोगने के लिये तैयार हूँ ।'' 

राजा बहुत विचारशील था । सब बाते सुनकर उसने समझ लिया कि इस बिचारे ने कोई 
अपराध मन से नही किया है, प्रत यह दण्ड का पात्र नही है। उसे दया आई शोर उसने चतुराई से 
फंसला करने का निर्णय किया । सर्वप्रथम बेल वाले को बुलाया गया और राजा ने उससे कहा - 
“भाई ! तुम्हे अपने बल लेने है तो पहले अ्रपनी श्रांखे निकालकर इसे दे दो, क्योकि तुमने भ्रपनी 
श्रॉँखो से इसे बाडे मे बल छोडते हुए देखा था ।” 

इसके बाद घोडेवाले को बुलाकर राजा ने कहा--“अगर तुम्हे घोडा चाहिए तो पहले अपनी 
जिह्दा इसे काट लेने दो, क्योकि दोषी तुम्हारी जिह्ना है, जिसने इसे घोडे को डण्डा मारने के लिए 
कहा था। इसे दण्ड मिले श्रौर तुम्हारी जिद्वा बच. जाए यह न्यायसंगत नही । ऐसा करना भ्रन्याय 
है । भ्रत पहले तुम जिद्दा दे दों फिर घोडा इससे दिलवा दिया जायगा । 


इसके बाद नटो को भी बुलाया गया । राजा ने कहा- -'इस दीन व्यक्ति के पास क्‍या है जो 
तुम्हे दिलवाया जाय ! अगर तुम्हे बदला लेना है तो इसे उसी वक्ष के नीचे सुला देते है श्ञोर श्रव जो 
तुम्हारा मुखिया बना हो, उससे कहो कि वह इसी व्यक्ति के समान गले मे फदा डालकर उसी डाल से 
लटक जाए और इस व्यक्ति के ऊपर गिर पडे ।” 

राजा के इन फँसलो को सुनकर तीनो प्रभियोगी चुप रह गये झ्ौर वहाँ से चलते बने । 


राजा की वेनयिकी बुद्धि ने उस भ्रभागे व्यक्ति के प्राण बचा लिए । 


(३) कर्मजा बुद्धि के उदाहरण 


४१-उवओोगधविट्रततारा कस्मपर्संगपरिलोघणबिसाला । 
साहुक्कारफलवई  कम्मसमुत्या हवइ बुद्धी ॥। 


हेरण्णिए करिसय, कोलिय डोये य मुत्ति घम पथए । 
तुन्चनाग बडहुई ये, पूथदई घड़ चित्तकारे य।। 
५१ --उपयोग से जिसका सार-परमार्थ देखा जाता है, प्रभ्यास और विचार से जो विस्तृत 
बनती है भ्रोर जिससे प्रशसा प्राप्त होती है, वह कर्मजा बुद्धि कही जाती है । 
(१) सुवर्णका र, (२) किसान, (३) जुलाहा, (४) दर्वीकार, (५) मोती, (६) घी, (७) नठ, 
(८) दर्जी, (९) बढई, (१०) हलवाई, (११) घट तथा (१२) चित्रकार । इन सभी के उदाहरण कर्म 
से उत्पन्न बुद्धि के परिचायक हैं। विवरण इस प्रकार है-- 
(१) हैरण्यक--सुनार ऐसा कुशल कलाकार होता है कि अपने कलान-ज्ञान के द्वारा घोर 
अ्न्धकार में भी हाथ के स्पशेमात्र से ही सोने और चाँदी की परीक्षा कर लेता है । 
(२) कर्षक (किसान)--एक चोर किसी वणणिक्‌ के घर चोरी करने गया । वहाँ उसने दीवार 
में इस प्रकार सेंध लगाई कि कमल की आकृति बन गई। प्रात काल जब लोगों ने उस कलाकृति सेंध्र 


अतिज्ञान ] [१०३ 


को देखा तो चोरी होने की बात को भूलकर चोर को कला कौ प्रशसा करने लगे । उसी जन-समूह मे 
चोर भी खडा था श्रौर भ्रपनी चतुराई की तारीफ सुनकर प्रसन्न हो रहा था । एक किसान भी वहाँ 
था, पर उसने प्रशसा करने के बदले कहा--भाइयो ' इसमे इतनी प्रशसा या प्रचम्भे की क्‍या बात 
है ? अपने कार्य मे तो हर व्यक्ति कुशल होता है ' 

किसान की बात सुनकर चोर को बडा क्रोध श्राया और एक दिन वह छुरा लेकर किसान को 
मारने के लिए उसके खेत में जा पहँचा । जब वह छुरा उठाकर किसान की ओर लपका तो एकदम 
पीछे हटते हुए किसान ने पूछा--'तुम कौन हो और भुझे क्यो मरना चाहते हो ?” चोर बोला-- तूने 
उस दिन मेरी लगाई हुई सेध की प्रशसा क्यो नही की थी ? ' 


किसान समभ गया कि यह वही चोर है । तब वह बोला-- “भाई, मैंने तुम्हारी बुराई तो नही 
की थी, यही कहा था कि जो व्यक्ति जिस कार्य को करता है उसमे वह श्रपने ग्रभ्यास के कारण कुशल 
हो ही जाता है। श्रगर तुम्हे घिश्वास न हो तो मैं अपनी कला तुम्हे दिखाकर विश्वस्त कर दू' । देखो, 
भेरे हाथ मे मू ग के ये दाने है। तुम कहो तो मै इन सबको एक साथ ऊध्वंमुख, भ्रधोमुख भ्रथवा पाश्व॑ 
से गिरा दू ।” 

चोर चकित हुआ । उसे विश्वास नहीं ञभ्रा रहा था । तथापि किसान के कथन की सचाई 
जानने के लिए वह बोला -'इन सबको अधोमुख डालकर बताझो ।” 


किसान ने उसी वक्त पृथ्वी पर एक चादर ऊलाई और मूंग के दाने इस कुशलता से बिखेरे 
कि सभी अधोमुख हो गिरे । चोर ने ध्यान से दानो को देखा श्रौर कहा--“भाई ! तुम तो भुभसे भी 
कुशल हो अपने कार्य मे । इतना कहकर वह पुन लौट गया । उक्त उदाहरण तस्कर एवं कृषक, दोनों 
की कर्मजा बुद्धि का है । 

(३) कौलिक--जुलाहा अपने हाथ मे सूत के धागो को लेकर ही सही-सही बता देता है कि ' 
इतनी संख्या के कण्डो से यह वस्त्र तेयार हो जायगा । 

(४) डोव-तरखान अनुमान से ही सही-सही बता सकता है कि इस कुडछी में इतनी मात्रा 
में वस्तु भ्रा सकेगी । 

(५) मोती--सिद्धहस्त मणिकार के लिये कहा जाता है कि वह मोतियों को इस प्रकार 
उछाल सकता है कि वे नीचे खडे हुए सूभ्रर के बालो मे आकर पिरोये जा सकते हैं । 


(६) घृत-कोई-कोई घी का व्यापारी भी इतना कुशल होता है कि वह चाहने पर गाडी या 
रथ मे बंठा-बठा ही नीचे स्थित कु डियो मे बिना एक बूंद भी इधर-उधर गिराये घी डाल देता है । 


(७) प्लवक (नट)--नटो की चतुराई जगत्‌ प्रसिद्ध है। वे रस्सी पर ही अनेको प्रकार के खेल 
करते है किन्तु नीचे नही गिरते भ्रौर लोग दाँतो तले अंगुली दबा लिया करते हैं । 

(८) तृष्णाग--कुशल दरजी कपडे की इस प्रकार सफाई से सिलाई करता है कि सीवन किस 
जगह है, इसका पता नही पड़ता । 

(९) बड्ढइ (बढई)--बढई लकड़ी पर इतनी सुन्दर कलाकृति का निर्माण करता है तथा 


१०४] [सन्दीसृत् 


विभिन्न प्रकार के सुन्दर चित्र बनाता है कि वे सजीव दिखाई देते हैं। इसके भ्रतिरिक्त लकड़ी को 
तराश कर इस प्रकार जोडता है कि जोड कही नजर नही झ्ाता । 


(१०) श्रापूपिक--चतुर हलवाई नाना प्रकार व्यञज्जन बनाता है तथा तोल-नाप के बिना ही 
किसमे कितना द्रव्य लगेगा, इसका अनुमान कर लेता है । कोई व्यक्ति तो भ्रपनी कला मे इतने माहिर 
होते हैं कि दूर-दूर के देशों तक उनकी प्रसिद्धि फेल जाती है तथा वह नगर उस विधिष्ट व्यञ्जन के 
द्वारा भी प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है। 


(११) घट--कुम्भका र घडो का निर्माण करने मे इतना चतुर होता है कि चलते हुए चाक पर 
जल्दी-जल्दी रखने के लिये भी मिट्टी का उतना ही पिण्ड उठाता है, जितने से घट बनता है । 


(१२) चित्रकार--कुशल चित्रकार श्रपनी तूलिका के द्वारा फूल, पत्ती, पेड, पौधे, नदी ग्रथवा 
अरने झ्रादि के ऐसे चित्र बनाता है कि उनमे असली-तकली का भेद करना कठिन हो जाता है। वह 
पशु-पक्षी अथवा मानव के चित्रो मे भी प्राण फूक देता है। क्रोध, भय, हास्य तथा घ॒णा श्रादि के 
भाव चेहरो पर इस प्रकार अकित करता है कि देखने वाला दग रह जाय । 


उल्लिखित सभी उदाहरण कार्य करते-करते अ्रभ्यास से समुत्पन्न कमंजा बुद्धि के परिचायक 
हैं । ऐसी बुद्धि ही मानव को प्रपने व्यवसाय मे दक्ष बनाती है। 


(४) पारिणामिकी बुद्धि के लक्षण 


५२-- अणुमान-हेउ-विट्ठंतसाहिआ, _ वय-विवाग-परिणामा । 
हिय-निस्सेयसल फलवई, बुद्धों परिणामिया नास || 


५२--अनुमान, हेतु भर दृष्टान्त से कार्य को सिद्ध करने वाली, झ्रायु के परिपक्व होने से 
पुष्ट, लोकहितका री तथा मोक्षरूपी फल प्रदान करने वाली बुद्धि पारिणामिकी कही गई है। 


पारिणामिफो बुद्धि के उदाहरण 


५३-अभए सिट्टी कुमारे, देवी उदियोदए हवइ राया । 
साहू य नंविसेणे, धणदत्ते सावग अभच्चे ॥। 
खमए अमच्चपुसे चाणक्के चेव थलभदे य। 
नासिक्क सुदरीनंदे, बइरे परिणाम बुद्धीए।॥। 
चलणाहण प्रामंडे, समणो य सप्पे य खाग्गिय्िदे । 
परिणासिय-बुद्धीप,, एवमाई उदाहरणा ॥। 


से त्त भ्रस्सुयनिस्सियं । 


५३--(१) अभयकुमार, (२) सेठ, (३) कुमार, (४) देवी, (५) उदितोदय, (६) साधु भ्रौर 
नन्दिघोष, (७) धनदत्त, (८) श्रावक, (९) अमात्य, (१०) क्षपक, (११) अमात्यपुत्र, (१२) चाणक्य, 
(१३) स्थूलिभद्र, (१४) नासिक का सुन्दरीनन्द, (१५) वज्जस्वामी, (१६) चरणाहत, (१७) प्रावला, 


मतिज्ञान ] [१०१४ 


मणि (१९) सप॑ (२०) गेडा (२१) स्तूप-भेदन । ये सभी उदाहरण पारिणामिकी बुद्धि के 
उदाहरण हैं । 


अश्रुतनिश्चित मतिज्ञान का निरूपण पूर्ण हुआ । 


(१) अभयकुसार -बहुत समय पहले उज्जयिनी नगरी मे राजा चण्डप्रद्योतन राज्य करता 
था | एक बार उसने श्रपने सादूभाई श्रोर राजगृह के राजा श्रेणिक को दूत द्वारा कहलवा भेजा -- 
'प्रगर अपना शौर राज्य का भला चाहते हो तो अनुपम बकचूड हार, सेचनक हाथो, अभयकुमार पुत्र 
अ्रथा रानी चेलना को श्रविलम्ब मेरे पास भेज दो ।' 


दूत के द्वारा चडप्रद्योतन का यह सदेश सुनकर श्रेणिक आगबबूला हो गया श्रौर दूत से 
कहा -“अवध्य होने के कारण तुम्हे छोड देता हूँ पर श्रपने राजा से जाकर कह देना कि यदि तुम 
अपनी कुशल चाहते हो तो भ्रग्निरथ, अनिलगिरि हस्ती, वजद्ञजघ दूत तथा शिवादेवी रानी, इन 
चारो को मेरे यहा शी ध्रातिशी प्र भेज दो ।” 


दूत के द्वारा यह उत्तर सुनते ही चडप्रद्योतन भारी सेना लेकर राजगृह पर चढाई करने के 
लिए रवाना हो गया और राजगृह के चारो ओर घेरा डाल दिया । श्रेणिक ने भी युद्ध करने की 
तैयारी करली । सेना सुसज्जित हो गई । किन्तु पारिणामिकी बुद्धि के धारक अ्भयकुमार ने अपने 
पिता श्रेणिक से नम्नतापूवंक कहा -“महाराज ! प्रभी आप युद्ध करने का झ्रादेश मत दीजिये, मै 
कुछ ऐसा उपाय करू गा कि 'सॉप भी मर जाए और लाठी भी न दूटे ।' अर्थात्‌ मौसा चडप्रद्योतन 
स्वय भाग जाएं और हमारी सेना भो नष्ट न होने पाए ।” श्रेणिक को अपने पुत्र पर विश्वास था 
अ्रत उसने भ्रभयकुमार की बात मान ली । 


इधर रात्रि को ही भ्रभवकुमार काफी घन लेकर नगर से बाहर आया और उस्ते चडप्रद्योतन 
क डरे के पीछे भूमि मे गडवा दिया । तत्पश्चात्‌ वह चंडप्रद्योतत के समक्ष आया। प्रमाण करके 
बोला--“मौसा जी ' श्राप किस फेर मे हैं ? इधर ग्राप राजगृह को जीतने का स्वप्न देख रहे हैं और 
उधर आपके सभी वरिष्ठ सेनाधिकारियो को पिताजी ने घूस देकर ग्रपनी ओर मिला लिया है | 
वे सूर्योदय होते ही ग्रापको बन्दी बनाकर मेरे पिताजी के समक्ष उपस्थित कर देगे। श्राप मेरे मौसा 
है, अत आपको मैं धोखा खाकर अपमानित होते नही देख सकता ।” चडप्रद्योतन ने कुछ अविश्वास 
पूर्वक पूछा-- तुम्हारे पास इस बात का क्या प्रमाण है ?” तब अ्भयकुमार ने उन्हे चुपचाप अपने 
साथ ले जाकर गडा हुआ धन निकाल कर दिखाया । घन देखकर चडप्रद्योतन को भ्रपनी सेना के 
मुख्याधिकारियों की गहरी का विश्वास हो गया और वह उसी समय घोड पर सवार होकर 
उज्जयिनों की ओर चल दिया । 


प्रात काल जब सेनापति श्रादि चडप्रद्योतन के डेरे मे राजगृह पर धावा करने की आाज्ञा 
लेने के लिए आए तो डेरा खाली मिला । न राजा था और न ही उसका घोडा । सबने समझ लिया 
कि राजा वापिस नगर को लौट गए है। बिना दूल्हे की बरात के समान सेना फिर क्‍या करती! 
सभी वापिस उज्जयिनी लौट गये । 


वहाँ आने पर सभो उनके रातो रात लौट झाने का कारण जानने के लिए महल में गए। 
राजा ने सभी को धोखेबाज समझकर मिलने से इकार कर दिया। बहुत प्रार्थना करते पर और 


१०६] [ नम्दोसृत्र 


दयनीयता प्रदर्शित करने पर राजा उनसे मिला तथा गद्दारी के लिए फटकारने लगा। बेचारे पदा- 
घिकारी घोर ग्राश्चर्य मे पड गए पर ग्रन्त मे विनम्र भाव से एक ने कहा--“देव | व॒र्षों से श्रापका 
नमक खा रहे हैं । भला हम इस प्रकार आपके साथ छल कर सकते हैं ” यह चालबाजी श्रभयकुमार 
की ही है । उसने भ्रापको भुलाबे मे डालकर भ्रपने पिता का व राज्य का बचाव कर लिया है।” 

चडप्रद्योतन के गले यह बात उतर गई । उसे अभयकुमार पर बडा क्रोध आया और नगर मे 
ढिढोरा पिटवा दिया कि--जो कोई प्रभयकुमार को पकड़कर मेरे पास लाएगा उसे राज्य की शोर 
से बहुमूल्य पुरस्कार दिया जाएगा ।' 

नगर में घोषणा तो हो गई किन्तु बिल्ली के गले मे घटी बाँधने जाए कौन ? राजा के मत्री, 
सेनापति भ्रादि से लेकर साधारण व्यक्ति तक सभी को मानो साँप सूघ गया । किसी की हिम्मत नही 
हुई कि प्रभयकुमार को पकडने जाय । प्राखिर एक वेश्या ने यह कार्य करना स्वीकार किया और 
राजगृह जाकर वहाँ श्राविका के समान रहने लगी । कुछ काल बीतने पर उस पाखडी श्राविका ने 
एक दिन अ्रभयकुमार को अपने यहाँ भोजन करने के लिये निमत्रण भेजा | श्राविका समभकर 
प्रभयकुमार ने न्‍्यौता स्वीकार कर लिया । वेश्या ने खाने की वस्तुओं मे कोई नशीली चीज मिला 
दी | उसे खाते ही भश्रभयकुमार मूछित हो गया । गणिका इसी पल की प्रतीक्षा कर रही थी । उसने 
अविलम्ब अ्रभयकुमार को अपने रथ मे डलवाया श्रौर उज्जयिनी ले जाकर चडप्रद्योतन राजा को 
सौंप दिया। राजा हषित हुआ तथा होश मे आ्राने पर प्रभयकुमार से व्यगमिश्रित परिहासपूर्बक 
बोला--“क्यो बेटा ! धोखेबाजी का फल मिल गया ? किस चतुराई से मैंने तुभे यहाँ पकडवा 
मगाया है ।' 

प्रभयकुमार ने तनिक भी घबराए बिना निर्भयतापूर्वंक तत्काल उत्तर दिया--“मौसाजी ! 
आपने तो मुझे बेहोश होने पर रथ मे डालकर यहाँ मगवाया है किन्तु मैं तो आपको पूरे होशोहवास 
मे रथ पर बैठाकर जूते मारता हुआ राजगृह ले जाऊँगा । 

राजा ने ग्रभय की बात को उपहास समभकर टाल दिया और उसे अपने यहाँ रख लिया 
किन्तु अभयकुमार ने बदला लेने की ठान ली थी । वह मौके की ताक में रहने लगा । 

कुछ दिन बीत जाने पर पश्रभयकुमार ने एक योजना बनाई । उसके भ्रनुसार एक ऐसे व्यक्ति 
को खोज निकाला जिसकी श्रावाज ठीक चडप्रद्योतत राजा जेसी थी। उस गरीब व्यक्ति को भारी 
इनाम का लालच देकर अपने पास रख लिया ओर अपनो योजना समझा दो । तत्पश्चात्‌ एक दिन 
प्रभयकुमार उसे रथ पर बेठाकर नगरी के बीच से उम्तके सिर पर जूते मारता हुआ निकला । जूते 
खाने वाला चिल्लाकर कहता जा रहा था-- “अरे, भ्रभयकुमार मुझे जूतों से पीट रहा है, कोई 
छुडाओ ! मुझे बचाश्ो |!” श्रपने राजा की जैसी श्रावाज सुनकर लोग दौडे ओर उसे छुडाने लगे, 
किन्तु लोगो के श्राते हो जूते मारने वाला और जूते खाने वाला, दोनो ही खिलखिला कर हँस पडे । 
अभयकुमार का खेल समझ लोग चुपचाप चल दिये। झ्रभयकुमार निरतर पाच दिन तक इसी प्रकार 
करता रहा । बाजार के व्यक्ति यह देखते पर कुमार की क्रीडा समभकर हँसते रहते । कोई उस ब्यक्ति 
को छुडाने नही ग्राता । 

छठे दिन मोका पाकर भ्रभयकुमार ने राजा चडप्रद्योतन को ही बाँध लिया श्रौर बलपूर्वक 
रथ पर बेठाकर सिर पर जूते मारता हुआ बोच बाजार से निकला । राजा चिल्ला रहा था--“ भरे 


मतिशान ] [१०७ 


दोड़ो ! दौड़ो !! पकड़ो ! भ्रभयकुमार मुझे जूते मारता हुआ ले जा रहा है।” लोगों ने देखा, 
किन्तु प्रतिदिन की तरह प्रभयकुमार का मनोरजक खेल समभकर हँसते रहे, कोई भी राजा को 
छुड़ाने नही आ्राया । नगरी से बाहर आते ही ग्रभयकुमार ने पवन-वेग से रथ को दौड़ाया तथा 
राजगृह श्राकर ही दम लिया। यथासमय दरबार में श्रपने पिता राजा श्रेणिक के समक्ष चडप्रद्योतन 
को उपस्थित किया । चडप्रद्योतन भ्रभयकुमार के चातुर्य से मात खाकर श्रत्यन्त लज्जित हुश्रा । उसने 
श्रेणिक से क्षमायाथना की । राजा श्रेणिक ने चडप्रद्योतन को उसी क्षण हृदय से लगाया तथा राजसी 
सम्मान प्रदान करते हुए उज्जयिनी पहुंचा दिया । राजगृह के निवासियों ने पारिणामिकी बुद्धि के 
अ्रधिकारी अपने कुमार की मुक्त कठ से सराहना की । 


(२) सेठ-- एक सेठ की पत्नी चरित्रहीन थी । पत्नी के श्रनाचार से क्षुब्ध होकर उसने पुत्र 
पर घर की जिम्मेदारी डाल दी और स्वय सयम ग्रहण कर साधु बन गया । इसके बाद ही सयोगवश 
जनता ने श्रेष्ठिपुत्र को वहाँ का राजा बना दिया । वह राज्य करने लगा । कुछ काल पश्चात्‌ मुनि 
बविचरण करते हुए उसी राज्य मे आए । राजा ने अपने मुनि हो गये पिता से उसी नगर मे चातुर्मास 
करने की प्रार्थना की । राजा को झ्ाकाक्षा एव आग्रह के कारण मुनि ने वहा वर्षावास किया। मुनि 
के उपदेशो से जनता बहुत प्रभावित हुई, किन्तु जेन शासन के विरोधियों को यह सह्य नही हुआ भर 
उन्होने मुनि को बदनाम करने के लिए षड़यत्र रचा । जब चातुर्मास काल सम्पन्न हुआ और भुनि 
विहार करने के लिये तैयार हुए तो विरोधियो के द्वारा सिखाई-पढाई एक गर्भवती दासी भ्राकर कहने 
लगी--“मुनिराज ' मैं तो निकट भविष्य मे ही तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ और तुम मुभे 
छोडकर भ्न्यत्र जा रहे हो | पीछे मेरा क्या होगा ? 


मुनि निष्कलक थे पर उन्होने विचार किया-- “भगर इस समय मैं चला जाऊंगा तो शासन 
का अपयश् होगा तथा धर्म की हानि होगी।” वे एक शक्तिसम्पन्न साधक थे, दासी की झूठी बात 
सुनकर कह दिया-“भ्रगर यह गर्भ मेरा होगा तो प्रसव स्वाभाविक होगा, श्रन्यथा वह तेरा उदर 
फाडकर निकलेगा । 

दासी भ्रासश्न-प्रसवा थी किन्तु मुनि पर कूठा कलक लगाने के कारण प्रसव नहीं हो रहा 
था। असह्य कष्ट होने पर उसे पुन मुनि के समक्ष ले जाया गया और उसने सच उगलते हुए कहा-- 
“महाराज ! आपके द्वे षियो के कथनानुसार मैंने श्राप पर झूठा लाछन लगाया था । कृपया मुझे क्षमा 
करते हुए इस सकट से मुक्त करे |” 

मुनि के हृदय मे कषाय का लेश भी नही था । उसी क्षण उन्होने दासी को क्षमा कर दिया 
और प्रसव सकुशल हो गया । धर्म-विरोधियो की थू-थू होने लगी तथा मुनि व जेन धर्म का यश् और 
बढ गया । यह सब मुनिराज की पारिणामिकी बुद्धि से ही हुआ । 


(४) बेबी --प्राचोन काल मे पृष्पभद्र नामक नगर मे पुष्पकेतु राजा राज्य करता था । उसकी 
रानी का नाम पुष्पवती, पुत्र का पृष्पचूल तथा पुत्री का पृष्पचूला था। भाई-बहन जब बडे हुए, 
दुर्भाग्य से माता पुथ्पवती का देहान्त हो गया शभ्रौर वह देवलोक मे पुष्पवती नाम को देवी के रूप में 
उत्पन्न हुई । 

देवी रूप मे उसने ग्रवधिज्ञान से अपने परिवार को देखा तो उसके मन मे आया कि अगर 
पुष्पचुला आत्म-कल्याण के पथ को आपना ले तो कितना अच्छा हो ' यह विचारकर उसने पृष्पचूला 


१०द] [ गन्दीसत्र 


क् 


को स्वप्न मे स्वर्ग तथा नरक के दृश्य स्पष्ट दिखाए | स्वप्न देखने से पुष्पचूला को प्रतिबोध हो गया 

श्रौर उसने सासारिक सुखो का त्याग करके सयम ग्रहण कर लिया। अ्रपने दीक्षाकाल मे शुद्ध संयम 

का पालन करते हुए उसने घाती कर्मों का क्षयषकर केवलज्ञान भौर केवलदर्शन प्राप्तकर सदा के लिए 
जन्म-मरण से छुटकारा पा लिया । देवी पुष्पवती की पारिणामिकी बुद्धि का यह उदाहरण है। 


(५) उद्दितोदय -पुरिमतालयुर का राजा उदितोदय था । उसकी रानी का नाम श्रीकान्ता 
था । दोनो बडे धामिक विचारों के थे तथा श्रावकवृत्ति धारणकर धर्मानुसार सुखपूर्वंक जीवन व्यतीत 
कर रहे थे । 


एक बार एक परिब्राजिका उनके श्रन्त पुर मे श्राई। उसने रानी को शौचमूलक धर्म का 
उपदेश दिया । किन्तु महारानी ने उसका विशेष आदर नही किया, श्रत परिक्नाजिका स्वय को 
ग्रपमानित समभ कर कुद्ध हो गई । बदला लेने के लिए उसने वाराणसी के राजा धर्मरुचि को चुना 
तथा उसके पास रानी श्रीकान्ता के अतुलनीय रूप-यौवन की प्रशसा की । घमंरुचि ने श्रीकान्ता को 
प्राप्त करने के लिए पुरिमतालपुर पर चढाई की । चारो श्रोर घेरा डाल दिया । रात्रि को उदितोदय 
ने विचारा--“भ्रगर युद्ध करू गा तो भीषण नर-सहार होगा और श्रसख्य निरपराध प्राणी व्यर्थ 
प्राणो से हाथ धो बेठेंगे | श्रत कोई श्रन्य उपाय करना चाहिए ।* 


जन-सहा र को बचाने के लिए राजा ने वैश्रमण देव की आराधना करने का निश्चय किया 
तथा ग्रष्टमभक्त ग्रहण किया । भ्रष्टमभक्त की समाप्ति होने पर देव प्रकट हुआ झौर राजा ने उसके 
समक्ष अपना विचार रखा । राजा की उत्तम भावना देखकर वेश्रमण देवता ने श्रपनी वंक्रिय शक्ति के 
द्वारा पुरिमतालपुर नगर को ही ग्रन्य स्थान पर ले जाकर रिथित कर दिया। इधर अगले दिन जब 
धर्मरचि राजा ने देखा कि पुरिमतालपुर नगर का नामोनिशान ही नहीं है, मात्र खाली मंदान 
दिखाई दे रहा है तो निराश और चकित हो सेना सहित लौट चला । उदितोदय की पारिणामिकी 
बुद्धि ने सम्पूर्ण नगर की रक्षा की । 

(६) साधु श्रौर नन्दिषेण- नन्दिषेण राजगृह के राजा श्रेणिक का पुत्र था। विवाह के योग्य 
हो जाने पर श्रेणिक ने भ्रनेक लावण्यवती एवं गुण-सम्पन्न राजकुमारियों के साथ उसका विवाह किया 
तथा उनके साथ नन्दिषेण सुखपूर्वक समय व्यतीत करने लगा । 


एक बार भगवान्‌ महावीर राजगृह नगर मे पधारे । राजा सपरिवार भगवान्‌ के दर्शनार्थ 
गया । नन्दिषेण एवं उसकी पत्नियाँ भो साथ थी । धर्मदेशना सुनी । सुनकर नन्दिषेण ससार के नश्वर 
सुखो से विरक्त हो गया। माता-पिता की अ्रनुमति प्राप्त कर उसने सयम अगीकार कर लिया । 
अत्यन्त तोब बुद्धि होने के कारण मुनि नन्दिषेण ने अ्ल्पकाल मे ही शास्त्रों का गहन अ्रध्ययन किया तथा 
अपने धर्मोपदेशों से श्रनेक भव्यात्मात्रो को प्रतिबोधित करके मुनिधर्म अगीकार कराया । 

भगवान्‌ भहावीर की आझ्राशा लेकर अ्रपनी शिष्यमडली सहित मुनि नन्दिषेण ने राजगृह से 
ग्रन्यत्र विहार कर दिया । 


बहुत काल तक ग्रामानुग्राम विचरण करने पर एक बार मुनि नन्दिषेण को ज्ञात हुआ कि 
उनका एक शिष्य सयम के प्रति अरुचि रखने लगा है तथा पुनः सासारिक सुख भोगने की इच्छा 
रखता है। कुछ विचार कर नन्दिषेण ने शिष्य-समुदाय सहित पुन राजगृह की ओर प्रस्थान किया । 


सतलिज्ञान ] [१०९ 


प्रपने पुत्र मुनि नन्दिषेण के भ्रागमन का समाचार सुनकर राजा श्रेणिक को श्रपार हर्ष 
हुआ । वह अपने श्रन्त पुर के सम्पूर्ण सदस्यो के साथ नगर के बाहर, जहाँ मुनिराज ठहरे थे, दशेनाथे 
आया । सभी सतो ने राजा श्रेणिक को, उनकी रानियो को तथा अपने गुरु नन्दिषेण की प्रनुपम 
रूपवतो पत्नियों को देखा । उन्हे देख कर मुनि-व॒त्ति त्यागने के इच्छूक, विचलित मन वाले उस साधु 
ने सोचा--“अरे ! मेरे गुरु ने तो अप्सराशो को भी मात करने वाली इत रूपवती स्त्रियों को त्याग 
कर मुनि-धर्म ग्रहूण किया है तथा मन, वचन, कर्म से सम्यक्तया इसका पालन कर रहे हैं, और मै 
वमन किये हुए विषय-भोगो का पुन सेवन करना चाहता हु ! घिक्कार है मुझे ! भुभे इस प्रकार 
विचलित होने का प्रायश्चित्त करना चाहिए ।” ऐसे विचार श्राने पर वह मुनि' पुन' सयम मे दढ हो 
गया तथा आत्म-कल्याण मे और अ्रधिक तन्मयता से प्रवृत्त हुआ । 


यह सब मुनि नन्दिषेण की पारिणामिकी बुद्धि के कारण हो सका। 


(७) धनदत्त-धनदत्त का उदाहरण श्रीज्ञाताधर्मकथाड्र सूत्र के अठारहवें श्रध्ययन में 
विस्तारपूर्वक दिया गया है, श्रत उसमे से जानना चाहिए । 


(८) श्रावक -एक व्यक्ति ने श्रावक के बारह ब्रत ग्रहण किये। 'स्वदारसंतोष' भी उनमे से 
एक था | बहुत समय तक वह अपने ब्रतो का पालन करता रहा किन्तु कर्म-संयोग से एक बार उसने 
श्रपनी पत्नी की सखी को देख लिया और आसक्त होकर उसे पाने की इच्छा करने लगा । अपनी इस 
इच्छा को लज्जा के कारण वह व्यक्त नही करता था, किन्तु मन ही मन दुखी रहने के कारण दुर्बल 
होता चला जा रहा था | यह देखकर उसकी पत्नी ने एक दिन आग्रह करके उससे कारण पूछा । 


श्रावक की पत्नी बडी गुण॑-सम्पन्न श्राविका थी। उसने पति का तिरस्कार नही किया ग्रपितु 
विचार करने लगी -'प्गर मेरे पति का इन्ही कुबिचारों के साथ निधन होगा तो उन्हे दुर्गंति प्राप्त 
होगी । अत ऐसा करना चाहिए कि इनके कलुषित विचार नष्ट हो जाएँ और ब्रत-भग न हो ।' 
बहुत सोच विचार कर उसने एक उपाय खोज निकाला । वह एक दिन पति से बोली-- “स्वामिन्‌ ! 
मैने अपनी सखो से बात कर ली है| वह श्राज रात्रि को आपके पास आएंगी, किन्तु आएगी अँधेरे 
मे । वह कुलीन घर की है प्रत उजाले मे आने मे लज्जा अनुभव करती है |” पति से यह्‌ कहकर वह 
ग्रपनी सखी के पास गई श्रौर उससे वही वस्त्राभूषण माँग लाई, जिन्हे पहने हुए उसके पति ने उसे 
देखा था । रात्रि को उसने उन्हे ही धारण किया और चुपचाप श्रपने पति के पास चली गई। किन्तु 
प्रात काल होने पर श्रावक को घोर पश्चात्ताप हुआ । वह श्रपनी पत्नी से कहने लगा--“मैंने बडा 
अनर्थ किया है कि अपना अगीक्ृत ब्रत भग कर दिया । 

पति को सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करते देखकर पत्नी ने यथार्थ बात कह दी । श्रावक ने 
स्वय को पतित होने से बचाने वाली अ्रपनी पत्नी की सराहना की। अपने ग्रुरु के समक्ष जाकर 
ग्रालोचना करके प्रायश्चित्त किया । 


श्राविका पत्नी ने पारिणामिकी बुद्धि के द्वारा ही पति को नाराज किये बिना उसके ब्रत की 
रक्षा की । 


(९) प्रमात्य--बहुत काल पहले कापिल्यपुर मे ब्रह्म नामक राजा था । उसकी रानी का 
नाम चुलनी था। चुलनी रानी ने एक बार चत्रवत्ती के जन्म-सूचक चौदह स्वप्न देखे तथा यथा-समय 


न 


११० ] [सम्दीसूत्र 


एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया । उसका नाम ब्रह्मदत्त रखा गया । ब्रह्मदत्त के बचपन में ही राजा ब्रह्म 
का देहान्त हो गया भरत राज्य का भार ब्रह्मद्त के वयस्क होने तक के लिए राजा के मित्र दी्॑पृष्ठ 
को सौपा गया । दीर्घपृष्ठ अरित्रहीन था और रानी चुलनी भी । दोनो का अनुचित सम्बन्ध स्थापित 
हो गया । 


राजा ब्रह्म का धनु नामक मत्री राजा व राज्य का बहुत वफादार था। उसने बडी सावधानी 
पूंक राजकुमार ब्रह्मदत्त की देख-रेख की और उसके बडे होने पर दीघं॑पृष्ठ तथा रानी के अनुचित 
सम्बन्ध के विषय मे बता दिया । युवा राजकुमार ब्रह्मदत्त को माता के श्रनाचार पर बड़ा क्रोध 
ग्राया । उसने उन्हे चेतावनी देने का निश्चय किया । अ्रपने निश्चय के अनुसार वह पहली बार एक 
कोयल भ्रौर एक कौए को पकड़ लाया तथा भश्रन्त पुर मे माता के समक्ष आकर बोला--"इन पक्षियों 
के समान जो वर्णसकरत्व करेगे, उन्हे मै निश्चय हो दण्ड दूं गा ।” 


रानी पुत्र की बात सुनकर घबराई पर दीघंपृष्ठ ने उस समझा दिया--“यह तो बालक है, 
इसकी बात पर ध्यान देने की क्या जरूरत है ? ” 


दूसरी बार एक क्रेष्ठ हथिनी और एक निकृष्ट हाथी को साथ देखकर भी राजकुमार ने 
रानी एव दीघंपृष्ठ को लक्ष्य करते हुए व्यगात्मक भाषा में श्रपनी धमकी दोहराई । 

तीसरी बार वह एक हसिनी और बगुले को लाया तथा गम्भीर स्वर से कहा -“इस राज्य 
मे जो भी इनके सदृश प्राचरण करेगा उन्हे मैं मृत्यु दण्ड दूगा ।”” 


तीन बार इसी तरह की धमकी राजकुमार से सुनकर दीर्॑पृष्ठ के कान खडे हो गये । उसने 
सोचा--“'भ्रगर मै राजकुमार को नही मरवाऊंगा तो यह हमे मार डालेगा ।” यह सोचकर वह रानी 
से बोला--“प्रगर हमे श्रपना मार्ग निष्कटक बनाकर सदा सुखपूर्वक जीवन बिताना है तो राजकुमार 
का विवाह करके उसे पत्नी सहित एक लाक्षागृह मे भेजकर उसमे भ्राग लगा देना चाहिए ।” कामाध 
व्यक्ति क्या नही कर सकता | रानी माता होने पर भी पुत्र की हत्या के लिए तंयार हो गई । 


राजकुमार ब्रह्मदत्त का विवाह राजा पुृष्पचुल की कन्या से कर दिया गया तथा लाक्षागृह 
भी बड़ा सुन्दर बन गया । उधर जब मन्त्री धनु को सारे षड़्यन्त्र का पता चला तो वह दीघंपृष्ठ के 
समीप गया और बोला--“देव ! मै वृद्ध हो गया हु । अब काम करने की शक्ति भी नही रह गई है । 
ग्रत शेष जीवन मैं भगवद्‌-भजन मे व्यतीत करना चाहता हू । मेरा पुत्र वरधनु योग्य हो गया है, 
अब राज्य की सेवा वही करेगा ।' 

इस प्रकार दीध्ध॑पृष्ठ से श्राज्ञा लेकर मत्री धनु वहा से रवाना हो गया और गगा के किनारे 
एक दानशाला खोलकर दान देने लगा । पर इस काये की आड मे उसने श्रतिशीघ्रता से एक सुरग 
खुदवाई जो लाक्षागृह मे निकली थी । राजकुमार का विवाह तथा लाक्षागृह का निर्माण सम्पन्न होने 
तक सुरग भी तंयार हो चुकी थी । 


विवाह के पश्चात्‌ नवविवाहित ब्रह्मदत्त कुमार और दुल्हन को वरधनु के साथ लाक्षागृह मे 
पहुचाया गया, किन्तु अ्रध॑रात्रि के समय शभ्रचानक ग्राग लग गई और लाक्षागृह पिघलने लगा। यह 
देखकर कुमार ने घबराकर वरधन्‌ से पूछा-- “मित्र ' यह क्या हो रहा है ? प्राग कंसे लग गई ? 
तब वरधनु ने सक्षेप में दीघपृष्ठ ओर रानी के षड़यन्त्र के विषय मे बताया। साथ ही कहा-“भ्राप 


भतिज्ञान ] [१११ 


घबराएं नही, मेरे पिताजी ने इस लाक्षागह से गगा के किनारे तक सुरग बनवा रखी है झौर वहा 
घोडे तैयार बड़े हैं। वे श्रापको इच्छित स्थान तक पहुचा देंगे । शीक्र चलिए ! श्राप दोनों को सुरग 
द्वारा यहाँ से निकालकर मैं गगा के किनारे तक पहुचा देता हूँ ।” 


इस प्रकार भ्रमात्य धनु की पारिणामिकी बुद्धि द्वारा बनवाई हुई सुरग से राजकुमार ब्रह्मद्त 
सकुशल मौत के मु ह से निकल गये तथा कालान्तर में अपनी वीरता एव बुद्धिबल से पट्खड जीतकर 
चक्रवर्ती सम्राट बने । 


(१०) क्षपकू--एक बार तपस्वी मुनि भिक्षा के लिए अपने शिष्य के साथ गये । लौटते समय 
तपस्वी के पेर के नीचे एक मेढ़क दब गया । शिष्य ने यह देखा तो गुरु से शुद्धि के लिये कहा, किन्तु 
शिष्य की बात पर तपस्वी ने ध्यान नहीं दिया। सायकाल प्रतिक्रमण करने के समय पुन. शिष्य ने 
मेंढक के मरने की बात स्मरण कराते हुए गुरु से विनयपूर्वक प्रायश्चित्त लेने के लिए कहा । किन्तु 
तपस्थी श्राग बबूला हो उठा श्र शिष्य को मारने के लिए भपटा | म्ोंक मे वह तेजी से आगे बढा 
किन्तु अधकार होने के कारण शिष्य के पास तो नही पहुँच पाया, एक खभे से मस्तक के बल टकरा 
गया। सिर फूट गया और उसी क्षण वह मृत्यु का ग्रास बन गया । मरकर वह ज्योतिष्क देव हुआ । 
फिर वहाँ से च्यवकर दृष्टि-विष सर्प की योनि मे जन्मा । उस योनि में जातिस्मरण ज्ञान से उसे 
श्रपने पूर्व जन्मो का पता चला तो वह घोर पश्चात्ताप से भर गया ग्रौर फिर बिल मे ही रहने लगा, 
यह विचारकर कि मेरी दृष्टि के विष स किसी प्राणी का घात न हो जाय ! 


उन्ही दिनो समीप के राज्य मे एक राजकुमार सर्प के काटने पर मर गया। राजा ने दु ख 
और क्रोध मे भरकर कई सपेरो को बुलाया तथा राज्यभर के सर्पों को पकडकर मारने की श्राज्ञा दे 
दी । एक सपेरा उस दुष्टि-विष सर्प के बिन पर भी जा पहुँचा । उसने सर्प को बाहर निकालने के 
लिए कोई दवा बिल पर छिडक दी । दवा के प्रभाव से उसे निकलना ही था किन्तु यह सोचकर कि 
दृष्टि के कारण कोई व्यक्ति मर न जाए, उस सर्प ने पू छ के बल से निकलना प्रारभ किया । ज्यो-ज्यो 
वह निकलता गया सपेरे ने उसके शरीर के टुकडे-टुकड़े कर दिये। मरते समय भी सप्प ने किचित्‌ 
मात्र भो रोष न करते हुए पूर्ण समभाव रखा और उसके परिणामस्वरूप वह उसी राज्य के राजा 
के यहाँ पुत्र बन कर उत्पन्न हुआ । उसका नाम नागदत्त रखा गया । 


नागदत्त पूर्व॑जन्म के उत्तम सस्कार लेकर जन्मा था, अत वह बाल्यावस्था भे ही ससार से 
विरक्त हो गया और मुनि बन गया। भ्रपने विनय, सरलता, सेवा एवं क्षमा झ्रादि अ्रसाधारण गुणों 
से वह देवो के लिये भी वदनीय बन गया । भ्रन्य मुनि इसी कारण उससे ईर्ष्या करने लगे । पिछले 
जन्म में तिय॑च होने के कारण उसे भूख भश्रधिक लगती थी । इसी कारण वह प्रनशन तपस्या नही कर 
सकता था। एक उपवास करना भी उसके लिये कठिन था। एक दिन, जबकि भ्रन्य मुनियो के 
उपवास थे, नागदत्त भूख सहन न कर पाने के कारण अपने लिए श्राहार लेकर आया। विनयपूर्वक 
प्राह्र उसने प्रत्य मुनियो को दिखाया पर उन्होने उसे भमुखमरा कहकर तिरस्कृत करते हुए उस 
ग्राहार मे थूक दिया । नागदत्त मे इतना सम-भाव एव क्षमा का जबर्दस्त गुण था कि उसने तनिक भी 
रोष तो नहीं ही किया, उलटे भूखा न रह पाने के कारण अपनी निन्‍्दा तथा अन्य सभी की प्रशसा 
करता रहा । ऐसी उपशान्त वत्ति तथा परिणामों की विशुद्धता के कारण उसी समय उसे केवल- 
ज्ञान हो गया श्लौर देवता केवल्य-महोत्सव मनाने के लिये उपस्थित हुए । यह देखकर भ्रन्य तपस्वियो 


११२] [गस्वीसूच 


को अपने व्यवहार पर घोर पश्चात्ताप होने लगा। पश्चात्ताप के परिणामस्वरूप उनकी आत्माप्रो 
के निर्मल हो जाने से उन्हे भी केवलज्ञान उपलब्ध हो गया । 


विपरीत परिस्थितियों मे भी पूर्ण समता एवं क्षमा-भाव रखकर कंवल्य को प्राप्त कर लेना 
नागदत्त की पारिणामिको बुद्धि के कारण ही सभव हो सका | 


(११) अमात्य पुत्र-काम्पिल्यपुर के राजा का नाम ब्रह्म, मत्री का धनु, राजकुमार का 
ब्रह्मदत्त तथा मत्नी के पुत्र का नाम वरधनु था । ब्रह्म की मृत्यु हो जाने पर उसके मित्र दीघेपृष्ठ ने 
राज्यकाय सभाला किन्तु रानी चुलनी से उसका अनेतिक सम्बन्ध हो गया। राजकुमार ब्रह्मदत्त 
को जब यह ज्ञात हुआ तो उसने भ्रपनी माता तथा दीर्घपृष्ठ को मार डालने की धमको दी | इस पर 
दोनो ते कुमार को पश्रपने मार्ग का कटक समभकर उसका विवाह करने तथा विवाहोपरान्त पुत्र श्ौर 
पुत्रवध्‌ को लाक्षागृह मे जला देने का निश्चय किया । किन्तु ब्रह्मदत्त कुमार का वफादार मत्री 
घनु एवं उसके पुत्र वरघनु की सहायता से लाक्षागृह मे से निकल गया । वह वृत्तान्त पाठक पढ चुके 
हैं । तत्पश्चात्‌ जब वे जगल मे जा रहे थे, ब्रह्मदत्त को प्यास लगी । वरधनु राजकुमार को एक वक्ष 
के नीचे बिठाकर स्वय पानी लेने चला गया | 


इधर जब दीघेपृष्ठ को राजकुमार के लाक्षागृह से भाग निकलने का पता चला तो उसने 
कुमार और उसके मित्र वरधनु को खोजकर पकड लाने के लिये प्ननुचरो को दोडा दिया। सेवक 
दोनो को खोजते हुए जगल के सरोवर के उसी तीर पर पहुँचे जहाँ वरधनु राजकुमार के लिए पानी 
भर रहा था । कर्मचा रियो ने वरधनु को पकड लिया पर उसी समय वरघधन्‌ ने जोर से इस प्रकार 
शब्द किया कि कुमार ब्रह्मदत्त ने सकेत समझ लिया श्रौर वह उसी क्षण घोडे पर सवार होकर भाग 
निकला | 


सेवको ने वरघन्‌ से राजकुमार का पता पूछा, किन्तु उसने नहीं बताया। तब उन्होंने उसे 
मारना-पीटना प्रारम्भ कर दिया । इस पर चतुर वरधन्‌ इस प्रकार निश्चेष्ट होकर पड गया कि 
अनुचर उसे मृत समझकर छोड गये। उनके जाते ही वह उठ बंठा तथा राजकुमार को ढू ढने लगा । 
राजकुमार तो नही मिला पर रास्ते मे उसे सजीवन और निर्जीवन, दो प्रकार की औषधिया प्राप्त हो 
गईं जिन्हे लेकर वह नगर की ओर लौट आया । 


जब वह नगर के बाहर ही था, उसे एक चाडाल मिला, उसने बताया कि तुम्हारे परिवार 
के सभी व्यक्तियो को राजा ने बदी बना लिया है। यह सुनकर वरधनु ने चाडाल को इनाम का 
लालच देकर उसे “निर्जीवन' श्रीषधि दी तथा कुछ सममााया। चाडाल ने सहर्ष उसकी बात को 
स्वीकार कर लिया और किसी तरह वरघधनु के परिवार के पास जा पहुँचा । परिवार के मुखिया को 
उसने आषधि दे दी श्रोर वरधन्‌ की बात कही | वरधनु के कथनानुसार निर्जीवन श्रौषधि को पूरे 
परिवार ने अभ्रपनी झांखो मे लगा लिया । उसके प्रभाव से सभी मृतक के समान निश्चेष्ट होकर गिर 
पड़े । यह जानकर दीघ॑पृष्ठ ने उन्हे चाडाल को सौपकर कहा--/इन्हे श्मशान मे ले जाझ्रो ! ” 'भ्रन्धा 
क्‍या चाहे, दो श्राखे ।' चाडाल यही तो चाहता था । वह सभी को श्मशान मे वरधनु के द्वारा बताये 
गये स्थान पर रख भ्राया । वरधनु ने श्राकर उन सभी की श्रांखो मे 'सजीवन' श्रोषधि श्राज दी । 
क्षण-मात्र मे हो सब स्वस्थ होकर उठ बठे और वरधनु को ग्रपने समोप पाकर हित हुए । तत्पश्चात्‌ 
वरघधनु ने अपने परिवार को किसी सम्बधी के यहां सकुशल रखा और स्वय राजकुमार ब्रह्मदत्त को 


] [११३ 





जने निकल पडा | दूर जगल में उसे राजकुमार मिल गया भ्रौर दोनो मित्र साथ-साथ वहाँ से 
कपिले । मार्ग में श्रनेक राजाओं से युद्ध करके उन्हे जीता, श्रनेक कन्याग्रों से ब्रह्मदत्त का विवाह भी 
है हुआ । धीरे-धोरे छह खण्ड को जीतकर ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती काम्पिल्यपुर आए श्रौर दीघ॑पृष्ठ को मारकर 
चक्रवर्ती की ऋद्धि का उपभोग करते हुए सुख एवं ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतोत करने लगे । 


इस प्रकार मन्त्रीपुत्र वरधनु ने भ्रपनी कुटुम्ब की एवं ब्रह्म॑दत्त की रक्षा करते हुए ब्रह्मदत्त 
को चक्रवर्ती बनने मे सहायता देकर पारिणामिकी बुद्धि का प्रमाण दिया । 

(१२) चाणक्य--नन्द पाटलिपुत्र का राजा था। एक बार किसी कारण उसने चाणक्य 
नामक ब्राह्मण को अपने नगर से बाहर निकाल दिया। सनन्‍्यासी का वेश धारण करके चाणक्य 
घुमता-फिरता मौये देश मे जा पहुँचा । वहाँ पर एक दिन उसने देखा कि एक क्षत्रिय पुरुष अपने 
घर के बाहर उदास बेठा है । चाणक्य ने इसका कारण पूछ लिया। क्षत्रिय ने बताया--“'मेरी पत्नी 
गर्भवती है भ्रौर उसे चन्द्रपान करने की इच्छा है। मै इस इच्छा को पूरी नही कर सकता । प्नत वह 
अत्यधिक कृश होती जा रही है । डर है कि इस दोहद को लिए हुए वह मर न जाय ।” यह सुनकर 
चाणक्य ने उसकी पत्नी को इच्छा पूर्ण कर देने का भ्राश्वासन दिया। 


सोच विचारकर चाणक्य ने नगर के बाहर एक तबू लगवाया | उसमे ऊपर की तरफ एक 
चन्द्राकार छिद्र कर दिया। पूर्णिमा के दिन क्षत्राणी को किसी बहाने उसके पति के साथ वहाँ 
बुलवाया और तम्बू मे ऊपरी छिंद्र के नीचे एक थाली मे कोई पेय-पदार्थ डाल दिया। जब 
चन्द्र उस छेद के ठोक ऊपर श्राया तो उसका प्रतिबिम्ब थाली में भरे हुए पदार्थ पर पड़ने लगा । 
उसी समय चाणक्य ने उस स्त्री से कहा-- “बहन ! लो इस थाली मे चन्द्र है, इसे पी लो । क्षत्राणी 
प्रसन्न होकर उसे पीने लगी श्रौर ज्योहों उसने पेय-वस्तु समाप्त की चाणक्य ने रस्सी खीचकर उस 
छिद्र को बन्द कर दिया । स्त्री ने यही समभा कि मैंने “चन्द्र पी लिया है। चन्द्रपान की इच्छा 
पृर्ण हो जाने से वह शोध स्वस्थ हो गई तथा समय ग्राने पर उसने चन्द्र के समान ही एक श्रत्यन्त 
तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया । नाम उसका चन्द्रगुप्त रखा गया। चन्द्रगुप्त जब बडा हुआ तो उसने 
झपनी माता को “ न्द्र-पान' कराने बाले चाणक्य को अपना मन्त्री बना लिया तथा उसकी 
पारिणामिकी बुद्धि की सहायता से नन्‍्द को मारकर पाटलिपुत्र पर भ्रपना अधिकार कर लिया । 


(१३) स्थूलिभद्र-जिस समय पाटलिपुत्र मे राजा ननन्‍्द राज्य करता था, उसका मन्‍्त्री 
शकटार नामक एक चतुर पुरुष था । उसके स्थूलिभद्र एबं श्रियक नाम के दो पुत्र थे तथा यक्षा, 
यक्षदत्ता, भूता, भूतदत्ता, सेणा, वेणा भ्रौर रेणा नाम की सात पुत्रियाँ थी । सबको स्मरणशक्ति बडी 
तोब्र थी । अन्तर यही था कि सबसे बडी पुत्री यक्षा एक बार जिस बात को सुन लेती उसे ज्यो की 
त्यो याद कर लेती । दूसरी यक्षदत्ता दो बार सुनकर श्लौर इसी प्रकार बाकी कन्याएँ क्रमश तीन, 
चार, पाँच, छ श्रौर सात बार सुनकर किसी भी बात को याद करके सुना सकती थी । 

पाटलिपुत्र मे ही वररुचि नामक एक ब्राह्मण भी रहता था। वह बडा विद्वान था। प्रतिदिन 
एक सौ ग्राठ श्लोको की रचना करके राज-दरबार मे राजा नन्‍्द को स्तुति करता था। नन्द स्तुति 
सुनता और मन्त्री शकटार की शोर इस अभिप्राय से देखता था कि वह प्रशसा करे तो उसके अनुसार 
पुरस्कार-स्वरूप कुछ दिया जा सके। किन्तु शकटार मौन रहता श्रत राजा उसे कुछ नही देता 
था | वररुचि प्रतिदिन खाली हाथ लौटता था । घर पर उसकी पत्नी उससे कगडा किया करती थी 


११४] [ नस्वोसूत्र 


कि वह कुछ कमाकर नहीं लाता तो घर का खर्च कंसे चले ? प्रतिदिन पत्नी के उपालम्भ सुने- 
सुनकर वररुचि बहुत छिन्न हुआ भौर एक दिन शकटार के घर गया | शकटार की पत्नी ने उसके 
झाने का कारण पूछा तो वररुचि ने सारा हाल कह सुनाया और कहा--“मैं रोज नवीन एक सौ झ्राठ 
श्लोक बनाकर राजा की स्तुति करता हूँ किन्तु मनत्री के मौन रहने से राजा मुझे कुछ नही देते झौर 
घर मे पत्नी कलह किया करती है। कहती है-कुछ लाते तो हो नही फिर दिन भर कलम क्यो 
घिसते हो ?” 

इकटार की पत्नी बुद्धिमती और दयालु थी । उसने सायकाल शकटार से कहा--“स्वामी ! 
वररुखि प्रतिदिन एक सौ आरा6 नए श्लोको के द्वारा राजा की स्तुति करता है। कया वे श्लोक भ्रापको 
अच्छे नही लगते ? अच्छे लगते हो तो श्राप पंडित की सराहना क्यो नही करते ?” उत्तर मे मन्त्री 
ने कहा-- “वह मिथ्यात्वी है इसलिये ।' पत्नी ने पुन विनयपूर्वक श्राग्रह करते हुए कहा--प्रगर 
झ्रापके उसकी प्रशसा मे कहे गये दो बोल उस गरीब का भला करते है तो कहने मे हानि ही क्‍या 
है ?' शकटार चुप रह गया । 

प्रगले दित जब वह दरबार में गया तो वररुचि ने श्रपने नये श्लोको से राजा की स्तुति की । 
पत्नी की बात याद श्राने पर उसने मात्र इतना ही कहा -“उत्तम है ।” उसके कहने की देर थी कि 
राजा ने उसी समय एक सौ झ्राठ सुवर्ण-मुद्राएँ वररुचि को प्रदान कर दी। वररुचि हषित होता 
हुआ अपने घर भ्रा गया । उसके चले जाने पर मन्त्री राजा से बोला--“महाराज आपने उसे स्वर्ण- 
मुद्राएँ वृथा दी । वह तो पुराने व प्रचलित श्लोको से प्रापकी स्तुति कर जाता है ।” 

राजा ने आश्चय से कहा--“क्या प्रमाण है इसका कि वे श्लोक किसी के द्वारा पूर्वरचित 
है?” 

मत्री ने कहा--“मैं सत्य कह रहा हूँ । वह जो श्लोक सुनाता है वे सब तो मेरी लडकियों को 
भी कठस्थ है। भ्रापको विश्वास न हो तो कल ही दरबार मे प्रमाणित कर दू गा ।” 


चालाक मन्नी श्रगले दिन श्रपनी कन्याझ्रो को ले आ्राया और उन्हे परदे के पीछे बंठा दिया । 
समय पर वररुचि आया श्र उसने फिर अपने नवीन श्लोको से राजा की स्तुति की । किन्तु शकटार 
का इशारा पाते ही उसकी सबसे बडी कन्या आई और राजा के समक्ष उसने वररुचि के द्वारा सुनाये 
गये समस्त श्लोक ज्यो के त्यो सुना दिये। वह एक बार जो सुनती वही उसे याद हो जाता था । 
राजा ने यह देखकर क्रोधित होकर बररुचि को राजदरबार से निकाल दिया । 


वररुचि राजा के व्यवहार से बहुत परेशान हुआ । शकटार से बदला लेने का विचार करते 
हुए लकड़ी का एक तख्ता गगा के किनारे ले गया । श्राधे तछ्ते को उसने जल मे डालकर मोहरो की 
थेली उस पर रख दी और जल से बाहर वाले भाग पर स्वय बैठकर गयगा की स्तुति करने लगा। 
स्तुति पूर्ण होने पर ज्योही उसने तख्ते को दबाया, अ्रगला मोहरों वाला हिस्सा ऊपर उठ श्राया । 
इन पर वररुचि ने लोगो को वह थेली दिखाते हुए कहा-“राजा मुझे इनाम नहीं देता तो क्‍या 
हुआ, गगा तो प्रसन्न होकर देती है | ” 


गगा माता को वररुचि पर कृपा करने की बात सारे नगर मे फैल गईं और राजा के कानो 
तक भी जा पहुँची । राजा ने शकटार से इस विषय मे पूछा तो उसने कह दिया--“महाराज ! सुनी 


मतिशान ] [११५ 


सुनाई बातो पर विश्वास न करके प्रात काल हमे स्वय वहाँ चलकर आआाँखो से देखना चाहिये ।'' राजा 
मान गया । घर भ्राकर शकटार ने श्रपने एक सेवक को श्रादेश दिया कि तुम रात को गगा के किनारे 
छिपकर बेठ जाना श्र जब वररुचि मोहरो की थेली पानी मे रखकर चला जाए तो उसे निकाल 
लाना । सेवक ने ऐसा ही किया और थैली लाकर मत्री को सौप दी । 


भ्रगले दिन सुबह वररुचि आया भ्रौर सदा की तरह तख्ते पर बंठकर गगा की स्तुति करने 
लगा । इतने मे ही राजा और मत्री भी वहाँ झा गए । स्तुति समाप्त हुई पर तख्ते को दबाने पर भी 
जब थेली ऊपर नही श्राई, कोरा तख्ता ही दिखाई दिया तब शकटार ने व्यगपूर्वक कहा--“पडित- 
प्रवर ! रात को गगा में छपाई हुई श्रापकी थैली तो इधर मेरे पास है ।” यह कहकर शकटार ने 
सब उपस्थित लोगो को थैली दिखाते हुए वररुचि की पोल खोल दी | बररुचि कटकर रह गया। 
वह मत्री से बदला लेने का अवसर देखने लगा । 

कुछ समय पश्चात्‌ शकटार ने अपने पुत्र श्रियक का विवाह रचाया और राजा को उस खुशी 
के मौके पर भेट देने के लिये उत्तम शस्त्रास्त्र बनवाने लगा। वररुचि को मौका मिला और उसने 
अपने कुछ शिष्यो को निम्न श्लाक याद करके नगर मे उसका प्रचार करवा दिया--- 


“व न विजाणेइ लोझो, ज सकडालो करिस्सइ । 
न्दराउ मारेवि करि, सिरियंउ रज्जे ठवेस्सह ॥। 
प्र्थात्‌- लोग नही जानते कि शकटार मत्री क्या करेगा ? वह राजा नन्द को मारकर 
श्रियक को राज-सिंहासन पर श्रासीन करेगा । 
राजा ने भी यह बात सुनी | उसने शकटार के षड्यन्त्र को सच मान लिया। मत्री जब 
दरबार मे श्राया और राजा प्रणाम करने लगा तो राजा ने कुपित होकर मु ह फेर लिया | राजा के 
इस व्यवहार से शकटार भयभीत हो गया । और घर श्राकर सब बताते हुए श्रियक से बोला-- 


“बेटा ! राजा का भयकर कोप सम्पूर्ण वश का भी नाश कर सकता है| अभ्रतएव कल जब , 
मैं राजसभा में जाऊ श्रौर राजा फिर मुह फेर ले तो तुम मेरे गले पर उसी समय तलवार चला देना । 
मैं उस समय तालपुट विष श्रपने मुंह मे रख रूगा। मेरी भृत्यु उस विष से हो जाएगी, तुम्हे 
पितृहत्या का पाप नहीं लगेगा ।/ श्रियक ने विवश होकर पिता की बात मान ली । 


अगले दिन शकटार श्रियक सहित दरबार मे गया । जब वह राजा को प्रणाम करने लगा तो 
राजा ने पुन मुह फेर लिया । इस पर श्रियक ने उसी भुकी हुई ग्देन को धड से अलग कर दिया । 
यह देखकर राजा ने चकित होकर कहा - “श्रियक, यह क्या कर दिया ?” श्रियक ने श्ञाति से उत्तर 
दिया- -“देव ! जो व्यक्ति श्रापको अच्छा न लगे वह हमे कंसे इष्ट हो सकता है ?” शकटठार की 
मृत्यु से राजा खिन्न हुआ, किन्तु श्रियक को वफादारी भरे उत्तर से सतुष्ट भी। उसने कहा -- 
“श्रियक ! अपने पिता के मत्री पद को अरब ॒तुम्ही सभालो । इस पर श्रियक ने विनयपूर्बक उत्तर 
दिया--“प्रभो | मै मत्री का पद नही ले सकता । मेरे बडे भाई स्थलिभद्ग, जो बारह वर्ष से कोशा 
गणिका के यहाँ रह रहे है, पिताजी के बाद इस पद के अधिकारी हैं।' श्रियक की यह बात सुनकर 
राजा ने उसी समय कर्मचारी को आदेश दिया कि स्थूलिभद्र को कोशा के यहाँ से ससम्मान ले 
आग्रो । उसे मन्त्रिपद दिया जायगा । 


११६] [गस्दासूत्र 


राज-सेवक कोझा के यहाँ गये भौर स्थूलिभद्र को सारा वृत्तान्त सुनाते हुए बोले--“प्राप 
राजसभा मे पधारे, महाराज ने बुलाया है।” स्थूलिभद्र उनके साथ दरबार मे श्राया। राजा ने 
झ्रासन की ओर इगित करते हुए कहा--“तुम्हारे पिता का निधन हो गया है। झब तुम मत्रिपद को 
सम्हालो ।' 


स्थूलिभद्र को राजा के प्रस्ताव से तनिक भी प्रसन्नता नही हुई | वह पिता के वियोग से दु खी 
था हो, साथ ही पिता की मृत्यु मे राजा को ही कारण जानकर श्रत्यधिक खिन्न भी था। वह भली- 
भाँति समझ गया था कि राजा का कोई भरोसा नहीं | झ्राज वह जिस मत्रिपद को सहष प्रदान 
कर रहा है, उसे कल कुपित होकर छीन भी सकता है। श्रत ऐसे पद व धन के प्राप्त करने 
से क्‍या लाभ ' 


इस प्रकार विचार करते-करते स्थूलिभद्र को विरक्ति हो गई | वह राज-दरबार से उलटे 
पेरो लौट आ्राया और आराचार्य सम्भूतिविजय के समक्ष जाकर उनका शिष्य बन गया। स्थूलिभद्गर के 
मुनि बन जाने पर राजा ने श्रियक को अपना मत्री बनाया । 


स्थुलिभद्र मुनि अपने गुरु के साथ ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए सयम का पालन करते रहे 
तथा ज्ञान-ध्यान मे रत बने रहे । एक बार भ्रमण करते हुए वे पाटलिपुत्र के समीप पहुँचे तथा 
चातुर्मासकाल निकट होने से गुरुदेव ने वही वर्षावास करने का निश्चय किया । उनके स्थूलिभद्र सहित 
चार शिष्य थे। चारो ने ही उस बार भिन्न-भिन्न स्थानों पर वर्षाकाल बिताने की गुरु से श्राज्ञा ले 
ली । एक ने सिह की ग्रुफा मे, दूसरे ने भयानक सर्प के बिल पर, तीसरे ने एक कुए के किनारे पर 
तथा चोथे स्थूलिभद्र ने कोशा वेश्या के घर पर । चारो ही भ्रपने-अ्रपने स्थानों पर चले गये । 

कोशा वेश्या स्थलिभद्र मुनि को देखकर अत्यत प्रसन्न हुई श्रौर विचार करने लगी कि पूर्व 
के समान ही भोग-विलास मे समय व्यतीत हो सकेगा । स्थूलिभद्र की इच्छानुसार कोशा ने अ्रपनी 
चित्रशाला मे उन्हे ठहरा दिया । वह नित्य भाति-भाति के ज्यू गार तथा हाव-भावादि के द्वारा उन्हे 
भोगों की श्रोर आकर्षित करने का प्रयत्न करने लगी, किन्तु स्थूलिभद्र अरब पहले वाल स्थूलिभद्र 
नही थे । वह तो प्रारभ मे मधुर, आकर्षक और प्रिय लगने वाले किन्तु बाद मे असहनीय पीडा प्रदान 
करने वाले किपाक फल के सदुश काम-भोगो को त्याग चुके थे । ग्रत किस प्रकार उनमे पुन लिप्त 
होकर आत्मा को पतन की ओर श्रग्नसर करते ? कहा भी है - 

“विषयासक्तचित्तो हिं यतिमोक्ष न विदति 

“जिसका चित्त साधु-वेश धारण करने के पश्चात्‌ भी विषयासक्त रहता है, ऐसी भ्रात्मा मोक्ष 
की प्राप्ति नही कर सकती । 

कोशा के लाख प्रयत्न करने पर भी उनका मन विचलित नही हुआा। पूर्ण निविकार 
भाव से वह भ्रपनी साधना मे रत रहे । स्थूलिभद्र का शात एवं विकार-रहित मुख देखकर कोशा की 
भोग-लालसा ठीक उसी प्रकार शात हो गई ज॑से भ्रग्नि पर छीतल जल गिरने से वह शात हो जाती 
है। के स्थूलिभद्र ने यह देखा तो कोशा को प्रतिबोधित किया। उसने श्रावक के ब्रत ग्रहण 
कर लिये । 


चातुर्मास की समाप्ति पर चारो शिष्य गुरु की सेवा मे पहुँचे । गुरुजी ने सिह की गुफा 


मतिशान ] [११७ 


में, सप के बिल तथा कुए के किनारे पर वर्षावास बिताने वाले तीनो शिष्यों की प्रशसा करते हुए 
कहा --'तुमने दुष्कर कार्य किया । किन्तु जब मुनि स्थूलिभद्र ने श्रपना मस्तक गुरु के चरणों मे 
भुंकाया तो उन्होने कहा -- तुमने प्रतिदृष्कर कार्य किया है ।' स्थलिभद्र के लिए गुरु के द्वारा ऐसा 
कहे जाने से भ्रन्य शिष्यो के हृदय में ईर्ष्याभाव उत्पन्न हो गया। वे स्वय को स्थूलिभद्र के समान 
साबित करने का भ्रवसर देखने लगे । 


प्रगला चातुर्मास ग्राते ही अवसर मिल गया । सिंह की गुफा मे चातुर्मास करने वाले शिष्य 
ने इस बार कोशा वेश्या की चित्रशाला मे वर्षाकाल बिताने की गआराज्ञा माँगी | ग्रुरु ने उसे श्राज्ञा 
नही दी पर वह बिना गआराज्ञा के ही कोशा के निवास की ओर चल दिया । कोशा ने उसे श्रपनी रग- 
शाला मे चातुर्मास व्यतीत करने की अनुमति दे दी । किन्तु मुनि तो उसका रूप-लावण्य देखकर ही 
अपनी तपस्था व साधना को भूल गया और उससे प्रेम-निवेदन करने लगा। यह देखकर कोदा को 
बहुत दुख हुआ्आा किन्तु उसने मुनि को सन्मार्ग पर लाने के लिए उपाय खोज निकाला । मुनि से कहा-- 
“मुनिराज | पहले मुझे एक लाख मोहरे दो ।' भिक्षु यह माग सुनकर चकराया और बोला-भिक्षु 
हैं, मेरे पास तो फूटी कोडी भी नहों है ।” कोशा ने तब कहा- “नेपाल-नरेश प्रत्येक साधु को एक-एक 
रत्न-कबल प्रदान करता है जिसका मूल्य एक लाख मोहरे होता है | तुम वहाँ जाकर राजा से कबल 
माँग लाओो और मुर्के दो । 


काम के वशीभूम हुआझा व्यक्ति क्‍या नहीं करता ? मुनि भी अपनी सयम-साधना को एक 
श्रोर रखकर रत्न-कबल लाने चल दिया। मार्ग में अ्रनेक कष्ट सहता हुझ्ना वह ज॑से-तैसे नेपाल 
पहुँचा और वहाँ के राजा से एक कबल मॉगकर लौटा। किन्तु मार्ग मे चोरो ने उसका कबल छीन 
लिया और वह रोता-कीकता वापिस नेपाल गया । राजा से श्रपनी रामकहानी कहकर बडी कठिनाई 
से उसने दूसरा कबल लिया और उसे एक बॉस में छिपाकर पुन लौटा। मार्ग में लुटेरे फिर भिले 
किन्तु बॉस की लकड़ी में छिपे रत्न-कबल को वे नहीं पा सके और चले गये । इसके बाद भी भूख- 
प्यास तथा श्रनेक शारीरिक कष्टो को सहता हुआ मुनि किसी तरह पाटलिपुत्र लौटा और कोशा को 
उसने रत्न-कबल दिया । किन्तु कोशा ने वह अतिमूल्यवान्‌ रत्नकबल दुर्गन्‍्धमय भअ्रशुचि स्थान पर फेक 
दिया । मुनि ने हडबडाकर कहा-- “यह क्‍या किया ? मैं तो श्रनेकानेक कष्ट सहकर इतनी दूर से 
इसे लाया भौर तुमने यो ही फंक दिया ? ” 


कोशा ने उत्तर दिया--“मुनिराज ! यह सब मैने तुम्हे पुन सन्‍्मार्ग मे लाने के लिये किया 
है। रत्न-कबल मूल्यवान्‌ है पर सीमित मूल्य का, किन्तु तुम्हारा सयम तो ग्रनमोल है । सारे ससार 
का वेभव भी इसकी तुलना मे नगण्य है। ऐसे सयम-धन को तुम काम-भोग रूपी कीचड मे डालकर 
मलिन करने जा रहे हो ” जरा विचार करो, जिन विषय-भोगो को तुमने विष मानकर त्याग दिया 
था, क्‍या भ्रब वमन किये हुए भोगो को पुन ग्रहण करोगे ? ” 


कोशा की बात सुनकर मुनि की श्राखे खुल गई। घोर पश्चात्ताप करता हुश्रा वह 
कहने लगा--- 
“स्थूुलिभद्रः स्थुलिभद्र: स एको5खिरूसाधुषु । 
युक्त वुष्कर-दुष्करकारको गुरुणा जगे।।* 


११८५) [ नम्दोसूतच 
“वस्तुत सम्पूर्ण साधु में स्थूलिभद्र मुनि ही दुष्कर-दुष्कर क्रिया करनेवाले ग्रद्वितीय हैं । 
गुरुदेव ने उसके लिए जो 'दुष्करातिदुष्कर-कारक' शब्द कहे थे वे यथार्थ हैं । 


यही सोचता हुश्रा मुनि गुरु के समीप आया झोर झपने पतन के लिये पश्चात्ताप करते हुए 
प्रायश्चित्त लिया । भ्पनी आलोचना करते हुए उसने पुन पुन स्थूलिभद्र की प्रशसा की और कहा-- 


“बेदया रागबती सदा तदनुगा घड़भी रसंसोजन । 
शुध्र धाम मनोहर वपुरहो ! नव्यों बयःसगस: ।। 
कालोध्यं जलवाबविलस्तदपि यः, कासमजिगायादरात । 
तवंदे युवतिप्रबोधकुशल, श्रोस्थुलभद्र' मुनिम्‌ ॥ 


अर्थात्‌-- प्रेम करने बाली तथा उसमे अनुरक्त वेश्या, घट्रस भोजन, मनोहारी महल, सुन्दर 
शरीर, तरुणावस्था और वर्षाकाल, इन सब अनुक्लताश् के होते हुए भी जिसने कामदेव को जीत 


लिया, ऐसे वेश्या की प्रतिबोध देकर धर्म मार्ग पर लाने वाले मुनि स्थूलिभद्र को मैं प्रणाम 
करता हूँ । 


वास्तव में झपनी पारिणामिको बुद्धि के कारण मत्रिपद और उसके द्वारा प्राप्त भोग के 
साधन धन-वेभव को ठकराकर आत्म-कल्याण कर लेने वाले स्थलिभद्र प्रशसा के पात्र है । 

(१४) नासिकपुर का सुन्दरोनन्द- नासिकपुर के नन्‍न्द नामक सेठ की सुन्दरी नाम की 
प्रत्यन्त रूपवती स्त्री थी। सेठ उसमे इतना अनुरक्त था कि पल भर के लिये भो उसे श्रपने नेत्रो से 


ग्रोफल नही करता था । सुन्दरी पत्नी में इतनी अ्नुरक्षि देखकर लोग उसे सुन्दरीनन्द ही कहा 
करते थे । 


सुन्दरीनन्द सेठ का एक छीटा भाई मुनि बन गया था। उसे जब ज्ञात हुआ कि स्त्री में 
अनुरक्त मेरा बडा भाई प्रपता भान भूल बेठा है तो वह उसे प्रतिबोध देने के विचार से नासिकपुर 
आया । जनता को मुनि के आगमन का पता चला तो वह धर्मोपदेश श्रवण करने के लिए गई किन्तु 
सुन्दरीनन्द वहाँ नहीं गया । प्रवचन के पश्चात्‌ मुनि ने झ्राहार की गवेषणा करते हुए सुन्दरीनन्द के 
घर मे भी प्रवेश किया | अपने भाई की स्थिति देखकर मुनि के मन में विचार प्राया--जब तक इसे 
प्रधिक प्रलोभन नहीं मिलेगा, इसकी पत्नी-प्रासक्ति कम नहीं होगी। उन्होंने एक सुन्दर वानरी 
अपनो वैक्रियलब्धि के द्वारा बनाई और सेठ से पूछा- "क्या यह सुन्दरी जंसी है ? सेठ ने कहा-- 
“यह सुन्दरी से आ्राधी सुन्दर है । मुनि ने फिर एक विद्याधरी बनाई झ्ौर सेठ से पूछा--“तुम्हे कंसी 
लगी ? ” सेठ ने उत्तर दिया--“यह सुन्दरी ज॑ंसी है । तीसरी बार मुनि ने देवी की थिकुर्बेणा की 
और भाई से प्‌न, वही प्रश्न किया । इस बार सेठ ने उत्तर दिया--“यह तो सुन्दरी से भो भ्रधिक 
सुन्दर है । इस पर सुनि ने कहा--'भ्रगर तुम थोडा भी धर्माचार करो तो ऐसी अनेक सुन्दरियों 
तुम्हे सहज हो प्राप्त हो सकती हैं ।” मुनि के इन प्रतिबोधपूर्ण वचनों को सुतने से सेठ की समझ में 
आ गया कि मुनि का उद्द श्य क्या है? उसी क्षणसे उसकी ग्रासक्ति पत्नी मे कम हो गई और 
कुछ समय पश्चात्‌ उसने भी सयम की आराधना करके आत्म-कल्याण किया । यह सब मुनि ने अ्रपनी 
पारिणामिकी बुद्धि के ह्वारा सभव बनाया । 


(१५) बज्यस्थामो- अवन्ती देश मे तुम्बबन सन्निवेश था | वहाँ धनगिरि नामक एक श्रेष्ठि- 


सतिज्ञान ] [११९ 
पुत्र रहता था । धनगिरि का विवाह धनपाल सेठ की पुत्री सुनन्दा से हुआ था । विवाह के पश्चात्‌ ही 
धनगिरि की इच्छा सथम ग्रहण करने को हो गई किन्तु सुनन्‍्दा ने किसी प्रकार रोक लिया। कुछ 
समय पश्चात्‌ ही देवलोक से च्यवकर एक पुण्यवान्‌ जोव सुतन्दा के गर्भ मे आया। पत्नी को 
गर्भवती जानकर धनगिरि ने कहा-- तुम्हारे जो पुत्र होगा उसके सहारे ही जीवनयापन करना, मै 
ग्रब दीक्षा ग्रहण करूगा ।” पति को उत्कट इच्छा के कारण सुनन्दा को स्वीकृति देनी पड़ी । 
धनगिरि ने भ्राचाय सिहगिरि के पास जाकर मुनिवृत्ति धारण कर ली । सुनन्दा के भाई आ्रार्ययमित 
भो पहले से ही सिहगिरि के पास दीक्षित थे । सत-मडली ग्रामानुग्राम विचरण करने लगी । 


इधर नौ मास पूरे होने पर सुनन्दा ने एक पुण्यवान्‌ पुत्र को जन्म दिया । जिस समय उसका 
जन्मोत्सव मनाया जा रहा था, किसी स्त्री ने करुणा से भरकर कहा- “इस बच्चे का पिता श्रगर 
मुनि न होकर भ्राज यहाँ होता तो कितना श्रच्छा लगता ? बच्चे के कानो मे यह बात गई तो उसे 
जातिस्मरण हो गया और वह विचार करने लगा--'मेरे पिताजी ने तो मुक्ति का मार्ग अपना ही 
लिया है, प्रब मुझे भी कुछ ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे मै ससार से मुक्त हो सक तथा मेरी 
माँ भी सासारिक बधनों से छुटकारा पा सके | यह विचार कर उस बालक ने दिन-रात रोना 
प्रारभ कर दिया । उसका रोना बद करने के लिए उसकी माता तथा सभी स्वजनो ने प्रनेक प्रयत्न 
किये पर सफलता नही मिली । सुनन्दा बहुत ही परेशान हुई । 


सयोगवश उन्ही दिनो आचाये सिहगिरि अपने शिष्यो सहित पुन तुम्बवन पधारे। श्राहार 
का समय होने पर मुनि आयंसमित तथा धनगिरि नगर की श्रोर जाने लगे। उसी समय शुभ शकुनों 
के ग्राधार पर आचार्य ने उनसे कह दिया--“ग्राज तुम्हे महान लाभ प्राप्त होगा, भ्रत जो कुछ भी 
भिक्षा मे मिले, ले आना ।” गुरु की आज्ञा स्वीकार कर दोनो मुनि शहर की ओर चल दिये । 


जिस समय मुनि सुनन्दा के घर पहुंचे, वह अपने रोते हुए शिशु को चुप करने के लिये प्रयत्न 
कर रही थी । मुनि धनगिरि ने फोली खोलकर ग्राहार लेने के लिए पात्र बाहर रखा। सुनन्दा के 
मन में एकाएक न जाने क्‍या विचार आया कि उसने बालक को पात्र में डाल दिया और कहा-- 
“महाराज | अपने बच्चे को श्राप हो सम्हाले ।” प्रनेक स्त्री-पुरुषो के सामने मुनि धनगिरि ने बालक 
को ग्रहण किया तथा बिना कुछ कहे कोली उठाकर मथर गति से चल दिये। प्राश्चय सभी को इस 
बात का हुआ कि बालक ने भी रोना बिल्कुल बद कर दिया था । 


आचार्य सिहगिरि के समक्ष जब वे पहुँचे तो उन्होंने झोली को भारी देखकर पूछा--'यह 
वज्च्र जेसी भारी वस्तु क्या लाये हो ?” धनगिरि ने बालक सहित पात्र गुरु के आगे रख दिया ।। गुरु 
पात्र मे तेजस्वी शिशु को देखकर चकित भो हुए श्रौर हृषित भी । उन्होने यह कहते हुए कि यह बालक 
झ्रागे चलकर शासन का आधारभूत बनेगा, उसका नाम वज्ञ' ही रख दिया । बच्चा छोटा था अतः 
उन्होने उसके पालन-पोषण का भार सघ को सौप दिया | शिशु वज् चन्द्रमा की कलाओ्रो के समान 
तेजोमय बनता हुश्ना दिन-प्रतिदिन बडा होने लगा। कुछ समय बाद सुनन्दा ने सघ से भ्रपना पुत्र वापिस 
माँगा किन्तु सघ ने उसे 'भ्रन्य की भ्रमानतः कहकर देने से इल्कार कर दिया । मन मारकर सुनन्दा 
वापिस लौट श्राई और अ्रवसर की प्रतीक्षा करने लगी । बह भ्रवसर उसे तब प्राप्त हुआ्ला, तब आचार्य 
सिहगिरि विचरण करते हुए अपने शिष्य-समुदाय सहित पुन ॒तुम्बवन पधारे। सुनन्‍्दा ने श्राचार्य 
के श्रागमन का समाचार सुनते ही उनके पास जाकर श्रपना पुत्र माँगा किन्तु झ्ाचार्य के न देने पर 


१२० ] [भन्‍्दीसूतच 


बह दुखो होकर वहाँ के राजा के पास पहुँची । राजा ने सारी बात सुनी भ्रौर सोच-विचा रकर कहा-- 
'एक ओर बच्चे की माता को बेठाया जाय तथा दूसरी ओर उसके मुनि बन चुके पिता को । बच्चा 
दोनों में से जिसके पास चला जाय, उसी के पास रहेगा ।' 


भ्रगले दिन ही राजसभा मे यह प्रबंध किया गया । वज्य की माता सुनन्‍्दा बच्चो को लुभाने 
वाले आकर्षक खिलौने तथा खाने-पीने की भ्रनेक वस्तुएँ लेकर एक ओर बंठो तथा राजसभा के मध्य 
में बेठे हुए अपने पुत्र को श्रपनी ओर झाने का सकेत करने लगो । किन्तु बालक ने सोचा--“भ्रगर 
मैं माता के पास नहीं जाऊगा तो यह मोहरहित होकर आत्म-कल्याण मे जुट जाएगी | इससे हम 
दोनो का कल्याण होगा । यह विचारकर बालक ने न तो माता के समक्ष रखे हुए उत्तमोत्तम पदार्थों 
की श्रोर देखा ध्लौर न ही वहा से इच मात्र भी हिला । 


भ्रब बारी श्राई उसके पिता मुनि घनगिरि की । मुनि ने बच्चे को सबोधित करते हुए कहा-- 


“जइसि कयज्ञवसाशो, धम्सज्ञयसृसिभ इसमं बहर ' 
गिण्ठु लह रगहरण, फम्म-रमपमज्जण घीर |” 


प्र्थात्‌ हे वत्न अगर तुमने निश्चय कर लिया है तो धर्माचरण के चिह्नभूत और कर्मरज 
को प्रमाजित करने वाले इस रजोहरण को ग्रहण करो । 


ये शब्द सुनने की ही देर थी कि बालक ने तुरन्त अपने पिता की श्रोर जाकर रजोहरण 
उठा लिया । 


यह देखकर राजा ने बालक श्राचायं सिहशिरि को सौंप दिया श्रौर उन्होंने उसी समय राजा 
एवं सघ की श्राज्ञा प्राप्त कर उसे दीक्षा प्रदान कर दी । 


सुनन्दा ने विचारा--जब मेरे पति, पुन्न एव भाई सभी सासारिक बधनो को तोड़कर 
दीक्षित हो गए हैं तो मैं ही श्रकेली घर में रहकर क्या करू गी ?” बस, वह भी सयम लेने के लिये 
तेयार हो गई श्रौर आत्मकल्याण के मार्ग पर श्रग्नसर हुई । 


श्राचायं सिहगिरि ने भ्रन्यत्र विहार कर दिया। वज्ञमुनि बडा मेघावी था। जिस समय 
आ्राचार्य अन्य मुनियों को वाचना देते, वह एकाग्र एवं दत्तचित्त होकर सुनता रहता । मात्र सुन- 
सुनकर ही उसने ग्या रह अगो का ज्ञान प्राप्त कर लिया और क्रमश पूर्वो का भी ज्ञान प्राप्त किया । 


एक वार प्राचाय उपाश्रय से बाहर गए हुए थे । ग्रन्य मुनि भ्राह्यार के लिये निकल गये थे । 
तब वष्जमुनि ने, जो उस समय भो बालक ही थे, खेल-खेल मे ही सतो के वस्त्र एवं पात्रादि को पक्ति- 
बद्ध रखा और स्वय उन के मध्य में बेठ गये। तत्पश्चात्‌ उन बस्त्र-पात्रों को ही अपने शिष्य 
मानकर वाचना देना प्रारभ कर दिया । जब प्राचार्य बाहर से लौटे तो दूर से ही उन्हें बचना देने 
की ध्वनि सुनाई दी । वे वही रुककर सुनने लगे । उन्होने वज्ञमुनि की आवाज पहचानी और उनको 
वाचना देने की शेली और ज्ञान को समभा । सभी कुछ देखकर वे घोर ग्राश्चर्य में पड गये कि इतने 
छोटे से बालक मुनि को इतना ज्ञान कंसे हो गया ? और बाचना देने का इतना सुन्दर ढग भी किस 
प्रकार आया ? उसकी प्रतिभा के कायल होते हुए उन्होंने उपाश्रय मे प्रवेश किया। श्राचायं को 
देखते ही वज्लसुनि ने उठकर उनके चरणों में विनयपूर्बक नमस्कार किया तथा समस्त उपकरणों 


सतिशात ] [१२१ 


को यथास्थान रख दिया । इसी बीच प्रन्य मुनि भी भ्र। गए तथा ग्राहारादि ग्रहण करके अपने-भपने 
कार्यों में व्यस्त हो गये । 


इसके भ्रनन्तर आचार्य सिंहगिरि कुछ समय के लिए भ्रन्यत्र बिहार कर गये और वज्रमुनि को 
वाचना देने का कार्य सौप गये । बालक वज्ञमुनि आगमों के सूक्ष्म से सूक्ष्म रहस्य को इस सहजता से 
समझाने लगे कि मन्दबुद्धि मुनि भी उसे हृदयगम करने लगे । यहाँ तक कि. उन्हें पूर्व प्राप्त ज्ञान मे 
जो शकाएँ थी, वज्जमुनि ने शास्त्रों की विस्तृत व्याख्या के द्वारा उनका भी समाधान कर दिया । सभी 
सा के हृदय मे वज्ञमुनि के प्रति अ्रसीम श्रद्धा उत्पन्न हो गई और वे विनयपूर्वक उनसे वाचना 

ते रहे । 

आ्राचायं पुत लौटे तथा मुनियो से बज्ञमुनि की वाचना के विषय मे पूछा । मुनियो ने पूर्ण 
सन्तोष व्यक्त करते हुए उत्तर दिया- “गुरुदेव | वज्ञमुनि सम्यक्‌ प्रकार से हमे वाचना दे रहे है, 
कृपया सदा के लिए यह काये इन्हे सौप दीजिए ।” आचार्य यह सुनकर श्रत्यन्त सन्तुष्ट एवं प्रसन्न हुए 
ग्रोर बोले--'वज्रमुनि के प्रति श्राप सबका स्नेह व सद्भाव जानकर मुझ सन्‍्तोष हुआ । मैने इनकी 
योग्यता तथा कुशलता का परिचय देने के लिये ही इन्हे यह कार्य सौपकर विहार किया था ।* 
नत्पश्चात्‌ यह सोचकर कि गुरुमुख से ग्रहण किये बिना कोई वाचनागुरु नहीं बन सकता, श्राचार्य ने 
श्रुतधर वज्ञमुनि को अपना ज्ञान स्वय प्रदान किया । 

ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए एक समय आचार्य अपने सन्त समुदाय सहित दशपुर नगर मे 
पघारे । उन्हीं दिनो अवन्ती नगरी मे आचार्य भद्रगुप्त वृद्धावस्था के कारण स्थिरवास कर रहे थे । 
सिहगिरि ने श्रपने दो ग्रन्य शिष्यो के साथ वज्वमुनि को उनकी सेवा में भेज दिया । वज्ञमुनि ने 
श्राचार्य भद्गगुप्त की सेवा मे रहकर उनसे दस पूर्वों का ज्ञान प्राप्त किया । उसके बाद ही प्राचार्य 
सिहगिरि देवलोकवासी हुए किन्तु उससे पहले उन्होने वत्यमुनि को ग्राचायंपद प्रदान कर दिया । 


अ्रब ग्राचार्य वद्भमुनि विचरण करते हुए स्व-परकल्याण में रत हो गये | उसने तेजस्वी 
स्वरूप, अथाह शास्त्रीय ज्ञान, अनेक लब्धियों श्लौर इसी प्रकार की अन्य विशेषताश्रों ने सबे दिशाश्रो 
में उनके प्रभाव को फंला दिया और असख्य भटकी हुई प्रात्माप्नो ते उनसे प्रतिबोध प्राप्तकर भ्रात्म- 
कल्याण किया । 

वज्ञमुनि ने भ्रपनी पारिणामिकी बुद्धि के द्वारा ही माता के मोह को दूर करके उसे मुक्ति 
के मार्ग पर लगाया तथा स्वय भी सयम ग्रहण करके अपना तथा श्रनेकानेक भव्य प्राणियों का 
उद्धार किया । 


(१६) चरणाहुत- किसी नगर मे एक युवा राजा राज्य करता था। उसकी अप रिपक्व 
अवस्था का लाभ उठाने के लिये कुछ युवकों ने आकर उसे सलाह दी--“महाराज ! श्राप तरुण है 
तो श्रापका कार्य-सचालन करने के लिए भी तरुण ब्यक्ति ही होने चाहिए । ऐसे व्यक्ति ग्रपनी शक्ति 
व योग्यता से कुशलतापूर्वक राज्य-कार्य करेंगे। वृद्धजन अशक्त होने के कारण किसी भी कार्य को 
ठोक प्रकार से नही कर सकते । 

राजा यद्यपि नवयुवक था, किन्तु अत्यन्त बुद्धिमानू था। उसने उन युवकों की परीक्षा लेने 
का विचार करते हुए पूछा-- 'प्रगर मेरे मस्तक पर कोई श्रपने पैर से प्रहार करे तो उसे क्या दड़ 
देना चाहिये ? 


१२२] [नम्दीलृत्र 


युवको ने तुरन्त उत्तर दिया--'ऐसे व्यक्ति के टुकडे-टुकडे कर देना चाहिए ।” राजा ने 
यही प्रश्न दरबार के अनुभवी बृद्धों से भी किया | उन्होने सोच विचारकर उत्तर दिया--देव 
जो व्यक्ति आपके मस्तक पर चरणो से प्रहार करे उसे प्यार करना चाहिए तथा वस्त्राभूषणों से लाद 
देना चाहिये । 


ब॒द्धो का उत्तर सुनकर नवयुवक श्रापे से बाहर हो गये | राजा ने उन्हे शात करते हुए उन 
वढ़ों से श्रपनी बात को स्पष्ट करने के लिये कहा । एक बुजुर्ग दरबारी ने उत्तर दिया--“महाराज ! 
झापके मस्तक पर चरणो का प्रहार आपके पुत्र के अलावा और कौन करने का साहस कर सकता 
है ” और शिशु राजकुमार को भला कोन-सा दड दिया जाना चाहिए ? 


बृद्ध का उत्तर सुनकर सभी नवयुवक अपनी श्रज्ञानता पर लज्जित होकर पानी-पानी हो 
गये । राजा ने प्रसन्न होकर अपने वयोव॒द्ध दरबारियो को उपहार प्रदान किये तथा उन्हे ही अपने 
पदो पर रखा । युवकों से राजा ने कहा- “राज्यकार्य मे शक्ति की श्रपेक्षा बुद्धि की ग्रावश्यकता 
अधिक होती है ।” इस प्रकार वृद्धो ने तथा राजा ने भी अपनी पारिणामिकी बुद्धि का परिचय दिया। 


(१७) ऑवबला-एक कुम्हार ने किसी व्यक्ति को मूर्ख बनाने के लिये पीली मिट्टी का एक 
आँवला बनाकर दिया जो ठीक श्रँविले के सदृश ही था। ग्रॉवला हाथ मे लेकर वह व्यक्ति विचार 
करने लगा--“यह आ्राकृति मे तो आ्रॉवले ज॑ंसा है, किन्तु कठोर है श्ौर यह ऋतु भी श्रॉवलो की नहीं 
है ।” झ्पनी पारिणामिकी बुद्धि से उसने आँवले की क्त्रिमता को जान लिया और उसे फंक दिया । 


(१८) मणि-- किसी जगल मे एक मणिधर सप॑ रहता था। रात्रि मे वह व॒क्ष पर चढ़कर 
पक्षियों के बच्चो को खा जाता था। एक बार वह अपने शरीर को सभाल नही सका और वृक्ष से 
नीचे गिर पडा । गिरते समय उसकी मणि भी वृक्ष की डालियो में श्रटक गई। उस वृक्ष के नीचे 
एक कुआ था । मणि के प्रकाश से उसका पानी लाल दिखाई देने लगा। प्रात काल एक बालक 
खलता हुआ उधर झा निकला और कुए के चमकते हुए पानी को देखकर घर जाकर अपने वृद्ध पिता 
को बुला लाया । बुद्ध पिता पारिणामिकी बुद्धि से सम्पन्न था। उसने पानी को देखा और जहाँ से 
पानी का प्रतिबिब पडता था, वृक्ष के उस स्थान पर चढ़कर मणि खोज लाया । श्रत्यन्त प्रसन्न होकर 
पिता पुत्र घर की श्रोर चल दिये । 


(१९) सर्प--भगवान्‌ महावीर ने दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात्‌ प्रथम चातुर्मास अ्रस्थिक 
ग्राम मे किया तथा चातुर्मास के पश्चात्‌ श्वेताम्बिका नगरी की ओर विहार कर दिया। कुछ भ्रागे 
बढने पर ग्वालो ने उनसे कहा --/“भगवन्‌ | आप इधर से न पधारे क्योकि मार्ग मे एक बडा भयकर 
दृष्टिविष सर्प रहता है, जिसके कारण दूर-दूर तक कोई भी प्राणी जाने का साहस नही करता । 
ग्राप श्वेताम्बिका नगरी के लिए दूसरा मार्ग ग्रहण करे । भगवान्‌ ने ग्वालो की बात सुनी पर उस 
सर्प को प्रतिबोध देने की भावना से वे उसी मार्ग पर श्रागे बढ गये । 


चलते-चलते वे विषधर सं की बॉबी पर पहुँचे श्रौर वही कायोत्सगं मे स्थिर हो गए । कुछ 
क्षणो के पश्चात्‌ ही नाग बाहर श्राया ओर अपने बिल के समीप ही एक व्यक्ति को खड़े देखकर 
ऋ्रोधित हो गया । उसने अपनी विषेली दृष्टि भगवान्‌ पर डाली किस्तु उन पर कोई असर नही 
हुआ । यह देखकर सर्प ने श्रागबबूला होकर सूर्य की झ्ोर देखा तथा फुफकारते हुए पुन विषाक्त 


सतिज्ञान ] [१२३ 


दृष्टि उन पर फंकी । उसका भी जब भसर नही हुआ तो उसने तेजी से सरसराते हुए आकर भगवान्‌ 
के चरण के अँगूठे को जोर से डस लिया | पर डसने के बाद स्वय ही यह देखकर घोर भ्राश्चर्य मे 
पड़ गया कि उसके विष का तो कोई प्रभाव हुआ नहीं उलटे अँगूठे से निकले हुए रक्त का स्वाद हो 
बड़ा मधुर भ्रौर विलक्षण है | यह अनुभव करने के बाद उसे विचार आया--यह साधारण नहीं 
भ्रपितु कोई विलक्षण झौर अ्रलौकिक पुरुष है। बस, सर्प का क्रोध शान्त तो हुआ ही, उलटा वह बहुत 
भयभीत होकर दीन-दृष्टि से ध्यानस्थ भगवान्‌ की ओर देखने लगा । 


तब महावीर प्रभ ने ध्यान खोला प्रौर अत्यन्त स्नेहपूर्ण दृष्टि से उसे सम्बोधित करते हुए 
कहा--“है चण्डकौशिक ! बोध को प्राप्त करो तथा अपने पूर्व भव को स्मरण करो | पूर्व जन्म 
में तुम साधु थे और एक शिष्य के गुरु भी । एक दिन तुम दोनो झ्राहार लेकर लौट रहे ये, तब 
तुम्हारे पैर के नीचे एक मेढक दबकर मर गया था। तुम्हारे शिष्य ने उसी समय तुमसे आलोचना 
करने के लिए कहा था किन्तु तुमने ध्यान नहीं दिया। शिष्य ने सोचा--“गुरुदेव स्वय॑ तपस्वबी है, 
सायकाल स्वय आलोचना करेंगे ।' किन्तु तुमने सायकाल प्रतिक्रमण के समय भी श्रालोचना नही 
की तो सहज भाव से शिष्य ने आलोचना करने का स्मरण कराया। पर उसकी बात सुनते हो तुम 
फ्रोध मे पागल होकर शिष्य को मारने के लिए दौडे परन्तु मध्य मे स्थित एक खंभे से टकरा गये । 
तुम्हारा मस्तक स्तभ से टकराकर फट गया और तुम मृत्यु को प्राप्त हुए। भयकर क्रोध करते समय 
मरने से तो तुम्हे यह सपं-योनि मिली है श्रौर भ्रब पुन क्रोध के वशीभूत होकर श्रपना जन्म बिगाड़ 
रहे हो ! चण्डकौशिक, अरब स्वय को सम्हालो, प्रतिबोध को प्राप्त करो ।” 

ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से तथा भगवान्‌ के उपदेश से चण्डकौशिक को जातिस्मरण 
ज्ञान हो गया । उसने भ्रपने पूर्वभव को जाना । अपने क्रोध व अपराध के लिए पश्चात्ताप करने लगा। 
उसी समय उसने भगवान्‌ को विनयपूर्वक वन्दना की तथा झाजीवन अ्रनशन कर लिया | साथ ही 
दृष्टिविष होने के कारण उसने अ्रपना मु हू बिल मे डाल लिया, शरीर बाहर रहा । 


कुछ काल पश्चात्‌ ग्वाले भगवान्‌ की तलाश में उधर श्राए। उन्हे सकुशल वहाँ से रवाना 
होते देख वे महान्‌ ग्राश्चर्य मे पड गए । इधर जब उन्होंने चण्डकौशिक को बिल मे मुह डालकर 
पड़े देखा तो उस पर पत्थर तथा लकडी आदि से प्रहार करने लगे। चण्डकौशिक सभो चोटो को 
समभाव से सहन करता रहा | उसने बिल से बाहर अपना मुह नहीं किया। जब श्रासपास के लोगो 
को इस बात का पता चला तो भु ड के कु इ बनाकर सब सपं को देखने के लिए ग्राने लगे । सं के 
शरीर पर पडे घावो पर चीटियाँ शौर अन्य जीव इकट्ठे हो गये थे और उसके शरीर को उन सबने 
काट-काटकर चालनी के समान बना दिया था। पन्द्रह दिन तक चण्डकौशिक सर्प सब यातनाओं 
को शाति से सहता रहा । यहाँ तक कि उसने अपने शरीर को भो नही हिलाया, यह सोचकर कि 
मेरे हिलने से चोटियाँ प्रथवा अन्य छोटे-छोटे कीडे-मकोडे दब कर मर जाएगे। 


पन्द्रह दिन पश्चात्‌ श्रपने ग्रनशन को पूरा कर वह मृत्यु को प्राप्त हुआ तथा सहस्लार नामक 
श्राठवें देवलोक मे उत्पन्न हुआ । यह उसकी पारिणासिकी बुद्धि थी । 

(२०) गेंडा--एक व्यक्ति ने युवावस्था मे श्रावक के प्रतों को घारण किया किन्तु उन्हें 
सम्यक्‌ प्रकार से पाल नही सका । कुछ काल पश्चात्‌ वह रोगग्रस्त हो गया और अपने भग किये हुए 
ब्रतों की श्रालोचना नही कर पाया । वैसी स्थिति मे जब उसकी मृत्यु हो गई तो धर्म से पतित होने 


१२४] [ नम्दीसूत्र 


के कारण एक जंगल मे गेड़े के रूप में उत्पन्न हुआ। अपने क्र परिणामों के कारण वह जमल के 
प्रन्य जीवो को तो मारता ही था, ग्राने-जाने वाले मनुष्यो को भी मार डालता था । 

एक बार कुछ मुनि उस जगल में से विहार करते हुए जा रहे थे । गेडे ने ज्यो ही उन्हे देखा, 
क्रोधपूर्वंक उन्हे मारने के लिए दौडा । किन्तु मुनियों के तप, तेज व श्रहिसा आदि धर्म के प्रभाव से 
वह उन तक पहुँच नही पाया श्रौर श्रपने उदं श्य मे श्रसफल रहा | गेंडा यह देखकर विचार में पड 
गया श्रौर अपने निस्तेज होने के कारण को खोजने लगा। धीरे-धीरे उसका क्रोध शात हुआ श्रौर 
उसे ज्ञानावरणीय कर्मों के क्षयोपश्म से जातिस्मरण ज्ञान हो गया। श्रपने पृबंभव को जानकर उसे 
बडी ग्लानि हुई प्लौर उसी समय उसने भ्रनशन कर लिया । श्रायुष्य पूरा हो जाने पर वह देवलोक में 
देव हुआ । शभ्रपनी पारिणामिकी बुद्धि के कारण ही गेडे ने देवत्व प्राप्त किया । 

(२१) स्तृप-भेदन--कुणिक भ्ौर विहल्लकुमार, दोनो ही राजा श्रेणिक के पुत्र थे | श्रेणिक 
ने अपने जीवनकाल मे ही सेचनक हाथी तथा वड्धूचड हार दोनो विहल्लकुमार को दे दिये थे तथा 
कुणिक राजा बन गया था | विहल्लकुमार प्रतिदिन श्रपनी रानियो के साथ हाथी पर बैठकर जल- 
क्रीडा के लिये गगातट पर जाता था । हाथी रानियो को ग्रपनी सूड से उठाकर नाना प्रकार से 
उनका मनोरजन करता था। विहल्लकुमार तथा उसकी रानियो की मनोरजक क्रीडाएँ देखकर 
जनता भाति-भाति से उनकी सराहना करती थी तथा कहती थी कि राज्य-लक्ष्मी का सच्चा उपभोग 
तो विहललकुमार ही करता है । 

राजा कुणिक की रानी पद्मावती के मन मे यह सब सुनकर ईर्ष्या होती थी । वह सोचती 
थी--महारानी मैं हूँ पर श्रधिक सुख-भोग विहल्लकुमार की रानियाँ करती है। उसने अपने पति 
राजा कुणिक से कहा-- “यदि सेचनक हाथी श्रौर प्रसिद्ध हार मेरे पास नही है तो मै रानी किस 
प्रकार कहला सकती हूँ ? मुझे दोनो चीजे चाहिए ।” कुणिक ने पहले तो पदुमावती की बात पर 
ध्यान नही दिया किन्तु उसके बार-बार श्राग्रह करने पर विहल्लकुमार से हाथी और हार देने के 
लिये कहा । विहल्लकुमार ने उत्तर मे कहा--“अगर शाप हार और हाथी लेना चाहते है तो मेरे 
हिस्से का राज्य मुझे दे दीजिए ।” कुणिक इस बात के लिए तैयार नही हुआ झ्ौर उसने दोनो चीजे 
विहल्‍ल से जबद॑स्ती ले लेने का निश्चय किया । विहलल को इस बात का पता चला तो वह हार और 
हाथी लेकर रानियो के साथ श्रपने नाना राजा चेडा के पास विशाला नगरी मे चला गया । 


राजा कुणिक को बडा क्रोध श्राया श्र उसने राजा चेडा के पास दूत द्वारा सदेश भेजा-- 

“राज्य की श्रेष्ठ वस्तुएँ राजा की होती हैं, अत हार झ्रौर हाथी सहित विहल्लकुमार व उसके 
भ्रन्त पुर को आप वापिस भेज दे श्रन्यथा युद्ध के लिए तेयार हो जाएं ।”' 

कुणिक के सदेश्ष के उत्तर में चेडा ने कहलवा दिया -“जिस प्रकार राजा श्रेणिक व चेलना 
रानी का पुत्र कुणिक मेरा दोहित्र है, उसी प्रकार विहल्लकुमार भी है। विहल्‍ल को श्रेणिक ने अपने 
जीवनकाल मे ही ये दोनो चीजें प्रदान कर दी थी, शभ्रत उसी का श्रधिकार उस पर है। फिर भी 
प्गर कुणिक इन दोनो को लेना चाहता है तो विहल्‍्लकुमार को श्राधा राज्य दे दे । ऐसा न करने पर 
भ्रगर वह युद्ध करना चाहे तो मैं भी तेयार हूँ ।” 

राजा चेडा का उत्तर दूत ने कुणिक को ज्यो का त्यो कह सुनाया | सुनकर कुणिक क्रोध के 
मारे श्रापे मे न रहा और अपने प्रन्य भाइयो के साथ विशाल सेना लेकर विश्ञाला नगरी पर चढाई 


सतिज्ञान ] [१२५ 


करने के लिये चल दिया । राजा चेडा ने भी कई प्रन्य गण-राजाग्रो को साथ लेकर कुणिक का सामना 
करने के लिये युद्ध के मंदान की श्रोर प्रयाण किया । 


दोनो पक्षो मे भीषण युद्ध हुआ भौर लाखो व्यक्ति काल-कवलित हो गये । इस युद्ध मे राजा 
चेडा पराजित हुश्रा श्रौर वह पीछे हटकर विद्याला नगरी मे भ्रा गया । नगरी के बारो श्रोर विशाल 
परकोटा था, जिसमे रहे हुए सब द्वार बद करवा दिए गए । कुणिक ने परको्ट को जगह-जगह से 
तोडने की कोशिश की पर सफलता नही मिली । इस बीच झाकाशवाणों हुई--“प्रगर कूलबालक 
साधु मागधिका वेश्या के साथ रमण करे तो कुणिक नगरी का कोट गिराकर उस पर अपना 
ग्रधिकार कर सकता है । 


कुणिक आकाशवाणी सुनकर चकित हुझ्ना पर उस पर विश्वास करते हुए उसने उसी समय 
मागधिका गणिका को लाने के लिए राज-सेवको को दौडा दिया । मागधिका भा गई और राजा की 
प्राज्ा शिरोधाये करके वह कूलबालक मुनि को लाने चल दी । 


कलबालक एक महाक्रोधी श्रौर दुष्ट-बुद्धि साधु था । जब वह अपने गुरु के साथ रहता था 
तो उनकी हितकारी शिक्षा का भी गलत शअ्रर्थ निकालकर उनपर क्रूद्ध होता रहता था। एक बार वह 
अपने भुरु के साथ किसी पहाडी मार्ग पर चल रहा था कि किसी बात पर क्रोध आते ही उसने गुरुजी 
को मार डालने के लिए एक बडा भारी पत्थर पीछे से उनकी श्रोर लुढका दिया । श्रपनी झोर पत्थर 
ग्राता देखकर आचार्य तो एक ओर होकर उससे बच गए किन्तु शिष्य के ऐसे घृणित श्रौर अ्रसहनीय 
कुकृत्य पर कुपित होकर उन्होने कहा- “दुष्ट | किसी को मार डालने जेसा नीच कर्म भी तू कर 
सकता है ? जा | तेरा पतन भी किसी स्त्री के द्वारा होगा । 


कूलबालक सदंव गुरु की श्राज्ञा से विपरीत ही कार्य करता था। उनकी इस बात को भी 

भूठा साबित करने के लिए वह एक निजंन प्रदेश मे चला गया। वहाँ स्त्री तो क्या पुरुष भी नही 

रहते थे । वही एक नदी के किनारे ध्यानस्थ होकर वह तपस्या करता था। श्राहार के लिए भी कभी 

वह गाव में नही जाता था अ्रपितु सयोगवश कभी कोई यात्री उधर से गुजरता तो उससे कुछ प्राप्त 

करके शरीर को टिकाये रहता था । एक बार नदी में बडे जोरो से बाढ़ श्राई, उसके बहाव में वह 

पलमात्र मे बह सकता था, किन्तु उसकी घोर तपस्या के कारण ही नदी का बहाव दूसरी प्लोर हो 
गया । यह आश्चर्यजनक घटना देखकर लोगो ने उसका नाम 'कूलबालक भुनि' रख दिया । 


इधर जब राजा कुणिक ने मागधिका वेश्या को भेजा तो उसने पहले तो कूलबालक के स्थान 
का पता लगाया और फिर स्वय ढोगी श्राविका बनकर नदी के समीप ही रहने लगी । अ्रपनी सेवार्भकक्ति 
से द्वारा उसने कूलबालक को आकर्षित किया तथा आ्राहार लेने के लिए भ्राग्रह किया । जब वह भिक्षा 
लेने के लिए मागधिका के यहाँ गया तो उसने खाने की वस्तुएँ विरेचक ऑऔषधि-मिश्रित दे दी, जिनके 
कारण कूलबालक को भ्रतिसार की बीमारी हो गई । बीमारी के कारण वेश्या साधु की सेवा-शुश्रषा 
करने लगी । इसी दौरान वेश्या के स्पश से साधु का मन विचलित हो गया और वह शअपने चारित्र 
से भ्रष्ट हुआ । साधु की यह स्थिति ग्रपने श्रनुकूल जानकर वेश्या उसे कुणिक के पास ले आई । 


कुणिक ने कलबालक साधु से पूछा--'विशाला नगरी का यह दढ़ और महाकाय कोट कैसे 
तोडा जा सकता है ?” कूलबालक श्पने साघुत्व से भ्रष्ट तो हो ही चुका था, उसने नैमित्तिक का 


१२६] [ नम्वीसत्र 


वेष धारण किया और राजा से बोला-- “महाराज ' मैं नगरी मे जाता हूँ पर जब श्वेत वस्त्र हिलाकर 
श्रापको सकेत दू तब झाप सेना को लेकर कुछ पीछे हट जाइयेगा । 


नेमित्तिक का रूप होने से उसे नगर मे प्रवेश करने दिया गया श्रौर नगरवासियों ने पूछा-- 
“महाराज ' राजा कुणिक ने हमारी नगरी के चारो श्रोर घेरा डाल रखा है, इस सकट से हमे कंसे 
छुटकारा मिल सकता है ?” कूलबालक ने अपने ज्ञानाभ्यास द्वारा जान लिया था कि नगरी मे जो 
स्तृप बना हुआ्ना है, इसका प्रभाव जबतक रहेगा, कुणिक विजय प्राप्त नही कर सकता | श्रत उन 
नगरवासियो के द्वारा ही छल से उसे गिरवाने का उपाय सोच लिया। वह बोला-- “भाइयो ' तुम्हारी 
नगरी में भ्रमुक स्थान पर जो स्तूप खडा है, जबतक वह नष्ट नही हो जायगा, तबतक कुणिक घेरा 
डाले रहेगा भ्रौर तुम्हे सकट से मुक्ति नही मिलेगी । श्रत इसे गिरा दो तो कुणिक हट जाएगा ।” 

भोले नागरिको ने नैमित्तिक की बात पर विश्वास करके स्तूप को तोडना प्रारम्भ कर दिया । 
इसी बीच कपटी नेमित्तिक ने सफेद वस्त्र हिलाकर अपनी योजनानुसार कुणिक को पीछे हटने का 
सकेत किया और कुणिक सेना को कुछ पीछे हटा ले गया । नागरिकों ने जब यह देखा कि स्तूप के 
थोडा सा तोडते ही कुणिक की सेना पीछे हट रहो है तो उसे पूरी तरह भगा देने के लिये स्तूप को 
बडे उत्साह से तोडना प्रारम्भ कर दिया । कुछ समय मे ही स्तूप धराशायी हो गया । पर हुआ्ना यह 
कि ज्योही स्तूप टूटा, उसका नगर-कोट की दृढ़ता पर रहा हुम्रा प्रभाव समाप्त हो गया और कुणिक 
ने तुरन्त आगे बढकर कोट तोडते हुए विशाला पर अपना भ्रधिकार कर लिया । 

कूलबालक साधु को अपने वष्य मे कर लेने की पारिणामिकी बुद्धि वेश्या की थो और स्तूप- 
भेदन कराकर कुणिक को विजय प्राप्त कराने मे कूलबालक की पारिणामिकी बुद्धि ने कायें किया । 

प्रश्नुतनिश्रचित मतिज्ञान का वर्णन पूर्ण हुआ । 

श्रुतनिश्चित मतिज्ञान 

श्रसे कि ते सुयनिस्सिय ? 

सुयनिस्सिय चउब्विहं पण्णत्त, त जहा-- 

(१) उर्गहे (२) ईहा (३) अबाओ (४) घारणा। । सूत्र २७ ।। 

५३- शिष्य ने पूछा --श्रुतनिश्चित मतिज्ञान कितने प्रकार का है ? 

गुरु ने उत्तर दिया--वह चार प्रकार का है यथा-- 

(१) अवग्रह (२) ईह (३) शभ्रवाय (४) धारणा। 

विवेचन-- प्रस्तुत सूत्र मे बताया गया है कि कभी तो मतिज्ञान स्वतत्र रूप से कार्य करता है 
श्रोर कभी श्रुतञञाान के सहयोग से । जो मतिज्ञान श्रुतज्ञान के पृवंकालिक सस्कारो के निमित्त से 


उत्पन्न होता है, उसके चार भेद हो जाते है-प्रवग्रह, ईहा, श्रवाय और धारणा। इनकी सक्षिप्त 
व्याख्या निम्न प्रकार से है-- 


(१) अबपग्रह - जो ज्ञान नाम, जाति, विशेष्य, विशेषण आदि विशेषताओं से रहित, मात्र 
सामान्य को ही जानता है वह श्रवग्रह कहलाता है। वादिदेवसूरि लिखते हैं--“विषयर--विषयिस ्नि- 


भतिज्ञाम ] [१२७ 


पातानन्तरसमुद्भूत-सत्तामात्रगोचर-दर्शनाज्जातमाद्यम्‌ू, श्रवान्तरसामान्याकारविशिष्टवस्तुग्रहणमब- 
ग्रह | 
--प्रमाणनयतत्त्वालोक, परि २ सू० 
अर्थात्‌--विषय-पदार्थ और विषयी-इस्द्रिय, नो-इन्द्रिय ग्रादि का यथोचित देश में सम्बन्ध 
होने पर सत्तामात्र (महासत्ता) को जाननेवाला दर्शन उत्पन्न होता है। इसके अ्रनन्तर सबसे पहले 
मनुष्यत्व, जीवत्व, द्रव्यत्व आदि ग्रवान्तर (अ्रपर) सामान्य से युक्त वस्तु को जाननेवाला ज्ञान श्रवग्रह 
कहलाता है । 

जैनागमो में उपयोग के दो प्रकार बताये हैं--(१) साकार उपयोग तथा (२) भ्रनाकार 
उपयोग । इन्ही को ज्ञानोपयोग एवं दर्शनोपयोग भी कहा गया है। ज्ञान का पृर्वभावी होने से 
दर्शनोपयोग का भी वर्णन ज्ञानोपयोग का वर्णन करने के लिए किया गया है। ज्ञान की यह धारा 
उत्तरोत्तर विशेष की ग्रार भुकती जाती है । 

(२) ईहा- भाष्यकार ने ईहा की परिभाषा करते हुए बताया है-अ्रवग्नरह मे सत्‌ श्लौर भ्रमत्‌ 
दोनो से श्रतीत सामात्यमात्र का ग्रहण होता है किन्तु उसकी छानबीन करके भ्रसत्‌ को छोडते हुए 
सत्‌ रूप का ग्रहण करना ईहा का काये है। प्रमाणनय-तच्बालोक में भी ईहा का स्पष्टीकरण करते 
हुए बताया है “पअ्रवगृहीताथंविशेषाकाक्षणमीहा | 

प्र्थात्‌ अवग्नह से जाने हुए पदार्थ मे विशेष जानने की जिज्ञासा को ईहा कहते है । दूसरे 
शब्दों मे अ्रवग्रह से कुछ श्रागे और ग्रवाय से पूर्व सत-रूप श्रर्थ की पर्यालोचनरूप चेष्टा ही ईहा 
कहलाती है । 

(३) श्रवाय - निश्चयात्मक या निर्णयात्मक ज्ञान को भ्रवाय कहते है । प्रमाणनयतत्त्वालोक मे 
श्रवाय की व्याख्या को गई है-- “ईहितविशेषनिर्णयोआबाय ।* 

अर्थात्‌ -ईहा द्वारा जाने गए पदार्थ मे विशेष का निर्णय हो जाना अ्रवाय है। निश्चय और 
निर्णय ग्रादि प्रवाय के ही पर्यायान्तर है | इसे 'अपाय' भी कहते है । 


(४) धारणा--“स एवं दृढतमावस्थापन्नो धारणा । 
- प्रमाणनयतत्त्वालोक 


-जब ग्रवाय ज्ञान अत्यन्त दृढ हो जाता है, तब उसे धारणा कहते है । निश्चय तो कुछ 
काल तक स्थिर रहता है फिर विषयान्तर मे उपयोग के चले जाने पर वह लुप्त हो जाता है। किन्तु 
उससे ऐसे सस्कार पड जाते है, जिनसे भविष्य मे किसी निमित्त के मिल जाने पर निश्चत किए हुए 
विषय का स्मरण हो जाता है। उसे भी धारणा कहा जाता है । धारणा के तीन प्रकार होते हैं- 

(१) अ्रविच्युति--अवाय मे लगे हुए उपयोग से च्युत न होना । अ्रविच्युति धारणा का भ्रधिक 
से ग्रधिक काल अन्‍्तमु हृत्तं का होता है। छद्मयस्थ का कोई भी उपयोग भ्रन्तमु हूत्ते से श्रधिक काल तक 
स्थिर नही रहता । 

(२) वासना-श्रविच्युति से उत्पन्न सस्कार वासना कहलाती है। ये सस्कार सख्यात वर्ष 
की आयु वालो के सख्यात काल तक और भ्रसख्यात काल की श्रायु वालो के श्रसख्यात काल तक भी 
रह सकते है । 


१५८ ] [ नन्दीसूत्र 


(३) स्मृति--कालान्तर मे किसी पदार्थ को देखने से भ्रथवा किसी प्रन्य निमित्त के द्वारा 
सस्कार प्रबुद्ध होने से जो ज्ञान होता है, उसे स्मृति कहा जाता है । 


श्रुतनिश्चित मतिज्ञान के ये चारो प्रकार क्रम से ही होते है। अवग्रह के बिना ईहा नही होती, 
ईहा के बिना भ्रवाय (निश्चय) नही होता और अवाय के श्रभाव मे धारणा नही हो सकती । 


(१) अवग्रह 

भ्रड--से कि त उग्गहे ? 

उग्गहे दुधिहे पण्णसे, त जहा--अत्थुग्गहे थ बजणुग्गहे य ।  ।। सूत्र ० २८ ।। 

प्रश्न-अवग्रह कितने प्रकार का है ? 

उत्तर--बह दो प्रकार से प्रतिपादित किया गया है। (१) ग्रर्थावग्रह (२) व्यजनावग्रह । 

विवेचन- सूत्र मे श्रवग्नह के दो भेद बताए गए हैं । एक श्रर्थावग्रह और दूसरा व्यजनावग्रह । 
अर्थ' वस्नु को कहते है । वस्तु और द्रव्य, ये दोनो पर्यायवाची शब्द है । जिसमे सामान्य श्रौर विशेष 
दोनो प्रकार के घ॒र्म रहते हैं, वह द्रव्य कहलाता है । अवग्रह, ईहा, अवाय श्रौर धारणा, ये चारो 
सम्पूर्ण द्रव्यग्राही नही है । ये प्राय पर्यायों को हो ग्रहण करते है। पर्याय से भ्नन्‍्त धर्मात्मक वस्तु 
का ग्रहण स्वत हो जाता है। द्रव्य के अवस्थाविशेष को पर्याय कहते है। कर्मो से आवृत देहगत 
आत्मा को इन्द्रियो श्रौर मन के माध्यमों से ही बाह्य पदार्थों का ज्ञान होता है । 

ग्औदारिक, वेक्रिय श्रौर ग्राहारक शरीर के अगोपाड्डनामकर्म के उदय से द्रव्येन्द्रियाँ प्राप्त 
होती है तथा ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से भावेन्द्रियां प्राप्त होती है । 
द्रव्येन्द्रियाँ तथा भावेन्द्रियाँ, दोनो ही एक दूसरी के बिना अकिचित्कर है । इसलिए जिन-जिन जीवो 
को जितनी-जितनी इन्द्रियाँ मिलती हैं वे उसके द्वारा उतना-उतना ही ज्ञान प्राप्त करते है । जेसे 
एकेन्द्रिय जीव को केवल स्पर्ेन्द्रिय के द्वारा भ्रर्थावग्नह श्रौर व्यजनावग्रह होता है । ग्रर्थावग्रह 
पटुक्रमी तथा व्यजनावग्रह मन्दक्रमी होता है । अर्थावग्नह श्रभ्यास से तथा विशेष क्षयोपशम से होता 
है और व्यजनावग्रह भ्रभ्यास के विना तथा क्षयोपशम की मन्दता में होता है । 


यद्यपि सूत्र मे प्रथम भ्र्थावग्नह का और फिर व्यजनावग्रह का निर्देश किया गया है किन्तु 
उनकी उत्पत्ति का क्रम इससे विपरीत है, अर्थात्‌ पहले व्यजनावग्रह और तत्पश्चात्‌ श्रर्थावग्रह उत्पन्न 
होता है । 

“व्यज्यते श्रनेनेति व्यञ्जन' अथवा '“व्यज्यते इति व्यञ्जनम्‌' भ्रर्थात्‌ जिसके द्वारा व्यक्त किया 
जाए या जो व्यक्त हो, वह व्यजन कहलाता है । इस व्युत्पत्ति के ग्रबुसार व्यजन के तीन श्रर्थे फलित 
होते है-- (१) उपकरणेन्द्रिय (२) उपकरणेन्द्रिय तथा उसका अपने ग्राह्म विषय के साथ सयोग और 
(३) व्यक्त होने वाले शब्दादि विषय । 


सर्वप्रथम होने वाले दर्शनोपयोग के पश्चात्‌ व्यञ्जनावग्रह होता है। इसका काल अ्रसख्यात 
समय है | व्यजनावग्रह के प्रन्त में श्रर्थावग्रह होता है श्रौर इसका काल एक समय मात्र है । श्रर्थावग्रह 
के द्वारा सामान्य का बोध होता है । यद्यपि व्यजनावग्रहे के द्वारा ज्ञान नही होता तथापि उसके अ्रन्त 
मे होने वाले श्रर्थावग्रह के ज्ञानरूप होने से, अर्थात्‌ ज्ञान का कारण होने से व्यजनावग्रह भी उपचार 


मतिलान ] [१२९ 
से ज्ञान माना गया है । एवं व्यजनावग्रह में भी अत्यल्प-प्रव्यक्त ज्ञान की कुछ मात्रा होतो प्रवश्य है, 
क्योकि यदि उसके असख्यात समयो में लेश मात्र भी ज्ञान न होता तो उसके श्रन्त में प्र्थावग्रह में 
यकायक ज्ञान कैसे हो जाता ! अतएव प्रनुमान किया जा सकता है कि व्यजनावग्रह मे भी प्रव्यक्त 
ज्ञानाश होता है किन्तु भ्रति स्वल्प रूप में होने के कारण वह हमारी प्रतीती मे नही श्राता । 


दर्शनोपयोग महासमान्य--सत्ता मात्र का ग्राहक है, जबकि प्रवयह में भ्रपरसामान्य-- 
मनुष्यत्व भ्रादि--का बो